होली की हुड़दंग

ऋतु फागुन में घोल – घोल रंग ।
करुंगी हुड़दंग री सखि।

साँसें छेड़ रही हैं सरगम
पायल संग – संग बाजे छम – छम
हुआ जाये मेरा मन मतंग
करुंगी हुड़दंग री सखि

महकी – महकी है अंगड़ाई
बदली – बदली है पुरवाई
बदल लूंगी मैं अपना भी ढंग
करुंगी हुड़दंग री सखि

सावन से लेकर हरियाली
टेसू से माँगूंगी लाली
लगाके रंग बसंती को अंग
करुंगी हुड़दंग री सखि

लेकर सरसों से रंग पीला
और गगन से थोड़ा नीला
सागर से चुरा के तरंग
करुंगी हुड़दंग री सखि।

मस्ती में कर के करताली
दूंगी मैं चुन – चुन कर गाली
अब किसी ने किया जो मुझे तंग
करुंगी हुड़दंग री सखि

अक्षर – अक्षर तोल – मोल कर
शब्दों में रस प्रेम घोलकर
भर कर के मैं भावों का भंग
करुंगी हुड़दंग री सखि

सप्रेम भेंट

फेसबुक पर लेखिका, समीक्षक मीनाक्षी जी के द्वारा की गई एक पुस्तक की समीक्षा पढ़ते हुए दीक्षा के मन में आ रहा था कि अभी पुस्तक आर्डर कर दें । वह खुद भी भी बहुत अच्छी कवयित्री, लेखिका व समीक्षक थी।

तभी अचानक मोबाइल पर मीनाक्षी जी का काॅल आ गया।

” अरे मैं आपकी लिखी समीक्षा पर टिप्पणी कर ही रही थी, वाकई आपकी लिखी समीक्षा का कोई जोड़ नहीं, ऐसी ही समीक्षा होनी चाहिए कि किसी का भी पुस्तक पढ़ने के लिए मन हो जाये। अभी देखिये न मैं  पुस्तक ही आर्डर करने जा रही थी ।” दीक्षा ने मीनाक्षी जी की तारीफ़ करते हुए कहा।

” अरे नहीं मत मंगाइये, पुस्तक में कुछ खास नहीं है आपका पैसा व समय दोनों ही जाया होगा। “मीनाक्षी जी ने कहा।” 

दीक्षा ” फिर आपने इतनी अच्छी समीक्षा क्यों लिखी?” 

मीनाक्षी ” कभी-कभी लोग इतने प्यार से कहते हैं कि इन्कार नहीं किया जा सकता। “

इस प्रकार बातों-बातों में दीक्षा ने उनके द्वारा समीक्षा की गई और भी बड़ी – बड़ी लेखिकाओं, कवयित्रियों की पुस्तकों के बारे में पूछा तो मीनाक्षी जी ने सभी के बारे में कुछ न कुछ नकारात्मक बातें बताकर पुस्तक खरीदने के लिए मना कर दिया। 

तभी दरवाजे की घंटी बजी और दीक्षा ने दरवाजा खोला तो देखा डाकिया एक पार्सल लेकर आया है। पार्सल भेजने वाले का नाम पढ़ते ही दीक्षा कौतूहलवश मीनाक्षी का काॅल काटकर जल्दी – जल्दी पार्सल खोलने लगी तो देखी कि पार्सल के अंदर वही पुस्तक है जिसकी वह समीक्षा पढ़ रही थी। पुस्तक को लेखिका ने सप्रेम भेट किया था। 

चूंकि मीनाक्षी जी ने उस पुस्तक की आलोचना कर दी थी इसीलिए वह पुस्तक पढ़ने के लिए और भी उत्सुक हो गई कि आखिर पुस्तक है कैसी? 

