रहस्य

24 कहानियों का गुलदस्ता है ‘रहस्य’

कृति: रहस्य (कहानी संग्रह)
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशकः पंकज बुक्स
109-ए, पटपड़गंज गाँव
दिल्ली-110091

पृष्ठः 128 मूल्यः 395/-

समीक्षकः मुकेश कुमार सिन्हा

हमारे आस-पास कहानियों के अनगिनत पात्र बिखरे पड़े हैं, बस जरूरत है उन पात्रों को, शब्द रूपी पुष्पों में ढालने की। पुष्पों को चुन-चुनकर हम उसे माला का रूप दे सकते हैं। रंग-बिरंगे पुष्पों से तैयार माला गुलदस्ता रूप में लोगों का बरबस ध्यान आकर्षित करता है। कौन नहीं चाहेगा रंग-बिरंगे फूलों के गुलदस्ता को हाथों में लेना? ऐसा ही एक गुलदस्ता है-‘रहस्य’। 24 कहानियों से सुसज्जित है यह। कहानीकार हैं-किरण सिंह।
किरण सिंह केवल कहानियाँ नहीं गढतीं, साहित्य की हर विधा पर अपनी कलम चलाती हैं। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मान सहित कई सम्मानों से सम्मानित किरण सिंह की कलम कविता गढ़ती है, दोहे रचती है, कहानियाँ भी सृजित करती है। ‘प्रेम और इज्जत’ के बाद किरण सिंह की कहानियों की यह दूसरी पुस्तक है।
बकौल किरण, ‘हमारे आसपास के वातावरण में कई तरह की घटनाएँ घटित होती रहतीं हैं, जिसे देखकर या सुनकर हमारा संवेदनशील मन कभी हर्षित होता है तो कभी व्यथित और फिर कभी अचंभित भी। ऐसे में हम मानव के स्वभावानुरूप अपने-अपने मित्रों, पड़ोसियों आदि से उस घटना की परिचर्चा करके अपनी मचलती हुई संवेदनाओं को शांत करने का प्रयास करते हैं। किंतु, एक लेखक की लेखनी मचलने लगती है, शब्द चहकने लगते हैं और लिख जाती हैं खुद-ब-खुद कहानियाँ।
किरण सिंह रचित ‘रहस्य’ की कहानियों में नारी के अंतर्मन की चाहत है, नारी की बेबसी है, तो समाज से उम्मीद भी। आखिर समाज से नारी उम्मीद नहीं लगाये, तो किससे लगायेगी? कितना त्याग करती है नारी? माँ रूप में, पुत्री रूप में, बहन रूप में और न जाने कितने रिश्तों को निभाते-निभाते अपनी खुशियों की भी परवाह नहीं करती है। कहानियों में नयी पीढ़ी को संदेश है, तो नारी को नसीहत भी।
भले ही ‘रहस्य’ से पर्दा उठ गया, लेकिन यह प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम अन्तर्मन से होता है, यह हाट में बिकने वाली चीज नहीं है। ‘यह मैं सोना के लिए लाया हूँ। उससे ब्याह करूँगा।’ यह हीरा ने कहा। हीरा और सोना का एक-दूसरे से बहुत प्यार था, मगर दोनों विवाहित थे।
कभी कुएँ में गिरे सोना को निकालने वाला हीरा उसे फिर कुएँ से निकालता है, लेकिन तब वह बेजान होती है। लोगों के बीच चर्चा थी कि कुएँ पर सोना की आत्मा भटकती है, पायल की झंकार सुनायी देती है। हालाँकि वह सोना नहीं होती। वह तो हीरा होता है, जो अक्सर रात को चूड़ियाँ, बिंदिया तथा पायल-सिंदूर को लाल रंग के बक्से में रखकर कुएँ के पास पहुँचता है, यह आस लिए कि सोना जिंदा कुएँ से लौटेगी और वह ब्याह रचायेगा!
दिल से किया गया ‘प्यार’ हमेशा पूर्णतः को प्राप्त करता है। ऋचा को पाकर ऋषभ इठला उठा था। हालाँकि ऋचा का संबंध अभिषेक से हो जाता है, लेकिन प्यार का पलड़ा ऋषभ का ही भारी रहा। ‘लाल गुलाब’ लेकर ऋषभ के खड़ा होने से ऋचा का चेहरा गुलाब-सा खिलना लाजिमी था। यह ‘विडम्बना’ ही है कि विवेहत्तर संबंध का खामियाजा स्त्री को ही भुगतना पड़ता है। मेघा यह जान गयी थी कि उसके पति का संबंध उसकी जेठानी से है, फिर भी वह यह सोचकर चुप हो जाती है कि जेठानी की क्या गलती? इस परिवार ने छलकर ही उनकी शादी नपुंसक बेटे से करा दी। वहीं ‘अपशगुन’ कहानी नारी मन की पीड़ा को उजागर करती है।
कहानीकार की कहानियाँ माता-पिता को सलाह देती है। सच में, हम अपनी औलाद को इतना लाड़-प्यार देने लगते हैं कि उनकी गलतियों को नजरअंदाज कर देते हैं। फलतः औलाद के पाँव भटक जाते हैं। जरूरत है माँ-पिता को सही परवरिश देने की, ताकि हर माँ यह कह पाये-‘बेटा सोने पर लाख धूल मिट्टी जम जाये, थोड़ा-सा तपा दो चमक ही जाता है।’ फैशनपरस्त नयी पीढ़ी को नसीहत देती है-‘झूठी शान’। कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता, बस राह गलत न हो!
अक्सर युवा मन भटक जाता है। एकतरफा प्यार के चक्कर में वह कैरियर को दाँव पर लगा देता है। हालाँकि जो संभल गया, उसकी चाँदी है और जो न समझा, वह कैरियर व भविष्य को चौपट कर लेता है। विक्की सँभल गया, इसलिए अच्छे पद पर पहुँचा। कितना अच्छा होता, यदि ‘यू आर माई बेस्ट फ्रेंड’ में लेखिका विक्की के हाथ को मिताली के हाथ में थमा देती। हम प्यार करते हैं, लेकिन इजहार नहीं कर पाते। यदि नितेश मन की बात को मृणालिनी से कह देता, तो उसकी जिंदगी संवर जाती। अब मृणालिनी के हिस्से ‘प्रार्थना’ के सिवाय कौन-सा शब्द शेष है।
कोख कितनी भी बेटियों को जन्म दे दे, लेकिन बेटों को न जने, तो कोख की इज्जत कम हो जाती है। खानदान चलाने के लिए बेटा चाहिए, समाज की यही सोच है। पति की खुशी और वंश वृद्धि के लिए भगवती देवी घर में सौतन लाती है, लेकिन एक वक्त ऐसा आता है कि उसे उपेक्षित जीवन जीना पड़ता है। भगवती जैसी नारी समाज में है, लेकिन आखिर भगवती जैसी महिलाओं को सौतन लाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? समाज आज तक अपनी सोच को बदल पाने में असमर्थ क्यों है? एक अनुत्तरित प्रश्न है, जिसका जवाब ढूँढा जाना आवश्यक है।
लेखिका स्त्री को नसीहत देती है। लिखती हैं-यदि स्त्री चाहे तो घर को घर बना सकती है, अन्यथा ‘राम वनवास’ हो सकता है। स्त्री की सोच क्यों हो जाती है कि उसके बगैर घर नहीं चल सकता? परिवार को चलाने के लिए सबकी जरूरत होती है, बस ‘आत्ममंथन’ की जरूरत है। संस्मरणात्मक कहानी है-‘नायिका’, तो कोरोना की त्रासदी का दंश है-‘वादा’।
पति और पत्नी के बीच नोंक-झोंक होना कोई असाधारण बात नहीं है, लेकिन इसका क्या मतलब कि हम अपनी जान पर ही आफत मोल लें। ‘जीवन का सत्य’ में अविनाश गलत है या मीना, कहना मुश्किल है। यदि अविनाश सही होता, तो वह अपनी पत्नी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करता और यदि मीना सही होती, तो वह अपनी ‘बगिया’ को छोड़कर संन्यासी जीवन को नहीं अपनाती। पति और पत्नी गाड़ी के दो पहिए हैं, दोनों का साथ जरूरी है गृहस्थ जीवन चलाने में। शक को भी कभी जिंदगी में आने नहीं देना चाहिए, अन्यथा शिखा और नितेश की तरह जिंदगी बदरंग-सी हो जायेगी। प्राची की वजह से दोनों के साँसों की सरगम में जीवन संगीत बजा। जाहिर सी बात है कि ‘जीवन संगीत’ है, मन के आँगन में शहनाई का बजना भी बार-बार जरूरी है।
अपनी जान बचाने के एवज में ‘अमृता’ ने डाॅक्टर दंपति की बदरंग जिंदगी को रोशन करने के लिए कोख को दे देती है। हालाँकि यह अमृता की बदकिस्मती थी कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। काश! उसकी अभिलाषा पूरी हो जाती।
कहानीकार के शब्द संयोजन के क्या कहने? कहावतों को भी कहानी में पिरोती हैं। सिरहाने बांसुरी रखने से पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है को शब्दों में पिरोकर कहानी रची गयी है-बांसुरी। ‘धर्म’ यह बताने को काफी है कि सबसे बड़ा धर्म है-मानवता। हम बेवजह धर्म को लेकर आपस में लड़ते-झगड़ते हैं। यदि शबाना ने मानव धर्म नहीं अपनाया होता, तो शैलजा का बेटा पता नहीं आज किस हाल में होता? ‘नमस्ते आंटी’ उन महिलाओं को बेपर्द करने की कोशिश है, जो अपनी उम्र छिपाती फिरती हैं। ‘संकल्प’ आईना है। अनसोशल की पैठ के बीच जरूरी है सोशल मीडिया में खुद के लिए लक्ष्मण रेखा तैयार करना। हालाँकि सोशल मीडिया की उपयोगिता है। फेसबुकिया प्रपंच के बीच संध्या की ‘परख’ को दाद देनी पड़ेगी। ‘संतुष्टि’ अच्छी कहानी है। हमारी मदद से किसी की जिंदगी सुधर जाये, तो संतुष्ट होना लाजिमी है। सविता के चेहरे पर संतुष्टि का भाव कहानी को जीवंत बनाती है।
लेखिका किरण सिंह की कलम परिपक्व है। वह जानती है कि कब और कहाँ, किस पात्र से क्या-क्या कहलाना है? ‘वैसे भी पतियों की आदत होती है हिदायत देने की क्योंकि उनकी नज़रों में तो दुनिया की सबसे बेवकूफ औरत उनकी पत्नी होती है’, ‘गलत कहते हैं लोग कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती है। सच तो यह है कि पुरुष ही अपनी अहम् तथा स्वार्थ की सिद्धि के लिए एक स्त्री के पीठ पर बंदूक रखकर चुपके से दूसरी स्त्री पर वार करते हैं, जिसे स्त्री देख नहीं पाती और वह मूर्ख स्त्री को ही शत्रु समझ बैठती है’, ‘अरे आ जायेगा। लड़का है कउनो लड़की थोड़े है कि एतना चिंता करती हो’, ‘बच्चे बाहर निकले नहीं कि बेलगाम घोड़ा बन जाते हैं’, ‘स्त्रियाँ अपनी खुशी ढूँढ ही लेती हैं…कभी पिता की तो कभी पति की तो कभी पुत्र की खुशियों में’ आदि वाक्यों के माध्यम से लेखिका ने सामाजिक दृष्टिकोण को रखने की कोशिश की है।
लेखिका बलिया की हैं, इसलिए कहानियों में भोजपुरी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग है। यह लेखिका का मातृभाषा के प्रति समर्पण का द्योतक है। कहानियाँ चूँकि सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं, इसलिए यह ग्राह्य है। काल्पनिकता है, लेकिन पाठकों को बाँधे रखने के लिए यह जरूरी है। एकाध जगह प्रूव की कमी है, जिसे लेखिका अगले अंक में दुरुस्त कर देंगी, ऐसी आशा है।

