अंतर्ध्वनि-हमारे समकाल को दर्शाती सुंदर सरस कुंडलियाँ

लय, धुन, मात्रा भाव जो, लिए चले है साथ
दोहा रोला मिल करें, छंद कुंडली नाद
छंद कुंडली नाद, लगे है मीठा प्यारा
सब छंदों के बीच, अतुल, अनुपम वो न्यारा
ज्यों शहद संग नीम, स्वाद को करती गुन-गुन
जटिल विषय रसवंत, करे छंदों की लय धुन
वंदना बाजपेयी
दोहा और रोला से मिलकर बने, जहाँ अंतिम और प्रथम शब्द एक समान हो .. काव्य की ये विधा यानी कुंडलियाँ छंद मुझे हमेशा से आकर्षित करते रहे हैं | इसलिए आज जिस पुस्तक की बात करने जा रही हूँ, उसके प्रति मेरा सहज खिंचाव स्वाभाविक था| पर पढ़ना शुरू करते ही डूब जाने का भी अनुभव हुआ | तो आज बात करते हैं किरण सिंह जी द्वारा लिखित पुस्तक “अंतर्ध्वनि” की |जानकी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित एक बेहद खूबसूरत कवर के अंदर समाहित करीब दो सौ कुंडलियाँ कवयित्री के हृदय की वो अंतर्ध्वनि है जो हमारे समकाल से टकराकर उसके हृदय को ही गुंजायमान नहीं करती अपितु पाठक को भी आज के समय का सत्य सारस सुंदर तरीके से समझा कर कई नई परिभाषाएँ गढ़ती है |

अपनी गेयता के कारण कुंडलियाँ छंद विधा जितनी सरस लगती है उसको लिखना उतना ही कठिन है | वैसे छंद की कोई भी विधा हो, हर विधा एक कठिन नियम बद्ध रचना होती है | जिसमें कवि को जटिल से जटिल भावों को नियमों की सीमाओं में रहते हुए ही कलम बद्ध करना होता है | ये जीवन की जटिलता थी या काव्य की, जिस कारण कविता की धारा छंदबद्ध से मुक्त छंद की ओर मुड़ गई | कहीं ना कहीं ये भी सच है की मुक्तछंद लिखना थोड़ा आसान लगने के कारण कवियों की संख्या बढ़ी .. लेकिन प्रारम्भिक रचनाएँ लिखने के बाद समझ आता है की मुक्त छंद का भी एक शिल्प होता है जिसे साधना पड़ता है | और लिखते -लिखते ही उसमें निखार आता है | अब प्रेम जैसे भाव को ही लें ..

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लतियात।
भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही सब बात॥
बिहारी

प्यार किसी को करना लेकिन
कह कर उसे बताना क्या
अपने को अर्पण करना पर
और को अपनाना क्या
हरिवंश राय बच्चन

चम्पई आकाश तुम हो
हम जिसे पाते नहीं
बस देखते हैं ;
रेत में आधे गड़े
आलोक में आधे खड़े ।
केदारनाथ अग्रवाल
तीनों का अपना सौन्दर्य है | पर मुक्त छंद में भी शिल्प का आकाश पाने में समय लगता है और छंद बद्ध में कई बार कठिन भावों को नियम में बांधना मुश्किल | जैसा की पुस्तक के प्राक्कथन में आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी रवींद्र उपाध्याय जी की पंक्तियाँ के साथ कहते हैं की
तपन भरा परिवेश,
किस तरह इसको शीत लिखूँ
जीवन गद्ध हुआ
कहिए कैसे गीत लिखूँ ?
“मगर इस गद्य में जीवन में छंदास रचनाओं की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है, जो कभी पाठक को आंदोलित करे तो कभी अनुभूतिपरक मंदिर फुहार बन शीतलता प्रदान करे |”

शायद ऐसा ही अंतरदवंद किरण सिंह जी के मन में भी चल रहा होगा तभी बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष श्री अनिल सुलभ जी के छंद बद्ध रचना लिखने को प्रेरित करने पर उन्होंने छंद बद्ध रचना को विवहित और छंद मुक्त रचना को लिव इन रेलेशन शिप की संज्ञा देते हुए एक बहुत खूबसूरत कविता की रचना की है | जिसे “अपनी बात” में उन्होंने पाठकों से साझा किया है |
लिव इन रिलेशनशिप भी
एक कविता ही तो है
छंद मुक्त
ना रीतिरिवाजों की चिंता
न मंगलसूत्र का बंधन
न चूड़ियों की हथकड़ी
न पहनी पायल बेड़ी
खैर ! किरण सिंह जी की मुक्त छंद से छंद बद्ध दोहा , कुंडली, गीत आदि की यात्रा की मैं साक्षी रही हूँ और हर बार उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा पाठकों को मनवाया है | भाव प्रवणता और भाषा दोनों पर पकड़ इसमें उनकी सहायक बनी है | इस पुस्तक की शुरूआत “समर्पण” भी लेखक पाठक रिश्ते को समर्पित एक सुंदर कुंडलिया से की है | लेखक पाठकों की भावनाओं को शब्द देता है और पाठक की प्रतिक्रियाएँ उसे हर्षित हो कर बार -बार शब्द संसार रचने का साहस , देखिए तेरा तुझको अर्पण वाला भाव ….

अर्पित करने मैं चली, लेकर अक्षर चंद |
सज्ज हो गई भावना, बना पुन: नव छंद |
बना पुन :नव छंद, लेखनी चली निरंतर |
मुझको दिया समाज हमेशा नव -नव मंतर |
देती है सो आज , किरण भी होकर हर्षित |
रचनाओं का पुष्प गुच्छ है तुमको अर्पित || शुरुआती पृष्ठों पर प्रथम माता सरस्वती की आराधना करते हुए अन्य देवी देवताओं को प्रणाम करते हुए उन्होंने सूर्यदेव से अपनी लेखनी के लिए भी वरदान मांगा है .. लेकिन यहाँ व्यष्टि में भी समष्टि का भाव है | हर साहित्यकार जब भी कलम उठाता है तो उसका अभिप्राय यही होता है की जिस तरह सूर्य की जीवनदायनी किरणें धरती पर जीवन का कारक हैं उसे प्रकार उसकी लेखनी समाज को दिशा दे कर जीवन की विद्रूपताओं को कुछ कम कर सके , चाहे इसके लिए उसे कितना भी तपना क्यों ना पड़े |

मुझको भी वरदान दो, हे दिनकर आदित्य |
तुम जैसा ही जल सकूँ, चमकूँ रच साहित्य |
चमकूँ रच साहित्य, कामना है यह मेरी |
ना माँगूँ साम्राज्य, न चाहूँ चाकर चेरी |
लिख -लिख देगी अर्घ्य किरण, रचना की तुमको |
कर दो हे आदित्य, तपा कर सक्षम मुझको ||

अभी हाल में हमने पुरुष दिवस मनाया था | वैसे तो माता पिता में कोई भेद नहीं होता पर आज के पुरुष को कहीं ना कहीं ये लगता है की परिवार में उसके किए कामों को कम करके आँका जाता है | यहाँ पिता की भूमिका बताते हुए किरण जी बताती है कि बड़े संकटों में तो पिता ही काम आते हैं | मेरा विचार है की इसे पढ़कर परिवार के अंदर अपने सहयोग को मिलने वाले मान की पुरुषों की शिकायत कम हो जाएगी …
संकट हो छोटा अगर, माँ चिल्लाते आप
आया जो संकट बड़ा, कहें बाप रे बाप |
कहें बाप रे बाप, बचा लो मेरे दादा |
सूझे नहीं उपाय, कष्ट होता जब ज्यादा |
पिता प्रकट हो आप, हटाता पाठ का कंटक
रखकर सिर पर हाथ, पिता हर लेता संकट ||

अभी काफी समय पर किसान आंदोलन चल रहा था, प्रकाश पर्व पर सरकार ने किसानों की शर्ते मान ली | इसका एक कारण ये था की किसानों के साथ आम जनता भी खड़ी थी और कलम भी | किरण जी प्रगति या विकास को सीधे किसान की प्रगति से जोड़ कर देखती हैं | वो लिखती हैं कि …..
हुई हमारी है प्रगति, तब हम लेंगे मान |
हो जाएंगे देश के, अगर प्रसन्न किसान |
अगर प्रसन्न किसान, उगाएँ चांदी -सोना |
देकर सभी उतार, नजरिया जादू टोना |
होगा हर्षित गाँव, किरण हर नागरी न्यारी |
हम भी लेंगे माँ, प्रगति है हुई हमारी ||

कोई महिला कुछ भी लिखे उसकी कलम में स्त्री जीवन, स्त्री संघर्ष और समाज में समान रूप से जीवन जीने के अधिकार की मांग वैसे ही गुथी होती है जैसे किसी पुष्प हार में पुष्प | किरण सिंह जी के स्त्री विमर्श की कुंडलियों में जहाँ कन्या दान और दहेज के खिलाफ आक्रोश है वहीं शिक्षा और अपनी प्रतिभा को निखारने देने के अवसर की मांग | वो बेटियों को अपनी प्रतिभा को पहचान कर विकसित करने की प्रेरणा भी देती हैं | एक बात जो हम महिलाओं को अक्सर खटकती है की स्त्री स्त्री की शत्रु है .. इस नारे का उदय कहाँ और कैसे हुआ ? और क्योंकर बार -बार स्त्री इसे स्वयं भी प्रयोग करती है | किरण सिंह इसे पितृसत्ता की चाल बताती हैं और इसे काटने का उपाय बताते हुए स्वयं पहल करने की बात करती हैं ..