जब दीक्षा उस पुस्तक को पढ़ने लगी तो पढ़ती ही चली गई क्योंकि पुस्तक का कथानक, प्रवाह, कौतूहल प्रचुर मात्रा में था। लेखन शैली भी उत्कृष्ट थी। 

पुस्तक पढ़ने के बाद दीक्षा के मन में बार – बार यह प्रश्न उठ रहा था कि आखिर मीनाक्षी जी ने पुस्तक की शिकायत की क्यों? 

फिर कुछ सोचते हुए उसने वो सभी पुस्तकें आर्डर कर दिया जिसके लिए मीनाक्षी जी ने लेने से मना किया था।

कहाँ गये वे दिवस

कहाँ गये वे दिवस सखी री , कहाँ गईं अब वे रातें।

झगड़ा – रगड़ा, हँसी ठिठोली, वह मीठी – मीठी बातें।

दादी की उस कथा – कहानी में रहते राजा – रानी ।

रातों में सुनते थे पर दिन में करते थे मनमानी।

भीग रहे थे हम मस्ती में, जब होती थी बरसातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

पूछा करते थे कागा से, अतिथि कौन आयेगा कह।

पवन देवता से करते थे , मिन्नत की जल्दी से बह।

रात चाँदनी बाँट रही थी, छत पर सबको सौगातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

रिश्तों में तब था अपनापन, सब अपने से लगते थे ।

बिना दिखावा के मिलजुलकर, हम आपस मे रहते थे।

मन था हम सबका ही निश्छल, कोमल थी हर जज्बातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

छत पर हम तारे गिन – गिनकर, सपनो में रंग भरते थे।

संग हमारे अपने थे तो , नहीं किसी से डरते थे।

विकट घड़ी में भी रहते थे, तब हम सब हँसते गाते।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

चौखंडी आँगन में तुलसी, लहरा कर अपना आँचल।

बुरी बला को दूर भगाकर, भर देती थी हममे बल।

शायद इसी वजह से हम तब, नहीं बेवजह घबराते।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

दिवाली के बाद दियों को, तुला बनाकर हम खेले । 

पता नहीं क्यों याद आ रहे, बचपन वाले वे मेले। 

मिट्टी के वे खेल – खिलौने तोल – मोल कर  ले आते। 

कहाँ गये वे दिवस सखी री……………………… 

आइस – बाइस कित – कित गोटी, खेल हमारे होते थे। 

बातें करते – करते छत पर, निश्चिंत हो सोते थे। 

मीठे – मीठे सपने आकर, मन हम सबका बहलाते। 

कहाँ गये वे दिवस सखी री……………

मुस्कान

“इस ईयर एण्ड पर हम मुंबई चल रहे हैं ” कहते हुए जैसे ही नितेश ने रीमा के हाथों में एयर टिकट पकड़ाया रीमा मारे खुशी के उछल पड़ी और नितेश के गले लगते हुए कहा ”  यू आर बेस्ट हसबैंड इन द वर्ल्ड” फिर नितेश ने शरारत भरे अंदाज़ में उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा – “रियली?” उसे देख रीमा का चेहरा लाल हो उठा।  

अगले दिन यात्रा की तैयारी शुरू हो गई। रीमा अपना बैग पैक करते हुए खूबसूरत कल्पनाओं में डूबने लगी । 
जिस रोज उन दोनों को मुंबई के लिए निकलना था उसके एक रात पूर्व नितेश की मम्मी  की तबीयत अचानक बिगड़ गयी। सास की हालत देख रीमा भी परेशान थी पर मन ही मन दुखी हो रही थी  कि एक तो इतने दिनों बाद घर से निकलने का मौका मिला उसमें भी…… फिर वह अपने किस्मत को कोसते हुए पैकिंग बैग खोलकर वार्डरोब में रखने लगी तभी नितेश ने उसे टोका “पैकिंग क्यों खोल रही हो?” 

