वादा

लाॅकडाउन में पिता की मृत्यु से महेंद्र बाबू की आँखों में आँसुओं के बाढ़ में अनेक स्वप्न महल ढहने लगे। अभी कुछ ही वर्ष पहले तो माँ की मृत्यु हुई थी जिसके श्राद्ध कर्म में करीब दस हजार से भी अधिक व्यक्ति सम्मिलित हुए थे। पूरे गाँव में इस श्राद्ध कर्म की चर्चा होने लगी थी। कुछ मृत्यु के आसपास पहुंचे बुजुर्गों की भी यही इच्छा होती थी कि काश मेरे भी बेटे मेरा श्राद्ध कर्म इतने ही धूमधाम से करें। और महेंद्र बाबू के पिता तो कह भी दिये कि ए बेटा जब हम मरेंगे त हमरो श्राद्ध कर्म असहिये करना । अपने बाप से बेइमानी मत कर देना ।
वह मन ही मन सोच रहे थे कि सच में यह हम पुरुष लोगन का अभागे ही हैं कि वे अपने बेटे – बेटियों को कितना भी स्नेह कर लें पर उनकी गिनती में तो बाप  का जगह माँ के बाद ही आता है। इस पर महेंद्र बाबू बोले थे – बाबू जी तनि भरोसा कीजिए आपका श्राद्ध कर्म हम माँ से भी बढ़िया से करेंगे। हाँ बस हमें छोड़ कर जाने की जल्दी मत कीजियेगा। इस बात पर महेंद्र बाबू के पिता की आँखें एक विश्वास की ज्योति से चमक उठीं थी ।
आज अतीत महेन्द्र बाबू की आँखों में तैर रहा था और महेंद्र बाबू काल के जंजीरों में जकड़े किंकर्तव्यविमूढ़ अपने पिता की मृत देह को निहार रहे थे।
तभी महेंद्र बाबू का मोबाइल रिंग किया उधर से उनके अफसर भाई सुरेन्द्र बाबू का काॅल आया – सुरेन्द्र बाबू का आवाज़ तो कुछ भर्राया हुआ ही था लेकिन वह खुद को सम्हालते हुए अपने भाई को समझाते हुए बोले –
अभी पूरी दुनिया कोरोना जैसे महामारी से लड़ रही है ऐसे में ज्यादा भीड़ – भाड़ इकट्ठा करने की जरूरत नहीं है इसीलिए जो जान गया सो आये लेकिन किसी के घर यह खबर देकर अन्त्येष्टि में जाने के लिए बुलाहट मत भेजना। प्रवाह में जाने के लिए बीस आदमी से एक भी अधिक नहीं होना चाहिए।
महेंद्र बाबू – भाई जी यह तो ठीक न होगा। गाँव समाज की बात है। लोगों को समझाना मुश्किल होगा ।
सुरेन्द्र बाबू – क्या मुश्किल होगा? हम इंटलेक्चुअल पर्सन हैं यदि हम ही सरकारी रूल फाॅलो नहीं करेंगे तो औरों को क्या कहेंगे। किसी भी कीमत पर बीस से अधिक आदमी नहीं जायेगा।
महेंद्र बाबू के मन के तराजू के एक पलड़े में अपने पिता को दिया गया वचन तो दूसरे पलड़े में अपने आदर्श बड़े भाई का आदेश। ऐसे में जब जब दिल से काम लेते तो बाबू जी को दिये गये वचन का पलड़ा भारी लगता और जब दिमाग से काम लेते तो अपने भाई का आदेश का। उनके दिल और दिमाग के मध्य जंग छिड़ गई तभी गाँव के मुखिया जी पधारे।
का सोच रहे हैं महेन्दर हम अभी जिंदा हैं और हमारे रहते हमारे गाँव में कोरोना का बाप भी नहीं आ सकता। नउआ को बुला के बोलाहटा भेजवाइये। किसका मजाल है कि हमारे गाँव के मजल पर नज़र गड़ाने की। सब थाना पुलिस मैनेज हो जायेगा। तनिको चिंता मत करिये आप।
महेंद्र बाबू – उ त है बाकी भाई जी न अलगे राग अलाप रहे हैं, कह रहे हैं कि बीसे आदमी घाट पर जायेगा।
मुखिया जी – अरे उ सुरेन्दर बाबू अफसर हैं इसलिए शहरी नियम कानून की बात कर रहे हैं। हम तो देहाती गंगा किनारे वाले हैं जरा नज़र गड़ा के देखिये तो इहां से उहां तक कवनो को कोरोना हुआ है? अरे इ सब हमारी अर्थव्यवस्था ठप्प करने की चीन डबलू एच ओ की सेनेटाइजर अउर मास्क बेचने की साजिश है। तभिये तो कबो स्वाइन फ्लू त कबो चिकेन गुनिया त कबो कोरोना.…………. ।
मुखिया जी महेन्दर बाबू के दिल की बात कह रहे थे इसलिए वह गांव में घाट जाने के लिए बोलाहटा भिजवा दिये। इधर सुरेन्दर बाबू भी पहुंच कर लाख भाषण देते रह गये लेकिन उनकी  एक न चली। घाट पर चार – पाँच सौ लोगों की भीड़, वहाँ एक टेंट लगा था, सभी गर्मी से बचने के लिए एकदूसरे से सट – सट कर टेंट में बैठे थे। शर्बत, पानी, फल, मेवा, मिष्ठान चल रहा था। सुरेन्द्र बाबू मुखाग्नि दे रहे थे और उनके मन के डर की चिता में पूरा गाँव जलता हुआ दिखाई दे रहा था।