चलितवार्ता-9304632536

छोटी सी बात

अपने बाॅस के रवैये से नाखुश होकर महेश बाबू दफ्तर से छुट्टी लेकर घर बैठ गये। परिणाम स्वरूप उनका वेतन कटने लगा। कुछ दिनों तक तो जमा – पूंजी से घर खर्च मैनेज होता रहा, लेकिन कुछ समय के बाद दिक्कत होने लगी। महेश बाबू के मित्रों तथा परिजनों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह किसी की भी सुनते ही नहीं थे।
पति की जिद के सामने मीना की भी एक न चलती थी इसलिए मीना ने सब ईश्वर पर छोड़ दिया।
मीना की चाहे कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, वह प्रतिदिन सांझ को भगवान के सामने दीया जलाना नहीं भूलती थी। एकदिन ऐसे ही शाम को दीया जला रही थी और उसका बारह वर्षीय बेटा गोलू उससे नाश्ता मांगने लगा, मीना ने उससे कहा “थोड़ी देर और रुक जा मैं भगवान के आगे दीया जला लूँ, फिर तुझे नाश्ता देती हूँ”।
गोलू ने कौतूहल वश अपनी माँ से पूछा.. ‘ मम्मी आप ये रोज शाम को लक्ष्मी जी को दीया क्यों जलाती हैं.”.?
मीना बोली -” बेटा ऐसा करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख समृद्धि आती है। गोलू इस बात से सहमत नहीं हुआ और बोला – मम्मी घर में सुख समृद्धि लक्ष्मी जी के आगे दीया जलाने से नहीं आयेगी , वो तो पापा के दफ्तर जाने से आयेगी।आप ही तो कहती हैं कि कर्म ही पूजा है। यह सुनकर मीना कुछ न कह स्की और चुपचाप दीया जलाकर रसोई में गोलू के लिए नाश्ता निकालने चली गई।
अगली सुबह जब मीना महेश बाबू को चाय देने उनके कमरे में गई तो तो देखा महेश बाबू दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। उन्होंने मीना को जल्दी से नाश्ता निकालने को कहा।
मीना के होठों पर विजयी मुस्कान खिल गयी। वह मन ही मन सोचने लगी कि महेश जी को जो बात मैं तथा बड़े – बुजुर्ग भी नहीं समझा पाये उन्हे उनके छोटे से बेटे ने समझा दिया ।

खेलूंगी मैं होली

सखियों संग खेलूंगी मैं होली
सखियों संग

सन सन सनन सन बहे पुरवाई
अंग  – अंग लिये अंगड़ाई
फाग उड़ाये गुलाल रोली
सखियों संग………………….

कुहुक – कुहुक कोयलिया गाये
सुनके मेरा दिल भी बहक – बहक जाये
लेके आओ न मेरे सजन डोली
सखियों संग……………………

सात रंग की लूंगी चुनरिया
उस पर बनाऊँगी सुन्दर लहरिया
चाहे कितना भी बोले  बलम बोली
सखियों संग……………………

फूलों से लाली उधार ले लूंगी
नयनों से कजरा की धार ले लूंगी
कोरे मन पर बनाऊँगी रंगोली
सखियों संग………………….

प्रीत रंग भरी पिचकारी
अबकी पड़ूंगी सभी पर मैं भारी
घोल भावना भंग गोली
सखियों संग……………………

शब्दों को जोड़ – तोड़ गीत लिख दूंगी
रंगों को छिड़क – छिड़क प्रीत लिख दूंगी
ऐसी – वैसी नहीं हूँ मैं अलबेली
सखियों संग ………………….

उत्कृष्ट बाल साहित्य साधना के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान ( उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान 2019)से सम्मानित किरण सिंह से लेखिका पूनम आनंद की बातचीत।

किरण

सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मझौआं गांव में 28 दिसबंर, 1967 को हुआ। इनके पिताजी स्व श्री कुन्ज बिहारी सिंह की शुमार अच्छे एडवोकेट के रूप में होती थी। माताजी दमयंती देवी कुशल गृहिणी थीं। इनके पति भोलानाथ सिंह एसबीएपीडीसीएल के पूर्व डीजीएम हैं। इनकी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर बलिया में हुई। तत्पश्चात उन्होंने गुलाब देवी महिला महाविद्यालय, बलिया (यूपी) से स्नातक की शिक्षा प्राप्त कीं। संगीत में भी किरण सिंह की गहरी अभिरुचि रही है। इन्होंने संगीत के क्षेत्र में संगीत प्रभाकर ( सितार ) की उपाधि हासिल की हैं। किरण सिंह की सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिसमें मुखरित संवेदनाएं ( काव्य संग्रह ) 2016, प्रीत की पाती ( काव्य संग्रह) 2017, अन्त: के स्वर ( दोहा संग्रह ) 2018, प्रेम और इज्जत ( कथा संग्रह ) 2019, गोलू – मोलू ( बाल कविता संग्रह) 2020, श्री राम कथामृतम् ( बाल खण्ड काव्य) 2020 एवं दूसरी पारी का – ( आत्मकथ्यात्मक संस्मरण संग्रह ) सम्पादन 2020 शामिल हैं।

लेखन विधा – बाल साहित्य, गीत, गज़ल, छन्द बद्ध तथा छन्मुक्त पद्य, कहानी, आलेख, समीक्षा, व्यंग्य !
सम्मान – 1-2019 में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन से साहित्य सेवी सम्मान,
2-उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान (2019)
2-नागरी बाल साहित्य सम्मान ( 2020)

प्रश्न 1-इतने अन्तराल के बाद ऐसा क्या हुआ कि आपकी कलम लेखन के लिए उतावली हो गई।

उत्तर – सामाजिक विसंगतियाँ, रिश्तों के उतार चढ़ाव, लोगों के छल प्रपंच की वजह से जब मन में विरक्ति का भाव पनपने लगा तब चिंतन-मनन के फलस्वरूप आत्मसाक्षात्कार हुआ, भावनाएँ मचल उठीं, संवेदनाएँ मुखर हो उठीं और मेरी कलम चल पड़ी। और तब कविता ने जन्म लिया।

2-आपकी रचनाओं को सराहना कैसे मिली?