रीमा ने कहा “ऐसी हालत में माँ जी को छोड़ कर जाना ठीक लगेगा क्या?” रीमा ने मायुसी से कहा “

” छोड़ कर नहीं साथ में लेकर जायेंगे माँ को ”  मैंने डाॅक्टर से बात कर ली है और मुंबई के एक प्रसिद्ध हाॅस्पिटल  में माँ के इलाज के लिए उनसे रेफरेंस लेटर भी लिखवा लिया है” – नितेश ने कहा ।

रीमा सोचने लगी अस्पताल में माँ जी अकेली थोड़े न रहेंगी। उनके साथ तो किसी न किसी को रहना ही पड़ेगा।

मुंबई पहुंच कर नितेश और रीमा ने श्यामा को डाॅक्टर से दिखाया तो उन्होंने  हफ्ते भर बाद ऐडमिट लेने के लिए कहा। 
जब वे लोग वहाँ से बाहर जाने लगे तभी करीब पचास – पचपन वर्ष के व्यक्ति आकर श्यामा का चरण स्पर्श किया ।  नितेश ने सरप्राइज होकर कहा  “अरे मामा जी आप यहाँ …..?” 
उनकी बात के बीच में ही श्यामा ने कहा “हाँ बेटा मैंने ही बुलवा लिया है। इतने दिनों के बाद तो तुम दोनों को एक-दूसरे के साथ वक्त गुजारने का मौका मिला है वो भी मेरी वजह से बर्बाद हो जाये यह मैं नहीं चाहती थी ” तुम दोनो अपने प्लान के हिसाब से घूमो – फिरो, मेरा भाई मेरे साथ रहेगा। “
सास की समझदारी ने रीमा के नजरों में उनका सम्मान दोगुना कर दिया और उसके होठों पर मुस्कान खिल गई।

महिमा श्री से मेरी बातचीत

मां पत्नी और कुशल गृहणी के दायित्व वहन करते हुएश्रीमती किरण सिंह लेखन की ओर लौटी और बहुत कम समय में ही पाठकों के बीच अपनी सरल लेखन से जगह बना ली है। आप सभी तरह के प्रतिनिधि पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में लगातार प्रकाशित हो रही हैं। अभी हाल में ही इन्हें उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान ने 2020 में प्रकाशित श्री राम कथामृतम् (बाल खण्ड काव्य) के लिए सूर पुरस्कार से नवाजा है। इससे पहले भी 2019 के लिए उत्कृष्ट बाल साहित्य साधना के लिए सुभद्रा कुमारी चौहान महिला सम्मान से नवाजी जा चुकी है। अब तक आपकी दो कहानी संग्रह,व कई काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं और होने वाले हैं ।
प्रस्तुत है युवा कवयित्री व लेखिका महिमा श्री से साहित्यकार किरण सिंह की बातचीत।

1.सबसे पहले आपको उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान तथा सूर पुरस्कार के लिए बधाई? इस संबंध में कुछ बताए।

उत्तर –
अभिभूत हूँ । सच कहूँ तो मैंने इस पुरस्कार के बारे में कभी सोचा भी नहीं था। सुना था बच्चे भगवान के रूप होते हैं और उन्हें प्रसन्न करना ईश्वर को प्रसन्न करना होता है, अब अनुभव भी कर रही हूँ।
इस पुरस्कार को मैं ईश्वरीय कृपा, माता-पिता एवं गुरुजनों की शिक्षा एवम् आशिर्वाद, मेरे स्नेहिल एवम् सम्मानित मित्रों, भाई – बहनों तथा पाठकों के स्नेह व शुभकामनाओं का प्रतिफल मानती हूँ ।
सबसे बड़ी बात कि उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने मेरी मनोकामना पूरी कर दी क्योंकि मैंने श्री राम कथामृतम् यही सोच कर लिखा ही था कि बच्चे श्री राम के चरित्र से परिचित हों।

2.आपने लेखन की शुरुआत कब की।इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली?

