गोलू – मोलू

कृति: गोलू-मोलू (बाल कविता-संग्रह)
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशकः जानकी प्रकाशन,
अशोक राजपथ, पटना।

पृष्ठः 64 मूल्यः 150/-

समीक्षक: मुकेश कुमार सिन्हाबच्चों के लिए लिखना, मतलब बच्चा बन जाना। बच्चा बनकर ही बच्चों के लिए लिखा जा सकता है, अन्यथा लिखना व्यर्थ है। जिन्होंने बचपन को खुलकर जिया ही नहीं, उनके लिए मुश्किल है बच्चों के लिए लिखना!

हम महसूस करते हैं कि बच्चों का हृदय बेहद कोमल होता है। ऐसे में, उनके लिए लिखना साहित्यकारों के लिए बेहद दुरुह कार्य है। बच्चों के लिए उतना नहीं लिखा जा रहा है, जितना लिखा जाना चाहिए।
बच्चों के कोमल हृदय में नैतिकता का भाव पैदा करना जरूरी है। जरूरी है बच्चों को भारतीय संस्कृति और संस्कार से परिचित कराना, ताकि फिर से संस्कृति का झंडा बुलंद हो सके। बच्चों में संस्कार और संस्कृति का भाव साहित्य के माध्यम से ही भरा जा सकता है। बाल मन के भटकाव को रोकने के लिए बाल साहित्य का उन्नत होना जरूरी है। जितना उन्नत बाल साहित्य होगा, उतना ही उन्नत होगा देश और समाज!
राष्ट्र की भावी पीढ़ी के लिए यह एक सुखद बात है कि उन्हें हर दृष्टिकोण से ‘मजबूत’ बनाने के लिए कलम कमर कसकर बैठी है। यूँ तो किरण सिंह की कलम बड़ों के लिए ही लिखती आयी है, लेकिन बाल साहित्य के सृजन को भी उनकी कलम मचल उठी है और साहित्यिक बगिया को समर्पित की सुंदर और सुगंधित पुष्प ‘गोलू-मोलू’। यह बाल कविता संग्रह है, जिसमें 39 कविताएँ हैं और यह पुस्तक समर्पित है प्यारे-प्यारे मासूम बच्चों को।
निश्चित,, प्रत्येक साहित्यकार के लिए बाल साहित्य का सृजन करना नैतिक जिम्मेदारी है। कुशल कलमकार किरण सिंह ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाने की भरसक कोशिश की है। उन्होंने बच्चों से कहा-‘कभी मैं भी आपकी ही तरह बच्ची थी। मैं भी खेलती-कूदती थी, पढ़ती-लिखती थी और शैतानियाँ भी किया करती थी। इसलिए जब आपको देखती हूँ तो मुझे अपना बचपन याद आ जाता है, तो सोची कि क्यों न मैं आपसे दोस्ती कर लूँ।
वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी मानते हैं कि मौजूदा दौर के बच्चे जब कई तरह से दबाव और तनाव झेल रहे हैं, हर जिम्मेदार रचनाकार का दायित्व है कि वह शिशुओं-बालकों-किशोरों के लिए भी जरूरी सृजन करे। ऐसा साहित्य-सृजन, जो उनके अधरों पर हँसी ला सके और खेल-खेल में ही कोई जीवनोपयोगी संदेश (उपदेश नहीं) दे दे।
53 साल की संजीदा रचनाकार किरण सिंह बिल्कुल बचपन को जीते हुए कलम को गति दी है। बाल मन तो भगवान से यही मन्नतें माँगता है कि हम पढ़-लिख जायें, सदा मन के सच्चे रहें और छल-कपट से अनजान। बच्चों की तमन्ना होती है कि उनकी कद बढ़े और ऊँचे पद को पा लें, मगर इंसानी गुण बरकार रहे। अभिमान हो, लेकिन स्वभिमान में कभी कोई कमी न आये।
मानवता का पाठ पढ़ें हम
दानवता से दूर रहें हम
दिल का है इतना अरमान
हमको ऐसा दो वरदान
हे भगवान्, हे भगवान।

