उत्कृष्ट बाल साहित्य साधना के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान ( उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान 2019)से सम्मानित किरण सिंह से लेखिका पूनम आनंद की बातचीत।

किरण

सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मझौआं गांव में 28 दिसबंर, 1967 को हुआ। इनके पिताजी स्व श्री कुन्ज बिहारी सिंह की शुमार अच्छे एडवोकेट के रूप में होती थी। माताजी दमयंती देवी कुशल गृहिणी थीं। इनके पति भोलानाथ सिंह एसबीएपीडीसीएल के पूर्व डीजीएम हैं। इनकी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर बलिया में हुई। तत्पश्चात उन्होंने गुलाब देवी महिला महाविद्यालय, बलिया (यूपी) से स्नातक की शिक्षा प्राप्त कीं। संगीत में भी किरण सिंह की गहरी अभिरुचि रही है। इन्होंने संगीत के क्षेत्र में संगीत प्रभाकर ( सितार ) की उपाधि हासिल की हैं। किरण सिंह की सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिसमें मुखरित संवेदनाएं ( काव्य संग्रह ) 2016, प्रीत की पाती ( काव्य संग्रह) 2017, अन्त: के स्वर ( दोहा संग्रह ) 2018, प्रेम और इज्जत ( कथा संग्रह ) 2019, गोलू – मोलू ( बाल कविता संग्रह) 2020, श्री राम कथामृतम् ( बाल खण्ड काव्य) 2020 एवं दूसरी पारी का – ( आत्मकथ्यात्मक संस्मरण संग्रह ) सम्पादन 2020 शामिल हैं।

लेखन विधा – बाल साहित्य, गीत, गज़ल, छन्द बद्ध तथा छन्मुक्त पद्य, कहानी, आलेख, समीक्षा, व्यंग्य !
सम्मान – 1-2019 में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन से साहित्य सेवी सम्मान,
2-उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान (2019)
2-नागरी बाल साहित्य सम्मान ( 2020)

प्रश्न 1-इतने अन्तराल के बाद ऐसा क्या हुआ कि आपकी कलम लेखन के लिए उतावली हो गई।

उत्तर – सामाजिक विसंगतियाँ, रिश्तों के उतार चढ़ाव, लोगों के छल प्रपंच की वजह से जब मन में विरक्ति का भाव पनपने लगा तब चिंतन-मनन के फलस्वरूप आत्मसाक्षात्कार हुआ, भावनाएँ मचल उठीं, संवेदनाएँ मुखर हो उठीं और मेरी कलम चल पड़ी। और तब कविता ने जन्म लिया।

2-आपकी रचनाओं को सराहना कैसे मिली?

जब मैं फेसबुक पर यूँ ही शौकिया तौर पर अपनी रचना पोस्ट कर दिया करती थी तो लाइक्स और कमेंट्स के माध्यम से फेसबुक फ्रेंड्स की सराहना मुझ तक पहुंचती थी और अब रचनाएँ प्रकाशित होने के बाद ईमेल के जरिये।

3-आपके कलम को ताकत कब मिली?

जब उसे सम्पादकों ने प्रकाशित किया . दूरदर्शन केंद्र तथा आकाशवाणी केन्द्र ने रचनाओं का प्रसारण किया, राजभाषा विभाग पटना ने मंच से प्रस्तुति का अवसर दिया तो उसे पढ़कर तथा देख-सुनकर पाठकों, श्रोताओं तथा दर्शकों से जो सराहना मिली उसी की बदौलत मेरी कलम को ताकत मिली। साथ ही सकारात्मकता के साथ की गई आलोचना भी मेरी कलम को चुनौती देकर धार दे दी ।

4-आपकी शिक्षा में संगीत विषय रहा है, और आपकी पहचान साहित्य में बंन रही है, इस पर कुछ कहेगी?

हिन्दी , संगीत और मनोवैज्ञानिक विषय से मैंने स्नातक किया है । यह तीनों विषय साहित्य के लिये महत्वपूर्ण हैं।

5-लेखन में किस विषय को आप अपना मुद्दा बनाती हैं?

जब जो विषय दिल की गहराई में उतर गया और अंतरात्मा को झकझोर दिया उस विषय को लिखने के लिए मेरी कलम अनायास ही चल पड़ती है।

6-महिला लेखक होने के कारण कोई परेशानी या सहायता के उल्लेख आप पाठकों से करना चाहती है तो उसे बतायें?

घर हो या बाहर महिला लेखिकाओं को बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। चूंकि कोई भी साहितकार शुरुआत में ही प्रसिद्धि नहीं पा लेता – इसलिए जब वो लिख रही होती हैं तो घर के अन्य सदस्यों को लगता है कि ये फालतू काम कर रही हैं। अतः उन्हें गैरों की तो छोड़िये अपनो का भी उपहास झेलना पड़ता है।
औरतों के लिए सबसे मुश्किल होता है प्रेम विषय पर कलम चलाना।

7-आप एक गृहणी है, आपने लेखन और गृहस्थी में सामंजस्य कैसे बैठाया?

गृहस्थी मेरी पहली प्राथमिकता रही है। हमेशा मैं खाली समय में ही लिखती – पढ़ती हूँ ।हाँ कभी-कभी मनमौजी भावनाएँ कभी भी आ जाती हैं तो उस वक्त मैं अपने मोबाइल में उन भावनाओं को नोट कर लेती हूँ और बाद में विस्तार देती हूँ।

8-कहते है प्रतिभा लाख छुपा ले छुपती नहीं है? आप इस खड़ी उतर रही है, आपका क्या कहना है?