मेरे मन में लेखन का बीज मेरे पिता ने ही डायरी देकर बोया था। तब मेरी आयु करीब दस वर्ष थी ।

3.बाल साहित्य रचने के लिये किस प्रकार की तैयारियां करनी पड़ी।
पहले तो अपने बचपन में गई और उसके बाद अपने बच्चों के बचपन की क्रियाकलापों ( उनके बाल हठ, छोटे – छोटे झगड़े, उनकी जिज्ञासा, उनकी फर्माइश, आदि) को याद करते हुए बाल साहित्य रचना आसान हो गया ।

4.गृहणी होने के नाते लेखन में कितना लाभ और हानि देखती है। क्या गृहणी होने से पूरा समय दे पा रही है।

गृहणी होने का लाभ तो मिला कि बच्चों के बाहर जाने के बाद मुझे समय बहुत मिला जिसमें मैं सृजन कर पाई। और हानि यह है कि मेरे पास बाहरी दुनिया का अनुभव कामकाजी महिलाओं की अपेक्षा कम है जो कि लेखन के लिए जरूरी हो जाता है। मैं बाहरी दुनिया को बातचीत, समाचार पत्र – पत्रिकाओं, न्युज चैनलों तथा फिल्मों के माध्यम से देख – सुन तथा पढ़ पाती हूँ ।
5.आप छन्दयुक्त कविता, दोहे , कहानी रचती आ रही हैं।अब बाल साहित्य भी लिख रही हैं। किस प्रकार विधाओं की प्रक्रिया में अंतर साधती है।

बिल्कुल उसी प्रकार जैसे हम गृहणियां अपनी रसोई में विविधता लाती रहती हैं। बस देखना होता है कि कौन सी भावनाएँ किस विधा में फिट बैठती हैं।

6.अभी आपकी दो बाल साहित्य की पुस्तकें आइ हैं
आगामी योजनाएं क्या है?
शीघ्र ही अकड़ – बक्कड़ बाॅम्बे बो,( बाल कविता संग्रह) शगुन के स्वर (विवाह गीत संग्रह) व लहरों की लय पर (मुक्तक संग्रह) हाँ इश्क है ( ग़ज़ल संग्रह) जीवन कड़ियाँ ( लघुकथा संग्रह) , जिंदगी लय में चलो ( गीत – नवगीत संग्रह) आ रहा है । एक उपन्यास का कथानक तैयार है शीघ्र ही लिखना शुरू करूंगी। कुछ बड़े महान साहित्यकार हैं जिनकी जीवनी भी लिखूंगी। उसके बाद मैं किसी ऐतिहासिक चरित्र पर खण्ड काव्य और महाकाव्य भी रचना चाहती हूँ।

7.बाल साहित्य ही आपका लक्ष्य है या अन्य विधाओं में लेखन चलता रहेगा।

मैं हमेशा ही जब जो भावनाएँ प्रबल होंगी उन्हें शब्दों में बांधने का प्रयास करती रहूंगी। मुझे तो बस यही देखना है कि कौन सी भावनाएँ किस विधा में फिट बैठती हैं। आगे माँ शारदे की इच्छा।

8.परिवार से लेखन में कितना सहयोग मिलता रहा है।

मेरे परिवार में साहित्यकार सिर्फ मैं ही हूँ इसीलिए लेखन में मुझे किसी का सहयोग तो नहीं मिला।
फिर भी बेटे मेरे गाइड का काम करते हैं और पतिदेव आलोचक की भूमिका निभाते हैं।

  1. साहित्य में स्त्री लेखन का भविष्य कैसा देख रही है?क्या यहाँ भी किसी तरह का भेदभाव देखना पड़ा?