रहना है तुमको अगर, किरण सबल समृद्ध
नारी -नारी मित्र हैं, प्रथम करो यह सिद्ध
प्रथम करो यह सिद्ध शक्ति बन कर नारी की |
बदलो अपना चित्र, बना जो बेचारी की |
स्वर को करो बुलंद, खो जो भी कहना है |
नहीं बहाना अश्रु, नहीं अब चुप रहना है ||

पर्यावरण हम सबकी साझी चिंता है .. समस्त जीव जंतुओं में केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है जो इसे नष्ट करने में डाल पर बैठे मूर्ख मानव की तरह उसे डाल को काटने में ये सोच कर लगा है की डाल कटने पर वो नहीं गिरेगा | जंगल काटे जा रहे हैं नदियों और हवा में में विष मिलाया जा रहा है| इस क्रूरता से आहत किरण जी ताकीद करती है ….

जाग जरा अब तो मनुज, कर ले सोच विचार |
डर प्रकार्तिक प्रकोप से, मत कर अत्याचार |
मत कर अत्याचार प्रकृति पर इतना ज्यादा |
कर ले हे नर नार , स्वयं से टू भी वादा |
सुंदर यह संसार , रहेगा स्वस्थ सदा जब
लेगी टू भी ठान , चेतना जाग जरा अब || रिश्ते हमारे जीवन का आधार स्तम्भ हैं | सच्चाई ये वो ज्यादा सुखी होते हैं जिनके रिश्ते अच्छे चलते हैं | रिश्ते -नाते खंड में किरण सिंह जी जहाँ अच्छे रिश्तों की पहचान बताती है वहीं बुरे रिश्तों से सावधान भी करती हैं | एक कुंडलियाँ छंद में मित्र चाहे बदल जाए, याद ना भी करें पर शत्रु सदा याद रखते हैं का व्यंगात्मक पुट भी है | पर रिश्तों की चोट उन्हें भी चुभती है .. पर इसके लिए सही वक्त की प्रतीक्षा का माद्दा उनमें है |

देना किरण जवाब, वक्त पर उन सब जन को |
खींच रहे थे टांग, चोट वाणी से कर जो ||

हालांकि अंततः वो हर रिश्ते के महत्व को स्वीकार करती हैं ..
चाहे तू तकरार कर, चाहे तू कर प्यार
रिश्ते -नाते हैं मगर, जीवन का आधार || अंत में यही कहूँगी की जानकी प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में जीवन के विविध रंग हैं | ईश वंदना , प्रकृति पर्यावरण, प्रेम , योग, कोविड, स्त्री विमर्श, उद्बोधन, पुलवामा के शहीद, लेखनी शिक्षक आदि में हमारा समकाल समाया हुआ है | जिसको किरण जी एक आम मनुष्य की तरह देखकर पाठकों के साथ साझा कर रही है | इसलिए ये कुंडलियाँ कहीं भी उपदेशक नहीं लगती है | लेखक और पाठक की दूरी खत्म हो जाती है और वो स्वयं के सुधार के माध्यम से ही समाज में सुधार की कल्पना करते हुए “बूंद -बूंद से घट भरता है का निर्दोष पर महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती हैं | चाहें वो स्त्री विमर्श हो या पर्यावरण की रक्षा | यहाँ तक की आध्यात्म की बात करते हुए भी वो “ पर उपदेश की राह पर ना चलकर आत्मसुधार की बात करती हैं | इसलिए मैंने पहले भी कहा था की उनकी रचनाएँ व्यष्टि से समष्टि की ओर जाति हैं और पाठक को अपनी सी लगती हैं | किरण सिंह जी भाव, भाषा और जुनून की धनी है | उनकी हर किताब में एक लेखक के रूप में उनके विकास की ये यात्रा दिखती है | यही सच्चे अर्थों में किसी भी कलमकार के शब्दों का हासिल है | अगर आप भी कुंडलियाँ छंद के माध्यम से भाव रस रचना के साथ हमारे समकाल से मिलना चाहते हैं तो ये किताब आप के लिए मुफीद है |

चलते -चलते आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी के आशीर्वचन के रूप में लिखा गया मुक्तक जिसमें मेरी भावनाएँ भी शामिल हैं ..
सदा अधर पर फूलों सी मुस्कान रहे ,
भौरऑन का संगीत सरीखा मान रहे,
जैसा भी हो छह, राह सब खुले खिले
नहीं अधूरा कोई भी अरमान रहे ||

अंतर्ध्वनि- कुंडलियाँ संग्रह
लेखिका -किरण सिंह
प्रकाशक -जानकी प्रकाशन
पृष्ठ – 104
मूल्य -300 रुपये
अमेजॉन लिंक –

अन्तर्ध्वनि

अन्तर्ध्वनी… एक सहज ध्वनि जो कुण्डलिया में रच बस गयी — ऋता शेखर ‘मधु'(समीक्षा)

स्वयं के संग्रह छपवाना और चयन द्वारा प्रकाशित होना, दो अलग अलग भाव सम्प्रेषित करता है।
बिहार राजभाषा परिषद द्वारा चयनित कुण्डलिया संग्रह “अन्तर्ध्वनी” की लेखिका श्रीमती किरण सिंह जी है। सर्वप्रथम उन्हें बधाई प्रेषित करती हूँ कि बिहार सरकार द्वारा उनकी रचनाएँ चयनित की गई हैं और प्रकाशन के लिए अनुदान की राशि मिली।
पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध साहित्यकार आ0 भगवती प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा लिखी गयी है। रचनाओं के बारे में उन्होंने जो लिखा वह पुस्तक में पढ़ियेगा। मैं यहाँ उनके आशीर्वचन उद्धृत कर रही हूँ। यही भाव हमारे भी होंगे।

सदा अधर पर फूलों-सी मुस्कान रहे,
भौरों का संगीत सरीखा मान रहे,
जैसी भी हो चाह, राह सब खुले-खिले
नहीं अधूरा कोई भी अरमान रहे।
— भगवती प्रसाद द्विवेदी

दिनकर की वह है किरण, लिए चली उत्साह।
जादू जैसी लेखनी, भरती सतत प्रवाह।।
भरती सतत प्रवाह, शब्द हो जाते कुसुमित।
सरस् सरल हर भाव, सहज होते है पुष्पित।
पूरी हो हर चाह, मधु लुटाएँ वह सबपर ।
सखी किरण के साथ, सदा मुस्काएं दिनकर।।
— ऋता शेखर

अब पुस्तक पर आते हैं।
अपनी बात में किरण जी ने विस्तार से अपनी लेखन यात्रा का ज़िक्र किया है। छंदमुक्त से छंदयुक्त तक का सफर उन्होंने कविता में पिरोकर अपनी बात रखी है। अभी तक में उनकी बहुत सारी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसका जिक्र भी उन्होंने किया है।
उन्होंने अपनी कुंडलियाँ कुल 19 विषयों के अंतर्गत रखी हैं। प्रथम विषय प्रार्थना में माँ सरस्वती, माँ दुर्गा, पार्वती, सूर्य, श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं शिवजी की आराधना की गई है।
माँ विषय पर चार कुंडलियाँ हैं। एक कुण्डलिया में गौरैया का बिम्ब लिया गया है जो मुझे बहुत अच्छी लगी।

