गोलू – मोलू


सरल, सहज, सुबोध, सरस एवं शिक्षाप्रद बाल कविताएँ
प्रभात कुमार राय
कृति: गोलू – मोलू ( बाल कविता- संग्रह )
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशक: जानकी प्रकाशन, नई दिल्ली- पटना
पृष्ठ: 48 मूल्य : रू• 150
समीक्षक: प्रभात कुमार राय
मो• 9934083444
यह महज संयोग है कि कवयित्री द्वारा रचित बाल- कविता-संग्रह की समीक्षा लिखते वक्त ही यह आहलाद्कारी समाचार मिला कि उन्हें लखनऊ उ•प्र• हिन्दी संस्थान के बाल साहित्य संवर्धन योजना के अंतर्गत सुभद्रा कुमारी चौहान बाल साहित्य सम्मान से नवाजा गया है। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भी हाल ही में उन्हें उत्कृष्ट रचनाओं के लिए सम्मानित किया है । कवयित्री की यह अद्यतन पुस्तक महान साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी द्वारा साहित्यिक चर्चा के दरम्यान वर्णित एक प्रेरक वाक्य – ‘ बाल साहित्य सृजन प्रत्येक साहित्यकार का नैतिक कर्तव्य होता है’ – की देन है। इसे सूत्रवाक्य की तरह अपनाकर कवयित्री के सत्प्रयास का समीक्ष्य पुस्तक एक सुन्दर फल है । माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अपने पुरोवाक् में बाल साहित्य साधना को ईश्वरीय आराधना की संज्ञा दे डाला है ।
हिंदी बाल साहित्य लेखन की परंपरा प्राचीन एवं समृद्ध है । हाल मे कॉमिक्स तथा अंग्रेजी विद्यालयों में तुकबंदी वाली लघु कविताओं आदि के प्रति झुकाव के कारण इस साहित्य के अभिवर्धन की गति धीमी हो गयी है । विश्व कवि रवीन्द्रनाथ की बाल- कविताएँ मशहूर है । पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों में अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ‘ हरिऔध ‘, कामताप्रसाद गुरू, राम नरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चौहान, सोहन लाल द्विवेदी, रामधारीसिंह दिनकर एवं आरसी प्रसाद सिंह प्रभृति साहित्यकारों की बाल- कविताएँ बच्चों का कंदहार बन गयी थी। मुझे अपने बाल्यकाल में दिनकर जी का ‘ सूरज का व्याह ‘, ‘मिर्च का मजा ‘, ‘ चित्तौड़ का साका’ तथा आरसी जी का ‘ सोने का झरना’, ‘ कलम और बंदूक ‘, ‘ कागज की नाव’ आदि बाल कविता-संग्रहों को पढ़ने का सौभाग्य मिला । निस्संदेह इन कविताओं ने मेरी कल्पनाशीलता को नया आयाम दिया तथा साहित्य- बोध एवं महत्वपूर्ण सीखें भी दीं।
इस पुस्तक के आरंभ में सरल एवं सरस शब्दों में प्रार्थनाएं हैं जो सदाचार , निष्कपटता एवं विवेकशीलता की पाठ पढ़ाते हैं, वहीं अंत में राष्ट्र- भक्ति से ओत-प्रोत उत्साह, उमंग, गौरव और शौर्य का संचार करनेवाली कविताएँ हैं। कवयित्री की बाल- कविताएँ सिर्फ मनोरंजन या साहित्यिक चेतना को जगाने के निमित्त ही नहीं हैं वरन् उपदेशात्मक और जीवन- दर्शन के यथार्थ को भी स्वर देती है । राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी सपाटबयानी में लिखा है : ‘ केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए/ उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए’/। पर उपदेश या चरित्र-निर्माण संबंधित हिदायतें अगर आदेशात्मक शैली में कही जाती है तो बच्चों के कोमल मस्तिष्क इसे सहज ग्रहण नहीं कर पाते। इसलिए मनोरंजन के मर्म में शिक्षण को पिरोया गया है ताकि बालक अनायास उन्हें अपने स्वभाव और आदतों में डाल सकें । कवयित्री द्वारा कड़वी दवा के घूंट को मधु-मिश्री में घोलकर कंठ के नीचे उतारने का प्रयास रोचक एवं कुशलतापूर्वक किया गया है। जल-संचय, पर्यावरण-संरक्षण, स्वास्थ्य संबंधी हिदायतें, ट्रैफिक सुरक्षा नियमों का अनुपालन, कोरोना महामारी को मात देने के लिए सावधानियाँ आदि ज्वलंत मुद्दों को बड़ी ही सूक्ष्मता से सहज प्रवाह में गेय कविताओं द्वारा व्यक्त किया गया है जिनसे नन्हे-मुन्हे उन्हें झूम-झूम कर गायेंगे और जीवनोपयोगी संदेश को ग्रहण करेंगे ।
सर्वधर्म समभाव के मर्म को भावी कर्णधारों के कोमल हृदय में उकेड़ने का कवयित्री का प्रयास स्पृहणीय है:
‘आस-पास हो मंदिर-मस्जिद/ द्वेष रहे न मन में सिंचित’/
‘एक तरफ हो अल्लाह- अकबर/ सम्मुख विष्णु महेश हों’/
‘चलो सुनाते हूँ मैं कहानी/ एक राम रहीम एक है/ एक सीख हर धर्म की’/
जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव को त्यागने और ऐक्य की भावना जागृत करने के लिए कवयित्री बच्चों को सिखलाती है:
‘ तोड़ दो दीवारें जाति-धर्म की/ हम रहेंगे साथ मिलकर ए वतन’/
बाल कविता-संग्रह में बच्चों के सर्वाधिक प्रिय फल आम का जिक्र स्वाभाविक है ।कवयित्री की ये पंक्तियां:’ खट्टा-मीठा ताजा आम,/सबका जी ललचाता आम/ हिमसागर बादामी बीजू,/ केसर चौसा लंगड़ा आम’/
ये पंक्तियां कविवर आरसी प्रसाद सिंह की निम्न बाल-कविता के भाव को व्यंजित करती प्रतीत होती है:
‘ आमों के हैं नाम हजारों, सभी रसीले, सब सुंदर ।
कृष्णभोग, सिन्दुरिया, फजली, चंपा-दुधिया हिम-सागर’।
बच्चों का स्कूल जाने से कतराना जग-जाहिर है । कवयित्री ने लिखा है: ‘ बस जायगी छूट स्कूल की,/ अगर करोगे देरी/ हो जाओ तैयार फटाफट, बात मानकर मेरी’/ अपनी ‘ रविवारी प्रार्थना’ कविता में आरसी जी ने लिखा है: ‘ हे प्रभो ! प्रत्येक दिन को/ तू मधुर रविवार कर/ और दिन की हर घड़ी में , खेल का संचार कर’/
अत्यधिक कल्पना-प्रधान होने के कारण काल्पनिक कविताएँ, कथा व कहानियों बालकों को अधिक प्रिय होती हैं । कल्पना शक्ति के अधिक तीव्र होने के कारण वे बिल्ली, मेढक, बंदर आदि को भी मनुष्यों की तरह बात-चीत और व्यवहार करनेवाला समझ लेते हैं । कवयित्री ने ऐसी कविताओं का सृजन कर बच्चों की कल्पना को कुलांचे प्रदान की है । आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों एवं उपादानों जैसे मोबाइल, फेसबुक (मुखपोथी),फोटो का स्टाइल आदि के बारे में चर्चा वर्तमान पीढ़ी के बालकों को विशेषकर भायेगा ।
