हे राम! मर गया… धनी राम..!

राम के नाम हियो में धरो,
न सड़े न गले नहीं होत पुराना।
दिनो दिन बढ़े न घटे कबहूँ ,
नहीं आग लगे नहीं चोर चुराना।
कितनी सत्य पंक्तियाँ हैं यह। तभी तो कुछ लोग अपना सरनेम तो कुछ पूरा का पूरा राम का नाम ही अपनाकर लेते हैं। राम का नाम है ही ऐसा जो दुख हो या सुख हमारे मुख पर अनायास ही आ जाता है।

अब चलिये ज्यादा भूमिका में समय न गंवाते हुए सीधे-सीधे बात करती हूँ माननीय बाँके बिहारी साव जी के द्वारा लिखित व्यंग्य संग्रह हे राम! मर गया… धनी राम का ! जिसके लाल रंग के कवर पृष्ठ पर श्री राम का सुन्दर चित्र अंकित है। जो पाठको को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

व्यंग्य साहित्य की ऐसी विधा है जिसमें हँसी मजाक में ही उपहास करते हुए आलोचना की वाण चला दी जाती है।

वैसे व्यंग्य को व्यंग्यकार माननीय बांके बिहारी साव ने उदाहरण सहित बहुत ही प्रभावकारी ढंग से परिभाषित किया है। यथा – एक पत्रकार जिसका वेतन एक लाख रुपये महीना है और वह रिपोर्ट लिखता है – तीन दिनों से भूखे झगड़ू ने मेरी आँखों के सामने दम तोड़ दिया। तो मैं समझता हूँ कि समाज का यह सबसे बड़ा व्यंग्य है। कपड़े का जब एक दुकानदार चिल्ला – चिल्लाकर कहता है देखिये – देखिये एक नंगी जवान औरत मेरे दुकान के सामने तड़प – तड़प कर दम तोड़ दी । वह चिल्लाता है मगर उस मृत औरत पर दस – बीस रूपये का कफ़न नहीं फेंकता है। दरअसल यह व्यंग्य है।

व्यंग्य साहित्य की क्षत्रिय विधा है। यह जब युद्ध करता है, तब कुव्यवस्था की रूह काँप जाती है।

व्यंग्य सत्य की वह आवाज़ है जो अपने से कई गुणा शक्तिशाली, चरित्रहीन परिस्थितियों को परास्त कर समाज को परिवर्तन की ताकत प्रदान करता है।

आगे उन्होंने लिखा है जब साहित्य की सारी विधाएँ थक जाती हैं तो समाज में चेतना के बीज बोता है।

सच में इस पुस्तक को पढ़ने के उपरांत तो उपर्युक्त पंक्तियां अक्षरशः सत्य प्रतीत होती हैं।
इस पुस्तक में व्यंग्यकार ने बहुत ही स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा है कि भ्रष्ट नेताओं से पुरस्कार पाने वाला साहित्यकार अपने गर्भ में व्यंग्य नहीं पाल सकता।