चुन चुन दाना चोंच में, लाती बारम्बार।
देख अचंभित में हुई, माँ बच्चों का प्यार।।
माँ बच्चों का प्यार, देखकर मैंने सच्चा।
सीखा गुण दो चार, लगा जो मुझको अच्छा।
कहे किरण कर यत्न, सोचती क्यों घबराना।
गौरैया हर बार, खिलाती चुन चुन दाना ।।

पिता विषय पर चार कुंडलियाँ में मुझे यह सबसे अच्छी लगी।

संकट छोटा हो अगर, माँ चिल्लाते आप ।
आया ज्यों संकट बड़ा, कहें बाप रे बाप ।।
कहें बाप रे बाप, बचा लो मेरे दादा ।
सूझे नहीं उपाय, कष्ट जब होता ज्यादा।
पिता प्रकट हो आप, हटाता पथ का कंटक।
रखकर सिर पर हाथ, पिता हर लेता संकट ।।

कृषक के लिए लेखिका ने छह कुंडलियाँ लिखी हैं। यह उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है। कृषक की कर्मठता, उसके सपने, उसका प्रहरी जैसा रूप , भारत को कृषि प्रधान देश कहकर लिखना तथा कृषक के लिए गांव की प्रगति को महत्व देना कवयित्री की उच्च कोटि की सोच को दर्शाता हैं।
प्राकृतिक सुषमा में उनकी लेखनी ने खूब सौंदर्य बिखेरा है। सूरज, चाँद, हरियाली, सब कुछ ही है।
स्त्री विमर्श की कुंडलियाँ में लेखिका ने एक बात पर विशेष बल दिया है कि नारी, नारी की दुश्मन नहीं होती। ये नर द्वारा बने गए जाल हैं।

सदियों से ही नर यहाँ, बुनते आए जाल|
नार, नार की शत्रु है, कहकर चलते चाल ||
कहकर चलते चाल, जरा तुम समझो इसको |
डाल रखे हैं फूट, दोष बोलो दूँ किसको |
कहे किरण, हे नार ! करो कुछ विषय समझ के|
धो दो सभी कलंक, लगा है जो सदियों से ||

विषय ‘प्रीत की पाती’ पर कुल ३२ कुण्डलियाँ हैं | सभी एक से बढ़कर एक सरस हैं| पढ़ते हुए मन लेखिका के लिये स्वतः ही कह उठता है…’तू प्यार का सागर है…’| एक कुण्डलिया उद्धृत कर रही हूँ|

ज्यों उनको देखा सखी, गई हृदय मैं हार |
नींद चैन सब ले गया, छलिया राजकुमार ||
छलिया राजकुमार, श्रेष्ठतम पुरुष जगत का |
कर बैठी मैं प्यार, हुआ आभास अलग सा |
किया किरण ने प्रश्न, हो गया क्या मुझको |
ठगी रह गई हाय, देख ली मैं ज्यों उनको ||

वात्सल्य पर २ कुण्डलियाँ हैं | ‘मन की आँख’ विषय में २४ कुण्डलियाँ हैं| यह अंतर्ध्वनि को सही मायने में परिभाषित कर रहीं|लेखिका की सकारात्मक सोच की बानगी देखिए |

जो कुछ मिला नसीब से, हो जा उससे तुष्ट |
सबको सब मिलता नहीं, क्यों होना है रुष्ट ||
क्यों होना है रुष्ट, कोसना क्यों किस्मत को |
हम जिसके थे योग्य, दिया ईश्वर ने हमको |
जीवन से दो-चार, चुराकर खुशियाँ ले लो |
खुशी खुशी लो बाँट, ईश ने तुम्हें दिया जो ||

‘युग बोध के बाद किरण जी की लेखनी रिश्ते-नातों पर चली है इस |विषय से एक कुण्डलिया उद्धृत कर अपनी बात को विराम दूँगी| आगे के विषयों को पुस्तक में पढ़ें| जिन्हें छंदों से लगाव है वे तो अवश्य पसंद करेंगे, जिन्हें न हो, वे पसंद करने लगेंगे यह हमारा विश्वास है| एक सीख भरी कुण्डलिया देखिए|

रिश्तों पर विश्वास कर, जो हैं बहुत अजीज |
भूले से बोना नहीं, उर में शक के बीज |
उर में शक के बीज, अंकुरित हुए अगर जो |
आएगा तूञान, उठेगा हृदय लहर तो |
किरण सभी संबंध, रखा बंधक किश्तों पर|
धीरे- धीरे नेह, लुटाना है रिश्तों पर ||

आशा है आगे भी किरण जी की कृतियाँ पढ़ने को मिलेंगी | उनकी लेखनी सतत क्रियाशील रहे…
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ…
ऋता शेखर ‘मधु’

पुस्तक परिचय
नाम- अंतर्ध्वनि
लेखिका- किरण सिंह
प्रकाशन- जानकी प्रकाशन

पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।

वक्त में है बहुत

 

वक्त  में हैं बहुत तल्खियाँ जिंदगी ।  

बन्द रख दिल की तू खिड़कियाँ जिंदगी ।।


दिल में तूफां उठे तो सँभलना जरा –

डूब जाएँ  न ये कस्तियाँ जिंदगी।


तोहफा है बहुत खूबसूरत –  सा ये –

जो दिया रब ने कर शुक्रिया जिंदगी। 


मौत की तो है फितरत डराएगी ही-

करने दे उसको मनमर्जियाँ जिंदगी ।


लाख देता रहे वक्त तुझको दगा-

आगे बढ़  , माफ़ कर गलतियाँ जिंदगी। 


है पता खूबसूरत है सबसे  ‘ किरण ‘-

चाहे जितनी पड़ें अर्जियाँ जिंदगी।

श्री राम कथामृतम्

बच्चों को रामकथा का अमृत रसपान 

  • प्रभात कुमार राय 

कृति: श्री राम कथामृतम्  ( बाल खंड काव्य  )

कृतिकार : किरण सिंह 

प्रकाशक: जानकी प्रकाशन  पटना: नई दिल्ली 

पृष्ठ: 58             मूल्य: रू 150/-

समीक्षक: प्रभात कुमार राय 

मो-  9934083444

     ‘ श्री राम कथामृतम् ‘ कवयित्री द्वारा राम चरित को सरल, सहज एवं सुबोध शब्दों में बालोपयोगी सांचे में ढालने का सत्प्रयास है । मूलतः इस कृति के पीछे 2020 की कुछ घटनाएं कवयित्री ने ‘अपनी बात ‘ में बताया है: (1) ‘ कौन बनेगा करोड़पति ‘ में संजीवनी बूटी संबंधी जानकारी से अनभिज्ञता (2) लब्थप्रतिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा साहित्यिक चर्चा के दरम्यान बाल साहित्य को हर साहित्यकार  की नैतिक जिम्मेदारी बताना (3) कोविड 19 महामारी की रोकथाम के लिए आरोपित लाकडाउन का रचनात्मक कार्य में सदुपयोग (4) लाॅकडाउन की अवधि मे रामानंद सागर द्वारा फिल्माया रामायण का दूरदर्शन पर प्रसारण ।

     यह इत्तेफाक है कि इस पुस्तक के अध्ययन करते वक्त मेरा ध्यान एक दिलचस्प समाचार की ओर आकृष्ट हुआ जिसकी चर्चा प्रसंगवश कर रहा हूँ । भुवनेश्वर के 10 साल के आयुष कुमार खुंटिया ने लाॅकडाउन के दौरान प्रसारित होने वाले रामायण सीरियल पर आधारित दूरदर्शन सीरीज देखने के बाद बच्चों के लिए उड़िया में रामायण लिखी है। 100 पन्ने वाले इस किताब का नाम पिलाका रामायण (बच्चों के लिए रामायण) रखा गया है।

     स्वभावतः बच्चे गूढ, मोटी और गंभीर किताबों से भागते हैं । पढ़ने में रूचि विकसित होने पर बच्चों को अपने मानसिक विकास के लिए ऐसे बाल साहित्य की जरूरत पड़ती है जिसे वे अपना समझकर आत्मसात कर लें । ऐसा साहित्य मनोरंजन के अलावा बालकों में नेक भावनाओं का उदय करने में भी सहायक होता है । कवयित्री ने बाल साहित्य की बुनियादी आवश्यकताओं को भलीभांति ध्यान में रखकर इस खंड काव्य की रचना की है ।