दाह संस्कार निर्बाध रूप से सम्पूर्ण हुआ। इसके बाद जहाँ महेंद्र बाबू के मुख पर पितृ शोक के बावजूद भी विजय का भाव दिखाई दे रहा था वहीं सुरेन्द्र बाबू के मन में अपराधबोध और आशंका ।
इस विजय के बाद बारी आई श्राद्ध कर्म की। सुरेन्द्र बाबू फिर भी भाई को समझाये कि नियम न तोड़े। श्राद्ध कर्म में पचास आदमी से अधिक नहीं जुटना चाहिए। पितृ ऋण चुकता करने के और भी बहुत से तरीके हैं। लेकिन इस बात पर भी महेंद्र बाबू अपनी तथा अपने पिता की प्रतिष्ठा की दुहाई देने लगे। सुरेन्द्र बाबू बोले भी कि अगले वर्ष चौगुना लोगों को बुला लेना पर उस समय तो जैसे लग रहा था कि महेंद्र बाबू पर पागलपन सवार था इसीलिए वह किसी की भी सुन नहीं रहे थे ऊपर से उनके सिर पर मुखिया जी का हाथ था ।
सुरेन्द्र बाबू मुखाग्नि देने के बाद महेंद्र बाबू को समझा – बुझाकर उन्हें ही आगे का कार्यभार देकर अपनी ड्युटी पर चले गये। इधर महेंद्र बाबू जोर – शोर से श्राद्ध कर्म की तैयारी करने लगे। जिला – जवार के लोगों को आमंत्रित करने में आमन्त्रण कार्ड छपने चला गया।
तैयारी जोरो पर थी तभी पूरे गाँव में ख़बर फैल गई कि मुखिया जी को खांसी और बुखार हो गया था और चेक करवाने पर कोरोना निकल गया इसलिए उन्हें कोरन्टाइन सेंटर ले जाया जा रहा है।
इ कइसे हो गया..? महेंद्र बाबू ग्रामीण से सवाल दाग दिये।
ए बाबू इ कोरोना एटम बमों से बड़का खतरनाक है। आ उ बड़ छोट थोड़े न देखता है… बहुते भांज रहे थे मुखिया जी अब निकल गया न सब मुखियागिरी…
ग्रामीणों की बात सुनकर महेंद्र बाबू थर्मामीटर लेकर अपना बुखार नापने लगे। उस समय तो लग रहा था कि उन्हें भी कोरोना पकड़ लिया है।
एक तो पूरे गाँव में कोरोना फैलने का डर और दूसरे श्राद्ध कर्म के खण्डित होने का खतरा।
महेंद्र बाबू के कानों में अपने भाई जी सुरेन्द्र बाबू की कही गई एक – एक बात गूँज रही थी। सामने पिता के श्राद्ध में आमंत्रण के लिए कार्ड पड़ा हुआ था। मन में सोच रहे थे कि क्या करें क्या न करें… तभी हेल्थ सेंटर से गाड़ी आई और मुखिया जी के सम्पर्क में आये सभी लोगों का ब्लड सेम्पल लेकर गई।
काफी चिंतन मनन के बाद महेन्द्र बाबू उठे और थोड़ी दूर जाकर पोखर में सभी आमन्त्रण कार्ड प्रवाहित कर दिये। मानो वह अपने मन का सभी आडम्बर और दिखावा को निकाल कर प्रवाहित कर रहे हों।
तभी रमेसर (महेंद्र बाबू का सेवक) आकर बोला मालिक हलवाई आ गये।
महेंद्र बाबू – बोल दो चला जाये खाना नहीं बनेगा।
काहे मालिक?
महेंद्र बाबू – अरे देखते नहीं हो पूरे गाँव में आफत आ गई है और तुम्हें भोजे दिखाई दे रहा है।
रमेसर –  मालिक त इ समनवा का होगा?
महेंद्र बाबू – अरे भाक बुरबके हो का…. जा सुदेसर, महेसर सबको बोला के अपने गोतिया में बांट लो..
अउर लो इ लो सुरेंद्र भाई जी शहर से सेनेटाइजर अउर मास्क लाये थे मास्क मुंह में बांध लेना अऊर सिनेटाइजर बेरी – बेरी हाथ में मलते रहना अउर सभे के भी कहना न तो इ कोरोनवा गाँव को लील जायेगा।
उ त ठीक है मालिक, बाकि बड़का मालिक के किरीया करम कइसे होगा? रमेसर डरते-डरते पूछा।
भाक बुरबक पचास आदमी के खाना त अपनही से घरे में बन जायेगा।
अभी देखते नहीं हो दुनिया में महामारी आया है आ तुमको किरिया का पड़ल है।
रमेसर महेन्द्र बाबू का मुंह ताकने लगा… और महेंद्र बाबू अंदर ही अंदर कोरोना के डर से कांपते हुए
बाबू जी के फोटो के सामने  हाँथ जोड़ कर क्षमा माँगते हुए अगले बरसी पर धूमधाम से श्राद्ध करने का वादा कर रहे थे ।

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