अंधकार और प्रकाश में भेद बतलाता है बाल साहित्य

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी

जन्म – जुलाई 1,1955, बलिया (उत्तर प्रदेश (के दल छपरा गाँव में।

आपको उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने वर्ष 2016 के लिए बाल साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती‘, सरस्वती बाल कल्याण – न्यास, इंदौर से देवपुत्र गौरव सम्मान। बिहार राष्ट्र भाषा परिषद के तत्वावधान में विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से वर्ष 2013 का निराला पुरस्कार, व 2014 का सूर पुरस्कार, चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट, शकुंतला सिरोठिया बाल साहित्य पुरस्कार, चमेली देवी महेन्द्र सम्मान, भारतीय बाल कल्याण संस्थान, राष्ट्र बंधु स्मृति सम्मान, विद्या वाचस्पति ( पी एच डी ) की मानद उपाधि आदि मिले हैं।

प्रकाशित कृतियाँ – साहित्य अकादमी से ‘भारतीय साहित्य के निर्माता‘ श्रृंखला के तहत प्रकाशित विनिबंध (मोनो ग्राफ) ‘महेन्द्र मिसिर‘ और ललित निबंध-संग्रह ‘माटी में सोनवा‘, चीर हरण, अस्तित्व बोध, फील गुड तथा अन्य कहानियाँ ( कहानी संग्रह) नई कोपलों की खातिर ( नवगीत संग्रह) एक और दिन का इजाफ़ा (कविता संग्रह ) इंटेलेक्चुअल पाॅर्लर ( व्यंग्य संग्रह) भविष्य का वर्तमान, थाती, सदी का सच ( लघुकथा संग्रह ) भिखारी ठाकुर :भोजपुरी के भारतेंदु, महेंद्र मिसिर :भोजपुरी गीतकार ( आलोचना ) भारतीय जनजातियाँ कल आज और कल ( शोध ) भोजपुरी लोककथा मंजू आ ( लोककथा संकलन ) आदि तथा बाल साहित्य की 83 पुस्तकों में मेरी प्रिय बाल कहानियाँ, मेरी प्रिय बाल कविताएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय।

प्रश्न 1- यह तो सत्य है कि हमारे जीवन में अचानक कुछ ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं कि हृदय सागर में भावनाओं की बाढ़ सी आ जाती है और अनायास ही लेखनी चल पड़ती है। हम यह जानना चाहते हैं कि आपके मन लेखन के प्रति अभिरुचि कबसे जागृत हुई?

उत्तर – बचपन की घटना है। जूनियर हाईस्कूल रेवती ( जो मेरे गाँव दल छपरा से करीब दस कीलोमीटर दूर है ) में हर शनिवार को बाल सभा हुआ करती थी जिसमें कविता – कहानी आदि सुनाना होता था। उस समय मेरे मन में बात आई कि क्यों न मैं स्वयं की लिखी हुई रचना प्रस्तुत करूँ और मैंने ऐसा ही किया भी। मेरी रचना सुनकर मेरे शिक्षक जनार्दन पाण्डेय बहुत प्रभावित हुए और पूछे कि यह किसकी रचना है? जब मैंने बताया कि यह रचना मेरी है तो उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और बोले कि लिखा करो। तभी से मैं लिखने लगा।
इसके अलावा भी डेढ़ साल की उम्र में ही मेरी माँ ईश्वर को प्यारी हो गई थीं तो मेरा लालन-पालन मेरी दादी करती थीं। वही मुझे बचपन में अपने साथ सुलाती और लोक कधाएँ सुनातीं जिसके प्रभाव में मैं आ गया और मेरे अंदर बाल साहित्य की तरफ़ अभिरुचि पैदा हुई।

प्रश्न 2 – बाल साहित्य बाल मन पर कितना प्रभावकारी होता है।

उत्तर – बाल साहित्य ही वह माध्यम है जिसके द्वारा बच्चों को बहुत सहजता से जीवन में बहुत कुछ हासिल करने की प्रेरणा दी जा सकती है।
बाल साहित्य अंधकार और प्रकाश में भेद बताता है अतः असफल व्यक्ति को भी सफल बनाने का दम रखता है।
अतः बाल साहित्य बच्चों के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि प्राण वायु।

प्रश्न – 3- बाल साहित्यकारों को किन – किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? तथा आज के युग में बच्चों को आकृष्ट करने के लिए बाल साहित्यकारों को किन – बातों को ध्यान में रखकर साहित्य सृजन करनी चाहिए?