         रामचरितमानस के अक्षुण्णतत्व एवं सूत्र-संकेत सर्वकालिक है जो आज के युग-संदर्भ में भी सर्वथा सही उतरते हैं । राम का बहुआयामी, भव्य एवं महनीय चरित्र सदियों से रचनाकारों को उन पर लिखने के लिए प्रेरित करता रहा है । राष्ट्र कवि  मैथिलीशरण गुप्त ने तो यहाँ तक कह दिया:

           “ राम तुम्हारा चरित स्वंय ही काव्य है,

              कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।“

        जयशंकर प्रसाद ने लिखा है:

        “ अखिल विश्व में रमा हुआ है राम हमारा,

          सकल धरा पर जिसका क्रीड़ापूर्ण पसारा ।“

  मर्यादा पुरुषोत्तम की कथा को खंड काव्य के रूप में बालकों के लिए प्रस्तुत करने का सुप्रयास कवयित्री द्वारा इसी श्रृंखला में एक कड़ी है ।

         समस्त रामचरितमानस में राम को सत्य, न्याय,क्षमा, उदारता, कृपा और स्नेह का उच्चतम भाव प्रदर्शित करते हुए चित्रित किया गया है । निस्संदेह मानव के सद्गुणों का समन्वय उसी में निहित है जिससे समाज, वर्ग, परिवार और व्यक्ति की मर्यादा सुरक्षित रहे। राम मर्यादा के संरक्षण में सर्वोत्तम हैं । इन्हीं उच्चतम गुणों को बच्चों के प्रभाव्य मस्तिष्क में बीजारोपण के सोद्देश्य से कवयित्री ने अत्यल्प एवं अत्यंत सरल शब्दों में पूरे रामायण का मर्म को गूंथने का कठिन कार्य बखूबी किया है ।

      ध्यातव्य है कि रामचरितमानस के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास ने खुद बाल्यकाल मे अपने कोमल मन-मस्तिष्क में ऊँचे भावो के बीजारोपण के महत्व को स्वीकारा है । सौभाग्यवश बाल्यावस्था में  उन्होने सूकर क्षेत्र में अपने गुरू के मुख से रामकथा सुनी थी । स्वाभाविक तौर पर शिशु-काल में  उन्हें राम चरित का पूरा बोध नहीं हो सका था । इस बात का संकेत उन्होंने रामचरितमानस के प्रारम्भ में  इस प्रकार किया है:

        “ मैं पुनि निज गुरू सन सुनी कथा सो सूकर खेत ।

          समुझि नहीं तसि बालपन तब अति रहेऊॅ अचेत ।।“

     गुरु मुख से रामकथा सुनकर गोस्वामी जी के बाल-हृदय में  राम चरित का बीज तो अंकुरित हो गया था किन्तु उसका पल्लवन उनके परवर्ती जीवन में हुआ और उन्होंने युगांतरकारी महाकाव्य की रचना की ।

               रामायण में प्रभु राम का चरित्र उदात्त होते हुए भी  सुख-दुःख से उद्वेलित होता हुआ दिखलाया गया है जिससे वे सामान्य मानव की कोटि मे आ जाते है । उनसे आत्मीयता स्थापित हो ज़ाती है और उनके हर्ष-विषाद में उल्लसित और दुखी हो जाता है । अरण्यकाण्ड में सीता-हरण हो जाने पर राम की करूणपूर्ण दशा का चित्रण बड़े मार्मिक ढंग से किया है:

      “  हे खग-मृग हे मधुकर सेवी। तुम देखी सीता मृगनैनी ।

         यहि विधि खोजत विलपत स्वामी । मनुहॅ कहा विरही अति कामी।“

       कवयित्री ने इसी भाव को सरल शब्दों में बालकों को सहजता से ग्रहण करने हेतु यों लिखा है :

       ‘ लगे  राम-लक्ष्मण फिर करने/ सीताजी की खोज/

         भटक-भटक कर दोनों भाई/ भूले अपना ओज /’

          हनुमान द्वारा गिरि से औषधि ले आने पर राम की प्रसन्नता अवर्णनीय है-

          “ हरखि राम भेटउ हनुमाना । अति कृतज्ञ प्रभु परम सुजाना ।“

कवयित्री ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है:

‘ भरत वाण से अतिशीघ्र ही/ पहुंच गये हनुमान/

  हुए प्रसन्न तब राम लिया / सबने ही लोहा मान/’

         तुलसीदास जी ने अयोध्याकांड में केवट प्रसंग का वर्णन बड़े ही भावोत्पादक ढंग से  किया है । ( बाल्मीकीय रामायण में यह प्रसंग बिलकुल नहीं है । वहां राम नाव चढ़कर शीघ्र पार कर लेते हैं।) तुलसीदास जी ने केवट से कहलवाया है कि-

“ पद कमल धोई चढाई नाव न नाथ उतराई चहुँह।“

क्योंकि  –  “ छुवत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तैन काठ कठिनाई । तरनिऊ मुनि धरनी होई जाई। बाट मोरि नाव उड़ाई ।“

कवयित्री ने इस प्रसंग का वर्णन यों किया है:

        ‘ केवट बोला, कहीँ बनें न / नारी मेरा नाव/

          इसीलिए मैं प्रथम आपका/ धोऊॅगा यह पाँव  ।।‘

    कवयित्री ने समुद्र द्वारा राह नहीँ देने पर राम के क्रोध का वर्णन इस प्रकार किया है :

    ‘ पूजा करने लगे राम जी/ रखे तीन दिन धीर/

      किन्तु जलधि ने दी न राह तो/ तान लिए वे तीर/’

( “ विनय न मानहि जलधि जड़, गये तीन दिन बीत।

    बोले राम सकोप तब, भय बिनु होहिं न प्रीति ।“)

           तुलसीदास जी ने लिखा है :

 “ कवि-कुल वनु पावन जानी। राम-सिया जस मंगल खानी।

   तेहि  ते मैं कछु कहा बखानी/ करन पुनीत  हेतु निज बानी।“

(  सीता और राम के यश को कविकुल के जीवन को पवित्र करनेवाला और मंगोलों की खान जानकर, मैंने भी अपनी वाणी पवित्र करने के निमित्त उसका थोड़ा सा वर्णन कर डाला हूँ ।)

कवयित्री ने भी रामचरितमानस के पात्रों के माध्यम से बच्चों के लिए सदाचार, भातृभाव, सेवा, नैतिकता एवं सत्यनिष्ठा की सीख देने का पुनीत कार्य किया है।

      इस रचना में सादगी और मिठास के साथ सहृदयता और प्रांजलता मौजूद है । प्रसंगानुकूल चित्रों का समावेश प्रभावोत्पादक है और बच्चों को भायगा। इस कृति में बच्चों की रूचि के अनुकूल ही भाव , भाषा, शैली, प्रवाह आदि वर्तमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बालकों की सहज वृति में तारतम्य होकर यह खंड काव्य उद्भूत हुई  है । निस्संदेह बच्चे इस सोद्देश्य काव्य से लाभान्वित होंगे और भावी जीवन में चारित्रिक उत्थान की दिशा में  अग्रसर होंगे ।

जाऊँगा मैं स्कूल

जाऊँगा मैं स्कूल

रोज मुझे बहलाकर मम्मी,
नहीं बनाओ फूल।
नाम लिखा दो मेरा भी अब ,
जाऊँगा मैं स्कूल।

देखो मेरे भैया राजा,
कितने बनते स्मार्ट ।
पढ़ना-लिखना मुझको भी है,
करना जल्दी स्टार्ट।

अभी बहुत छोटे हो बेटा,
जिद्द करो मत व्यर्थ ।
पढ़ना-लिखना क्या है प्यारे ,
पहले समझो अर्थ।

क ख ग घ ए बी सी डी,
वन टू एक दो तीन।
चलो पढ़ाती हूँ मैं तुमको,
उँगली पर गिन – गिन।

मान लिये गोलू राजा फिर,
मम्मी की यह बात।
लगे पढ़ाई करने घर में,
मन से वह दिन रात।

धीरे-धीरे गोलू राजा,
हो गये होशियार।
मम्मी – पापा भैया उनको,
करते प्यार – दुलार।

बड़े हुए जब गोलू राजा,
दिये स्कूल में टेस्ट।
दिये जवाब फटाफट सार,
मार्क्स आ गया बेस्ट।

फिर मस्ती में गोलू राजा,
गये खुशी से झूम ।
मम्मी पापा लिये गर्व से,
उनका माथा चूम।