जब मैं फेसबुक पर यूँ ही शौकिया तौर पर अपनी रचना पोस्ट कर दिया करती थी तो लाइक्स और कमेंट्स के माध्यम से फेसबुक फ्रेंड्स की सराहना मुझ तक पहुंचती थी और अब रचनाएँ प्रकाशित होने के बाद ईमेल के जरिये।

3-आपके कलम को ताकत कब मिली?

जब उसे सम्पादकों ने प्रकाशित किया . दूरदर्शन केंद्र तथा आकाशवाणी केन्द्र ने रचनाओं का प्रसारण किया, राजभाषा विभाग पटना ने मंच से प्रस्तुति का अवसर दिया तो उसे पढ़कर तथा देख-सुनकर पाठकों, श्रोताओं तथा दर्शकों से जो सराहना मिली उसी की बदौलत मेरी कलम को ताकत मिली। साथ ही सकारात्मकता के साथ की गई आलोचना भी मेरी कलम को चुनौती देकर धार दे दी ।

4-आपकी शिक्षा में संगीत विषय रहा है, और आपकी पहचान साहित्य में बंन रही है, इस पर कुछ कहेगी?

हिन्दी , संगीत और मनोवैज्ञानिक विषय से मैंने स्नातक किया है । यह तीनों विषय साहित्य के लिये महत्वपूर्ण हैं।

5-लेखन में किस विषय को आप अपना मुद्दा बनाती हैं?

जब जो विषय दिल की गहराई में उतर गया और अंतरात्मा को झकझोर दिया उस विषय को लिखने के लिए मेरी कलम अनायास ही चल पड़ती है।

6-महिला लेखक होने के कारण कोई परेशानी या सहायता के उल्लेख आप पाठकों से करना चाहती है तो उसे बतायें?

घर हो या बाहर महिला लेखिकाओं को बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। चूंकि कोई भी साहितकार शुरुआत में ही प्रसिद्धि नहीं पा लेता – इसलिए जब वो लिख रही होती हैं तो घर के अन्य सदस्यों को लगता है कि ये फालतू काम कर रही हैं। अतः उन्हें गैरों की तो छोड़िये अपनो का भी उपहास झेलना पड़ता है।
औरतों के लिए सबसे मुश्किल होता है प्रेम विषय पर कलम चलाना।

7-आप एक गृहणी है, आपने लेखन और गृहस्थी में सामंजस्य कैसे बैठाया?

गृहस्थी मेरी पहली प्राथमिकता रही है। हमेशा मैं खाली समय में ही लिखती – पढ़ती हूँ ।हाँ कभी-कभी मनमौजी भावनाएँ कभी भी आ जाती हैं तो उस वक्त मैं अपने मोबाइल में उन भावनाओं को नोट कर लेती हूँ और बाद में विस्तार देती हूँ।

8-कहते है प्रतिभा लाख छुपा ले छुपती नहीं है? आप इस खड़ी उतर रही है, आपका क्या कहना है?

अगर सोशल मीडिया न होता तो आज भी मेरी प्रतिभा छुपी ही रहती।

9-स्त्रियाँ हुनरमंद होती है जन्मजात और कुछ सीखने -सीखाने की कला उन्हें ऊंचाई देती है। लेकिन, लेखन की कला इससे हटकर है ।आप अपने विचारों के नजरिया से कुछ कहे?

निश्चित तौर पर लेखन अपने अन्दर से आता है लेकिन लेखन की विधाओं को सीखना जरूरी हो जाता है। कुछ साहित्यिक कार्यशालाएँ ( आनलाइन व आफलाइन) सराहनीय कार्य कर रही हैं। वैसे यदि किसी में सीखने की ललक हो तो गूगल पर सबकुछ उपलब्ध हो जाता है।

10 साहित्यक गुरू के रूप में आपके प्रेरणा के स्तंभ का श्रेय आप किसे देंगी?

माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी को – क्योंकि उन्होंने ही बालसाहित्य सृजन प्रत्येक साहित्यकार की नैतिक जिम्मेदारी है जैसा गुरुमंत्र देकर मुझे बाल साहित्य सृजन के लिए प्रेरित किया।

11-पुरस्कारों और सम्मान के प्रति आपका क्या नजरिया है?

पुरस्कार और सम्मान निश्चित ही उत्साहवर्धन करते हैं। किन्तु जिस प्रकार आज पुरस्कारों और सम्मानों की खरीद बिक्री हो रही है वह विडम्बना है।

12 बाल साहित्यकार के सम्मान में सुभद्रा कुमारी चौहान ‘से आपको सम्मानित किया गया है। अपने उस अनमोल अनुभव को बताये?

अभिभूत हूँ ।सच कहूँ तो इस सम्मान की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह सब सिर्फ ईश्वरीय कृपा, माता-पिता एवं गुरुजनों की शिक्षा एवम् आशिर्वाद, मेरे स्नेहिल एवम् सम्मानित मित्रों, भाई – बहनों तथा पाठकों के स्नेह व शुभकामनाओं की बदौलत ही सम्भव हो पाया है।

13-आपकी योजनाएं साहित्य में क्या है?

अबतक तो मैं बिना योजना के ही जब जो जी में आया मौसम स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार भावनाओं को शब्दों में पिरोती आई और पाठकों की सराहना व प्रोत्साहन पाती रही – लेकिन इतना स्नेह व सम्मान पाकर साहित्य के प्रति मेरी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। अब लगता है कि, मुझे योजना बनानी पड़ेगी। वैसे जल्द ही मेरी पुस्तक रहस्य ( कथा संग्रह ) अंतर्धवनि (कुंडलिया संग्रह) शगुन के स्वर (विवाह गीत संग्रह) व लहरों की लय पर गीत ग़ज़ल संग्रह आ रहा है। एक लघुकथा संग्रह के लिए भी लघुकथाएँ लगभग तैयार हो गई हैं। एक उपन्यास का कथानक तैयार है शीघ्र ही शुरू करूंगी। कुछ बड़े महान साहित्यकार हैं जिनकी जीवनी भी लिखूंगी। उसके बाद मैं किसी ऐतिहासिक चरित्र पर खण्ड काव्य और यदि माँ शारदे की कृपा हुई तो महाकाव्य भी रचना चाहती हूँ। साथ ही मैं उन तमाम स्त्रियों को साहित्य से जोड़ना चाहती हूँ जिनकी कलम प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी रुक गई है।
और सबसे जरूरी कार्य जिसके लिए मुझे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान बालसाहित्य संवर्धन योजना के तहत सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान 2019 के लिए 2021 में मिल रहा है उसके लिए पूरी निष्ठा और इमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए बाल साहित्य को समृद्ध करती रहूंगी।

14 – नवोदित रचनाकारों को अब क्या संदेश देना चाहेंगी?

1-अपने मन में नकारात्मक भावों को न आने दें।
2-औरों की सुने किन्तु अपने मन की करें क्योंकि आप अपने जज स्वयं हैं।
3-कर्म करें और फल की इच्छा न करें। इसका तात्पर्य यह है कि आप लेखन करते रहें और उसे प्रकाशन हेतु भेजते रहें। यदि प्रकाशित नहीं हो रहा है तो हतोत्साहित न हों बल्कि उसे कहीं और भेजें और अपना लेखन जारी रखें – क्योंकि मेरा मानना है कि आज नहीं तो कल फल मिलता ही है। बसर्ते हम इमानदारी से अपना कर्तव्य निभायें।
4-लिखने के साथ – साथ अच्छा साहित्य पढ़ते भी रहें क्योंकि इससे आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
5-लेखन एक साधना है इसलिए चिंतन मनन के लिए एकाग्रता अनिवार्य है। अतः साहित्यिक समारोहों और चिंतन मनन के समय में संतुलन स्थापित करके रखें।