उत्तर – बच्चे ईश्वर के प्रतिमूर्ति होते हैं। इसलिए उनके मनोविज्ञान को पढ़ते हुए उनके लिए सर्जन करना ईश्वरीय आराधना है।
बाल साहित्य की पहली शर्त है बच्चों को आनन्दित करना। बाल साहित्य उपदेशपरक नहीं होना चाहिए।
सीधे – सीधे-सीधे उपदेश देना बच्चों की अभिरुचि को दबाना है। इसलिए बाल साहित्यकारों को चाहिये कि वो अपनी बातों को मजेदार ढंग कविता, कहानी के माध्यम से कहते हुए कुछ उपदेश मूलक ऐसी बातें कह देना चाहिए जो कि बच्चों के मार्गदर्शन में सहायक साबित हो।
अतः बाल साहित्यकारों को सार्थक सृजन करने के लिए बाल मनोविज्ञान की गहरी पड़ताल करना आवश्यक हो जाता है।
एक तरह से बाल साहित्य सर्जना तलवार की धार पर चलने के समान है।

प्रश्न 4 – आज जिस तरह से बच्चे एकाकी, उग्र व चिड़चिड़े होते जा रहे हैं जो कि भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। ऐसे में साहितकारों का क्या दायित्व हो जाता है।

उत्तर – आज बच्चे एकाकी जीवन जीने को विवश हैं। उनका बचपन अभिभावकों की महात्वाकांक्षा के तले दबकर इस कदर भयाक्रांत है कि कि बच्चे बचपन को भूलकर सीधे बालक से किशोर और युवा हो रहे हैं। नतीजतन बच्चे कहीं कुंठित हो रहे हैं तो कहीं हीन भावना के शिकार, और कहीं कहीं तो बच्चे जीवन से घबराकर आत्महत्या तक कर लेते हैं जो कि पूरे समाज के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
इसके लिए जिम्मेदार हमारी शिक्षा प्रणाली भी है जो बच्चों को मानवीय मूल्यों से काट रही है।
ऐसे में सभी प्रतिष्ठित साहित्यकारों की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे आज के संदर्भ में प्रगतिशील तत्वों को जोड़ कर कुछ ऐसा रच दें जो कि रोचकता के साथ – साथ प्रेरक तथा ज्ञानवर्धक हो।
साथ ही अभिभावकों को भी चाहिए कि वे अपने बच्चों को बाल पत्रिकाएँ पढ़ने के लिए प्रेरित करें व उपलब्ध कराएँ।
इसके लिए सरकार को भी अभियान चलाना चाहिये कि हर स्कूल में बच्चों के लिए पुस्तकालय हो।विद्यार्थियों में बाल सभाएँ होती रहें जिससे बच्चे सहज जीवन जी सकें और खेल – खेल में ही मानवीय मूल्यों को समझ सकें।

प्रश्न 5 -बाल साहित्य की सीमाएँ तथा सम्भावनाएँ क्या हैं?

उत्तर – बाल साहित्य की सम्भावनाएँ अनन्त हैं।दुनिया का हर क्षेत्र बाल साहित्य से जुड़ा हुआ है।
बस दिक्कत यह है कि बच्चों का साहित्य ( बच्चों की पत्रिकाएँ) बच्चों तक पहुँच नहीं पा रहा है। जबकि बच्चों की पत्रिकाएँ ही सही मायने में बच्चों की दोस्त हैं। क्योंकि बच्चों के दोस्त भले उनको भटका सकते हैं लेकिन पत्रिकाएँ खेल – खेल में रोचक ढंग से उनका सर्वांगीण विकास कर सकती हैं।

प्रश्न 6-बाल साहित्यकारों को साहित्य जगत में क्या वही स्थान मिलता है जितना कि अन्य साहित्यकारों को?

उत्तर – यह एक विडम्बना ही है कि एक तरफ तो हम बाल साहित्य को बहुत दुष्कर मानते हैं और दूसरी तरफ़ बाल साहित्य व साहित्यकारों की उपेक्षा करते हैं। पर जो सही मायने में रचनाकार है वह ऐसी उपेक्षा की परवाह नहीं करते हैं।

प्रश्न 7- आप वरिष्ठ साहित्यकार हैं और वर्षों से साहित्य की कई विधाओं पर लिखते आ रहे हैं। तो नये साहित्यकारों के लिए आपका क्या सुझाव है – क्या उन्हें एक ही विधा पर कलम चलानी चाहिये या अन्य विधाओं को भी आजमाना चाहिये?

उत्तर – हर रचनाकार अपनी अभिरुचि के अनुसार साहित्य सृजन करता है । कुछ साहित्यकार एक ही विधा में काम करते हैं तो कुछ बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं जो कई विधाओं में पूरी दक्षता के साथ काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर हम रविन्द्र नाथ टैगोर को ले सकते हैं।
अतः कौन साहित्यकार किस विधा में लिखता है वर उस साहित्यकार पर ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि इसके लिए न तो कोई शर्त है और न ही कोई सिद्धांत।

प्रश्न 8 – पुरस्कार किसी साहित्यकार को प्रोत्साहित तो करते हैं। किन्तु आज जिस तरह से पुरस्कारों की खरीद – बिक्री हो रही है वह साहित्य को कहाँ लेकर जायेगा?

उत्तर -यह अर्जित करने का क्षेत्र नहीं बल्कि अपना सर्वस्व लुटाने का क्षेत्र है। जो रचनाकार अच्छा रचेंगे उनकी रचनाएँ आज नहीं तो कल सराही भी जायेंगी और सम्मानित भी होंगी।
मुझे लगता है कि अच्छे व सच्चे रचनाकर को रचने में विश्वास करना चाहिए प्राप्ति में नहीं। क्योंकि जो प्राप्ति में विश्वास करते हैं वो कहीं विकृत राजनीति करते हैं तो कहीं गलत तरीके इस्तेमाल करके सही रचनाकर का हक छीनते हैं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।

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