स्त्री की प्रकृति ही सर्जन करने की होती है तो निश्चित तौर पर स्त्रियों का भविष्य उज्जवल दिख रहा है मुझे।
मैं बाहर कम ही निकलती हूँ इसीलिए भेदभाव जैसा अनुभव मेरे पास नहीं है। बल्कि मुझे तो स्त्री होने के नाते कुछ अधिक ही मान सम्मान मिल जाता है।

अंतर्ध्वनि-हमारे समकाल को दर्शाती सुंदर सरस कुंडलियाँ

लय, धुन, मात्रा भाव जो, लिए चले है साथ
दोहा रोला मिल करें, छंद कुंडली नाद
छंद कुंडली नाद, लगे है मीठा प्यारा
सब छंदों के बीच, अतुल, अनुपम वो न्यारा
ज्यों शहद संग नीम, स्वाद को करती गुन-गुन
जटिल विषय रसवंत, करे छंदों की लय धुन
वंदना बाजपेयी
दोहा और रोला से मिलकर बने, जहाँ अंतिम और प्रथम शब्द एक समान हो .. काव्य की ये विधा यानी कुंडलियाँ छंद मुझे हमेशा से आकर्षित करते रहे हैं | इसलिए आज जिस पुस्तक की बात करने जा रही हूँ, उसके प्रति मेरा सहज खिंचाव स्वाभाविक था| पर पढ़ना शुरू करते ही डूब जाने का भी अनुभव हुआ | तो आज बात करते हैं किरण सिंह जी द्वारा लिखित पुस्तक “अंतर्ध्वनि” की |जानकी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित एक बेहद खूबसूरत कवर के अंदर समाहित करीब दो सौ कुंडलियाँ कवयित्री के हृदय की वो अंतर्ध्वनि है जो हमारे समकाल से टकराकर उसके हृदय को ही गुंजायमान नहीं करती अपितु पाठक को भी आज के समय का सत्य सारस सुंदर तरीके से समझा कर कई नई परिभाषाएँ गढ़ती है |

अपनी गेयता के कारण कुंडलियाँ छंद विधा जितनी सरस लगती है उसको लिखना उतना ही कठिन है | वैसे छंद की कोई भी विधा हो, हर विधा एक कठिन नियम बद्ध रचना होती है | जिसमें कवि को जटिल से जटिल भावों को नियमों की सीमाओं में रहते हुए ही कलम बद्ध करना होता है | ये जीवन की जटिलता थी या काव्य की, जिस कारण कविता की धारा छंदबद्ध से मुक्त छंद की ओर मुड़ गई | कहीं ना कहीं ये भी सच है की मुक्तछंद लिखना थोड़ा आसान लगने के कारण कवियों की संख्या बढ़ी .. लेकिन प्रारम्भिक रचनाएँ लिखने के बाद समझ आता है की मुक्त छंद का भी एक शिल्प होता है जिसे साधना पड़ता है | और लिखते -लिखते ही उसमें निखार आता है | अब प्रेम जैसे भाव को ही लें ..

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लतियात।
भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही सब बात॥
बिहारी

प्यार किसी को करना लेकिन
कह कर उसे बताना क्या
अपने को अर्पण करना पर
और को अपनाना क्या
हरिवंश राय बच्चन

चम्पई आकाश तुम हो
हम जिसे पाते नहीं
बस देखते हैं ;
रेत में आधे गड़े
आलोक में आधे खड़े ।
केदारनाथ अग्रवाल
तीनों का अपना सौन्दर्य है | पर मुक्त छंद में भी शिल्प का आकाश पाने में समय लगता है और छंद बद्ध में कई बार कठिन भावों को नियम में बांधना मुश्किल | जैसा की पुस्तक के प्राक्कथन में आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी रवींद्र उपाध्याय जी की पंक्तियाँ के साथ कहते हैं की
तपन भरा परिवेश,
किस तरह इसको शीत लिखूँ
जीवन गद्ध हुआ
कहिए कैसे गीत लिखूँ ?
“मगर इस गद्य में जीवन में छंदास रचनाओं की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है, जो कभी पाठक को आंदोलित करे तो कभी अनुभूतिपरक मंदिर फुहार बन शीतलता प्रदान करे |”