अन्त: के स्वर – दोहों का सुंदर संकलन

सतसैयां के दोहरे, ज्यूँ नाविक के तीर |
देखन में छोटे लगे, घाव करें गंभीर ||

वैसे ये दोहा बिहारी के दोहों की ख़ूबसूरती के विषय में लिखा गया है पर अगर हम छन्द की इस विधा पर बात करें जिसके के अंतर्गत दोहे आते हैं तो भी यही बात सिद्ध होती है | दोहा वो
तीक्ष्ण अभिव्यन्जनायें हैं जो सूक्ष्म आकर में होते हुए भी पाठक के अन्त:स्थल व् एक भाव चित्र अंकित कर देती हैं | अगर परिभाषा के रूप में प्रस्तुत करना हो तो, दोहा, छन्द की वो विधा है जिसमें चार पंक्तियों में बड़ी-से बड़ी बात कह दी जाती है | और ये (इसकी चार पंक्तियों में (13, 11, 13, 11 मात्राएँ के साथ ) इस तरह से कही जाती है कि पाठक आश्चर्यचकित हो जाता है | हमारा प्राचीन कवित्त ज्यादातर छन्द बद्ध रचनाएँ हीं हैं | दोहा गागर में सागर वाली विधा है पर मात्राओं के बंधन के साथ इसे कहना इतना आसान नहीं है | शायद यही वजह है कि मुक्त छन्द कविता का जन्म हुआ | तर्क भी यही था कि सामजिक परिवर्तनों की बड़ी व् दुरूह बातों को छन्द में कहने में कठिनाई थी | सार्थक मुक्त छन्द कविता का सृजन भी आसान नहीं है | परन्तु छन्द के बंधन टूटते ही कवियों की जैसे बाढ़ सी आ गयी | जिसको जहाँ से मन आया पंक्ति को तोड़ा-मरोड़ा और अपने हिसाब से
प्रस्तुत कर दिया | हजारों कवियों के बीच में अच्छा लिखने वाले कवि कुछ ही रह गए | तब कविता का पुराना पाठक निराश हुआ | उसे लगा शायद छन्द की प्राचीन विधा का लोप हो जाएगा | ऐसे समय में कुछ कवि इस विधा के संरक्षण में आगे आते रहे, जो हमारे साहित्य की इस धरोहर को सँभालते रहे |उन्हीं में से एक नाम है किरण सिंह जी का | किरण सिंह जी छन्द बद्ध रचनाओं में न सिर्फ दोहा बल्कि मुक्तक,रोला और कुंडलियों की भी रचना की है |

“अन्त: के स्वर” जैसा की नाम सही सपष्ट है कि इसमें किरण जी ने अपने मन की भावनाओं का प्रस्तुतीकरण किया है | अपनी बात में वो कहती हैं कि, “हर पिता तो अपनी संतानों के लिए अपनी सम्पत्ति छोड़ कर जाते हैं, लेकिन माँ …? मेरे पास है ही क्या …? तभी अन्त : से आवाज़ आई कि दे दो अपने विचारों और भावनाओं की पोटली पुस्तक में संग्रहीत करके , कभी तो उलट –पुलट कर देखेगी ही तुम्हारी अगली पीढ़ी |” और इस तरह से इस पुस्तक ने आकर लिया | और कहते है ना कि कोई रचना चाहे जितनी भी निजी हो …समाज में आते ही वो सबकी सम्पत्ति हो जाती है |
जैसे की अन्त: के स्वर आज साहित्य की सम्पत्ति है | जिसमें हर पाठक को ऐसा बहुत कुछ मिलेगा जिसे वो सहेज कर रखना चाहेगा |

भले ही एक माँ संकल्प ले ले | फिर भी कुछ लिखना आसान नहीं होता | इसमें शब्द की साधना करनी पड़ती है | कहते हैं कि शब्द ब्रह्म होते हैं | लेखक को ईश्वर ने अतरिक्त शब्द क्षमता दी होती है | उसका शब्दकोष सामान्य व्यक्ति के शब्दकोष से ज्यादा गहन और ज्यादा विशद होता है | कवित्त का सौन्दर्य ही शब्द और भावों का अनुपम सामंजस्य है | न अकेले शब्द कुछ कर पाते हैं और ना ही भाव | जैसे प्राण और शरीर | इसीलिए किरण जी एक सुलझी हुई कवियित्री की तरह कागज़ की नाव पर भावों की पतवार बना कर शब्दों को ले चलती हैं …

कश्ती कागज़ की बनी, भावों की पतवार |
शब्दों को ले मैं चली , बनकर कविताकार ||

अन्त: के स्वर का प्रथम प्रणाम

जिस तरह से कोई व्यक्ति किसी शुभ काम में सबसे पहले अपने ईश्वर को याद करता है , उनकी वंदना करता है | उसी तरह से किरण जी ने भी अपनी आस्तिकता का परिचय देते हुए पुस्तक के
आरंभ में अपने हृदय पुष्प अपने ईश्वर के श्री चरणों में अर्पित किये हैं | खास बात ये है कि उन्होंने ईश्वर से भी पहले अपने जनक-जननी को प्रणाम किया है | और क्यों ना हो ईश्वर ने हमें इस सुंदर सृष्टि में भेजा है परन्तु माता –पिता ने ही इस लायक बनाया है कि हम जीवन में कुछ कर सकें | कहा भी गया है कि इश्वर नेत्र प्रदान करता है और अभिवावक दृष्टि | माता–पिता को नाम करने के बाद ही वो प्रथम पूज्य गणपति को प्रणाम करती है फिर शिव को, माता पार्वती, सरस्वती आदि भगवानों के चरणों का भाव प्रच्छालन करती हैं | पेज एक से लेकर 11 तक दोहे पाठक को भक्तिरस में निमग्न कर देंगे |

संस्कार जिसने दिया, जिनसे मेरा नाम |

हे जननी हे तात श्री, तुमको शतत् प्रणाम ||

..
अक्षत रोली दूब लो , पान पुष्प सिंदूर |

पहले पूज गणेश को, होगी विपदा दूर ||

शिव की कर अराधना, संकट मिटे अनेक |
सोमवार है श्रावणी , चलो करें अभिषेक ||

अन्त: के स्वर का आध्यात्म

केवल कामना भक्ति नहीं है | भीख तो भिखारी भी मांग लेता है | पूजा का उद्देश्य उस परम तत्व के साथ एकीकर हो जाना होता है | महादेवी वर्मा कहती हैं कि,

“चिर सजग आँखें उनींदी, आज कैसा व्यस्त बाना,
जाग तुझको दूर जाना |”

मन के दर्पण पर परम का प्रतिबिम्ब अंकित हो जाना ही भक्ति है | भक्ति है जो इंसान को समदृष्टि दे | सबमें मैं और मुझमें सब का भाव प्रदीप्त कर दे | जिसने आत्मसाक्षात्कार कर
लिए वह दुनियावी प्रपंचों से स्वयं ही ऊपर उठ जाता है | यहीं से आध्यात्म का उदय होता है | जिससे सारे भ्रम दूर हो जाते हैं | सारे बंधन टूट जाते हैं | किरण जी गा उठती हैं …

सुख की नहीं है कामना, नहीं राग , भय क्रोध |
समझो उसको हो गया , आत्म तत्व का बोध ||
……………………….

अंतर्मन की ज्योति से, करवाते पहचान |
ब्रह्म रूप गुरु हैं मनुज, चलो करें हम ध्यान ||

अन्त : के स्वर में नारी

कोई स्त्री स्त्री के बारे में ना लिखे … असंभव | पूरा संसार स्त्री के अंदर निहित है |जब एक स्त्री स्त्री भावों को प्रकट करने के लिए कलम का अवलंबन लेती है तो उसमें सत्यता अपने अधिकतम प्रतिशत में परिलक्षित होती है | अन्त : के स्वर का नारी की विभिन्न मन : स्थितियों के ऊपर
लिखे हुए दोहों वाला हिस्सा बहुत ही सुंदर है | एक स्त्री होने के नाते यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि ये हर स्त्री के मन को स्पर्श करेगा | इसमें चूड़ी हैं, कंगना है, महावर है और है एक माँ की पत्नी की बेटी की स्त्री सुलभ भावनाएं जो मन के तपती रेत पर किसी लहर सम आकर नमी सृजित कर देती हैं |

जीवन हो सुर से सजा , बजे रागिनी राग |
ईश हमें वरदान दो , रहे अखंड सुहाग ||
………………….

लिया तुम्हें जब गोद में , हुआ मुझे तब बोध |
सर्वोत्तम वात्सल्य है, सुखद सृष्टि का शोध ||
…………………….

करती हूँ तुमसे सजन, हद से अधिक सनेह
इसीलिये शायद मुझे , रहता है संदेह ||
…………………..

मचल-मचल कर भावना, छलक –छलक कर प्रीत |
करवाती मुझसे सृजन , बन जाता है गीत ||

अन्त: के स्वर में नीति मनुष्य को मनुष्य बनाता है सदाचार | मनुष्यत्व का आधार ही सदाचार है | दोहों में नीति या जीवन से सम्बंधित सूक्तियाँ ना हों तो उनका आनंद ही नहीं आता | कबीर , तुलसी रहीम ने नीति वाले दोहे आज भी हम बातों बातों में एक दूसरे से कहते रहते हैं |रहीम दास जी का ये दोहा देखिये ...

