बस कह देना कि आऊँगा

आना और न आना तो आने वालों की मर्जी पर निर्भर करता है किन्तु ये जिद्दी प्रतीक्षा इस बात से बेखबर अड़ी रहती है अपनी जिद्द पर ।  निराशा के तिमिर को भेद कर आशा की  खूबसूरत भविष्य की परिकल्पना में प्रतीक्षारत।
तभी तो आजिज़ होकर कवयित्री नन्दा जी की लेखनी चलकर प्रिय से प्रार्थना करती है कि तुम आना या न आना बस कह देना कि आऊँगा। और उनकी प्रार्थना रूप ले लेती है एक काव्य संग्रह का।  इस प्रकार संग्रह का शीर्षक बस कह देना की आऊँगा अपनी सार्थकता को सिद्ध करता ही है, ऊपर से लाल रंग के आवरण पृष्ठ पर नव यौवना का चित्र पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए पर्याप्त है।
एक सौ बीस पृष्ठों में अंकित इस पुस्तक में चौवन कविताएँ हैं।सभी रचनाएँ छन्द मुक्त, भाव प्रबल और श्रृंगार रस में डूबी हुई हैं जिसको पढ़ने के उपरांत ऐसा प्रतीत होता है कि नायिका ने अपनी व्यथा को डायरी में काव्य के रूप में अंकित कर दिया है जिसको पढ़ते हुए पाठक परत दर परत खुलती भावनाओं में प्रतीक्षा के मर्म को समझता है।
पुस्तक की पहली ही कविता शीर्षक को सार्थक कर रही है।
यथा –

मैं तो बस एक सम्भाव से
तुम्हारा इंतज़ार करती रहती हूँ..
तुम आओ न आओ
बस कह देना कि आऊँगा।

कवयित्री आप बीती में कहती हैं –

मेरी कविता मुझसे ही बगावत कर बैठी
सारी कविताएँ मुझ पर
हँस रहीं थीं और मेरा ही मुंह चिढ़ा रहीं थीं
मानो कह रही हों
क्या मिला मेरे शब्दों से खेलकर
जिसके लिये तुम हमें तोड़ती – जोड़ती रही
क्या उसने समझा तुम्हारी भावनाओं को
जी में आया सबका गला घोंट दूँ…….

आरम्भ या अंतिम संस्कार में कवयित्री लिखती हैं –
एक बार फिर मैं,
अप्रमेय प्रेम की खोज में
सबसे सरलतम प्रमेय से छली गई
क्या..?
ये मेरा आरम्भ होगा या अंतिम संस्कार
नहीं जानती मैं… ।

कवयित्री मन का रिश्ता में मन के खूबसूरत रिश्ते की गहराई को कुछ यूँ बयाँ करती हैं –

जानते हो!
तुम्हारे प्रति मेरी
अनुभूति की अभिव्यक्ति
शब्दों में परिवर्तित क्यों नहीं हो पाती?
क्योंकि
मेरे और तुम्हारे प्रेम का
सुनहरा क्षितिज असीमित है..

नायिका जब प्रतीक्षा करते – करते थक जाती है तो कवयित्री तुम आओगे या मैं आऊँ कविता में कहती हैं –

तुम्हारे यादों के उस कोट में
खुद को बंद कर लेती हूँ
जिसमें मेरी कल्पनाओं के सतरंगी इन्द्रधनुष
आज भी दिखाई देते हैं
जानती हूँ ये असम्भव प्राय है
फिर भी हो सके तो आ जाना..

और कवयित्री तुम आना में लिखती हैं –

तुम आना जब मिट जाये
मध्यस्थ की रेखा
मृदु नेह अर्पित हो
मिलन पर
गा उठे सब तार
मन के
तुम आना!
बेशक तुम मत आना…. बस कह देना कि आऊँगा।

इस प्रकार मुक्त छन्द में उन्मुक्त काव्य से संकलित यह पुस्तक पठनीय है। पुस्तक के पन्ने स्तरीय हैं तथा छपाई स्पष्ट है। यह कवयित्री की पहली पुस्तक है इसलिए मैं कवयित्री को हार्दिक बधाई एवम् उनके उज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएँ देती हूँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक – बस कह देना कि आऊँगा
लेखिका – नन्दा पाण्डेय
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन
मूल्य – 150. 00

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