अन्तर्ध्वनि

अन्तर्ध्वनी… एक सहज ध्वनि जो कुण्डलिया में रच बस गयी — ऋता शेखर ‘मधु'(समीक्षा)

स्वयं के संग्रह छपवाना और चयन द्वारा प्रकाशित होना, दो अलग अलग भाव सम्प्रेषित करता है।
बिहार राजभाषा परिषद द्वारा चयनित कुण्डलिया संग्रह “अन्तर्ध्वनी” की लेखिका श्रीमती किरण सिंह जी है। सर्वप्रथम उन्हें बधाई प्रेषित करती हूँ कि बिहार सरकार द्वारा उनकी रचनाएँ चयनित की गई हैं और प्रकाशन के लिए अनुदान की राशि मिली।
पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध साहित्यकार आ0 भगवती प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा लिखी गयी है। रचनाओं के बारे में उन्होंने जो लिखा वह पुस्तक में पढ़ियेगा। मैं यहाँ उनके आशीर्वचन उद्धृत कर रही हूँ। यही भाव हमारे भी होंगे।

सदा अधर पर फूलों-सी मुस्कान रहे,
भौरों का संगीत सरीखा मान रहे,
जैसी भी हो चाह, राह सब खुले-खिले
नहीं अधूरा कोई भी अरमान रहे।
— भगवती प्रसाद द्विवेदी

दिनकर की वह है किरण, लिए चली उत्साह।
जादू जैसी लेखनी, भरती सतत प्रवाह।।
भरती सतत प्रवाह, शब्द हो जाते कुसुमित।
सरस् सरल हर भाव, सहज होते है पुष्पित।
पूरी हो हर चाह, मधु लुटाएँ वह सबपर ।
सखी किरण के साथ, सदा मुस्काएं दिनकर।।
— ऋता शेखर

अब पुस्तक पर आते हैं।
अपनी बात में किरण जी ने विस्तार से अपनी लेखन यात्रा का ज़िक्र किया है। छंदमुक्त से छंदयुक्त तक का सफर उन्होंने कविता में पिरोकर अपनी बात रखी है। अभी तक में उनकी बहुत सारी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसका जिक्र भी उन्होंने किया है।
उन्होंने अपनी कुंडलियाँ कुल 19 विषयों के अंतर्गत रखी हैं। प्रथम विषय प्रार्थना में माँ सरस्वती, माँ दुर्गा, पार्वती, सूर्य, श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं शिवजी की आराधना की गई है।
माँ विषय पर चार कुंडलियाँ हैं। एक कुण्डलिया में गौरैया का बिम्ब लिया गया है जो मुझे बहुत अच्छी लगी।

चुन चुन दाना चोंच में, लाती बारम्बार।
देख अचंभित में हुई, माँ बच्चों का प्यार।।
माँ बच्चों का प्यार, देखकर मैंने सच्चा।
सीखा गुण दो चार, लगा जो मुझको अच्छा।
कहे किरण कर यत्न, सोचती क्यों घबराना।
गौरैया हर बार, खिलाती चुन चुन दाना ।।

पिता विषय पर चार कुंडलियाँ में मुझे यह सबसे अच्छी लगी।

संकट छोटा हो अगर, माँ चिल्लाते आप ।
आया ज्यों संकट बड़ा, कहें बाप रे बाप ।।
कहें बाप रे बाप, बचा लो मेरे दादा ।
सूझे नहीं उपाय, कष्ट जब होता ज्यादा।
पिता प्रकट हो आप, हटाता पथ का कंटक।
रखकर सिर पर हाथ, पिता हर लेता संकट ।।

कृषक के लिए लेखिका ने छह कुंडलियाँ लिखी हैं। यह उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है। कृषक की कर्मठता, उसके सपने, उसका प्रहरी जैसा रूप , भारत को कृषि प्रधान देश कहकर लिखना तथा कृषक के लिए गांव की प्रगति को महत्व देना कवयित्री की उच्च कोटि की सोच को दर्शाता हैं।
प्राकृतिक सुषमा में उनकी लेखनी ने खूब सौंदर्य बिखेरा है। सूरज, चाँद, हरियाली, सब कुछ ही है।
स्त्री विमर्श की कुंडलियाँ में लेखिका ने एक बात पर विशेष बल दिया है कि नारी, नारी की दुश्मन नहीं होती। ये नर द्वारा बने गए जाल हैं।

सदियों से ही नर यहाँ, बुनते आए जाल|
नार, नार की शत्रु है, कहकर चलते चाल ||
कहकर चलते चाल, जरा तुम समझो इसको |
डाल रखे हैं फूट, दोष बोलो दूँ किसको |
कहे किरण, हे नार ! करो कुछ विषय समझ के|
धो दो सभी कलंक, लगा है जो सदियों से ||

विषय ‘प्रीत की पाती’ पर कुल ३२ कुण्डलियाँ हैं | सभी एक से बढ़कर एक सरस हैं| पढ़ते हुए मन लेखिका के लिये स्वतः ही कह उठता है…’तू प्यार का सागर है…’| एक कुण्डलिया उद्धृत कर रही हूँ|

ज्यों उनको देखा सखी, गई हृदय मैं हार |
नींद चैन सब ले गया, छलिया राजकुमार ||
छलिया राजकुमार, श्रेष्ठतम पुरुष जगत का |
कर बैठी मैं प्यार, हुआ आभास अलग सा |
किया किरण ने प्रश्न, हो गया क्या मुझको |
ठगी रह गई हाय, देख ली मैं ज्यों उनको ||

वात्सल्य पर २ कुण्डलियाँ हैं | ‘मन की आँख’ विषय में २४ कुण्डलियाँ हैं| यह अंतर्ध्वनि को सही मायने में परिभाषित कर रहीं|लेखिका की सकारात्मक सोच की बानगी देखिए |

जो कुछ मिला नसीब से, हो जा उससे तुष्ट |
सबको सब मिलता नहीं, क्यों होना है रुष्ट ||
क्यों होना है रुष्ट, कोसना क्यों किस्मत को |
हम जिसके थे योग्य, दिया ईश्वर ने हमको |
जीवन से दो-चार, चुराकर खुशियाँ ले लो |
खुशी खुशी लो बाँट, ईश ने तुम्हें दिया जो ||

‘युग बोध के बाद किरण जी की लेखनी रिश्ते-नातों पर चली है इस |विषय से एक कुण्डलिया उद्धृत कर अपनी बात को विराम दूँगी| आगे के विषयों को पुस्तक में पढ़ें| जिन्हें छंदों से लगाव है वे तो अवश्य पसंद करेंगे, जिन्हें न हो, वे पसंद करने लगेंगे यह हमारा विश्वास है| एक सीख भरी कुण्डलिया देखिए|

रिश्तों पर विश्वास कर, जो हैं बहुत अजीज |
भूले से बोना नहीं, उर में शक के बीज |
उर में शक के बीज, अंकुरित हुए अगर जो |
आएगा तूञान, उठेगा हृदय लहर तो |
किरण सभी संबंध, रखा बंधक किश्तों पर|
धीरे- धीरे नेह, लुटाना है रिश्तों पर ||

आशा है आगे भी किरण जी की कृतियाँ पढ़ने को मिलेंगी | उनकी लेखनी सतत क्रियाशील रहे…
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ…
ऋता शेखर ‘मधु’

पुस्तक परिचय
नाम- अंतर्ध्वनि
लेखिका- किरण सिंह
प्रकाशन- जानकी प्रकाशन

पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।

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