अर्णव

सागर का अथाह जल भले ही खारा हो । उसका विशाल स्वरूप भले ही भयभीत करते हों । किन्तु उनकी लहरें जब हमें आमन्त्रित करती हैं तो हम अपने आप को रोक पाने में विफल हो जाते हैं।
यूँ ही नहीं स्वयं जल से लबरेज नदियाँ भी खारे पानी वाले सागर से मिलने के लिए निरन्तर चलती रहती हैं। समाहित हो जाना चाहती हैं वह सागर में । कुछ इसी तरह से कवयित्री पूनम आनंद जी की लेखनी सरिता चलते-चलते समाहित हो गई है भावों के अर्णव में। जिसका स्वाद कुछ मीठा, कुछ खारा तो कुछ नमकीन सा हो गया है, या यूँ कहें कि उनकी लेखनी ने पाठकों के लिए एकरसता से विलग समरसता के भावों से ओतप्रोत सृजन कर डाला है ।
मैं बात कर रही हूँ Punam Anand जी के काव्य संग्रह अर्णव की जो रंगबिरंगे आवरण में लिपटी जीवन के कई रंगों को चित्रित करती हुई प्रतीत होती हैं।
एक सौ छत्तीस (136) पृष्ठों में संग्रहित इस पुस्तक में समर्पण, अभिनन्दन के अलावा कुल पचहत्तर (75) रचनाएँ हैं, जो कि छन्द मुक्त काव्य विधा में लिखी गई जीवन के हर रंगों को उकेरने का प्रयास कर रही हैं।
कवयित्री स्वयं से प्रश्न करती हैं –

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
मन का कोना क्यों है सूना?

जिंदगी के सबसे खूबसूरत रंग प्रेम रंग को कवयित्री कुछ इस तरह से परिभाषित करती हैं –
प्रेम
इन्द्र धनुष की तरह
सतरंगी रंगों में लिपट
अपने इर्द-गिर्द समेटे
अनेक ख्वाबों की तरह
एक खूबसूरत एहसास है

जब कवयित्री का प्रेम परवान चढ़ता है तो कुछ यूँ लिखती हैं –

सिंदूरी साँझ झाँक रही
दिल मेरा नादान रे!
ऐसे न देखो तुम तिरछी नज़र से,
ओ बावरे! प्रेम चढ़ा परवान रे ।

प्रेम को ही विस्तार देते हुए कवयित्री देश प्रेम की गाँठ बंधते हुए लिखती हैं –

अपने उर के आँचल में हम
देश प्रेम की गाँठ बांध लें

कवयित्री प्रकृति और फुदगुदी चिरैया को महामिलन की साखी बतलाते हुए लिखती हैं –

महा मिलन की शाखी है ये प्रकृति
और फुदगुदी चिरैया चिर
शुरू हुआ सदियों पूर्व का एक सफर,
जो आदि से अंत का गवाह बन रहा

चिरैया से याचना करते हुए कवयित्री लिखती हैं –

मेरी गुस्ताखियों की सजा मेरे सूने पड़े मन – आँगन को न दो।
मेरे मुंडेर की शोभा बढ़ाने ओ चिरैया तुम आया करो।

बसंती बयार से प्रश्न करती हुई कवयित्री लिखती हैं –

ओ बसंती बयार
तुम कहाँ चली?

कवयित्री जिंदगी में रिश्तों को जोड़ती हुई लिखती हैं –

तिनका – तिनका जोड़कर रिश्तों की बुनियाद जमाई
पाई – पाई जोड़ कर जमा पूंजी बचाई।

खामोशी में कवयित्री चेतावनी देती हैं –

मेरी खामोशी को नजरअंदाज मत करो।
ये गर्म लावे की तरह है
कभी भी फूट सकती है

कवयित्री स्मृतियों में भ्रमण करती हुई लिखती हैं –

सुनकर उनकी राम कहानी
भर आया आँखों में पानी।
कहाँ गई वो दादी – नानी ,
कौन सुनाये मुझे कहानी ।
कहाँ गई काग़ज़ की कस्ती……….

कवयित्री माँ का अभिनन्द करते हुए लिखती हैं –
हे माँ! तुम्हें मेरा अभिनन्दन
शत् – शत् चरणों में वंदन

आगे लिखती हैं –

सीप में मोती जैसे
ममता अपने संजोती
धीरज के सेतु बांध
चेतना की ज्योति जलाती है माँ।

कवयित्री पत्रकार के रूप में स्वयं को खड़ा कर बनकर लिखती हैं –

मैं पत्रकार कहलाता हूँ
कलम की नोक से लिखकर
तलवार सी धार बनाता हूँ।
जान हथेली पर रखकर
जांबाजों का जज्बा रखता हूँ।

कविता डर में कवयित्री डर से परिचय करवाते हुए लिखती हैं –

मैं डर हूँ ।
मुझे पहचाना आपने?
शक्ल मेरी डरावनी नहीं
पर अक्ल मुझे देखते ही मारी जाती है।
दर-असल मैं हूँ एक मात्र कोरी कल्पना…….

इस तरह से इस संग्रह की सभी कविताएँ अलग – अलग भावों के रंग में रंगी हुई हैं। अतः हम कह सकते हैं कि यह पुस्तक पठनीय है।
इस पुस्तक के लिए कवयित्री पूनम आनंद जी को हार्दिक बधाई देते हुए शुभकामनाएँ देती हूँ कि उनका साहित्य का यह सफर यूँ ही अविराम चलता रहे।

किरण सिंह

रचनाकर – पूनम आनंद
प्रकाशक – विद्या विहार ( नई दिल्ली)
मूल्य – दो सौ पचास ( 250) रूपये

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s