जलधार

कथा की जल धार में मैं भीगी जा रही हूँ। मेरा अन्तर्मन डूबकर रोमांचित हो रहा है तो मेरी आत्मा में स्निग्ध सिहरन सी पैदा रही है। मति नतमस्तक है लेखनी की स्वामिनी को पढ़ कर और सोच रही है कि अवश्य ही इस महा लेखिका की प्रतिभा को पहचानकर स्वयं ब्रम्ह ने ही इन्हें लेखनी भेंट की होगी । और कभी-कभी संशय हो रहा है कि लेखिका कहीं स्वयं सरस्वती की अवतार तो नहीं ? मेरी भावनाएँ प्रबल हो रही हैं कुछ शब्द सुमन अर्पित करने को और मेरी लेखनी सयास उस जलधार को अपनी अंजुरी में भर कर अर्पित करने का प्रयास कर रही है पद्मश्री तथा भारत भारती जैसे सम्मानों से अलंकृत परम आदरणीया उषा किरण खान दी की बेहतरीन कहानियों का संग्रह जलधार को।

जल की धारा से चित्रित खूबसूरत आवरण में जिसमें परम् आदरणीया लेखिका का दैदिप्यमान चित्र है।
116 पृष्ठों में संकलित इस संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं।
पुस्तक की पहली कहानी है स्वास्तिक, जिसका नायक सतीश अपनी ही कई सारी बहनों का इकलौता भाई है ऊपर से ममेरी, चचेरी, फुफेरी बहनों के राखी का बंधन उसे उबाऊ लगता था। लेकिन समय ने सतीश का समय बदल दिया और वह अच्छे पद पर कार्यरत हो गया। अचानक एकदिन यात्रा के दौरान उसे अपनी फुफेरी बहन कांति से मुलाकात हो गई जिसके गरीब भाई पर तरस खाकर एक बेरोजगार लड़के ने अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ उससे विवाह कर लिया। इस बात पर सतीश कांति के भाई कौशल को खरी – खोटी भी सुनाई कि यदि लड़के को नौकरी नहीं मिली और उसके माता-पिता भी अपने घर में रखने से इंकार कर देंगे तो क्या होगा।
लेकिन कांति किस्मत की अच्छी रही कि लड़के को नौकरी मिल गई और उसकी गृहस्थी की गाड़ी उसके पति के प्यार और सम्मान के इंधन से सकुशल चल रही थी…… इस कहानी में बहुत ही खूबसूरती से रिश्तों के सकारात्मक पहलू को दिखाया गया है जिसके सामने भौतिकता बौनी नज़र आती है ।
संग्रह की दूसरी कहानी छुअन जीवन संध्या की वेला में अपनों से दूर धनाढ्य बुजुर्ग की कहानी है जिसके बेटे विदेश में बसे हुए हैं। बच्चों की बेरुखी से हताश अपना घर बेचकर अपनापन की तलाश में अपने भाई के पास जाना चाहते हैं लेकिन भाई ने उनका दायित्व बोध कराकर उनके जीवन को नई दिशा दे दी। यह कहानी निराशा की गहन तिमिर में आशा की ज्योति जलाती है।
संग्रह की तीसरी कहानी सुर्योदय पूर्णतः ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई कहानी है जिसमें अपने टंडेल की पत्नी का इलाज़ करवाने के पुण्य के बदले मोहन बाबू को पूरा गाँव तो संदेह की दृष्टि से देखता ही है साथ ही उनकी पत्नी भी इस संदेह के रोग से मुक्त नहीं हो पाती…. अन्ततः सकारात्मक सुर्योदय होता है।

संग्रह की चौथी कहानी उसके बिना एक वृद्ध विधुर की कहानी है जिसे बहुत ही खूबसूरती और मार्मिक ढंग से लिखा गया है।
संग्रह की पाँचवी कहानी वह एक नदी एक अलग तरह की कहानी है जिसमें माँ की बदचलनी का दंश बेटी झेल रही है। किंतु उसकी माँ की बचपन की सहेली एक पत्र के माध्यम से उसे समझाती है कि वह( तुम्हारी माँ) एक नदी है उसके प्रवाह को रोकने की चेष्टा मत करो।

संग्रह की छठी कहानी तुम ही भारत हो एक सच्चा, पवित्र और निश्छल प्रेम कहानी है। या यूँ कहें कि पुरुष और स्त्री के मध्य एक सच्ची मित्रता की कहानी है जिसमें भारतीय परिवेश के पुरुष का अपने परिवार के लिये सच्चे मन से की गई सेवा, श्रम और त्याग को दिखलाया गया है। नायिका नायक के दर्द को महसूस करके आहत है और वह उसके लिये उसके परिवार को भी भला-बुरा कह देती है। जिसपर नायक उसे ही भला-बुरा कह देता है। काफी अन्तराल के बाद पुनः मिलन होता है और नायिका उसके त्याग के लिए उसे तुम ही भारत हो कहकर विभूषित करती है।

संग्रह की सातवीं कहानी हँसी – हँसी पनवा खियओले बेइमनवा पूर्णतः बिहार के ग्रामीण परिवेश के सफेदपोश मुखिया की कहानी है जिसके कुकर्मो का बदला उसी के अंदाज में उसका अंत करके लिया जाता है। यह कहानी बहुत ही रोचक, कौतुहल पूर्ण व मार्मिक है जिसको पढ़ते हुए मन कहानी में पूरी तरह से डूब गया।

संग्रह की आठवीं कहानी तुम बिन अखुवन बिकल मुरारी एक अविवाहित स्त्री की बहुत ही खूबसूरत प्रेम कहानी है। इसमें नायिका सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भी भी अपनी माँ की अतिमहत्वाकांक्षा की वजह से अविवाहित रह जाती है। अपने मन पर अंकुश लगाने के बाद भी उसे एक विवाहित पुरुष से प्रेम हो जाता है। पुरुष उससे विवाह करके उसे पूर्ण करना चाहता है लेकिन वह अपने मन पर पत्थर रख मना कर देती है।

इस प्रकार उजास, अनजाना पहचाना सा तथा नौनिहाल भी काफी रोचक तथा तथा कौतुहल पूर्ण तथा प्रवाहमयी कहानी है जिसे पढ़ते हुए पाठक का चित्त एक क्षण के लिए भी इधर-उधर नहीं भटकेगा।
हाँ कहानी पढ़ते हुए वर्तनी की अशुद्धियाँ खली जरूर लेकिन इसके लिए सीधे-सीधे प्रकाशन विभाग दोषी है।
इस संग्रह की विशेषता यह भी है कि संग्रह की सभी कहानियों के परिदृश्य को इतनी खूबसूरती और सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है की पढ़ते हुए पाठक के आँखों के सामने वह देशकाल दिखने लगता है । कहानी के प्रत्येक पात्र अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं जिसे पढ़ते हुए मन सोचने पर विवश हो जाता है।
इसके लिए महान लेखिका परम् आदरणीया उषा किरण खान दीदी की कलम को शत् शत् नमन करते हुए उन्हें सादर बधाई देते हैं और कामना करते हैं कि आगे भी हमें उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता रहे

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – जलधार
लेखिका – उषा किरण खान
प्रकाशक – शिवना प्रकाशन

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है ।
http://www.amazon.in/dp/B08LNTY1VY
Ushakiran Khan Ushakiran Khan

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