बच्चों के लिए ‘माँ’ सर्वोपरि है। कितना काम करती हैं माँ, लेकिन थकती नहीं हैं। मैं क्या चाहता हूँ, मेरे कहने से पहले ही माँ जान लेती हैं, समझ लेती हैं। चेहरे की हर भाषा को माँ पढ़ लेती हैं। माँ पढ़ाती हैं, लिखाती हैं, नये-नये सपने दिखाती हैं। जब शरीर थक जाता है, तो माँ सिर को सहलाती हैं। हर मुसीबत में ढाल बन जाती हैं। हर कष्ट को माँ चुपचुप सह लेती हैं, फिर भी मुख से कभी कुछ नहीं कहतीं। सच में, माँ के ममत्व का कोई जोर नहीं है। एक बच्चा का माँ से प्रश्न है-
जादूगरनी हो मम्मी या तुम हो परियों की रानी।
तूफानों में घर की नैया, बोलो कैसे खेती हो।

माँ, पिता और गुरु का हमारे जीवन में विशेष स्थान है। बच्चों की ‘टीचर जी’ क, ख, ग, घ के साथ ही जीवन को संवारने की सीख देती हैं। उदंडता पर दंड, तो डगमगाते पाँवों के भटकाव पर रोक लगाने वाली ‘टीचर जी’ बच्चों की प्रतिभा को नयी ऊँचाइयाँ प्रदान करती हैं। ‘टीचर जी’ बच्चों की ‘नायिका’ हैं, जो सवालों में फँसने और कभी उलझने नहीं देतीं। चुटकी बजाते हल कर देती हैं सारे सवाल।
राहों में हों फूल बिछे या, फिर हों चाहे शूल बिछे।
हाथ पकड़ कर मंजिल तक, हमको पहुँचातीं टीचर जी।

कवयित्री बच्चों को सीख देती हैं कि सुबह उठ जाना है। सूरज अम्बर में उग आया है, किरणें घर-घर में बिखर गयीं हैं। सभी दिशाएँ चहक उठी हैं। धरती का कण-कण फूलों की खुशबू से सराबोर है। ऐसे में अलसाना व्यर्थ है। देर से उठने पर स्कूल की बस छूट जायेगी, फिर टीचर जी की डाँट सुननी पड़ेगी। उठने में आना-कानी करने पर माँ समझाती हैं-
देखो मम्मी बना रही हैं, टिफिन सुबह से उठकर।
सजा रहीं आँखों में सपने, प्यारे-प्यारे बुनकर।

वह बताती हैं कि जीवन का आधार जल है, जिस पर संसार टिका हुआ है। जल की अहमियत है, इसलिए इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। यदि जल समाप्त हो गया, तो भुखमरी बढ़ जायेगी, सृष्टि का अंत हो जायेगा। बच्चों को यदि सीख दी जाये कि पानी अनमोल है, तो निश्चित तौर पर जल की बर्बादी को रोका जा सकता है। कवयित्री बच्चों से कहती हैं-
चलो करो सब शपथ ग्रहण।
जल का करना है संरक्षण।

बच्चों को जरूरी है बताना कि हमें सड़क पर कैसे चलना चाहिए? ट्रैफिक रूल का पालन जरूरी है। यदि हम ट्रैफिक रूल का पालन कर लें, तो दुर्घटनाओं को रोक सकते हैं। कवयित्री बच्चों को ट्रैफिक रूल बताती हैं और इसे कभी नहीं भूलने की अपील करती हैं। बिना कोई सवाल किये लाल बत्ती जलने पर रूकने को कहती हैं। यलो बत्ती जलने पर चलने को तैयार रहने, वहीं ग्रीन लाइट जलने पर चलने को कहती हैं। कहती हैं कि हरदम लेफ्ट को चलो। आगे-पीछे देखकर चलो और कभी भी ओवरटेक न करो।
अलग-अलग रंगों की लाइट,
रूल बताती हमको राइट।

