मुखरित संवेदनाएं – संस्कारों को थाम कर अपने हिस्से का आकाश मांगती स्त्री के स्वर

लेखिका एवम कवयित्री किरण सिंह  जी का प्रथम काव्य संग्रह “मुखरित संवेदनाएं” का दूसरा संस्करण अभी कुछ समय पहले ही आया है | इस संस्करण में कुछ नयी कविताएँ हैं और कई पुरानी कविताओं को उन्होंने पहले से अधिक परिष्कृत रूप में प्रस्तुत किया है | ये परिष्कार उनके लेखन में परिष्कार का ही स्वरूप प्रस्तुत करता है | मुखरित संवेदनाएँ का पहला संस्करण किरण सिंह जी की  पहली पुस्तक भी रही है| क्योंकि मैंने दोनों संस्करण पढ़ें हैं | तो तुलनात्मक रूप से कहूँ तो जहाँ पहला संस्करण पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था कि एक किशोर मन वो सब कहना चाहता है जो ग्रहस्थी के झमेलों और उम्र के बढ़ते परदों के मध्य अनकहा रह गया था |वहीं इस संस्करण को पढ़कर लगा कि किशोर-युवा मन की भावनाएँ अनुभव की चाशनी में पककर ज्यादा सौंधी हो गई हैं |

शुरुआत करती हूँ संग्रह के पहले अंश “अपनी बात से” जैसा की किरण जी ने लिखा है की छोटी उम्र में ही पिताजी द्वारा थमाई गई डायरी में अपने स्कूल, शिक्षकों, रिश्ते -नातों पर कलम चलाना आरंभ कर दिया था| पर  विवाह व् घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों  में वो भूल ही गयी की उनके अन्दर जाने कितनी कवितायें साँस  ले रही हैं | जो जन्म लेना चाहती है | जब बच्चे उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए तो कांपते हाथों से उन्होंने  पुन: कलम थामी तो उदेश्य निज तक नहीं रह गया बल्कि कलम के माध्यम से  उस बेचैनी का समाधान ढूंढना था जो हर रचनात्मक व्यक्ति अपने अन्दर महसूस करता है | और सामाजिक कुरीतियों, भ्रस्टाचार और दबे-कुचले लोगों  के संघर्षों को के प्रति अपनी कलम का उत्तरदायित्व समझा |
संग्रह की भूमिका “अंतस का सत्व”में जितेंद्र राठौर जी लिखते हैं ..
हर कोशिश है एक बगावत
वरना जीसे सफलता,असफलता कहते हैं
वह तो बस हस्ताक्षर हैं
कवयित्री किरण सिंह का संग्रह सच पूछिए तो इनकी एक कोशिश ही नहीं एक मुखर बगावत है | एक ऐसी बगावत जो जाने-अनजाने पथरीली जमीन तोड़कर  मिट्टी में तब्दील करती हुई जगह -जगह फैले हुए रेगिस्तान को सींचने  का काम करती है |
इस संग्रह को पढ़ते हुए उनकी प्रथम कविता “किस पर  लिखूँ मैं ?” से  “देखो आया डोली द्वार” एक कवयित्री के कलम थाम कर कुछ लिखने की ऊहापोह से गहन आध्यात्मिक भाव तक पहुँचने की विकास यात्रा सहज ही परिलक्षित होती है | जहाँ “किस पर लिखूँ मैं” असमंजस है कि जब मन में इतना कुछ एक साथ चल रहा हो तो एक विषय का चयन कितना दुष्कर हो जाता है |वहीं “देखो आया डोली द्वार” आत्मा सुंदरी और परमात्मा के मिलन की के मिलन पर छायावाद का प्रभाव सपष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है | 

इस पुस्तक में किरण जी ने अपनी 136 संवेदनशील रचनाओं को चार अध्याओं (भक्ति-आध्यात्म,नारी संवेदना के स्वर,युग चेतन ऐवम उदबोधन व  ऋतु रंग) में विभाजित किया है |

भक्ति आध्यात्म
                                           काव्य संग्रह के प्रथम खंड भक्ति व आध्यात्म को समर्पित है | इस खंड में में अपने हिस्से का आसमान मांगने वाली और समाज की कुप्रथाओं से लड़ने वाली कवयित्री एक भावुक पुजारिन में तब्दील हो जाती है | जहाँ वो और उसके आराध्य के अतरिक्त कोइ दूसरा नहीं है | न जमीन न आसमान न घर न द्वार | यहाँ पूर्ण  समर्पण  की भावना है | भक्ति रस में डूबे ये गीत आत्मा को आध्यात्म की  तरफ मोड़ देते हैं |

मन है चंचल भर दे साधना,
कर जोड़ करूँ सुन ले प्रार्थना ||
एक अन्य कविता शत-शत नमन में वो कहती हैं ..

जाति  धर्म में हम उलझ कर
मिट रहे आपस में लड़ कर
क्यों नहीं तुम आते लेकर
शांति चैन और अमन
पुरुषोत्तम राम आपको शत – शत नमन

नारी संवेदना के स्वर
                                   मुखरित संवेदनाएँ का  दूसरे व् प्रमुख खंड  “नारी संवेदना के स्वर” हैं ||इसमें 48 कविताएँ हैं | इस खंड की कविताओं में मुख्य रूप से उस स्त्री का अक्स दिखाई देता है जो हमारे देश के छोटे शहरों, गांवों और कस्बों से निकल कर आई है | जो महानगरों की स्त्री की तरह पुरुष विरोधी नहीं है | या यूँ कहिये वो मात्र विरोध करने के लिए विरोध नहीं करती | वो पुरुष से लड़ते – लड़ते पुरुष नहीं बनना चाहती है | उसे अपने  स्त्रियोचित गुणों पर गर्व है | चाहें वो दया ममता करुणा  हो या मेहँदी चूड़ी और गहने वो सब को सहेज कर आगे बढ़ना चाहती है | या यूँ कहें की वो अपनी जड़ों से जुड़े रह कर अपने हिस्से का आसमान चाहती है | वो अपने पिता पति और पुत्र को कटघरे में नहीं घसीटती बल्कि  सामाजिक व्यवस्था  और अपने ही कोमल स्वाभाव के कारण स्वयमेव अपना प्रगति रथ रोक देने के कारण उन्हें दोष मुक्त कर देती है | वो कहती है ………..