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग |
चन्दन विष व्याप्त नहीं, लिपटे राहत भुजंग ||

बिहारी यूँ तो श्रृंगार के दोहों के लिए अधिक प्रसिद्ध हैं पर आम प्रचलन में उनके नीति के ही
दोहे हैं | ‘अन्त : के स्वर में भी किरण जी ने कई नीति के दोहे सम्मिलित किये हैं| हर दोहा अपने साहित्यिक सौन्दर्य के साथ एक शिक्षा दे जाता है |

अपनों से मत कर किरण, बिना बात तकरार |

जो हों जैसे रूप में , कर लेना स्वीकार ||

कर यकीन खुद पर किरण , खिलना ही है रूप |

मूर्ख मेघ कब तक भला, रोक सकेगा धूप ||

सुख में रहना संयमित, दुःख में धरना धीर |
संग समय के आ पुन :, हर लेगा सुख पीर ||

अन्त: के स्वर में प्रेम

प्रेम मानव मन की सबसे कोमल भावना है | प्रेम के बिना तो जीवन ही पूरा नहीं होता तो कोई पुस्तक पूरी हो सकती है भला ? किरण सिंह जी ने भी प्रेम के दोनों रंगों संयोग और वियोग के दोहे इस पुस्तक में लिखें हैं | प्रेम केवल दैहिक नहीं होता यह मन व आत्मा से भी होता है | अक्सर देह के अनुराग को ही प्रेम समझ बैठते हैं पर देह तो प्रेम की तरफ बढ़ाया पहला कदम मात्र है | प्रेम की असली अभिव्यंजना इसके बाद ही पल्लवित –पुष्पित होती है जहाँ से यह मन और आत्मा के स्तर पर अवतरित होता है | प्रेम पर अपनी कलम चलाने से पूर्व ही वो प्रेम का परिचय देती हैं |

प्रेम नहीं है वासना, प्रेम नहीं है पाप |

प्रेम पाक है भावना, नहीं प्रेम अभिशाप ||

प्रेम नहीं है वासना , प्रेम नहीं है भीख |
प्रेम परम आनंद है, प्रेम प्रेम से सीख ||
अन्त: के स्वर :राजनीति

वो कवि ही क्या जिसकी कलम देश की स्थिति और समकालीन समस्याओं पर ना चले | आज की
राजनीति दूषित हो चुकी है चुनाव के समय तो नेता वोट माँगने के लिए द्वार –द्वार जाते हैं |याचना करते हैं पर चुनाव जीतते ही उनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं | इस भौतिकतावादी युग में नेता सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी |पीड़ित, शोषित , दुखी व्यक्ति कराहते रह जाते हैं और सत्ता जन प्रतिनिधियों की मुट्ठी गर्म करती रहती है | ये बात कवियित्री को मर्मान्तक पीड़ा से भर देती है |

जनता के दुःख दर्द से, जो रहते अनभिज्ञ |
उसको ही कहते यहाँ , किरण राजनीतिज्ञ ||

…………………….

घूम रहे बेख़ौफ़ हो, करके कातिक खून |
कैसे होगा न्याय जब , अँधा है क़ानून ||

अन्त :के स्वर में स्त्री विमर्श

आज कल साहित्य में स्त्री विमर्श की बाढ़ आई हुई है | जिसे पुरुष बड़ी संदिग्ध दृष्टि से देखते हैं | उसे लगता है कि उसके अधिकार क्षेत्र में महिलाओं की दखलंदाजी हो रही है | वो अभी भी अपने उसी नशे के मद में रहना चाहता है | स्त्री विमर्श सत्ता की नहीं समानता की बात करता है | यूँ तो स्त्री विमर्श हर काल में स्थित था परन्तु महादेवी वर्मा ने इसकी वकालत करते हुए कहा कि स्त्री विमर्श तभी सार्थक है जब स्त्री शिक्षित हो और अर्थ अर्जन कर रही हो | वर्ना ये सिर्फ शाब्दिक प्रलाप ही होगा | मैत्रेयी पुष्पा , उषा किरण खान, प्रभा खेतान, सुधा अरोड़ा, चित्रा मुद्गल आदि स्त्री विमर्श की अग्रणीय लेखिकाएं रही है | इससे पितृसत्ता की जंजीरे कुछ ढीली तो हुई है पर टूटी नहीं है | आगे की कमान समकालीन लेखिकओं को संभालनी है | किरण जी ये दायित्व पूरी जिम्मेदारी के साथ उठाते हुए कहती हैं कि …

अपनी कन्या का स्वयं, किया अगर जो दान |

फिर सोचो कैसे भला , होगा उसका मान ||

करके कन्यादान खुद, छीन लिया अधिकार |

इसीलिये हम बेटियाँ , जलती बारम्बार ||

जो दहेज़ तुमने लिया, सोचो करो विचार |
बिके हुए सुत रत्न पर , क्या होगा अधिकार ||

अन्त: के स्वर में प्रकृति

प्रकृति मनुष्य की सहचरी है | ये लताएं ये प्रसून , ये हवाएं, नदी झरने ,वन, विविध जलचर वनचर | ईश्वर भी क्या खूब चितेरा है उसने अपनी तूलिका से प्रथ्वी पर अद्भुत रंगों की छटा बिखेर दी है| प्रकृति को देखकर ना जाने कितनी बार प्रश्न कौंधता है, “वो चित्रकार है ?” श्री राम चरित मानस किष्किन्धा कांड में जब प्रभु श्री राम अपने लघु भ्राता लक्ष्मण के साथ पूरा एक वर्ष सुग्रीव द्वारा माता सीता की खोज का आदेश देने की प्रतीक्षा में बिताते हैं तो तुलसी दास जी ने बड़ी ही सुंदर तरीके से सभी ऋतुओं का वर्णन किया | उन्होंने हर ऋतु के माध्यम से शिक्षा दी है |

रस-रस सूख सरित सर पानी ,
ममता त्याग करहिं जिमी ज्ञानी ||

दादुर ध्वनि चहुँ दिशा सुहाई |
वेड पढई जनु वटू समुदाई ||

कवियित्री के मन को भी प्रकृति विह्वल करती है | यहाँ पर किरण जी ने हर ऋतु की सुन्दरता को अपने शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है |

पिघल गया नभ का हृदय, बरसाए है प्यार |

धरती मैया भीगती, रिमझिम पड़े फुहार ||

हरियाली ललचा रही , पुरवा बहकी जाय |
हरी धरा की चुनरी , लहर –लहर बलखाय ||

अंत में … कवयित्री ने इस छोटी सी पुस्तक के माध्यम से अपनी भावनाओं का दीप जलाया है| जिसकी लौ उनके अनुभवों से प्रदीप्त हो रही है | उन्होंने प्रकृति , नारी , स्त्री विमर्श , आध्यात्म , भक्ति , पर्यावरण ,साहित्य व् समकालें राजनैतिक दशा हर तरह के अँधेरे को अपनी परिधि में लिया है | खास बात ये हैं कि पुस्तक के सभी दोहों में लयात्मकता व् गेयता है | हिंदी साहित्य की इस विधा को जीवित रखने का उनका अप्रतिम योगदान है | 111 पृष्ठ वाली इस पुस्तक का कवर पृष्ठ आकर्षक है |

*अगर आप भी दोहे की विधा में रूचि रखते हैं तो ये पुस्तक आपके लिए एक अच्छा विकल्प है |

अन्त: के स्वर –दोहा संग्रह
लेखिका –किरण सिंह
प्रकाशक जानकी प्रकाशन
पृष्ठ – 111
मूल्य – 300 रुपये

वंदना बाजपेयी

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है

चंचला मति में माता

चंचला मति में माता
साधना भरो
भेद कर तमस मनः को ।
ज्योतिर्मय करो

ईर्ष्या द्वेष जैसे शत्रुओं
को मार दो
प्रेम भाव भर हृदय में
हमको तार दो
छल कपट मिटा दो मन का
कष्ट हर हरो
भेद कर तमस मनः को……
ज्योतिर्मय करो 
चंचला मति में माता
साधना….

शब्द शब्द हों हमारे 
दीप की तरह
भावना भी हो हमारी
सीप की तरह
वर्णों को आदेश दो कि
मोती बन झरो
भेद कर तमस मन को
ज्योतिर्मय करो
चंचला मति में माता
साधना….

वीणा की तरह हो झंकृत
एक एक स्वर
कृपा करो माँ शारदे
हमें ये दे दो वर
कंठ के हमारे माता
सुर मधुर करो
भेद कर तमस मन को
ज्योतिर्मय करो
चंचला मति में मैया
साधना….