औरत बुद्ध नहीं होती

पता नहीं ब्रम्ह ने स्त्रियों के हृदय को ही कुछ विशेष रूप से बनाया है या फिर बचपन से परिवार व समाज के द्वारा दिये गये संस्कारों का असर है कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी वह मोह – माया के बंधन से मुक्त नहीं हो पातीं।
कभी-कभी वह पुरुषों से प्रतिस्पर्धा में उन्हीं की भांति ठोस निर्णय लेना चाहती भी हैं तो वह सफल नहीं हो पातीं क्योंकि उनका स्वभाव तो पानी की तरह होता है जो कि बर्फ की तरह ठोस तो हो जाता है किन्तु ज्यों ही स्नेह और ममता की तपिश उनपर पड़ती है तो उनका हृदय पिघलने लगता है और वह ठोस निर्णय लेने में नाकामयाब हो जाती हैं।
शायद यही वजह है कि औरत बुद्ध नहीं हो सकती।
इस बात को अति संवेदनशील युवा कवयित्री अन्नपूर्णा सिसोदिया ने बखूबी महसूसा और बहुत ही खूबसूरती से कविता में गढ़ कर एक पुस्तक में संग्रहित किया, जिसका शीर्षक ही है औरत बुद्ध नहीं होती ।
पुस्तक का आवरण चित्र जिसमें मुक्तिमार्ग की तरफ़ बढ़ती हुई स्त्री तो है लेकिन रिश्तों की डोर से बंधी हुई है ही इतना सुन्दर व सारगर्भित है कि वह स्वयं ही पुस्तक में संग्रहित रचनाओं का सार बयाँ करने में समर्थ है।
मैं शुरूआत करती हूँ कवयित्री के आत्मकथन से जहां वह स्वयं कहती हैं –
“कविता मानव हृदय के गूढ़ भावों की अभिव्यंजना के साथ नवीन चेतना की वाहक बन, समाज में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, राजनीतिक, सामाजिक और व्यवस्थागत विसंगतियों पर विरोध का स्वर मुखर करती है। केवल परिस्थितियों का चित्रण कविता का उद्देश्य कभी नहीं रहा क्योंकि किसी भी रचना की उत्कृष्टता का आधार मात्र कला व बिम्ब नहीं हो सकते, उसमें युगमंथनकर्ता विषयवस्तु एवम् मानव समाज के महान ऐतिहासिक मूल्यों की प्रतिष्ठा का समावेश भी आवश्यक है।….
उक्त बातें कवयित्री सिर्फ कहती ही नहीं हैं, बल्कि उन्होंने अपनी कविताओं में सभी मूल्यों का समावेश भी किया है।
वैसे तो यह पुस्तक पूर्णतः स्त्री विमर्श पर आधारित है किन्तु कवयित्री ने करीब – करीब सभी विषयों पर पैनी दृष्टि डालते हुए अपनी कलम चलाई है जो कि काबिलेतारीफ है।
पुस्तक की पहली ही कविता मदारी आया खेल दिखाने में कवयित्री सामाजिक विद्रुपताओं पर व्यंग्य वाण छोड़ते हुए लिखती हैं –

रुपयों की बरसात और डुगडुगी की आवाज़ चरम पर थी और बंदर,
बंदरिया के पास धरती पर
आवाज़ बंद हो गई, भीड़ छँट गई
मुफ्त के घुंघरू दोनो के निष्प्राण देह से अलग कर
चल दिया मदारी रुपयों की पोटली संभालता
फिर से
नये बंदर और बंदरिया की खोज में
डुग – डुग – डुग – डुग……

शाशन व्यवस्था पर कुठाराघात करते हुए कवयित्री लिखती हैं –
प्रजा रोई, चिल्लाई
राजा की नींद में खलल पड़ा
उसने बैचैनी से करवट बदली
और कानो पर तकिया रख लिया
कोड़े अब भी बरस रहे हैं
प्रजा अब भी रो रही है
लेकिन राजा सुकून से सो पा रहा है
देश की व्यवस्था दुरुस्त हो रही है

पढ़ाई, बस्तों तथा अभिभावकों के महत्वाकांक्षा के बोझ तले तबे बच्चों के दर्द को महसूसते हुए कवयित्री लिखती हैं –
मैदान में अब शोर नहीं गूँजता, सन्नाटा पसरा है वहाँ
सारी गेंदे आसमान ने लील ली है या उस भारी बस्ते ने…….

आगे लिखती हैं –
बच्चे अब दादी – नानी के घर भी नहीं जातेऊ
क्यों कि उन्हें बच्चा रहने की इजाजत नहीं
उन्हें रोबोट बनना है
ऐसा रोबोट, जिसे बनते ही दौड़ लगानी है
और हमेशा आगे रहना इस दौड़ में अनिवार्य शर्त है
उसे इजाजत नहीं है पीछे रहने या असफल होने की
बच्चे खिलौनों को हाथ नहीं लगाते
क्यों कि खेलना फालतू होता है
और बच्चे अब फालतू नहीं
माता-पिता की उम्मीदों का बोझ ढोने वाले कुली हैं,……….

जैसा कि मैंने पूर्व में ही कहा कि यह पुस्तक पूर्णतः स्त्री विमर्श पर आधारित है तो आसमान सी वह शीर्षक कविता के माध्यम से कवयित्री स्त्रियों की स्थिति का सटीक चित्रण करते हुए लिखती हैं –

रोटी के साथ जब भी फूली थोड़ी खुशी से
अगले ही पल फटकार कर पिचका दिया घी लगाकर
और बंद हो गई कटोरदान में
सलीके से काटा सब्जी के साथ, अपनी हर इच्छा को
और मिला दिये छद्म मुस्कान के मसाले

स्त्रियों को लेखन के क्षेत्र में भी दोयम दर्जे पर रखने वालों को बहुत ही तुलनात्मक अंदाज़ में समझाते हुए कवयित्री लिखती है मन कविता के माध्यम से कहती हैं –

एक पुरुष लिखता है
क्यों कि उसे लिखना है
सब कुछ सोच समझ कर
जाँच परख कर
वह पारखी है
बहुत बड़ा ज्ञानी है
उसे अपने लेखन से
आने वाली पीढ़ियों का
मार्ग दर्शन करना है
अपनी विद्वता की धाक जो जमानी है

जब स्त्री लिखती है
तो बस इसलिये
क्योंकि
उसे कुछ कहना है
अपने मन का
वह बहुत नहीं जानती
बस अपने भावों के साथ
बहती है
वो प्रेम लिखती है
तो केवल लिखती नहीं
जीती है उसे
अपने शब्दों में जब वो “प्रकृति” लिखती है
तो तितली के परो सवार हो
नाप आती है सारा जंगल

महिला सशक्तिकरण झंडा गाड़ते हुए कवयित्री कहती हैं –

झुकूंगी नहीं

जब बढ़ाती हूँ, कदमों की गति
और मेरी आँखें देखने लगती है
संभावनाओं का आसमान
मेरे पंख खुलने से पहले ही
तुम प्रमाणपत्र जारी कर देते हो
मेरे व्यक्तित्व और चरित्र का
तुम्हारे साथ भीड़ बढ़ने लगती है
और मैं हिल जाती हूँ…..

