शार्टकट नहीं, सफलता का मूल मंत्र है, कठिन परिश्रम

शार्टकट का रास्ता अख्तियार करने से बचें।

बारहवीं की बोर्ड परीक्षा के साथ ही शुरू हो जाता है छात्र – छात्राओं के कैरियर की मैराथन दौड़ जिसकी मंजिल होती  है आई आई टी ( भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान), जे ई ई (संयुक्त प्रवेश परीक्षा) या फिर नीट ( राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा )  निकालना । जो स्टूडेंट्स इन परीक्षाओं को क्लियर कर लेते हैं उनके पेरेंट्स तो गंगा नहा लेते हैं, किन्तु जो नहीं क्लियर कर पाते उन्हें उस समय आगे का कुछ रास्ता ही समझ में नहीं आता।  ऐसे में उनके पास विकल्प बच जाता है कि वह अपनी क्षमता को आंक कर या तो  एक साल और इंतज़ार करें या फिर किसी अन्य काॅलेज में प्रवेश ले लें।
वैसे तो उपर्युक्त प्रवेश परीक्षाओं के आधार पर भी कोई न कोई काॅलेज तो मिल ही जाता है, किन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब स्टूडेंट्स के नम्बर तो कम होते हैं किन्तु सपने बड़े। ऐसे में उन्हें अपने मनपसंद काॅलेज में  पढ़ने के सपने चकनाचूर होते दिखाई देने लगते हैं।  उनके इन्हीं सपनों को बेचने के लिए  शिक्षा माफिया कैरियर काउंसिलर के रूप में अपनी दुकान खोलकर बैठे होते हैं। जहाँ खुलेआम काॅलेज का मोलभाव होता है। अर्थात जितना बढ़िया काॅलेज उतनी मोटी रकम अदा करना होता है ।
ऐसे में खुद के तथा अपने बच्चों के सपनों को पंख देने के लिए कुछ पेरेंट्स किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। उन्हें तो लगता है कि यदि अच्छे काॅलेज में  ऐडमिशन न हुआ तो उनके बच्चों के सफलता के सभी रास्ते बंद हो जायेंगे इसलिए वो कहीं से भी जुगाड़ कर के अपने बच्चों को अच्छा काॅलेज दिला देते हैं।उसके बाद उन्हें लगता है कि वे जिंदगी के सारे जंग जीत लिये ।  लेकिन अधिकांश मामलों में पेरेंट्स को निराशा की धूल ही फांकनी पड़ती है। क्योंकि वह अपनी संतानों को सपनों के घोड़ों पर बिठा तो देते हैं  किन्तु यह भूल जाते हैं कि हमारे बच्चों को ठीक से घुड़सवारी आती भी है या नहीं..? ऐसे में मुंह के बल गिरने की आशंका तो रहती ही है।
इंट्रेंस एक्जाम ही इसलिए ली जाती है कि स्टूडेंट्स की काबिलियत का पता चले। और उन्हीं का चयन होता है जो योग्य होते हैं। अर्थात अमुक स्टूडेंट अमुक काॅलेज के पाठ्यक्रम में फिट बैठता है। लेकिन जो दूसरे दरवाजे से आते हैं उन्हें काॅलेज का पाठ्यक्रम कठिन लगने लगता है। परिणामस्वरूप उन्हें एक्जाम क्लियर करना मुश्किल हो जाता है । ऐसी स्थिति में  हताशा की वजह से उन्हें अवसाद से ग्रसित होने की सम्भावना अधिक बन जाती है जिसके फलस्वरूप स्टूडेंट्स  गलत कदम ( नशे का शिकार, आत्महत्या का प्रयास, आदि) भी उठा सकते हैं।
आमतौर पर लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि अच्छे काॅलेज में अच्छा प्लेसमेंट होता है। सही भी है। किन्तु प्लेसमेंट तो तब होगा न जब एक्जाम क्लियर हो ।
अब मिस्टर अजय को ही ले लीजिए। उनके बेटे पर सरस्वती की कृपा भले ही कम थी पर उनपर लक्ष्मी की कृपा कुछ ज्यादा ही थी, अतः वह मनचाहा काॅलेज में अपने बेटे का ऐडमिशन कराकर फूले नहीं समाते थे।
वहीं अभय बाबू अपने तथा अपने बेटे के सामर्थ्य के अनुसार जिस कालेज में सलेक्शन हुआ उसी में ऐडमिशन करा दिये। हाँ उनके मन में थोड़ी कसक जरूर रह गई थी कि काश……
चार वर्ष बीता और अभय बाबू का बेटा काॅलेज का एक्जाम पास करके किसी साधारण कम्पनी में ही नौकरी करके अनुभव लिया और आज बहुत अच्छी कम्पनी में हाई सैलरी पर कार्यरत है जबकि अजय बाबू का बेटा काॅलेज का एक्जाम क्लियर नहीं कर पाने की वजह से अवसाद का शिकार होकर घर में बैठा है।
कहने का तात्पर्य यह है कि योग्यता के अनुसार कार्य और कार्य के अनुसार ही सैलरी मिलती है।
सभी बच्चे एक समान नहीं होते इसे स्वीकार करें।
डींगें हांकने से बचें।
स्व विवेक से काम लें।
शार्टकट का रास्ता अख्तियार करने से बचें।
सफलता का मूलमंत्र कठिन परिश्रम है इस सच्चाई को स्वीकार करें।
शिक्षा माफियाओं के चंगुल में न तो खुद फंसे और न ही अपने बच्चों को फंसने दें ।
और सबसे जरूरी है कि अपने बच्चों के अभिरुचि और क्षमता के अनुसार ही उन्हें अपने कैरियर का चयन करने दें।

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