संग्रह का पहले ही व्यंग्य कहानी बिहारी मास्टर साहब की में लेखक ने बहुत ही बेबाकी से कलम चलाकर सरकारी शिक्षा तंत्र का पर्दाफाश किया जिसके लिए उनकी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी।
चूंकि व्यंग्यकार स्वयं एक इन्जीनियर हैं तो इंजीनियर्स का पक्ष रखते हुए संग्रह के दूसरे व्यंग्य एक तू ही बेइमान में चमूचे तंत्र को नंगा कर के रख दिया है।
यथा – बिहार फेल…!
बिहारी फेल…!
इसलिये यहाँ के सारे मंत्री भी फेल.. लेकिन बिहार के नेता ऐसा कहाँ मान रहे हैं? यहाँ के सिर्फ इंजीनियर फेल हैं इसलिये सड़क से लेकर बिजली तक का सारा काम आई ए एस देखेंगे। यहाँ के आई ए एस सफल हैं क्योंकि चुनाव निश्पक्ष कराते हैं। वे इसलिए भी सफल हैं कि वे राहत कार्य पूरी इमानदारी से कराते हैं…… यहाँ के आई पी एस भी पूरी तरह से सफल हैं क्योंकि बिहार अपराध और अराजकता से पूरी तरह मुक्त है। आखिर ये हैं भी तो सेन्ट्रल के दूत… गुप – चुप लेन – देन में भी माहिर।
यहाँ की नेताओं की सफलता की तो बात ही मत कीजिये। वे लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड का उपयोग इतनी इमानदारी से करते हैं कि इनकी बनाई सड़कों पर कहीं खरोच तक नहीं आती……….. कल तक करुआ तेल चपोड़े मैले कपड़ो में घूमते चवनिया नेता जी अपनी मेहनत की कमाई से ही तो एक आध महीने के अन्दर ही क्वालिस’ स्कार्पियो’ और पजेरो पर घूमने लगते हैं। मानो नेतागिरी न हुई लाटरी का धंधा हो गया।
व्यंग्यकार ने संग्रह के तीसरे व्यंग्य नारा है नारों का क्या? में अलग – अलग पार्टियों के अलग – अलग नारों पर तीखा कटाक्ष करते हुए अपनी कलम चलाई है।
इसी तरह संग्रह के चौथे व्यंग्य में लेखक ने समाज, चुनाव और चरित्र का चेहरा बड़े ही अनोखे अंदाज में मनोरंजक तरीके से पेश किया है। जिसे पढ़ते हुए पाठक भी बहुत कुछक्त सोचने पर मजबूर हो जाता है।
संग्रह का पाँचवा व्यंग्य परिवार वाद बना प्रजातंत्र में पंचर में तो व्यंग्यकार ने अपने व्यंग्य की पात्र मनमोहिनी की ही तरह मनमोहक अंदाज में प्रजातंत्र में परिवारवाद पर तीक्ष्ण प्रहार किया है।
और अपने पुस्तक के आठवें व्यंग्य हे राम मर गया धनी राम (जो कि इस पुस्तक का शीर्षक भी है ) में तो व्यंग्यकार की कलम ने सरकारी तंत्र की निर्भीकता पूर्वक उपहास उड़ाते हुए राम नाम की ही छिः.. छिः कर दी ।
यथा –
खाद्य मंत्री – झूलन राम
एस डी ओ – महर्षि राम
सी ओ – प्रभु राम
उप प्रमुख – बिसुनदेव राम
फिर भी भूख से मर गया धनी राम…
राम.. राम…!
हे राम…!
छिः… छिः… राम

इस प्रकार एक सौ छत्तीस ( 136 ) पृष्ठ में संग्रहित इस संग्रह के सभी ( 57) व्यंग्य हल्के फुल्के शब्दों में, रुचिकर तरीके से लिखे गये बहुत गहरा प्रभाव छोड़ने वाले हैं। क्योंकि इस संग्रह में नेता हो या अभिनेता, कर्मचारी हो या पदाधिकारी, दुकानदार हो या साहित्यकार, मनुष्य हो या स्वयं भगवान ही क्यों नहीं व्यंकार के व्यंग्य वाण से बच नहीं पाया है।
इतनी निर्भीकता और बेबाकी से लिखने के लिए लेखक के हिम्मत को दाद देनी पड़ेगी।
इसलिए निश्चित ही यह पुस्तक पठनीय तथा संग्रहणीय है। इस पुस्तक के लिए हम माननीय बांके बिहारी साव जी को हार्दिक बधाई एवम् अनंत शुभकामनाएँ देते हुए कामना करते हैं कि आगे भी उनके व्यंग्य वाण कुव्यवस्थाओं पर चलते रहेंगे।
किरण सिंह
पुस्तक – हे राम मर गया धनी राम
लेखक – बाँके बिहारी साव
प्रकाशक – बिहारी प्रकाशन

2 विचार “हे राम! मर गया… धनी राम..!&rdquo पर;

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