ये तुम्हारी, मेरी या उसकी बात नहीं
ये हमारे सफ़र की कहानी है
मंजिल तक पहुंचना ही होगा
उस हर बेटी के लिए
जिसे उड़ना है, अपनी उड़ान
अपने पंखों से
चलाओ वाण जितना चाहे
मेरे हौसलों ने जवाब देना सीख लिया है
अब नहीं, नहीं झुकूंगी मैं
कभी नहीं।

और आगे पुस्तक के शीर्षक औरत बुद्ध नहीं होती में कवयित्री स्त्री मन की भावनाओं व संवेदनाओं का बहुत ही तर्कसंगत पक्ष रखते हुए कई वजहें बताती हैं कि औरत क्यों नहीं बुद्ध हो सकती –

वह न प्रेम त्यागती है, न घर न परिवार
क्यों कि जिस दिन औरत के मन में विरक्त होकर,
महान बनने के भाव जाग्रत हुए
वह दिन संसार में खुशियों का शायद अंतिम दिन होगा
श्रृंगार, प्रेम, ममता, करुणा हर भाव हृदय में सजाकर
वह गढ़ती है, ऐसा समाज
जहाँ मनुष्यता वास कर सके
वह जब माँ होती है तो कुछ और नहीं होती,
इसलिए और बुद्ध नहीं होती

इस प्रकार 150 पृष्ठों में संकलित इस संग्रह में कुल इक्यावन (51) कविताएँ हैं। सभी कविताएँ मुखर होती हुई अपनी बात कहने में समर्थ व सशक्त हैं। कहा जाता है न कि साहित्य समाज का दर्पण है तो निश्चित ही इस पुस्तक को समाज का दर्पण कहा जायेगा। पुस्तक के पन्ने स्तरीय हैं और छपाई भी स्पष्ट है, । अतः यह पुस्तक पठनीय व संग्रहणीय है। मैं कवयित्री की पहली पुस्तक के लिए हृदय से बधाई संग शुभकामनाएँ देती हूँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – औरत बुद्ध नहीं होती
लेखिका – डॉ. अन्नपूर्णा सिसोदिया
प्रकाशक – दिव्य प्रकाशन , पूर्व मुम्बई
मूल्य – 200

वर्ण सितारे

तिमिर कितना भी गहरा क्यों न हो, इतने बड़े आसमान में छोटे-छोटे टिमटिमाते हुए निर्भीक सितारे अपना अस्तित्व बोध कराते हुए हमारा ध्यान स्वतः अपनी ओर खींच ही लेते हैं और हम उनकी खूबसूरती में बंधे गिनती शुरू कर देते हैं, पर लाख कोशिशों के बावजूद भी उसकी गणना नहीं कर पाते। कुछ ऐसे ही कवयित्री, लेखिका ऋता शेखर मधु जी के हायकु संग्रह के वर्ण सितारे भी हैं।
हाँ वर्ण सितारे, बहुत ही सटीक शीर्षक है इस संग्रह का। क्योंकि कवयित्री ऋता शेखर मधु ने वर्ण सितारे चुन – चुन कर जिस खूबसूरती और बुद्धिमत्ता पूर्वक भावनाओं के क्षितिज में सजाया है वह काबिले तारीफ है।
5,7,5 अर्थात पहली पंक्ति मे पाँच वर्ण, दूसरी पंक्ति में सात और तीसरी में पाँच वर्णों में सन्निहित जापान से आई हाइकु विधा भारत में आकर साहित्य जगत में अपना स्थान बनाने में पूरी तरह से कामयाब हो गई है।ऐसे में ऋता शेखर मधु जी के वर्ण सितारे हायकु विधा में अपना विशिष्ट स्थान बनायेंगे ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।

पुस्तक का शुभारंभ माँ वीणा वादिनी को समर्पित कर कवयित्री ने अपने सूझ – बूझ और धार्मिक भावनाओं का बहुत ही सुन्दर परिचय दिया है-

शुभ आरम्भ
ज्ञान देवी के नाम
पृष्ठ प्रथम

माँ सरस्वती
साहित्य की झोली में
आखर मोती

कवयित्री ने प्राकृतिक चित्रण मन मोह लेता है और हमारे मन मस्तिष्क में वह खूबसूरत दृश्य अपनी ओर खींचने लगता है –

नभ सिंदूरी
लौट रही आहट
चहका नीड़

साँझ सजीली
दुपट्टा चाँदनी का
धरा के कांधे

उजली भोर
बदल रही प्राची
धरा के वस्त्र

कोई भी लेखक हो या कवि, प्रेम नहीं लिखा तो क्या लिखा? अतः कवयित्री प्रेम जैसे खूबसूरत भाव को नवीन उपमा से अलंकृत करती हुई लिखती हैं –

प्रेम

नभ में घन
नैनो के संग काजल
प्रेम मिलन

प्रेम किताब
पन्नो के बीच दबे
सूखे गुलाब

कवयित्री की जीवन दर्शन की अनुभूतियाँ भी बहुत गहन हैं –

जीवन सिंधु
दुख – सुख दो तट
मध्य लहर

जग सागर
मछुआरे की खुशी
जल की मीन

म्लान में उगे
प्रभु चरण चढ़े
गुणी कमल

कान्हा में प्रीत
जीवन में संगीत
जीने की राह

जो भरा नहीं भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। हृदय नही वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश से प्यार नहीं। महाकवि की यह पंक्तियाँ कितनी सत्य व सटीक हैं कि शायद ही ऐसा कोई कवि हृदय होगा जिसके हृदय धरा पर देश प्रेम का पुष्प न पल्लवित हुआ हो। अतः कवयित्री सरहद पर तिरंगे को लहराता देख कर अपनी भावनाओं को यूँ प्रकट करती हैं –

दोनों फकीर
सरहद पर है
एक लकीर

बिखेरे ज्योति
सरहद का दीप
माने न बंध

अति संवेदनशील कवयित्री ने हवाओं के भार को भी महसूस किया और लिखा –

बाग मोंगरा
सुगंधो की पोटली
हवा के कांधे

भाई बहन के पावन पर्व रक्षाबंधन का जिक्र करते हुए कवयित्री कहती हैं –

गूँथे बहना
मोती – मोती आशीष
भाव रेशमी

चूंकि कवयित्री शिक्षिका रह चुकी हैं इसलिए आधुनिक बच्चों की नस – नस से वाकिफ़ हैं। यथा –

बड़ों के बाप
आधुनिक बालक
बड़े चालाक

कवयित्री ने रिश्तों को कुछ यूँ परिभाषित करती हैं –

प्रेम के धागे
भावों की बुनकरी
वस्त्र रिश्तों के

प्रकृति और पर्यावरण का खूबसूरत चित्रण करते हुए कवयित्री ने लिखती हैं –

श्रृष्टि चूनर
ईश्वर रंगरेज
रंग बहार

एक स्त्री जब सास बनती है और उसके घर में नई – नवेली बहु आती है उन भावों का खूबसूरत चित्रण मन मोह लेता है –

वधु कंगना
झूम उठे अंगना
घर की शोभा

इस प्रकार 132 पृष्ठों में संकलित जीवन के हर पहलू को समेटे इस पुस्तक में कुल 600 हायकु और एक हायकु गीत हैं । सभी हायकु को कवयित्री ने एक कुशल जौहरी की तरह बहुत ही बारीकी से तराशा है। अतः मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि कवयित्री के इस संग्रह का साहित्य जगत में जोर – शोर से स्वागत किया जायेगा। मैं कवयित्री ऋता शेखर मधु जी को हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ देती हूँ।

समीक्षक – किरण सिंह
लेखिका – ऋता शेखर मधु
पुस्तक का नाम – वर्ण सितारे
प्रकाशक – श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य – 250 रुपये

https://amzn.in/i473oHd

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रहस्य

कथाकार,कवियत्री किरण सिंह की कहानी संग्रह “रहस्य” मेरी नजर में –
स्त्री विमर्श को स्वर देती कहानी संग्रह: “रहस्य” साहित्य का हमारे आसपास होना सिर्फ हमारी नहीं, साहित्य की भी मजबूरी है। क्योंकि साहित्य को भी खाद-पानी देने का काम समाज ही करता है। व्यक्ति के जीवन की घटनाओं से समाज प्रभावित होता है और समाज की घटनाओं से साहित्य। कथाकार किरण सिंह की सदः प्रकाशित कहानी संग्रह "रहस्य" से गुजरने का मौका मिला। कहते हैं चित्र के सामने भाषा अपने वजूद को तलाशता नजर आता है, तो मुझे लगता है एक लेखिका के सामने पुरुष प्रधान समाज। चौबीस कहानियों से सजी यह कहानी संग्रह समाज और परिवार के उतने ही करीब है, जितनी एक औरत। हर कहानी में एक औरत की मुखरित संवेदनाएं हैं। संवेदनाओं का गहरा समुद्र है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि लेखनी एक औरत की है। शायद इसलिए है लेखिका ने अपने आसपास के परिवेश को सिद्दत से महसूस किया है। समाज और परिवार किसी भी वर्ग का हो, औरत की कहानी लगभग एक जैसी ही होती है। ग्रामीण जीवन की छोटी-छोटी आम घटनाओं से रूबरू कराती ये कहानियां शहरी जीवन की तंग गलियों से एक दूरी से ही हाथ मिलाती दिखाई देती है। संग्रह में शामिल अधिकांश कहानियां स्त्री के आसपास के स्त्री के दर्द को स्वर देती नजर आती हैं। लेखिका ने पुरुष प्रधान समाज के अहं और वर्चस्व को बहुत नजदीक से देखा है। स्त्री और पुरूष के सामाजिक, पारिवारिक भेद को महसूस किया है। यही कारण है कि कहानी के पात्र खुद ही मुखर है। कुछ वानगी देखते हैं -