क्यों दोष दूं तुम्हे
मैं भी तो भूल गयी थी
स्वयं
तुम्हारे प्रेम में
                  आज स्त्री विमर्श के नाम पर  जिस तरह की स्त्री का स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है यह उससे भिन्न है | जिस  तरह से स्त्री बदले की भावना की ओर बढ़ रही है, लिव इन या बेवफाई से उसे गुरेज नहीं है | वो पुरुषों से कंधे से कंधा  मिला कर चलने में यकीन नहीं करती बल्कि सत्ता पलट कर पुरुष  से ऊपर हो जाना चाहती हैं | जिस को पढ़ कर सहज विश्वास नहीं होता | क्योंकि हमें अपने आस – पास ऐसी स्त्रियाँ नहीं दिखती | हो सकता है ये भविष्य हो पर किरण जी की कवितायें आज का यथार्थ लिख रही हैं | जहाँ संवेदनाएं इतनी इस कदर मरी नहीं हैं |  किरण जी की कवितायें एक दबी कुचली नारी के स्वर नहीं है | वो अपने हिस्से का आसमान भी मांगती हैं पर प्रेम और समन्वयवादी दृष्टिकोण के साथ ……….

भूल गयी थी तुम्हारे प्रेम में अपना
अस्तित्व
और निखरता गया मेरा
स्त्रीत्व
खुश हूँ आज भी
पर
ना जाने क्यों
लेखनी के पंख से उड़ना चाहती हूँ
मुझे मत रोको
मुझे
स्वर्ण आभूषण  नहीं 
आसमान चाहिए
—————————
यहाँ  कुछ रूढ़ियों के प्रति विरोध भी है ..
क्या गुनाह करती हैं बेटियाँ
कि कर दिया जाता है कन्यादान
बड़े चाव  से गयी थी वो
हल्दी की रस्म में
और सास ने कहा
रुको
सिर्फ सुहागनों के लिए है ये रस्म
क्यों क्रूर रीतियाँ
सिर्फ स्त्रियों के लिए ही हैं ?

युग चेतना एवं उद्बोधन
                                         वो कलम ही क्या जो समाज के लिए न चले | कवि का निज भी समष्टि में समाहित होता है | काव्य संग्रह का तीसरा खंड “युग चेतना ऐवम उदबोधन”  इस खंड में उनकी आत्मा की बेचैनी व् समाज के लिए कुछ करने की चाह स्पष्ट रूप से झलकती है | अपने परिवार के उत्तरदायित्व के साथ -साथ समाज के लिए कुछ करने का उत्तरदायित्व भी लेखनी पर होता है |जिसे किरण जी ने बखूबी निभाया है |

सीख लें हम बादलों से
किस पर गरजना है
किस पर बरसना है
किसको दिखाना है
किसको छुपाना है

और ………..

पीढा चढ़ कर ऊंचा बन रहे
आत्म प्रशंसा आप ही कर रहे
झाँक रहे औरों के घर में
नहीं देखते अपनी करनी
सूप पर हंसने लगी है चलनी

ऋतु-रंग
                                      काव्य संग्रह के अंतिम खंड ऋतु रंग है | इसमें 23 कविताएँ हैं | प्रभात कालीन सूर्य, बरसते मेघ, संध्या को घर वापस लौटते पक्षियों का कलरव और ऋतुओं के अनुसार अपना शृंगार परिवर्तित करती वसुंधरा के अनुपम सौन्दर्य को किरण जी की लेखनी ने शब्दों में जीवंत कर दिया है |

” खबरिया सत्य स्वप्न बलवंत
पिया कहीं तुम ही तो नहीं बसंत “
छलके नभ से मधुरस की गगरी
भीगें गाँव और झूमें नगरी
मन मेरा भी ना जाने क्यों
झूम जाना चाहता है
आज फिर से मन मेरा भीग जाना चाहता है |

                                              अंत में यही कहना चाहूँगी की किरण जी का यह पहला काव्य संग्रह है  जिसमें उन्होंने घर की दहलीज लांघ कर बाहर की दुनिया के सामने मुखर होने का साहस दिखाया है | इसी कारण  इसमें जहाँ एक ओर मिटटी और भावनाओ की भीनी भीनी  सुगंध है | शायद इसीलिए  देश की ८० % महिलाओ की भावनाओ को स्वर देती है “मुखरित संवेदनाएं”  भाव और शब्द  पक्ष बेहद मजबूत है| कविताओं में कमनीय कोमलता है | साहित्य में दिनों -दिन पुष्पित पल्लवित होती किरण जी को उनके प्रथम काव्य संग्रह के द्वितीय संस्करण के लिए बधाई |
मुखरित संवेदनाएँ -कविता संग्रह
कवयित्री -किरण सिंह
प्रकाशक – जानकी प्रकाशन
पृष्ठ -139
मूल्य -400 (हार्ड बाउन्ड ) फिलहाल अमेजन पर पचास प्रतिशत डिस्काउंट पर सिर्फ 200 में फ्री शिपिंग उपलब्ध है ।

समीक्षा -वंदना बाजपेयी

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