विसर्जन

जिंदगी ही कहानी है या कहानी ही जिंदगी है इस प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर देना थोड़ा उलझन भरा हो सकता है इसलिए जिंदगी और कहानी को एक दूसरे का पूरक कहना ही सही होगा। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति

की जिंदगी ईश्वर की लिखी कहानी है। हाँ यह और बात है कि किसी की कहानी आम होती है तो किसी की खास, किसी की सीधी-सादी तो किसी की उलझन भरी, किसी की खुशहाल तो किसी की बदहाल, किसी की रोचक तो किसी की नीरस, किसी – किसी की प्रेरणादायी तो किसी की दुखदायी ।लेकिन हर कहानी में कमोबेश कौतूहल तो होता ही है। यही वजह है कि लेखक का संवेदनशील मन किसी की जिंदगी की कहानी को इस कदर महसूस करता है कि उसकी लेखनी अनायास ही चल पड़ती है सर्जन करने हेतु और लिख डालती है उस व्यक्ति की गाथा। छोड़ देती है पाठकों को निर्णय करने के लिए कि किस हद तक उस कहानी को उन तक पहुंचाने में सफल हो पाई है वह ।
कुछ इसी तरह से जानी-मानी लेखिका वंदना वाजपेयी जी की लेखनी ने भी कुछ जिंदगी की कहानियों में कल्पना का रंग भरते हुए बड़े ही खूबसूरती से पिरोकर खूबसूरत कवर पृष्ठ के आवरण में एक पुस्तक ( जिसका नाम भी बड़ा ही खूबसूरत और विषय के अनुरूप है विसर्जन है ) के आकार में पाठको को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हुई है ।

इस संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैं जो कि एक सौ चौबीस पृष्ठ में संग्रहित हैं। सभी कहानियाँ मानवीय संवेदनाओं को खूबसूरती से उकेरती हुई रोचकता तथा कौतूहल से परिपूर्ण हैं। किन्तु इस संग्रह की पहली कहानी में लेखिका ने एक छली गई स्त्री के जीवन के संघर्षों की मनोवैज्ञानिक पहलू को छूते हुए बहूत ही खूबसूरती से अपनी कलम चलाई है जिसकी जितनी भी प्रशंसा करूँ कम होगी।

इस कहानी में एक लड़की जो बार – बार अपनी माँ से अपने पापा के बारे में पूछती है और माँ हर बार सच छुपाते हुए उसे झूठी तसल्ली देती है। जब माँ भी मर जाती है तो वह लड़की अपने पिता की खोज में निकलती है। बहुत ढूढने के बाद पिता मिलते तो हैं लेकिन उसके साथ एक स्त्री है जो कि उसके और उसके पिता के मध्य दीवार बनकर खड़ी है अतः लड़की दुखी मन से वापस आ जाती है। उसके बाद वो अपने पिता के उम्र के पुरुषों में अपने पापा का प्यार ढूढती है और बार-बार छली जाती है। अन्ततः वह निर्णय लेती है विसर्जन का जो कि उसके लिए बहुत जरूरी था ।
पुस्तक की दूसरी कहानी अशुभ अंधविश्वास पर प्रहार करती हुई बहुत ही मार्मिक कहानी है जिसमें एक लड़की का नाम ही अशुभ रख दिया जाता है। जिसको मृत्यु के उपरांत भी ऐसी सजा मिलती है जिसकी वह दोषी होती ही नहीं है।

संग्रह की तीसरी कहानी फुलवा में बाल श्रम, बाल विवाह, पर बहुत ही गहराई से प्रकाश डालते हुए बेटियों को पढ़ाने का संदेश दिया गया है।
संग्रह की चौथी कहानी दीदी में खून के रिश्तों से अलग भाई – बहन जैसे पवित्र रिश्ते बनाने में भी स्त्रियों की मजबूरियों को बहुत ही सूक्ष्मता से उकेरा गया है जिसे पढ़कर उन पुरुष पाठकों को स्त्रियों को समझने में मदद मिलेगी जो कि कहते हैं कि स्त्रियों को समझना बहुत मुश्किल है । या त्रिया चरित्र को स्वयं देव भी नहीं समझ पाये हैं।
संग्रह की पाँचवी कहानी चूड़ियाँ पढ़ने के बाद तो पत्थर हृदय भी पिघल जायेगा ऐसा मैं दावे के साथ कहती हूँ। क्योंकि इस कहानी की नायिका एक ऐसी स्त्री है जिसे बचपन से ही रंग – बिरंगी चूड़ियाँ पहनने का बहुत शौक है लेकिन उसके इस शौक को सामाजिक कुरीतियों ने विराम लगा दिया। तोड़ दी गई उसकी कलाइयों की चूड़ियाँ और पहुंचा दिया जाता है पागलखाना। फिर कहानी की ही एक पात्र लेखिका की सहेली निर्माण लेती है और……….