‘गलत कहते हैं लोग कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती है। सच तो यह है कि पुरूष ही अपनी अहम तथा स्वार्थ की सिद्धि के लिए एक स्त्री की पीठ पर बंदूक रखकर चुपके से दूसरी स्त्री पर वार करते हैं, जिसे स्त्री देख नहीं पाती और वह मूर्ख स्त्री को ही अपनी शत्रु समझ बैठती है।’

  • (जीवन का सत्य, पृष्ठ 15)
    ‘हम स्त्रियां अपनी खुशी की परवाह ही कब करती हैं। वह तो हमेशा ही अपनों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ ही लेती हैं..कभी पिता, तो कभी पति की, तो कभी पुत्र की खुशियों में।’ – (प्रार्थना, पृष्ठ 51,52)
    ‘ये पुरूष लोग न हमेशा ही औरतों की समझ पर शक करते हैं।’ – (परख, 74)
    ‘रिश्तों की समझ और परख मर्दों से अधिक स्त्रियों को होती है।’ – (परख, 75)
    ‘स्त्रियों का दुर्भाग्य है कि यदि पुत्र निठल्ले निकल गए तो पति और पुत्र के मध्य पिसकर रह जाती है। एक तरफ उसका वर्तमान रहता है, तो दूसरी तरफ उसका भविष्य। … यदि किसी एक ने भी गलत कदम उठाया तो सारा दोष उस स्त्री पर मढ़ दिया जाता है।’ – (राम वनवास, पृष्ठ 94)
    ‘पतियों की आदत ही होती है हिदायत देने की, क्योंकि उनकी नजरों में तो दुनिया की सबसे बेवकूफ औरत उनकी पत्नी ही होती है।’ – (नायिका, पृष्ठ 108) लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कहानी की महिला पात्र पुरुषों के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है। सधी लेखनी के सामने व्यक्ति गौण हो जाता है, परिवेश मुखर हो उठता है। तभी तो ‘जीवन संगीत’ की नायिका पुरुषों की तरफदारी करती भी नजर आती है –
    ‘सच कहते हैं। सभी स्त्रियों का स्वभाव ही शक्की होता है। लेकिन यह भी तो सही है कि जहां अधिक प्रेम होता है वहां शक पैदा हो ही जाता है।’ – (जीवन संगीत, पृष्ठ 119) कहानियां विविध रंगों से सजी हैं। एक गृहणी बाहर से अधिक घर के अंदर की विद्रूपताओं को नजदीक से देखती है। यही कारण है कि एक पुरुष लेखकों के कथा नायक, नायिका जिन मुद्दों को लेकर मुखर नहीं हो पाते, वहीं एक लेखिका की कलम से वैसे पात्र जीवंत हो उठते हैं। बात चाहे घरेलू हिंसा की हो या प्यार में छले जाने या विवाहेत्तर संबंधों के दंश को झेलने की। घर के अंदर के भेदभाव और तिरस्कार को रोजमर्रे की तरह लेने वाली नायिकाएं मौका मिलते ही पात्रों के बहाने सबकुछ उड़ेल कर रख देती हैं – ‘पीड़ा अधिक होने पर मरहम कहां काम कर पाता है और उसमें भी अपनों से मिली हुई पीड़ाएं तो कुछ अधिक ही जख्म दे जाती है।’ – (जीवन का सत्य,पृष्ठ 15)
    ‘बर्तन के खटर-पटर के साथ युगलबंदी करती चूड़ियों की खनक के साथ जीवन सरगम भी मन्द, मध्य और तार सप्तक के मध्य लयबद्ध हो ही जाती थी।’- (प्रतीक्षा, पृष्ठ 21)
    ‘स्त्रियों के लिए तो पति की प्यार भरी एक नजर ही उसे मल्लिकाए हिंदुस्तान की अनुभूति करा देती है।’ – (भगवती देवी, पृष्ठ 27) परंपराओं के निर्वहन की जिम्मेदारी भी हमने महिलाओं पर डाल दिया है। पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार और गीत-संगीत को संजोए रखने का भार भी इन्हीं के कंधों सौंप हम निश्चिंत हो चुके हैं। काली, दुर्गा की आराधना में व्रत रखने वाली हजारों महिलाएं हर दिन घरेलू हिंसा का शिकार होती रहती हैं, लेकिन एक ने भी यदि दुर्गा, काली का रूप धारण कर लिया तो हमारे पुरुष प्रधान समाज की चूलें हिल जाती हैं। ‘भगवती देवी’ की नायिका बेटे न जन पाने के दंश की पूर्णाहुति अपने सौत की खोज में पूरी करती है। उसका पति हो या परिवार इस दर्द को दूसरा कोई नहीं समझ सकता। नायिका इस दर्द को भी लोकगीतों और मान्य परंपराओं के माध्यम से बयां करने का तरीका ढूंढ लेती है। –
    ‘भभूति देखले रे हम जरी गइली हो,
    जटा देख जरे छाती जी
    सवती देखत मोरे मनवा विलपेला
    कइसे गंवइबो दिन राती जी।’ – (भगवती देवी,पृष्ठ 26) ‘विडंबना’ की नायिका का जेठ यदि नपुंसक है तो उसमें देवरानी की क्या गलती है, लेकिन सजा उसे ही मिलती है अपने पति द्वारा भाभी के यौन इच्छाओं की पूर्ति के रूप में। हमारा सामाजिक परिवेश ऐसा है कि घर की बातें बाहर न हो इसलिए इस दंश को भी नायिका अपने पति के भाभी के साथ के उसके अंतरंग रिश्तों को स्वीकार करने को बाध्य है। वह अपने पति के भाभी के साथ के संबंधों को भी आत्मसात करने को मजबूर है।
    ‘गलत कहते हैं लोग …….शत्रु मान बैठी है।’ – (विडंबना, पृष्ठ 47) वर्षों तक घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं भी पल भर के लिए भी पति का प्यार मिल जाने से बीते कल को भुलाकर परिवार को जोड़े रखने में तनिक भी झिझक महसूस नहीं करती हैं। ‘जीवन का सत्य’ की नायिका यही कहती है – ‘गलती चाहे स्त्री करे चाहे पुरूष, दोनों ही दशा में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है।’- (जीवन का सत्य,पृष्ठ 17) आज की हमारी युवा पीढ़ी रिश्तों को भी यूज़ एंड थ्रो के रूप में जीती है। किरण सिंह की लेखनी का आधार आज की युवा पीढ़ी भी बनी है। लेकिन आज की पीढ़ी के बहाने रूढ़िवादिता पर भी कटाक्ष करने से बाज नहीं आती।- ‘भारत में तो लड़की से पांच-सात साल बड़े लड़के को ही विवाह के लिए ज्यादा अच्छा माना जाता है कि लड़कियां जल्दी ही अपने उम्र से बड़ी हो जाती हैं और लड़के देर्य से।’ – (प्रार्थना, पृष्ठ 50) ‘लाल गुलाब’ और ‘यू आर माइ बेस्ट फ्रेंड’ के बहाने लेखिका ने नई पीढ़ी को भी नहीं बख्शा है। ‘लाल गुलाब’ में जातीय बंधन से आज की पीढ़ी भी मुक्त नहीं हो पाई है और अपने प्रेमी के प्यार की निशानी लाल गुलाब की सूखी कलियों को वापस कर प्रेम का इति श्री कर सुकून का एहसास करती है। ‘प्यार करते ही लड़कियों को सजना-संवरना स्वयं ही आ जाता है।’ – (लाल गुलाब, पृष्ठ 62) ‘जब कोई तुम्हारे मन का न करे तो तुम खुद को उसकी जगह रखकर देखो कि तुम उसकी जगह होते तो क्या करते?’ – (यू आर माई बेस्ट फ्रेंड, पृष्ठ 41) और अंत में – ‘आत्मकथ्यात्मक संस्मरण संग्रह “दूसरी पारी” से लेखिका किरण सिंह के कुछ शब्द – ‘भावनाएं होती हैं बड़ी मनमौजी। सोते जागते कभी भी मस्तिष्क पटल पर उमड़ने-घुमड़ने लगती थीं।’- पृष्ठ – 21 ‘स्त्रियां तो होती ही हैं समझौतावादी।’ – पृष्ठ – 22 ‘कभी-कभी ईश्वर से भी शिकायती प्रश्न कर बैठती कि मेरी किस्मत में स्वर्ण पिंजरे में बंद पक्षी से ज्यादा क्या लिखा आपने।’ – पृष्ठ 22
    • को धता बताती, आज कहती हैं कि मेरी ये आठवीं पुस्तक है।
      इसी पुस्तक की एक पंक्ति किरण सिंह के लेखन मर्म को रेखांकित करता है –
      ‘दर्द वही महसूस कर सकता है, जिसने दर्द झेला हो।’ – (जीवन संगीत, पृष्ठ 123)
    और अब बात”रहस्य” की –
    ‘रहस्य’ कहानी और यह कहानी संग्रह एक स्त्री का स्वर है। वेदनाओं का स्वर, संवेदनाओं का स्वर, जीवन का स्वर, चिंतन का स्वर, प्रेम की पराकाष्ठा का स्वर, गूंगे-बहरे समाज का स्वर और स्त्री विमर्श का स्वर। स्त्री विमर्श को रेखांकित करती यह कहानी संग्रह सिर्फ किरण सिंह को ही नहीं, पूरे सामाजिक परिवेश के दबे स्वर को मुखरता प्रदान करती नजर आती है। कुछ रहस्य और है, लेकिन इसे जानने के लिए “रहस्य” को पढ़ना होगा। इसलिए आगे के रहस्य को पढ़ने तक राज ही रहने देते हैं। लेखिका आगे क्या लेकर आ रही हैं, प्रतीक्षा मुझे भी है।