शायद ऐसा ही अंतरदवंद किरण सिंह जी के मन में भी चल रहा होगा तभी बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष श्री अनिल सुलभ जी के छंद बद्ध रचना लिखने को प्रेरित करने पर उन्होंने छंद बद्ध रचना को विवहित और छंद मुक्त रचना को लिव इन रेलेशन शिप की संज्ञा देते हुए एक बहुत खूबसूरत कविता की रचना की है | जिसे “अपनी बात” में उन्होंने पाठकों से साझा किया है |
लिव इन रिलेशनशिप भी
एक कविता ही तो है
छंद मुक्त
ना रीतिरिवाजों की चिंता
न मंगलसूत्र का बंधन
न चूड़ियों की हथकड़ी
न पहनी पायल बेड़ी
खैर ! किरण सिंह जी की मुक्त छंद से छंद बद्ध दोहा , कुंडली, गीत आदि की यात्रा की मैं साक्षी रही हूँ और हर बार उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा पाठकों को मनवाया है | भाव प्रवणता और भाषा दोनों पर पकड़ इसमें उनकी सहायक बनी है | इस पुस्तक की शुरूआत “समर्पण” भी लेखक पाठक रिश्ते को समर्पित एक सुंदर कुंडलिया से की है | लेखक पाठकों की भावनाओं को शब्द देता है और पाठक की प्रतिक्रियाएँ उसे हर्षित हो कर बार -बार शब्द संसार रचने का साहस , देखिए तेरा तुझको अर्पण वाला भाव ….

अर्पित करने मैं चली, लेकर अक्षर चंद |
सज्ज हो गई भावना, बना पुन: नव छंद |
बना पुन :नव छंद, लेखनी चली निरंतर |
मुझको दिया समाज हमेशा नव -नव मंतर |
देती है सो आज , किरण भी होकर हर्षित |
रचनाओं का पुष्प गुच्छ है तुमको अर्पित || शुरुआती पृष्ठों पर प्रथम माता सरस्वती की आराधना करते हुए अन्य देवी देवताओं को प्रणाम करते हुए उन्होंने सूर्यदेव से अपनी लेखनी के लिए भी वरदान मांगा है .. लेकिन यहाँ व्यष्टि में भी समष्टि का भाव है | हर साहित्यकार जब भी कलम उठाता है तो उसका अभिप्राय यही होता है की जिस तरह सूर्य की जीवनदायनी किरणें धरती पर जीवन का कारक हैं उसे प्रकार उसकी लेखनी समाज को दिशा दे कर जीवन की विद्रूपताओं को कुछ कम कर सके , चाहे इसके लिए उसे कितना भी तपना क्यों ना पड़े |

मुझको भी वरदान दो, हे दिनकर आदित्य |
तुम जैसा ही जल सकूँ, चमकूँ रच साहित्य |
चमकूँ रच साहित्य, कामना है यह मेरी |
ना माँगूँ साम्राज्य, न चाहूँ चाकर चेरी |
लिख -लिख देगी अर्घ्य किरण, रचना की तुमको |
कर दो हे आदित्य, तपा कर सक्षम मुझको ||

अभी हाल में हमने पुरुष दिवस मनाया था | वैसे तो माता पिता में कोई भेद नहीं होता पर आज के पुरुष को कहीं ना कहीं ये लगता है की परिवार में उसके किए कामों को कम करके आँका जाता है | यहाँ पिता की भूमिका बताते हुए किरण जी बताती है कि बड़े संकटों में तो पिता ही काम आते हैं | मेरा विचार है की इसे पढ़कर परिवार के अंदर अपने सहयोग को मिलने वाले मान की पुरुषों की शिकायत कम हो जाएगी …
संकट हो छोटा अगर, माँ चिल्लाते आप
आया जो संकट बड़ा, कहें बाप रे बाप |
कहें बाप रे बाप, बचा लो मेरे दादा |
सूझे नहीं उपाय, कष्ट होता जब ज्यादा |
पिता प्रकट हो आप, हटाता पाठ का कंटक
रखकर सिर पर हाथ, पिता हर लेता संकट ||