काव्य संग्रह में गाय माता के गुणों का बखान है, तो फलों के राजा आम की चर्चा है। खट्टा हो या मीठा, आम सबका जी ललचा देता है। कच्चे आम की चटनी और आचार को देखकर किसके मुँह से पानी नहीं आता? आम गुणों से भरा हुआ फल है। आम की कई प्रजातियाँ हैं, जिन्हें बच्चों को जानना जरूरी है।
हिम सागर बादामी बीजू,
केसर चौसा लंगड़ा आम।
नाम गिनाऊँ कौन-कौन-सा,
करूँ बड़ाई कितना आम।

बच्चे हठी होते हैं। बच्चे बात-बात पर लड़-झगड़ जाते हैं। हालाँकि छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई नहीं करनी चाहिए। लड़ाई बुरी बात है। हठ भी नहीं करना चाहिए। बड़ों का फर्ज है कि वह बच्चों को बताये कि पटाखे नहीं छोड़ना चाहिए। पटाखों से प्रदूषण फैलता है। पटाखों से हाथ जलने का डर बना रहता है। बच्चों को भारतीय संस्कार की जानकारी दी जानी चाहिए। भारतीय संस्कार में दीया का विशेष महत्व है। दीपावली दीपों का त्योहार है, इसलिए घर-घर को दीया से जगमग करना चाहिए। बच्चों को बताना होगा कि चाइनीज झालरों से अच्छा है मिट्टी का दीया। ऐसी सीख से बाल हठ छूटेगा ही और बाल मन मान जायेगा।
मिट्टी के दीयों से बिट्टू घर को लगे सजाने।
हुआ गगन ज्यों जगमग-जगमग लगा उन्हें भी भाने।

बच्चों के मन को होली बहुत भाती है, लुभाती है। लाल-गुलाबी, नीला और पीला रंग को देखकर बच्चे खुशी से झूम उठते हैं। प्रकृति भी खिल उठती है। चहूँओर बस खुशियों का बसेरा होता है। बच्चों की टोली जमकर होली खेलती है। होली पर्व में पुआ-पकवान, दही बड़ा से लेकर ढेर-सारे व्यंजन खाने को मिलते हैं। ऊँच-नीच का भेद मिटाकर यह पर्व सभी को गले लगाना सिखाता है। क्या अमीर और क्या गरीब?
पड़ी दिलों की गांठें खोली,
प्यार बांटने आई होली।

काश! अपने पास भी पंख होते, तो आकाश में घूमना-फिरना होता। हर बच्चों की यह ख्वाहिश होती है कि काश! पंख होते। आसमान में पंख पसारे चिरैया को देखकर हर बच्चा आकाश में उड़ना चाहता है, चाँद-सितारों से बतियाना चाहता है। ‘पंख पसारे चिरैया’ में कवयित्री का संदेश है कि हम भी उड़ सकते हैं, बस हौसलों की जरूरत है। एक सीख-
उड़ों हौसलों के पंखों से।
नाद करो तुम भी शंखों से।
नहीं असम्भव है कुछ भी गर।
कर्म करोगे पुत्र निरन्तर।

आखिर हताश क्यों होना? निराश क्यों होना? बेकार की बातों से आहत क्यों होना? मन में आगे बढ़ने की ललक हो, तो लक्ष्य को भेदने से कोई रोक नहीं सकता है। हजारों दुआएँ मिलेंगी, बलाएँ हट जायेंगी। हमें बस सतत प्रयास करना है। सतत प्रयास करने से ही सफलता मिल सकती है। हमें थककर बैठना नहीं है। लड़ना है, अड़ना है। आत्मबल को मजबूत बनाये रखना है। कवयित्री कहती हैं-
चाहे हो जितनी दूरी, हो कितनी भी मजबूरी।
चलतो रहो निरन्तर, इच्छाएँ होंगी पूरी।
मन में उमंग भर लो…।हर चीज की अति खराब है। या तो मोबाइल हो अथवा टीवी। लेकिन यह भी सच है कि मोबाइल से दुनिया सिमट गयी है। एक मिनट में हम हजारों मील दूर बैठीं ‘मामीजी’ से बतिया सकते हैं। सोचिए, बंदर के पास यदि मोबाइल नहीं होता, उसका ज्ञान नहीं होता, तो क्या उसकी चाह पूरी होती, वह स्कूल पहुँच पाता? गूगल ने ही तो उसे सही राह दिखायी थी, जब वह रास्ता भटक गया था। मोबाइल का यूज कीजिए, लेकिन मिसयूज नहीं।

