प्रेम मीरा – श्याम

1498 ई. में मेड़ता(कुड़की) में दूदा जी के चौथे पुत्र रतन सिंह तथा ( बाजोली के जागीरदार) के घर में एक कन्या का जन्म हुआ था जिन्हें हम मीराबाई के नाम से जानते हैं । मीरा बाई की माता का नाम वीर कुमारी था।ू
मीरा बाई जब आठ साल की थीं तो एक बारात जा रही थी तो उन्होंने घोड़े पर बैठे दूल्हे को देख कर पूछा कि माँ यह कौन है? तो उनकी मां ने बताया कि यह दूल्हा है।
फिर बालिका मीरा बाई ने उनसे पूछा कि मेरा दूल्हा कहाँ है?
मीरा बाई की माँ ने उन्हें बहलाने के लिए कृष्ण की मूर्ति की तरफ इशारा कर के कहा कि यही तुम्हारा दूल्हा है।
मीरा बाई का कोमल बाल मन इस झूठ को सच समझ बैठा और उसी समय से उनके हृदय में प्रथम प्रेम का बीज अंकुरित होने लगा जो समय के साथ – साथ पल्लवित पुष्पित होने लगा।
।मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राज परिवार में उदयपुर के महाराज भोजराज से हुआ। जो मेवाड़ के महाराणा सांगा के पुत्र थे। पहले तो विवाह के लिए मीराबाई तैयार नहीं थीं किन्तु परिवार के सदस्यों द्वारा समझाये जाने पर अनमने मन से ही तैयार हुईं लेकिन अपने फेरे के समय भगवान श्रीकृष्ण का श्री विग्रह हाथ में लिये हुए थीं।
विवाह के कुछ ही समय के बाद उनके पति का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हें पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया, (किन्तु मीरा इसके लिए तैयार नहीं हुईं।(मीरा के पति का अंतिम संस्कार चित्तोड़ में मीरा की अनुपस्थिति में हुुुआ।
पति की मृत्यु के बाद उनके सौतेले भाई विक्रमादित्य राणा बने।
संसार से विरक्त हो चुकी मीराबाई कुल की मर्यादा के खिलाफ़ साधु-संतों के बीच में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती, गाती, रोती रहती थीं। मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा।
कहते हैं कि राणा विक्रमादित्य ने मीराबाई को दो बार मरवाने का प्रयास किया था। एक बार फूल की टोकरी में जहरीला नाग भेजकर। लेकिन वह नाग कृष्ण की मूर्ति में परिवर्तित हो गया था।
और दूसरी बार उन्हें विष का प्याला देकर मारने की कोशिश की गई । लेकिन मीराबाई ने उसे कृष्ण का चरणामृत समझ कर पी लिया फिर भी उन्हें कुछ भी नहीं हुआ।
जब अति हो गई तो मीराबाई ने तुलसीदास जी को एक पत्र लिखा। जिसमें लिखा था कि मेरे पति की मृत्यु के बाद मुझे ससुराल में बहुत ही कष्ट दिया जा रहा है। मुझे कृष्ण भक्ति से रोका जा रहा है।
मीराबाई के पत्र के उत्तर में तुलसी दास जी ने लिखा –
जाके प्रिय न राम वैदेही,
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।
अर्थात जिसको राम से प्रेम नहीं है और वह आपको भी रामभक्ति से रोकता है उसे करोड़ों बैरियों की तरह ही त्याग देना चाहिए।
उसके बाद ही मीराबाई घर छोड़कर ब्रज की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ीं। और उसके बाद वृंदावन में कुछ साल रहने के बाद वह सन् 1546 के आस-पास द्वारका चली गईं।
कहा जाता है कि वह द्वारका में कृष्ण मंदिर में चली गईं। जब रात हो गई तो उस मंदिर के पुजारी ने कहा कि रात हो गई है बेटी अब तुम अपने घर जाओ। तो मीराबाई ने कहा कि मैंने सुना है कि भारतीय स्त्री का घर उसका पतिगृह ही होता है। और मेरा पतिगृह तो यही है। क्योंकि कृष्ण से तो मेरा विवाह बचपन में ही हो गया था। फिर वह पुजारी मीराबाई को अपनी पुत्री बनाकर रखने लगे।
मीराबाई मंदिर के पुजारी का अधिकांश कार्यभार स्वयं ले लीं। और कृष्ण की पूजा अर्चना में तल्लीन रहने लगीं।
जब बाबर का हिंदुस्तान पर हमला और प्रसिद्ध खानवा की लड़ाई जो की बाबर और राणा संग्राम सिंह के बीच हुई, जिसमें राणा सांगा की पराजय हुई। तो फिर वहां के राजपुरोहित ने कहा कि मीराबाई को इस घर में पुनः लाया जाये। मीराबाई को ढूंढने का काम भी राजपुरोहित को ही सौंपा गया। काफी मसक्कत के बाद जब मीराबाई का पता चला तो राजपुरोहित मीराबाई के पास पहुचे और उनसे उन्हें अपने ससुराल चलने का आग्रह करने लगे। तब मीराबाई ने कहा कि मैं तो अपने ससुराल में ही हूँ। आप किस ससुराल की बात कर रहे हैं। फिर राजपुरोहित ने कहा कि यदि आप नहीं चलेंगी तो मैं आत्महत्या कर लूंगा। उस समय मीराबाई धर्म संकट में पड़ गईं। परेशान होकर कृष्ण की मूर्ति के सामने रोने लगीं। कहने लगीं कि तुमने आज मुझे किस परिस्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। कोई भी पत्नी जब जब अपने ससुराल में आती है तो यह संकल्प लेकर आती है कि इस घर की दहलीज मृत्यु के उपरांत ही लांघूंगी और मैं…. ।
कृष्ण से काफी शिकवे शिकायत करने के बाद वह ब्रम्ह हत्या के डर से राजपुरोहित की बात मान कर ज्यों ही जाने के लिए मुड़ीं त्यों ही कृष्ण की मूर्ति की बांहें मीराबाई की तरफ़ फैल गई और मीराबाई कृष्ण में समा गईं।

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