अभी काफी समय पर किसान आंदोलन चल रहा था, प्रकाश पर्व पर सरकार ने किसानों की शर्ते मान ली | इसका एक कारण ये था की किसानों के साथ आम जनता भी खड़ी थी और कलम भी | किरण जी प्रगति या विकास को सीधे किसान की प्रगति से जोड़ कर देखती हैं | वो लिखती हैं कि …..
हुई हमारी है प्रगति, तब हम लेंगे मान |
हो जाएंगे देश के, अगर प्रसन्न किसान |
अगर प्रसन्न किसान, उगाएँ चांदी -सोना |
देकर सभी उतार, नजरिया जादू टोना |
होगा हर्षित गाँव, किरण हर नागरी न्यारी |
हम भी लेंगे माँ, प्रगति है हुई हमारी ||

कोई महिला कुछ भी लिखे उसकी कलम में स्त्री जीवन, स्त्री संघर्ष और समाज में समान रूप से जीवन जीने के अधिकार की मांग वैसे ही गुथी होती है जैसे किसी पुष्प हार में पुष्प | किरण सिंह जी के स्त्री विमर्श की कुंडलियों में जहाँ कन्या दान और दहेज के खिलाफ आक्रोश है वहीं शिक्षा और अपनी प्रतिभा को निखारने देने के अवसर की मांग | वो बेटियों को अपनी प्रतिभा को पहचान कर विकसित करने की प्रेरणा भी देती हैं | एक बात जो हम महिलाओं को अक्सर खटकती है की स्त्री स्त्री की शत्रु है .. इस नारे का उदय कहाँ और कैसे हुआ ? और क्योंकर बार -बार स्त्री इसे स्वयं भी प्रयोग करती है | किरण सिंह इसे पितृसत्ता की चाल बताती हैं और इसे काटने का उपाय बताते हुए स्वयं पहल करने की बात करती हैं ..

रहना है तुमको अगर, किरण सबल समृद्ध
नारी -नारी मित्र हैं, प्रथम करो यह सिद्ध
प्रथम करो यह सिद्ध शक्ति बन कर नारी की |
बदलो अपना चित्र, बना जो बेचारी की |
स्वर को करो बुलंद, खो जो भी कहना है |
नहीं बहाना अश्रु, नहीं अब चुप रहना है ||

पर्यावरण हम सबकी साझी चिंता है .. समस्त जीव जंतुओं में केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है जो इसे नष्ट करने में डाल पर बैठे मूर्ख मानव की तरह उसे डाल को काटने में ये सोच कर लगा है की डाल कटने पर वो नहीं गिरेगा | जंगल काटे जा रहे हैं नदियों और हवा में में विष मिलाया जा रहा है| इस क्रूरता से आहत किरण जी ताकीद करती है ….

जाग जरा अब तो मनुज, कर ले सोच विचार |
डर प्रकार्तिक प्रकोप से, मत कर अत्याचार |
मत कर अत्याचार प्रकृति पर इतना ज्यादा |
कर ले हे नर नार , स्वयं से टू भी वादा |
सुंदर यह संसार , रहेगा स्वस्थ सदा जब
लेगी टू भी ठान , चेतना जाग जरा अब || रिश्ते हमारे जीवन का आधार स्तम्भ हैं | सच्चाई ये वो ज्यादा सुखी होते हैं जिनके रिश्ते अच्छे चलते हैं | रिश्ते -नाते खंड में किरण सिंह जी जहाँ अच्छे रिश्तों की पहचान बताती है वहीं बुरे रिश्तों से सावधान भी करती हैं | एक कुंडलियाँ छंद में मित्र चाहे बदल जाए, याद ना भी करें पर शत्रु सदा याद रखते हैं का व्यंगात्मक पुट भी है | पर रिश्तों की चोट उन्हें भी चुभती है .. पर इसके लिए सही वक्त की प्रतीक्षा का माद्दा उनमें है |