समीक्षक – शम्भू पी सिंह
लेखक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – रहस्य
प्रकाशक – भावना प्रकाशन ( पंकज बुक्स)
मूल्य – 395

उषा किरण खान का कथा लोक

वैसे तो मैं स्वयं ही पद्मश्री उषा किरण खान दीदी की लेखन शैली से अत्यधिक प्रभावित हूँ जिसको पढ़ते हुए पढ़ने की तृष्णा शांत होने की बजाय और भी बढ़ती जाती है।  ऐसे में विदूषी बहन डाॅ सोनी पाण्डेय द्वारा सम्पादित पुस्तक गुलाबी रंग के आवरण में लिपटी, जिसपर उषा दीदी की तीन – तीन दैदिप्यमान छवि अंकित है ‘उषा किरण खान का कथा लोक’ साहित्य जगत के लिए एक उपहार ही है। उपहार इसलिए क्योंकि एक सौ बीस पृष्ठों में संकलित इस पुस्तक मे चौदह विदूषियों, मनिषियों का उषा किरण खान जी के कथा लोक पर अपने-अपने विचार संग्रहित हैं।
सभी के विचार उषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए इतनी खूबसूरती से लिखी गई है कि पाठक बस पढ़ता ही चला जायेगा और पढ़ते हुए उनकी कहानियों को महसूसने लगेगा। इतना ही नहीं  इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों के मन में उषा किरण खान जी की कहानियों को पढ़ने की इतनी उत्कंठा बढ़ जायेगी कि वह पढ़े बिना रह ही नहीं सकता है।
सर्वप्रथम पुस्तक की भूमिका में सोनी पाण्डेय जी लिखती हैं –

मैथिली की कथा लेखिका ‘ऊषा किरण खान’ की कहानियों से गुजरते हुए जो तत्व प्रमुखता से उभरता है वह है “आगे क्या हुआ?” की जिज्ञासा। आपकी कहानियाँ अपनी सहज रवानगी में भाषा को लोकरंग धारण किये पाठक को उस लोक में ले जाती है जहाँ की वह बात करती हैं।……..

विदुषी भावना शेखर जी ने ऊषा किरण खान की सवर्ण विधवाएँ पर बहुत ही खूबसूरती से प्रकाश डाला है जो अवश्य ही पठनीय है।
वो लिखती हैं –
मैथिली और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में सिद्धहस्त उषा जी का साहित्य अपने ग्राम्य अनुभवों के कारण उपेक्षितों, वंचितों के जीवन संघर्ष का आइना बन पड़ा है। दलितों की पीड़ा और जिजीविषा के सूक्ष्म और प्रभावी रेखांकन के लिए उन्हें पहचान मिली किन्तु बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि अपने विपुल साहित्य में बिखरे नारी पात्रों में न केवल दलित अपितु सवर्ण स्त्रियों की पीड़ा का व्याख्यान भी उन्होंने सिद्दत से रचा है। उनकी कहानियों में खास तौर पर विधवा पात्रों की व्यथा – पाठकों को उद्वेलित करती हैं। और लम्बे समय तक भीतर ही भीतर मन को कचोटती हैं।….

नीलकंठ और जलकुम्भी एक विश्लेषण में रानी सुमिता कहती हैं –
कथाकार ऊषा किरण खान की कहानियों का कथा संसार बेहद विस्तृत है। ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई इनकी कहानियाँ गाँवों की लगभग हर समस्या को ढूढती और खँघालती नज़र आती है। कहानी नीलकंठ सुदूर गाँवों में जा पहुंची है और कहानी की आड़ में घर – घर आ पसरे नक्सली जो सामान्य जन का नकाब ओढ़े रहते हैं, को उजागर किया है।….

और उषा किरण खान की कहानियों का नाट्य प्रयोग में उषा दीदी की बहुआयामी प्रतिभा की धनी विदुषी  पुत्री कनुप्रिया कहती हैं – उषा किरण खान मेरी माँ हैं। माँ की कहानियाँ बचपन से ही पढ़ रही हूँ मैं, पर मर्म अब जाकर समझ आया है । चूँकि बचपन से ही मंच और रेडियो पर हिन्दी, मैथिली नाटक करती आई हूँ तो हर कलाकार की तरह मैं भी यह सोचती थी कि काश इस किरदार को मैं भी अपने अंदर उतार सकूँ। किसी भी चरित्र को निभाना आज भी एक स्वप्न सा अनुभव होता है, एक ही जीवन काल में कई सारे जीवन जीना।…..

इस प्रकार से इस पुस्तक में ( शेफाली झर रही है  – डाॅ विद्या निवास मिश्र
जीवनानुभवों का उदात्त – डाॅ चन्द्र कला त्रिपाठी
जल प्लावन में तटबंध की तरह – प्रज्ञा पाण्डेय
सहज किन्तु साधारण नहीं – पूनम सिन्हा
लोक जीवन का समुच्चय – डाॅ गौरी त्रिपाठी
उषा किरण खान की कहानियाँ – आभा बोधिसत्व
अतीत के वर्तमान में वृहत्तर स्वीकृति – पूनम सिंह
गरीबी को परास्त करते पतः साधक बच्चे – सुधा बाला
जीवन मूल्यों का आलोक – डाॅ राजीव कुमार वर्मा
हमके ओढ़ा द चादरिया – आशीष कुमार) ने भी ऊषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए बहुत ही खूबसूरती से अपने-अपने भाव प्रकट किये हैं जो श्लाघनीय है।
वैसे तो यह पुस्तक सभी को अच्छी लगेगी लेकिन शोधार्थियों के लिए तो यह पुस्तक सोनी पाण्डेय जी के द्वारा एक उपहार की तरह है।
पुस्तक की छपाई स्पष्ट है और पन्ने सामान्य हैं। फिर भी पुस्तक की पठन सामग्री को देखते हुए मूल्य ठीक ही कहा जायेगा।
एक सुन्दर और सार्थक कार्य की सराहना करते हुए पुस्तक की सम्पादक सोनी पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – उषा किरण खान का कथा लोक
प्रकाशक – आपस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, अयोध्या, उत्तर प्रदेश
मूल्य – 285,
कवर – पेपर बैक
पृष्ठ संख्या – 120

इन दिनों

गिर रहा आँखों से पानी इन दिनों 

गिर रहा आँखों से पानी इन दिनों 
जिंदगी ने जंग ठानी इन दिनों।

अब डराती हैं हमें नजदीकियाँ,
लाजिमी दूरी बनानी इन दिनों।

बन्द हो अब जिस्म की सौदागिरी, 
इश्क ही लगता रुहानी इन दिनों। 

नाचती घुंघरू को पग में बांधकर, 
मौत होकर के दिवानी इन दिनों। 

आदतें जो भी बुरी हों छोड़िये, 
है सिसकती जिंदगानी इन दिनों। 

कर ‘किरण’ घर में ही तू चिंतन मनन, 
लिख दे फिर कोई कहानी इन दिनों।।