रिकवरी रूम में वेलेंटाइन डे

स्ट्रेचर पर लेटकर ऑपरेशन थियेटर की तरफ जाते हुए रीमा को लग रहा था कि जल्लाद रुपी परिचारिकाएँ उसे फांसी के तख्ते तक ले जा रही हैं, हृदय की धड़कने और भी तेजी से धड़क रही थीं। वह मन ही मन सोंच रही थी कि शायद यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है इसलिए वह जी भर कर देखना चाहती थी दुनिया को। पर नजरें नहीं मिला पा रही थी परिजनों से कि कहीं उसकी आँखें छलक कर उसकी पोल न खोल दें। क्योंकि वह अपने परिजनों के सामने  खुद को बिलकुल निर्भीक दिखाने का अभिनय कर रही थी!परिचारिकाएं ऑपरेशन थियेटर के दरवाजे के सामने स्ट्रेचर रोक दीं . और तभी किसी यमदूत की तरह डाक्टर आ गये .. स्ट्रेचर के साथ साथ डॉक्टर  उसके साथ चल रहे थे। चलते चलते वे अपनी बातों में उलझाने लगे थे ।  और फिर उसे आॅपरेशन थियेटर में ले गये। वहाँ डाॅक्टर ने रीमा को बातों ही बातों में उलझाकर बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया ! करीब ३६ घंटे बाद १४ फरवरी को उसकी आँखें रुक – रुक कर खुल रही थी ..! आँखें खुलते ही  सामने अपने पति को देख उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि वह जीवित है या कि  स्वप्न देख रही है। इसलिए वह अपने पति की तरफ अपना हाँथ बढ़ाया। जब उसके पति ने उसका हाथ पकड़ा तब उसे विश्वास हुआ कि वह सचमुच जीवित है ! उस समय उसे अपनी जिन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगी थी। वह हास्पीटल के रिकवरी रूम का वेलेंटाइन डे सबसे खूबसूरत दिन लग रहा था..!

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