जब तुम मुझको मिस करोगी
तब कर दूँगा डाइल,
मैया दे दो मोहे मोबाइल।

बच्चों की सोच में कहाँ कोई भेद है? पिंकी के हाथ में काॅपी और कलम हो, वहीं मुनिया बर्तन माँज रही हो, तो बाल मन प्रश्म पूछेगा ही? माँ भी बाल मन के प्रश्न से खुश हैं, प्रसन्नचित् हैं। पिंकी ने माँ से कहा-मम्मी रूल बदल लो अब, मुनिया बर्तन नहीं धोएगी अब, वह भी पढ़ने जायेगी, उसको भी ड्रेस दिला दो, काॅपी और कलम दे दो, ताकि उसके ख्वाब पूरे हो सके। बाल मन की ऐसी भावना को देखकर माँ का खुश होना लाजिमी है और वह चूमते हुए बिटिया को कहती है-
मुनिया की आँखों में सज गये, नये-नये फिर स्वप्न।

कवयित्री बच्चों को बताती हैं कि अपना देश बहुत प्यारा है। वीरों के संघर्ष के बाद भारत को आजादी मिली है। सीना तानकर और माथे पर कफन बाँधकर देश के नौजवान आजादी की लड़ाई के लिए निकल पड़े थे। अपना खून बहाकर देशभक्तों ने इस माटी की रक्षा की थी। यह हिन्दुस्तान सुंदर है और जग में बहुत प्यारा, जहाँ मानवता सबसे श्रेष्ठ धर्म है। इसे किसी भी सूरत पर विखंडित होने नहीं देना है। राम-रहिम एक हैं, इसलिए मन में द्वेष न हो, क्लेश न हो। कवयित्री की चाहत है-
जाति-धर्म का भेद भुलाकर
मिलें सभी को गले लगाकर
हरा, श्वेत, केसरिया रंग में
रंगा हर परिवेश हो
ऐसा मेरा देश हो।

पहले ही लिख चुका हूँ कि कवयित्री की पहचान संजीदा रचनाकार के रूप में है। ऐसे में उनकी कलम वैश्विक बीमारी कोरोना को नजरअंदाज कर दे, ऐसा कैसे संभव था? कोरोना डरा रहा है, लेकिन विश्वास है कि इसका नाश होगा। कोरोना से बचने के लिए मास्क और दो मीटर की दूरी बहुत जरूरी है। जरूरी है हाथ और मुँह को धोते रहना। जरूरी है लक्षण दिखने पर चिकित्सीय जाँच कराना। कवयित्री बच्चों को बताती हैं-
हाथ मिलाना कभी न अब से।
करो नमस्ते सीधे सबसे।

एक बात है! इस संग्रह से पूर्व कवयित्री की कलम बड़ों के लिए ही लिखती आयी है। बच्चों के लिए यह उनकी पहली कोशिश है। कलम की पहली कोशिश को सलाम करना जरूरी है। अब, कलम से अपेक्षाएँ बढ़ गयीं हैं। कलम से बाल साहित्य की बगिया खिलती रहे, यही अपेक्षा है। सरल शब्दों से रचित कविताएँ बच्चों को पसंद आयेंगी, ऐसा विश्वास है। पर, बच्चे गुल्लक के पैसे से किताब खरीद पायेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। दरअसल, यह पुस्तक थोड़ी महंगी जान पड़ती है लेकिन निराश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि फिलहाल पुस्तक 50% डिस्काउंट पर मिलेगी।

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है ।

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