लेखनी निडर प्रखर हो
उक्ति ऐसी दो
जीवन डगर सरल बनाए
सूक्ति वैसी दो
कहो हमें बढ़े चलो
किसी से न डरो
भेद कर तमस मन को.
ज्योतिर्मय करो 
चंचला मति में माता
साधना….

मुखरित संवेदनाएं – संस्कारों को थाम कर अपने हिस्से का आकाश मांगती स्त्री के स्वर

लेखिका एवम कवयित्री किरण सिंह  जी का प्रथम काव्य संग्रह “मुखरित संवेदनाएं” का दूसरा संस्करण अभी कुछ समय पहले ही आया है | इस संस्करण में कुछ नयी कविताएँ हैं और कई पुरानी कविताओं को उन्होंने पहले से अधिक परिष्कृत रूप में प्रस्तुत किया है | ये परिष्कार उनके लेखन में परिष्कार का ही स्वरूप प्रस्तुत करता है | मुखरित संवेदनाएँ का पहला संस्करण किरण सिंह जी की  पहली पुस्तक भी रही है| क्योंकि मैंने दोनों संस्करण पढ़ें हैं | तो तुलनात्मक रूप से कहूँ तो जहाँ पहला संस्करण पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था कि एक किशोर मन वो सब कहना चाहता है जो ग्रहस्थी के झमेलों और उम्र के बढ़ते परदों के मध्य अनकहा रह गया था |वहीं इस संस्करण को पढ़कर लगा कि किशोर-युवा मन की भावनाएँ अनुभव की चाशनी में पककर ज्यादा सौंधी हो गई हैं |

शुरुआत करती हूँ संग्रह के पहले अंश “अपनी बात से” जैसा की किरण जी ने लिखा है की छोटी उम्र में ही पिताजी द्वारा थमाई गई डायरी में अपने स्कूल, शिक्षकों, रिश्ते -नातों पर कलम चलाना आरंभ कर दिया था| पर  विवाह व् घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों  में वो भूल ही गयी की उनके अन्दर जाने कितनी कवितायें साँस  ले रही हैं | जो जन्म लेना चाहती है | जब बच्चे उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए तो कांपते हाथों से उन्होंने  पुन: कलम थामी तो उदेश्य निज तक नहीं रह गया बल्कि कलम के माध्यम से  उस बेचैनी का समाधान ढूंढना था जो हर रचनात्मक व्यक्ति अपने अन्दर महसूस करता है | और सामाजिक कुरीतियों, भ्रस्टाचार और दबे-कुचले लोगों  के संघर्षों को के प्रति अपनी कलम का उत्तरदायित्व समझा |
संग्रह की भूमिका “अंतस का सत्व”में जितेंद्र राठौर जी लिखते हैं ..
हर कोशिश है एक बगावत
वरना जीसे सफलता,असफलता कहते हैं
वह तो बस हस्ताक्षर हैं
कवयित्री किरण सिंह का संग्रह सच पूछिए तो इनकी एक कोशिश ही नहीं एक मुखर बगावत है | एक ऐसी बगावत जो जाने-अनजाने पथरीली जमीन तोड़कर  मिट्टी में तब्दील करती हुई जगह -जगह फैले हुए रेगिस्तान को सींचने  का काम करती है |
इस संग्रह को पढ़ते हुए उनकी प्रथम कविता “किस पर  लिखूँ मैं ?” से  “देखो आया डोली द्वार” एक कवयित्री के कलम थाम कर कुछ लिखने की ऊहापोह से गहन आध्यात्मिक भाव तक पहुँचने की विकास यात्रा सहज ही परिलक्षित होती है | जहाँ “किस पर लिखूँ मैं” असमंजस है कि जब मन में इतना कुछ एक साथ चल रहा हो तो एक विषय का चयन कितना दुष्कर हो जाता है |वहीं “देखो आया डोली द्वार” आत्मा सुंदरी और परमात्मा के मिलन की के मिलन पर छायावाद का प्रभाव सपष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है | 

इस पुस्तक में किरण जी ने अपनी 136 संवेदनशील रचनाओं को चार अध्याओं (भक्ति-आध्यात्म,नारी संवेदना के स्वर,युग चेतन ऐवम उदबोधन व  ऋतु रंग) में विभाजित किया है |

भक्ति आध्यात्म
                                           काव्य संग्रह के प्रथम खंड भक्ति व आध्यात्म को समर्पित है | इस खंड में में अपने हिस्से का आसमान मांगने वाली और समाज की कुप्रथाओं से लड़ने वाली कवयित्री एक भावुक पुजारिन में तब्दील हो जाती है | जहाँ वो और उसके आराध्य के अतरिक्त कोइ दूसरा नहीं है | न जमीन न आसमान न घर न द्वार | यहाँ पूर्ण  समर्पण  की भावना है | भक्ति रस में डूबे ये गीत आत्मा को आध्यात्म की  तरफ मोड़ देते हैं |

मन है चंचल भर दे साधना,
कर जोड़ करूँ सुन ले प्रार्थना ||
एक अन्य कविता शत-शत नमन में वो कहती हैं ..

जाति  धर्म में हम उलझ कर
मिट रहे आपस में लड़ कर
क्यों नहीं तुम आते लेकर
शांति चैन और अमन
पुरुषोत्तम राम आपको शत – शत नमन

नारी संवेदना के स्वर
                                   मुखरित संवेदनाएँ का  दूसरे व् प्रमुख खंड  “नारी संवेदना के स्वर” हैं ||इसमें 48 कविताएँ हैं | इस खंड की कविताओं में मुख्य रूप से उस स्त्री का अक्स दिखाई देता है जो हमारे देश के छोटे शहरों, गांवों और कस्बों से निकल कर आई है | जो महानगरों की स्त्री की तरह पुरुष विरोधी नहीं है | या यूँ कहिये वो मात्र विरोध करने के लिए विरोध नहीं करती | वो पुरुष से लड़ते – लड़ते पुरुष नहीं बनना चाहती है | उसे अपने  स्त्रियोचित गुणों पर गर्व है | चाहें वो दया ममता करुणा  हो या मेहँदी चूड़ी और गहने वो सब को सहेज कर आगे बढ़ना चाहती है | या यूँ कहें की वो अपनी जड़ों से जुड़े रह कर अपने हिस्से का आसमान चाहती है | वो अपने पिता पति और पुत्र को कटघरे में नहीं घसीटती बल्कि  सामाजिक व्यवस्था  और अपने ही कोमल स्वाभाव के कारण स्वयमेव अपना प्रगति रथ रोक देने के कारण उन्हें दोष मुक्त कर देती है | वो कहती है ………..

क्यों दोष दूं तुम्हे
मैं भी तो भूल गयी थी
स्वयं
तुम्हारे प्रेम में
                  आज स्त्री विमर्श के नाम पर  जिस तरह की स्त्री का स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है यह उससे भिन्न है | जिस  तरह से स्त्री बदले की भावना की ओर बढ़ रही है, लिव इन या बेवफाई से उसे गुरेज नहीं है | वो पुरुषों से कंधे से कंधा  मिला कर चलने में यकीन नहीं करती बल्कि सत्ता पलट कर पुरुष  से ऊपर हो जाना चाहती हैं | जिस को पढ़ कर सहज विश्वास नहीं होता | क्योंकि हमें अपने आस – पास ऐसी स्त्रियाँ नहीं दिखती | हो सकता है ये भविष्य हो पर किरण जी की कवितायें आज का यथार्थ लिख रही हैं | जहाँ संवेदनाएं इतनी इस कदर मरी नहीं हैं |  किरण जी की कवितायें एक दबी कुचली नारी के स्वर नहीं है | वो अपने हिस्से का आसमान भी मांगती हैं पर प्रेम और समन्वयवादी दृष्टिकोण के साथ ……….

भूल गयी थी तुम्हारे प्रेम में अपना
अस्तित्व
और निखरता गया मेरा
स्त्रीत्व
खुश हूँ आज भी
पर
ना जाने क्यों
लेखनी के पंख से उड़ना चाहती हूँ
मुझे मत रोको
मुझे
स्वर्ण आभूषण  नहीं 
आसमान चाहिए
—————————
यहाँ  कुछ रूढ़ियों के प्रति विरोध भी है ..
क्या गुनाह करती हैं बेटियाँ
कि कर दिया जाता है कन्यादान
बड़े चाव  से गयी थी वो
हल्दी की रस्म में
और सास ने कहा
रुको
सिर्फ सुहागनों के लिए है ये रस्म
क्यों क्रूर रीतियाँ
सिर्फ स्त्रियों के लिए ही हैं ?