संग्रह की छठी कहानी पुरस्कार एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपने शौक को ताक पर रखकर अपना पूरा जीवन अपने घर परिवार की खुशियों पर समर्पित कर देती है। लेकिन अपनी अभिव्यक्ति पर अंकुश नहीं लगा सकी। चूंकि पति को भी खुश रखना चाहती थी और अपनी लेखनी को भी पंख देना चाहती थी सो अपना नाम कात्यायनी रखकर पुस्तकें प्रकाशित करवाने लगी। धीरे-धीरे कात्यायनी की कीर्ति फैलने लगी और कात्यायनी का नाम पुरस्कार के लिए घोषित किया गया। तो भी कात्यायनी अपनी सच्चाई सामने नहीं लाना चाहती है। लेकिन सच्चाई को कोई कितने दिनों तक छुपाये रख सकता है ? एक न एक दिन तो पता चलना ही है सो स्नेहा के पति को भी पता चल ही गया आगे क्या हुआ पुस्तक के लिए छोड़ती हूँ।
इस प्रकार संग्रह की अन्य कहानियाँ ( पुरस्कार, काकी का करवाचौथ, फाॅरगिव मी, अस्तित्व, ये कैसी अग्निपरीक्षा तथा मुक्ति) भी अत्यंत मार्मिक, रोचक, प्रवाहयुक्त तथा कौतूहल पूर्ण है। चूंकि वंदना जी एक स्त्री हैं तो उनकी सभी कहानियाँ स्त्री प्रधान हैं। वैसे उन्होंने अपनी आत्मकथ्य में इस बात को स्वयं स्वीकारा भी है। यथा – ऐसे मेरी कोई योजना नहीं थी, फिर भी इस कहानी संग्रह के ज्यादातर मुख्य पात्र स्त्री ही है। शायद इसकी एक वजह मेरा स्त्री होना है, जो उनके दर्द को मैं ज्यादा गहराई से महसूस कर पाई।
इस तरह से इस संग्रह की प्रत्येक कहानी हमारे आस-पास के परिवेश तथ समाज के किसी न किसी व्यक्ति की कहानी प्रतीत होती है । कहानी पढ़ते हुए पाठक किसी न किसी किरदार से स्वयं को जुड़ा हुआ पाता है जो कि लेखिका की सफलता का द्योतक है।
पुस्तक का कवर पृष्ठ शीर्षक के अनुरूप ही खूबसूरत तथा आकर्षक है। पन्ने भी अच्छे हैं तथा छपाई भी स्पष्ट है। वर्तनी की अशुद्धियाँ नाम मात्र की या न के बराबर ही है। पुस्तक की गुणवत्ता के अनुपात में पुस्तक की कीमत भी मात्र एक सौ अस्सी रूपये है जिसे पाठक आसानी से क्रय कर सकते हैं। अतः मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि यह पुस्तक पठनीय एवम् संग्रहणीय है। यदि आप उच्च स्तरीय संवेदनशील कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं तो यह पुस्तक आपको जरूर पढ़ना चाहिए।
इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए मैं लेखिका वंदना वाजपेयी जी हार्दिक बधाई एवम् अनंत शुभकामनाएँ देती हूँ, और कामना करती हूँ कि आगे भी इनकी कहानियाँ हमें पढ़ने को मिलेंगी।

किरण सिंह
लेखिका – वंदना वाजपेयी
प्रकाशक – एपीएन पब्लिकेशन्स
मूल्य – 180
लिंक – https://www.amazon.in/dp/9385296981/ref=mp_s_a_1_6

किरण सिंह

2 विचार “विसर्जन&rdquo पर;

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