ऐसा माना जाता है कि बच्चों के मन को समझ पाना अतल अंधकारयुक्त समुद्र में गोता लगाकर मोती खोजने के समान अत्यंत कठिन है । श्रेष्ठ बाल-गीत के लिए बाल-स्वभाव का पर्याप्त ज्ञान परमावश्यक है ।बच्चों के मन में किन परिस्थितियों में कैसी भावनाएं उदित होती हैं, कब कैसी-कैसी कल्पनाएं करते हैं, अनुकरण की प्रवृत्ति, अपरिमित जिज्ञासा आदि को गहराई से समझना जरूरी है । तभी गुणवत्तापूर्ण बाल-कविता की रचना संभव है । बालकों को कैसी रचनाएँ प्रिय लगती है और अपने लिए कैसे विचार पसंद करते हैं, यह तो बालक बनकर उनके हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ अपने मनोभावों का स्पंदन मिलाकर ही अनुभव किया जा सकता है । पुस्तक के आरंभ में ‘ एक चिट्ठी बच्चों के नाम’ में कवयित्री ने लिखा है : ‘ ॰॰॰॰ क्यों न मैं आपसे दोस्ती कर लूं । क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगे ?’ पूरी पुस्तक में कवयित्री की भूमिका पाठशाला की शिक्षिका की नहीं वरन् समकक्ष वरिष्ठ दोस्त की है । वस्तुतः बाल-साहित्य को परिचय तो उसकी बाल-प्रकृति में मिलता है । जहां बाल-मनोभाव है, वहीं असली बाल-साहित्य है ।
हिंदी साहित्य के धूमकेतु एवं जनकवि आरसी प्रसाद सिंह ने बाल साहित्य की महत्ता एवं गुणवत्ता को रेखांकित करते हुए बड़े बेबाकी से कहा है: ‘ यह समझना भ्रम है कि उच्च कोटि का साहित्य प्रबुद्ध प्रौढ़ पाठकों के लिए है और निम्न कोटि की रचनाएँ बालकों के लिए । … इस विभेद ने बाल साहित्य के नाम पर इतना सारा कूड़ा- कर्कट भर दिया कि उसकी सडन और दुर्गंध से सारा वातावरण दूषित होने लगा है। अतएव ज्वलंत सच्चाई यही है कि बाल साहित्य भी अपने स्थान पर उतना ही पूर्ण, आत्म-निर्भर, जीवंत और उच्च कोटि का हो सकता है । प्रबुद्ध-प्रौढ़ साहित्य की अपेक्षा यह कोमल-सुकमार साहित्य इसलिए श्रेष्ठ है कि इसमें सरलता के साथ सरसता और श्रेय के साथ प्रेय को मिलाकर गागर में सागर कर देना पड़ता है, जो हर साहित्यकार के वश की बात नहीं ।‘
इस संग्रह में सभी कविताएँ बाल-मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर रची गयी है । कवयित्री के सच्चे आत्म- बोध के एकान्त स्वर में इन रचनाओं का प्रस्फुटन हुआ है । हर कविता के अंत में भावपूर्ण एवं मनोहारी चित्रों का समावेश कविता की सार्थकता को बढ़ाने में सहायक है ।कवयित्री ने अपने मन को बच्चों के मन से तादात्म्य स्थापित करते हुए, उनके मानसिक स्तर को ध्यान में रखते हुए, रोचक कविताओं का सृजन किया है । कवयित्री की भाषा उतनी ही सरल है जितना ‘गोलू-मोलू’ का चंचल स्वभाव ।
बालकों के निमित्त यह संग्रह प्रत्येक शिशु, जिसके कोमल जीवन-अंकुर में भविष्य की अपार संभावनाएं झाँक रही है, को सदाचरण, स्वनिष्ठा, नैतिकता, परस्पर सदभाव , सेवा और राष्ट्र-प्रेम का संदेश देगा और साथ ही साहित्यिक प्रवृत्तियों को विकसित करेगा । मुझे पूरा विश्वास है कि ये रचनाएँ अपने उद्देश्य में निश्चय सफल होंगी तथा पाठकों के हृदय में चेतना का ज्वार भर देगी।

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है –

2 विचार “गोलू – मोलू&rdquo पर;

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