युग चेतना एवं उद्बोधन
                                         वो कलम ही क्या जो समाज के लिए न चले | कवि का निज भी समष्टि में समाहित होता है | काव्य संग्रह का तीसरा खंड “युग चेतना ऐवम उदबोधन”  इस खंड में उनकी आत्मा की बेचैनी व् समाज के लिए कुछ करने की चाह स्पष्ट रूप से झलकती है | अपने परिवार के उत्तरदायित्व के साथ -साथ समाज के लिए कुछ करने का उत्तरदायित्व भी लेखनी पर होता है |जिसे किरण जी ने बखूबी निभाया है |

सीख लें हम बादलों से
किस पर गरजना है
किस पर बरसना है
किसको दिखाना है
किसको छुपाना है

और ………..

पीढा चढ़ कर ऊंचा बन रहे
आत्म प्रशंसा आप ही कर रहे
झाँक रहे औरों के घर में
नहीं देखते अपनी करनी
सूप पर हंसने लगी है चलनी

ऋतु-रंग
                                      काव्य संग्रह के अंतिम खंड ऋतु रंग है | इसमें 23 कविताएँ हैं | प्रभात कालीन सूर्य, बरसते मेघ, संध्या को घर वापस लौटते पक्षियों का कलरव और ऋतुओं के अनुसार अपना शृंगार परिवर्तित करती वसुंधरा के अनुपम सौन्दर्य को किरण जी की लेखनी ने शब्दों में जीवंत कर दिया है |

” खबरिया सत्य स्वप्न बलवंत
पिया कहीं तुम ही तो नहीं बसंत “
छलके नभ से मधुरस की गगरी
भीगें गाँव और झूमें नगरी
मन मेरा भी ना जाने क्यों
झूम जाना चाहता है
आज फिर से मन मेरा भीग जाना चाहता है |

                                              अंत में यही कहना चाहूँगी की किरण जी का यह पहला काव्य संग्रह है  जिसमें उन्होंने घर की दहलीज लांघ कर बाहर की दुनिया के सामने मुखर होने का साहस दिखाया है | इसी कारण  इसमें जहाँ एक ओर मिटटी और भावनाओ की भीनी भीनी  सुगंध है | शायद इसीलिए  देश की ८० % महिलाओ की भावनाओ को स्वर देती है “मुखरित संवेदनाएं”  भाव और शब्द  पक्ष बेहद मजबूत है| कविताओं में कमनीय कोमलता है | साहित्य में दिनों -दिन पुष्पित पल्लवित होती किरण जी को उनके प्रथम काव्य संग्रह के द्वितीय संस्करण के लिए बधाई |
मुखरित संवेदनाएँ -कविता संग्रह
कवयित्री -किरण सिंह
प्रकाशक – जानकी प्रकाशन
पृष्ठ -139
मूल्य -400 (हार्ड बाउन्ड ) फिलहाल अमेजन पर पचास प्रतिशत डिस्काउंट पर सिर्फ 200 में फ्री शिपिंग उपलब्ध है ।

समीक्षा -वंदना बाजपेयी

नमस्ते आंटी

नमस्ते आंटी, एक पतली – दुबली, लम्बी, छरहरी लगभग हमउम्र महिला के मुंह से आंटी सम्बोधन सुनकर कल्याणी थोड़ा असहज हो गई फिर भी थोड़ा खुद को संयमित करते हुए कुसुम को बैठने के लिए कह कर मन ही मन – ही – मन सोचने लगी  – क्या मैं सचमुच इतनी बुड्ढी हो गई हूँ कि वह आंटी बोले, फिर एक तिरछी नज़र कुसुम पर डालते हुए बुदबुदाई – हुंह! ये औरत खुद को क्या सोलह बरस की बाला समझ रही है । मन में तो आया कि उसे टोक दे लेकिन अभी कुछ ही महीने पहले कुसुम का परिवार कल्याणी के मुहल्ले में शिफ्ट हुआ था – इस दौरान आते-जाते दो – चार बार कुसुम से आमना – सामना हुआ था। हर बार कुसुम के मुंह से अपने लिए आंटी का सम्बोधन सुनकर वह सोच में पड़ जाती, पर शिष्टाचार वश कुछ कह नहीं पाती। आज पहली बार कुसुम उसके घर आई थी इसीलिए कल्याणी ने सोचा पहली बार घर आये आगन्तुक के साथ ऐसा कुछ कहना अशिष्टता होगी। अतः औपचारिक बातचीत के क्रम में उक्त महिला का परिचय तथा रुचि – अरुचि पूछते हुए चाय नाश्ता का प्रबन्ध करने लगी।  फिर तो वो महिला अपना डाइट गिनाने लगी साथ ही अपना फिगर मेंटेन रखने की रामकथा भी। बातों – बातों में कहने लगी कि जब मैं अपने बेटे के साथ कहीं जाती हूँ तो सभी कहते हैं कि अरे ये तेरी बहन है? यह बात कहते हुए उसके चेहरे पर गर्व और खुशी की रेखा स्पस्ट दिखाई दे रही थी लेकिन कल्याणी को यह सब सुनकर अन्दर ही अन्दर हँसी आ रही थी क्योंकि उस महिला के चेहरे की त्वचा और आँखों के आसपास की खिंची रेखाएं उसकी उम्र नापने के लिए पर्याप्त थीं।
वे दोनों बात – चीत कर ही रही थीं कि कल्याणी की छोटी बहन भी आ गई। वह कल्याणी से करीब दस वर्ष छोटी थी। हद तो तब हो गई जब कुसुम उसे भी मौसी कहकर सम्बोधित करने लगी । इस बात पर कल्याणी और उसकी बहन दोनों ही जोर – जोर से हँसने लगीं। वे क्यों हँसी इसबात को शायद कुसुम समझी नहीं या फिर समझना नहीं चाहती थी इसलिये अपना सम्बोधन जारी रखी। तभी कल्याणी की हमउम्र एक और पड़ोसन अपने पति की प्रमोशन की खुशी में मिठाई का डिब्बा लिये आ गईं और डब्बा खोलकर कुसुम की तरफ़ मुखातिब होकर बोलीं नमस्ते आँटी मिठाई लीजये ।
कुसुम को जैसे जोर का करंट लग गया, उसने त्वरित प्रतिक्रिया दी  आँटी???
मैं किस हिसाब से आपकी आँटी हो गई?
फिर वह पड़ोसन बोली जिस हिसाब से कल्याणी जी आपकी आँटी  हैं।
यह सुन कुसुम का मुंह देखने लायक था।
कल्याणी का घर ठहाकों से गूँज उठा।

जलधार

कथा की जल धार में मैं भीगी जा रही हूँ। मेरा अन्तर्मन डूबकर रोमांचित हो रहा है तो मेरी आत्मा में स्निग्ध सिहरन सी पैदा रही है। मति नतमस्तक है लेखनी की स्वामिनी को पढ़ कर और सोच रही है कि अवश्य ही इस महा लेखिका की प्रतिभा को पहचानकर स्वयं ब्रम्ह ने ही इन्हें लेखनी भेंट की होगी । और कभी-कभी संशय हो रहा है कि लेखिका कहीं स्वयं सरस्वती की अवतार तो नहीं ? मेरी भावनाएँ प्रबल हो रही हैं कुछ शब्द सुमन अर्पित करने को और मेरी लेखनी सयास उस जलधार को अपनी अंजुरी में भर कर अर्पित करने का प्रयास कर रही है पद्मश्री तथा भारत भारती जैसे सम्मानों से अलंकृत परम आदरणीया उषा किरण खान दी की बेहतरीन कहानियों का संग्रह जलधार को।

जल की धारा से चित्रित खूबसूरत आवरण में जिसमें परम् आदरणीया लेखिका का दैदिप्यमान चित्र है।
116 पृष्ठों में संकलित इस संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं।
पुस्तक की पहली कहानी है स्वास्तिक, जिसका नायक सतीश अपनी ही कई सारी बहनों का इकलौता भाई है ऊपर से ममेरी, चचेरी, फुफेरी बहनों के राखी का बंधन उसे उबाऊ लगता था। लेकिन समय ने सतीश का समय बदल दिया और वह अच्छे पद पर कार्यरत हो गया। अचानक एकदिन यात्रा के दौरान उसे अपनी फुफेरी बहन कांति से मुलाकात हो गई जिसके गरीब भाई पर तरस खाकर एक बेरोजगार लड़के ने अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ उससे विवाह कर लिया। इस बात पर सतीश कांति के भाई कौशल को खरी – खोटी भी सुनाई कि यदि लड़के को नौकरी नहीं मिली और उसके माता-पिता भी अपने घर में रखने से इंकार कर देंगे तो क्या होगा।
लेकिन कांति किस्मत की अच्छी रही कि लड़के को नौकरी मिल गई और उसकी गृहस्थी की गाड़ी उसके पति के प्यार और सम्मान के इंधन से सकुशल चल रही थी…… इस कहानी में बहुत ही खूबसूरती से रिश्तों के सकारात्मक पहलू को दिखाया गया है जिसके सामने भौतिकता बौनी नज़र आती है ।
संग्रह की दूसरी कहानी छुअन जीवन संध्या की वेला में अपनों से दूर धनाढ्य बुजुर्ग की कहानी है जिसके बेटे विदेश में बसे हुए हैं। बच्चों की बेरुखी से हताश अपना घर बेचकर अपनापन की तलाश में अपने भाई के पास जाना चाहते हैं लेकिन भाई ने उनका दायित्व बोध कराकर उनके जीवन को नई दिशा दे दी। यह कहानी निराशा की गहन तिमिर में आशा की ज्योति जलाती है।
संग्रह की तीसरी कहानी सुर्योदय पूर्णतः ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई कहानी है जिसमें अपने टंडेल की पत्नी का इलाज़ करवाने के पुण्य के बदले मोहन बाबू को पूरा गाँव तो संदेह की दृष्टि से देखता ही है साथ ही उनकी पत्नी भी इस संदेह के रोग से मुक्त नहीं हो पाती…. अन्ततः सकारात्मक सुर्योदय होता है।

