परिचय

d7fff86e-0ffa-4f1d-96da-f37df6d884d3किरण सिंह

नाम – किरण सिंह
पिता का नाम – स्व श्री कुन्ज बिहारी सिंह ( एडवोकेट)
माता का नाम – श्रीमती दमयंती देवी
पति का नाम – श्री भोला नाथ सिंह ( D G M At S B P D C L )
जन्मस्थान – ग्राम – मझौआं , जिला- बलिया
उत्तर प्रदेश
जन्मतिथि 28- 12 – 1967
शिक्षा
प्रार्थमिक शिक्षा – सरस्वती शिशु मंदिर बलिया।
माध्यमिक शिक्षा – राजकीय महिला विद्यालय बलिया।
स्नातक – गुलाब देवी महिला महाविद्यालय, बलिया (उत्तर प्रदेश)
संगीत प्रभाकर ( सितार )
प्रकाशित पुस्तकों की संख्या – 6

1-मुखरित संवेदनाएँ ( काव्यसंग्रह )
3-प्रीत की पाती ( काव्य संग्रह)
3-अन्तः के स्वर ( दोहा संग्रह )
4-प्रेम और इज्जत ( कथा संग्रह )

5- गोलू – मोलू ( बाल कविता संग्रह ),
6-श्री राम कथामृतम् ( बाल कथा काव्य)

सम्पादन – 1- दूसरी पारी ( विवाह गीत संग्रह )

शिघ्र प्रकाश्य -1-अन्तर्ध्वनि, ( कुंडलिया संग्रह),
2-रहस्य ( कथा संग्रह) 3- शगुन के स्वर ( विवाह गीत संग्रह)
उपलब्धियाँ – विभिन्न राष्ट्रीय प्रतिनिधि समाचार पत्र पत्रिकाओं ( दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, अहा जिंदगी, हिन्दुस्तान,जनसत्ता, प्रभात खबर, सन्मार्ग, सुरभि बाल भारती, सरिता, गृह शोभा, सरस सलिल आदि) में लगातार रचनाओं का प्रकाशन एवम् आकाशवाणी तथा दूरदर्शन पर पर लगातार रचनाओं का प्रसारण!
लेखन विधा – गीत, गज़ल, छन्द बद्ध तथा छन्मुक्त पद्य, कहानी, लघुकथा आलेख, समीक्षा, व्यंग्य !
सम्मान – बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन से साहित्य सेवी सम्मान

आत्मकथ्य

मेरे मन में लेखन का बीज मेरे पिता ने ही डायरी देकर बोया था। तब मेरी आयु करीब दस वर्ष होगी। मैं लिखने लगी किन्तु
अट्ठारह वर्ष की आयु में ही मैं विवाह बंधन में बांध दी गई !विवाह के बाद मेरे हाथों में चूड़ियों की हथकड़ियाँ और पाँवों में पायल की बेड़ियाँ पड़ गईं जिसे हर भारतीय स्त्री अपना सौभाग्य समझती है। सो मैंने भी इसे अपना सौभाग्य मानकर कलम से नाता तोड़ लिया । डायरी आलमारी में गुम हो गई और मैं अपनी खूबसूरत दुनिया को सजाने लगी। इस क्रम में मैं भूल गई पढ़ाई लिखाई ! जिंदगी की रफ्तार में चलते – चलते पता ही नहीं चला कि कब बच्चे बड़े हो गए और उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए !
लेकिन बच्चों के जाने के बाद मेरे अन्तः की दबी किरण पिंजरे से बाहर आने के लिए पंख फड़फड़ाने लगी जिसे उड़ने में मदद की मेरी बचपन की पक्की संगिनी मेरी लेखनी ने।

मेरे मन के दिये में भावना घृत भर गईं और जल उठे अन्तः के दीये! प्रकाश पुंज में स्पष्ट हो गये शब्द सुमन और मैं लिखती गई निरन्तर ! मुखर हो उठीं मेरी संवेदनाएँ ! और 2016 में प्रकाशित हो गयी मेरी प्रथम काव्य संग्रह ( मुखरित संवेदनाएँ ) ।

मैं एक नारी हूँ इसलिए नारी संवेदना के स्वर स्वयं प्रस्फुटित हो गये जो स्वाभाविक भी है ! मैने कभी राग लिखा तो कहीं विराग , कहीं ऋतुरंग लिखी तो कहीं भक्ति , कहीं वीर रस में मेरी भावनायें डूब गईं तो कहीं युग चेतना एवं उद्बोधन में ऊपर आ गई !

तत्पश्चात करीब सत्ताइस वर्षों के बाद मुझे मंच पर अपनी पुस्तक के विमोचन के अवसर पर उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । तब मेरी स्थिति बिल्कुल नई दुल्हन सी ही हो रही थी। कुछ सकुचाहट भी थी, कुछ घबराहट भी थी। सोच रही थी कि पता नहीं साहित्य जगत में मेरी रचनाओं को वो सम्मान मिल भी पायेगा या नहीं। लेकिन मैं सौभाग्यशाली रही कि न केवल मेरी रचनाओं को सराहा गया बल्कि उस मंच पर मुझे सकारात्मक आलोचना का भी सामना करना पड़ा
। सभा के अध्यक्ष महोदय डाॅ अनिल सुलभ जी की जो कि बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के भी अध्यक्ष हैं। उन्होंने मेरी पुस्तक पढ़ने के बाद अपने उद्बोधन में मेरा साहित्य में स्वागत करते हुए मुझे सुझाव दिया कि चूंकि किरण सिंह जी को साहित्य तथा संगीत दोनों में ही रुचि है तो मैं चाहूंगा कि ये छंदों में लिखें। क्योंकि जब कवि का छंदात्मक सामर्थ चूक जाता है तो वह गद्य की तरफ़ बढ़ने लगता है। हलांकि कुछ वरिष्ठ कवियों ने उनके इस बात का विरोध भी किया था। लेकिन पता नहीं क्यों उनकी वो बातें मेरे दिल में बैठ गईं और मैंने इसे एक चुनौती के रूप में ले लिया।
उसके बाद मैंने छन्दों में लिखना शुरू की । फलतः
मेरी दूसरी पुस्तक प्रीत की पाती ( छंद संग्रह) 20 17 में प्रकाशित हुई जिसमें रचनाएँ श्रृंगार रस में भीगी हुई गीत, गीतिका, गज़ल, मुक्तक, सवैया, घनाक्षरी, दोहा , छंद में बंधी हुई मिलेंगी !

उसके बाद भी एक रचनाकार को संतुष्टि कहाँ मिलता है अतः मेरी तीसरी पुस्तक – अन्तः के स्वर ( दोहा संग्रह ) जिसमें मैंने अपनी दिन, दोपहर, संध्या तथा रात्रि प्रहर में उमड़ती – घुमड़ती बेबाक भावनाओं को दोहा छंद में बांधा है!
उसके बाद मेरी माँ ने कहा कि कहानियाँ भी लिखा करो। अब मैं माँ की आज्ञा कैसे टाल सकती थी सो मैंने अपने आस पास की घटित घटनाओं के कैनवास में अपनी कल्पना के रंग भरकर कहानियाँ भी लिखने लगी और 2019 में मेरी चौथी पुस्तक – प्रेम और इज्जत ( कथा संग्रह ) प्रकाशित हुई ।जिसमें मैंने विशेष रूप से मानवीय संवेदनाओं के सबसे खूबसूरत भाव प्रेम , और जीवन में पग – पग पर अपने इज्जत को सम्हालते हुए किरदारों पर प्रकाश डाला है!

उसके बाद आगे आने वाली पुस्तक अन्तर्ध्वनि ( कुंडलिया संग्रह ) के लिए भूमिका लिखवाने के सिलसिले में कवि, लेखक, गीतकार तथा बाल साहित्य की जानी-मानी हस्ती माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी से मुलाकात हो गई और उन्होंने मुझे बाल साहित्य लिखने के लिए यह कहकर प्रेरित किया कि बाल साहित्य सृजन प्रत्येक सच्चे साहित्यकार की नैतिक जिम्मेदारी है। यह बात मेरे मन को छू गई और मैं लिखने लगी बच्चों के लिए कविता और प्रकाशित हो गई गोलू – मोलू ( बाल कविता संग्रह ) ।
उसके बाद लाॅकडाउन में रामायण देखते-देखते राम कहानी स्वयं ही बच्चों के लिए कविता में ढल गई और प्रकाशित हो गई श्रीराम कथामृतम् (बाल खण्ड काव्य)

अभी मेरी 3 पुस्तकें शिघ्र प्रकाशित होने को हैं –

1-अन्तर्ध्वनि, ( कुंडलिया संग्रह),
2- रहस्य ( कथा संग्रह)
3- शगुन के स्वर ( विवाह गीत संग्रह)