इंटेलेक्चुअल पार्लर

व्यंग्य अंग्रेज़ी के सटायर शब्द का हिंदी रूपांतर है।
व्यंग्य के माध्यम से हल्के-फुल्के अंदाज में ही हँसी मजाक करते हुए किसी भी व्यक्ति, वस्तु, व्यवस्था, समाज आदि की आलोचना सीधे शब्दों में न कह कर उल्टे या टेढ़े शब्दों में व्यक्त किया जाता है। बोलचाल में इसे ताना, बोली या चुटकी भी कहते हैं।
व्यंग साहित्य की विधा अन्य विधाओं से अधिक प्रभावकारी होता है। इसीलिए व्यंग्य को व्यंग्य वाण भी कहा जाता है। क्योंकि व्यंग्य वाले शब्द तीर की तरह ही हृदय को बेध देते हैं। लेकिन व्यंग्य को पढ़ते, सुनते हुए पाठकों , श्रोताओं के होठों पर अनायास ही मुस्कान बिखर जाती है। और यदि व्यंग्यकार की लेखनी मजी हुई हो तो वह अपने पाठकों को मन्त्रमुग्ध कर पढ़ने को मजबूर कर देती है।
कुछ ऐसी ही जादूई लेखनी है माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी की। जो चलकर अबतक सैकड़ों पुस्तकों को आकार देकर दुनिया भर के पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल हुई है। वैसे तो माननीय की प्रशंसा करना सूर्य को दीपक दिखाने के जैसा ही है, फिर भी मैं साहस जुटाकर उनकी सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह इंटेलेक्चुअल्स पार्लर के व्यंग्य पुष्प वाण से आप सभी को भी  बेधने का प्रयास कर रही हूँ। क्योंकि माननीय द्वारा प्राप्त उपहार स्वरूप यह पुस्तक मेरे मन मस्तिष्क पर इस प्रकार हावी हो चुकी है कि मैं लिखे बिना रह ही नहीं सकती।
हरे रंग के कवर पृष्ठ में लिपटी हुई  111 ( एक सौ ग्यारह ) पृष्ठों वाली इस पुस्तक में कुल पच्चीस ( 25) व्यंग्य हैं। सभी व्यंग्य में व्यंग्यकार ने बहुत प्यार से सामाजिक कुव्यवस्था पर वार किया है, जिसे पढ़ते हुए पाठक कभी हँस पड़ता है तो कभी आक्रोशित हो जाता है और फिर कभी सोचने – समझने पर विवश हो जाता है। जो कि व्यंग्यकार की सफलता का द्योतक है।
लेखक ने पुस्तक के पहले ही व्यंग्य का शीर्षक सम्बन्धों का अंत्य परीक्षण में अपनी विशिष्ट शैली की तकनीक  से बिना चीड़ – फाड़ के रिश्तों का आॉपरेशन कर दिया है। जिसकी कुछ पंतियों से मैं आपको भी रूबरू करवाती हूँ।
यथा – वर्तमान अर्थयुग में व्यवसाय तो एक सम्मानीय पेशा है। क्योंकि जहाँ व्यवसाय है वहीं अर्थ है। और अर्थ के बिना सबकुछ व्यर्थ है। ऐसे में सम्बन्धों को भी यदि व्यवसायिक बनाया जा रहा हो तो भला इसमें बुराई क्या है?

आगे लिखते हैं – जिस माँ बाप के पास पैसे न हों, उन्हें बेटे – बेटियाँ जन्माने का क्या अधिकार… और जिस बेटे की अच्छी – खासी कमाई न हो, उसे माँ – बाप के प्यार पाने का क्या हक़ है? अर्थ तंत्र का यह मंत्र धन्य है। सबहिं नचावत अर्थ गुसाईं।……
चाहे दोस्ती का रिश्ता हो या अन्य कोई, त्याग, निःस्वार्थ सेवा , समर्पण भाव, निष्ठा, कर्तव्य बोध जैसे कोरी भावुकता से ओत-प्रोत शब्द पिछड़ेपन की निशानी हैं।

संग्रह के दूसरे व्यंग्य में व्यंग्यकार ने आधुनिक युग में नारियों के बदलते हुए स्वरूप पर जमकर कटाक्ष करते हुए पुरुषों को आगाह किया है…
इक्सवीं सदी नारियों की होगी। तब दहेज की माँग करने वाले की नहीं, दहेज की मोटी रकम अदा करने वाले पतियों की जीते जी अर्थी निकलेगी। कमर से तलवार लटकाए रानी लक्ष्मी बाई सरीखी अश्वारोही नारी जब बारात लेकर निकलेगी तो सभी झूम – झूम कर गा उठेंगे, घोड़े पे होके सवार, चली है दूल्हन नार, कमरिया में बांधे तलवार…!