संग्रह की चौथी कहानी उसके बिना एक वृद्ध विधुर की कहानी है जिसे बहुत ही खूबसूरती और मार्मिक ढंग से लिखा गया है।
संग्रह की पाँचवी कहानी वह एक नदी एक अलग तरह की कहानी है जिसमें माँ की बदचलनी का दंश बेटी झेल रही है। किंतु उसकी माँ की बचपन की सहेली एक पत्र के माध्यम से उसे समझाती है कि वह( तुम्हारी माँ) एक नदी है उसके प्रवाह को रोकने की चेष्टा मत करो।

संग्रह की छठी कहानी तुम ही भारत हो एक सच्चा, पवित्र और निश्छल प्रेम कहानी है। या यूँ कहें कि पुरुष और स्त्री के मध्य एक सच्ची मित्रता की कहानी है जिसमें भारतीय परिवेश के पुरुष का अपने परिवार के लिये सच्चे मन से की गई सेवा, श्रम और त्याग को दिखलाया गया है। नायिका नायक के दर्द को महसूस करके आहत है और वह उसके लिये उसके परिवार को भी भला-बुरा कह देती है। जिसपर नायक उसे ही भला-बुरा कह देता है। काफी अन्तराल के बाद पुनः मिलन होता है और नायिका उसके त्याग के लिए उसे तुम ही भारत हो कहकर विभूषित करती है।

संग्रह की सातवीं कहानी हँसी – हँसी पनवा खियओले बेइमनवा पूर्णतः बिहार के ग्रामीण परिवेश के सफेदपोश मुखिया की कहानी है जिसके कुकर्मो का बदला उसी के अंदाज में उसका अंत करके लिया जाता है। यह कहानी बहुत ही रोचक, कौतुहल पूर्ण व मार्मिक है जिसको पढ़ते हुए मन कहानी में पूरी तरह से डूब गया।

संग्रह की आठवीं कहानी तुम बिन अखुवन बिकल मुरारी एक अविवाहित स्त्री की बहुत ही खूबसूरत प्रेम कहानी है। इसमें नायिका सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भी भी अपनी माँ की अतिमहत्वाकांक्षा की वजह से अविवाहित रह जाती है। अपने मन पर अंकुश लगाने के बाद भी उसे एक विवाहित पुरुष से प्रेम हो जाता है। पुरुष उससे विवाह करके उसे पूर्ण करना चाहता है लेकिन वह अपने मन पर पत्थर रख मना कर देती है।

इस प्रकार उजास, अनजाना पहचाना सा तथा नौनिहाल भी काफी रोचक तथा तथा कौतुहल पूर्ण तथा प्रवाहमयी कहानी है जिसे पढ़ते हुए पाठक का चित्त एक क्षण के लिए भी इधर-उधर नहीं भटकेगा।
हाँ कहानी पढ़ते हुए वर्तनी की अशुद्धियाँ खली जरूर लेकिन इसके लिए सीधे-सीधे प्रकाशन विभाग दोषी है।
इस संग्रह की विशेषता यह भी है कि संग्रह की सभी कहानियों के परिदृश्य को इतनी खूबसूरती और सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है की पढ़ते हुए पाठक के आँखों के सामने वह देशकाल दिखने लगता है । कहानी के प्रत्येक पात्र अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं जिसे पढ़ते हुए मन सोचने पर विवश हो जाता है।
इसके लिए महान लेखिका परम् आदरणीया उषा किरण खान दीदी की कलम को शत् शत् नमन करते हुए उन्हें सादर बधाई देते हैं और कामना करते हैं कि आगे भी हमें उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता रहे

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – जलधार
लेखिका – उषा किरण खान
प्रकाशक – शिवना प्रकाशन

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है ।
http://www.amazon.in/dp/B08LNTY1VY
Ushakiran Khan Ushakiran Khan

गोलू – मोलू

हर भाव का धनी बाल कविता संग्रह- गोलू-मोलू
लेखिका- किरण सिंह

गोलू मोलू, एक प्यारा बाल-कविता संग्रह, जिसे लिखा है जानी मानी लेखिका किरण सिंह जी ने।पहले भी कई विधाओं में लिखकर साहित्यजगत को समृद्ध करने वाली किरण जी ने अब बाल साहित्य की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया है। इस क्षेत्र में भी उन्होंने अद्भुत अभिव्यक्ति दी है।
बच्चे अपनी दुनिया में उनको ही प्रवेश देते हैं जो दिल में बचपन संजोकर रखते हैं और उनके संग बागों में झूला झूलने और तितलियों के पीछे भागने का हौसला रखते हैं। इसी हौसले ने किरण जी से बाल साहित्य का सृजन करवाया। गोलू – मोलू पुस्तक में सर्वप्रथम लेखिका ने पत्र लिखकर बच्चों को सम्बोधित किया है और उनके समक्ष दोस्ती का हाथ बढ़ाया है जिसे बच्चे अवश्य स्वीकार करेंगे। पुस्तक का आरम्भ सरस्वती माँ की सुन्दर वंदना से किया गया है। उसके बाद एक प्रार्थना गीत है जिसे बच्चे अवश्य गाना पसन्द करेंगे। उसके बाद बच्चों की प्रिय माँ पर कविता है , जिसमें बच्चों की ओर से माँ के गुणों का वर्णन किया गया है। उसके बाद लेखिका की लेखनी ने हर उस विषय को स्पर्श किया है जहाँ बच्चे अवश्य होते हैं। टीचर जी कैसी होती हैं, बच्चों की ओर से पढ़ना मन को भाया। देखो भोर हुई उठ जाओ, बहुत प्यारी कविता है।
जहाँ बच्चे हों वहाँ उनकी चुहलबाजियाँ न हों, शरारतें न हों, मान मनौवल न हो…यह कैसे मुमकिन है।
‘ गोलू मोलू बबलू डब्लू’, ‘गुड़िया रानी’, ‘ दिया करो न घुड़की ‘, खेल खेल में लगे झगड़ने…कविताओं में लेखिका ने इन्हीं बाल स्वभाव को बाँधने का सफल प्रयास किया है। जैसे-जैसे मैं आगे की कविताएँ पढ़ती जा रही, किरण जी की सकारात्मक सोच एवं उन्हें शब्दों में बांधने की कला देख अचंभित हो रही। सूरज और चंदा में श्रेष्ठ कौन …पाठकगण स्वयं पढ़कर देखें। बच्चों की छोटी छोटी हरकतों को पैनी नजर से परखने वाली लेखिका ने कई कविताओं में हास्य का रंग घोलकर प्रस्तुत किया है जिसे पढ़ते हुए बरबस होठों पर मुस्कुराहट आ जाती है। जल का महत्व, मुनिया को पढ़ने का महत्व सामाजिक सरोकार की कविताएं भी अत्यंत सुन्दर हैं।
बच्चों में देशभक्ति की भावना का विकास भी अत्यंत आवश्यक है, इस जिम्मेदारी को भी किरण जी ने बखूबी निभाया है। अंतिम कविता समसामयिक है जिसे कोरोना के नाश की बात कही गयी है।
पुस्तक बच्चों को उपहार के रूप में दी जा सकती है। यह अमेज़ॉन पर उपलब्ध है।
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पुस्तक परिचय-
पुस्तक का नाम- गोलू मोलू ( बाल कविता – संग्रह)
लेखिका- किरण सिंह
प्रकाशन- जानकी प्रकाशन
कीमत- पुस्तक में 150/- है किंतु वह बिल्कुल आधी कीमत अर्थात 75/- रुपये में उपलब्ध है।