अगर सोशल मीडिया न होता तो आज भी मेरी प्रतिभा छुपी ही रहती।

9-स्त्रियाँ हुनरमंद होती है जन्मजात और कुछ सीखने -सीखाने की कला उन्हें ऊंचाई देती है। लेकिन, लेखन की कला इससे हटकर है ।आप अपने विचारों के नजरिया से कुछ कहे?

निश्चित तौर पर लेखन अपने अन्दर से आता है लेकिन लेखन की विधाओं को सीखना जरूरी हो जाता है। कुछ साहित्यिक कार्यशालाएँ ( आनलाइन व आफलाइन) सराहनीय कार्य कर रही हैं। वैसे यदि किसी में सीखने की ललक हो तो गूगल पर सबकुछ उपलब्ध हो जाता है।

10 साहित्यक गुरू के रूप में आपके प्रेरणा के स्तंभ का श्रेय आप किसे देंगी?

माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी को – क्योंकि उन्होंने ही बालसाहित्य सृजन प्रत्येक साहित्यकार की नैतिक जिम्मेदारी है जैसा गुरुमंत्र देकर मुझे बाल साहित्य सृजन के लिए प्रेरित किया।

11-पुरस्कारों और सम्मान के प्रति आपका क्या नजरिया है?

पुरस्कार और सम्मान निश्चित ही उत्साहवर्धन करते हैं। किन्तु जिस प्रकार आज पुरस्कारों और सम्मानों की खरीद बिक्री हो रही है वह विडम्बना है।

12 बाल साहित्यकार के सम्मान में सुभद्रा कुमारी चौहान ‘से आपको सम्मानित किया गया है। अपने उस अनमोल अनुभव को बताये?

अभिभूत हूँ ।सच कहूँ तो इस सम्मान की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह सब सिर्फ ईश्वरीय कृपा, माता-पिता एवं गुरुजनों की शिक्षा एवम् आशिर्वाद, मेरे स्नेहिल एवम् सम्मानित मित्रों, भाई – बहनों तथा पाठकों के स्नेह व शुभकामनाओं की बदौलत ही सम्भव हो पाया है।

13-आपकी योजनाएं साहित्य में क्या है?

अबतक तो मैं बिना योजना के ही जब जो जी में आया मौसम स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार भावनाओं को शब्दों में पिरोती आई और पाठकों की सराहना व प्रोत्साहन पाती रही – लेकिन इतना स्नेह व सम्मान पाकर साहित्य के प्रति मेरी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। अब लगता है कि, मुझे योजना बनानी पड़ेगी। वैसे जल्द ही मेरी पुस्तक रहस्य ( कथा संग्रह ) अंतर्धवनि (कुंडलिया संग्रह) शगुन के स्वर (विवाह गीत संग्रह) व लहरों की लय पर गीत ग़ज़ल संग्रह आ रहा है। एक लघुकथा संग्रह के लिए भी लघुकथाएँ लगभग तैयार हो गई हैं। एक उपन्यास का कथानक तैयार है शीघ्र ही शुरू करूंगी। कुछ बड़े महान साहित्यकार हैं जिनकी जीवनी भी लिखूंगी। उसके बाद मैं किसी ऐतिहासिक चरित्र पर खण्ड काव्य और यदि माँ शारदे की कृपा हुई तो महाकाव्य भी रचना चाहती हूँ। साथ ही मैं उन तमाम स्त्रियों को साहित्य से जोड़ना चाहती हूँ जिनकी कलम प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी रुक गई है।
और सबसे जरूरी कार्य जिसके लिए मुझे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान बालसाहित्य संवर्धन योजना के तहत सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान 2019 के लिए 2021 में मिल रहा है उसके लिए पूरी निष्ठा और इमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए बाल साहित्य को समृद्ध करती रहूंगी।

14 – नवोदित रचनाकारों को अब क्या संदेश देना चाहेंगी?

1-अपने मन में नकारात्मक भावों को न आने दें।
2-औरों की सुने किन्तु अपने मन की करें क्योंकि आप अपने जज स्वयं हैं।
3-कर्म करें और फल की इच्छा न करें। इसका तात्पर्य यह है कि आप लेखन करते रहें और उसे प्रकाशन हेतु भेजते रहें। यदि प्रकाशित नहीं हो रहा है तो हतोत्साहित न हों बल्कि उसे कहीं और भेजें और अपना लेखन जारी रखें – क्योंकि मेरा मानना है कि आज नहीं तो कल फल मिलता ही है। बसर्ते हम इमानदारी से अपना कर्तव्य निभायें।
4-लिखने के साथ – साथ अच्छा साहित्य पढ़ते भी रहें क्योंकि इससे आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
5-लेखन एक साधना है इसलिए चिंतन मनन के लिए एकाग्रता अनिवार्य है। अतः साहित्यिक समारोहों और चिंतन मनन के समय में संतुलन स्थापित करके रखें।

3 विचार “उत्कृष्ट बाल साहित्य साधना के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान ( उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान 2019)से सम्मानित किरण सिंह से लेखिका पूनम आनंद की बातचीत।&rdquo पर;

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