संग्रह का तीसरा व्यंग्य आम और खास में व्यंग्यकार ने आम और खास को बहुत ही रोचक ढंग से परिभाषित करते हुए सामाजिक ढांचे को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है।

यथा – खास और खासमख़ास सबके आकर्षण का केंद्र रहा है आम आदमी। चाहे डाॅक्टर – इंजीनियर हों, खुद को तीसमार समझने वाले बुद्धिजीवी हों अथवा आत्ममुग्ध लेखक – पत्रकार – सभी आम आदमी नामक इसी प्राणी का गाहे-बगाहे उपयोग – उपभोग करते रहे हैं।
आम और आम आदमी दोनों ही समान धर्मा है। फलों का सरताज़ है आम, तो जन आन्दोलन का सिरमौर है आम आदमी।
संग्रह के ग्यारहवें व्यंग्य में लेखक ने बहुत ही बेबाकी से साहित्य जगत की बखिया उधेड़ कर रख दी है।

जैसे – जब यंत्र मानव बनाये जा सकते हैं तो फिर साहित्यकार – पत्रकार क्यों नहीं?
पत्रिका में छपने के लिए अच्छे साहित्यकार की कोई शर्त नहीं है। शर्त है तो बस आजीवन सदस्यता शुल्क भेजने की। सहयोगी संकलनों के लिए निर्धारित राशि के साथ कूड़ा – करकट कुछ भी भेजा जा सकता है।…… आप अपनी सज्जनता का परिचय देते हुए दोनों हाथ से मुँह माँगा धन उलीचिये और मीडिया में मनोवांछित प्रतिष्ठा प्राप्त कीजिये।

संग्रह के सत्रहवें व्यंग्य आजादी का अंक गणित में लेखक ने गवईं परिदृश्य को हल्का – फुल्का भोजपुरी भाषा का प्रयोग करते हुए बड़े ही खूबसूरत एवम् रोचक अंदाज में आजादी का अंकगणित समझाने का प्रयास किया है। जिसके छोटे से वार्तालाप से आपको भी अवगत करवाती हूँ।
कहाँ जा रहे हो, खदेरन.?
आज पन्द्रह अगस्त है नू? स्कूले जात बानी ।उसने कहा।
शाबाश। बहुत अच्छे। आजादी तो हमें आज के दिन ही तो मिली थी। मैंने उसे समझाने की गरज से कहा।
आजादी? उ का होला? स्कूल में त उ मिलबे ना करेला। खाली केला आ मिठाई मिलेला। एही से त आज जात बानी। खदेरन ने कहा।
संग्रह का बीसवा व्यंग्य इंटेलेक्चुअल्स पार्लर गुजरात राज्य शाला पाठ्यपुस्तक मंडल के संपादक मंडल ने कक्षा 12 की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में शामिल कर लिया है। इससे लेखक के लेखन के स्तर का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसी प्रकार संग्रह के अन्य व्यंग्य ( सुनी – अनसुनी, उल्टा – पुल्टा, और चाबी खो जाये, अथ गुरुदेवोपाख्यानम्, साहित्य अर्ध नारीश्वरों के नाम आदि ) भी जबरदस्त व्यंग्य हैं।
अतः मैं यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि यह संग्रह सभी को अच्छा लगेगा इसलिये जरूर पढ़ें।
इस संग्रह के लिए माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी को सादर प्रणाम करते हुए हार्दिक बधाई देती हूँ और आग्रह करती हूँ कि भविष्य में भी हमें अपनी अनमोल कृतियों से लाभान्वित करते रहें।

किरण सिंह

लेखक – भगवती प्रसाद द्विवेदी
प्रकाशक – अमिधा प्रकाशन
मूल्य – दो सौ ( 200 ) रुपये







2 विचार “इंटेलेक्चुअल पार्लर&rdquo पर;

  1. हमारे प्रिय कवियों में से एक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी हैं। उनके व्यंगों को बहुत ही संक्षेप में ही सही मगर बढ़िया ढंग से अवगत कराया

    आजादी? उ का होला? स्कूल में त उ मिलबे ना करेला। खाली केला आ मिठाई मिलेला। एही से त आज जात बानी।

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