देना किरण जवाब, वक्त पर उन सब जन को |
खींच रहे थे टांग, चोट वाणी से कर जो ||

हालांकि अंततः वो हर रिश्ते के महत्व को स्वीकार करती हैं ..
चाहे तू तकरार कर, चाहे तू कर प्यार
रिश्ते -नाते हैं मगर, जीवन का आधार || अंत में यही कहूँगी की जानकी प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में जीवन के विविध रंग हैं | ईश वंदना , प्रकृति पर्यावरण, प्रेम , योग, कोविड, स्त्री विमर्श, उद्बोधन, पुलवामा के शहीद, लेखनी शिक्षक आदि में हमारा समकाल समाया हुआ है | जिसको किरण जी एक आम मनुष्य की तरह देखकर पाठकों के साथ साझा कर रही है | इसलिए ये कुंडलियाँ कहीं भी उपदेशक नहीं लगती है | लेखक और पाठक की दूरी खत्म हो जाती है और वो स्वयं के सुधार के माध्यम से ही समाज में सुधार की कल्पना करते हुए “बूंद -बूंद से घट भरता है का निर्दोष पर महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती हैं | चाहें वो स्त्री विमर्श हो या पर्यावरण की रक्षा | यहाँ तक की आध्यात्म की बात करते हुए भी वो “ पर उपदेश की राह पर ना चलकर आत्मसुधार की बात करती हैं | इसलिए मैंने पहले भी कहा था की उनकी रचनाएँ व्यष्टि से समष्टि की ओर जाति हैं और पाठक को अपनी सी लगती हैं | किरण सिंह जी भाव, भाषा और जुनून की धनी है | उनकी हर किताब में एक लेखक के रूप में उनके विकास की ये यात्रा दिखती है | यही सच्चे अर्थों में किसी भी कलमकार के शब्दों का हासिल है | अगर आप भी कुंडलियाँ छंद के माध्यम से भाव रस रचना के साथ हमारे समकाल से मिलना चाहते हैं तो ये किताब आप के लिए मुफीद है |

चलते -चलते आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी के आशीर्वचन के रूप में लिखा गया मुक्तक जिसमें मेरी भावनाएँ भी शामिल हैं ..
सदा अधर पर फूलों सी मुस्कान रहे ,
भौरऑन का संगीत सरीखा मान रहे,
जैसा भी हो छह, राह सब खुले खिले
नहीं अधूरा कोई भी अरमान रहे ||

अंतर्ध्वनि- कुंडलियाँ संग्रह
लेखिका -किरण सिंह
प्रकाशक -जानकी प्रकाशन
पृष्ठ – 104
मूल्य -300 रुपये
अमेजॉन लिंक –

अन्तर्ध्वनि

अन्तर्ध्वनी… एक सहज ध्वनि जो कुण्डलिया में रच बस गयी — ऋता शेखर ‘मधु'(समीक्षा)

स्वयं के संग्रह छपवाना और चयन द्वारा प्रकाशित होना, दो अलग अलग भाव सम्प्रेषित करता है।
बिहार राजभाषा परिषद द्वारा चयनित कुण्डलिया संग्रह “अन्तर्ध्वनी” की लेखिका श्रीमती किरण सिंह जी है। सर्वप्रथम उन्हें बधाई प्रेषित करती हूँ कि बिहार सरकार द्वारा उनकी रचनाएँ चयनित की गई हैं और प्रकाशन के लिए अनुदान की राशि मिली।
पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध साहित्यकार आ0 भगवती प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा लिखी गयी है। रचनाओं के बारे में उन्होंने जो लिखा वह पुस्तक में पढ़ियेगा। मैं यहाँ उनके आशीर्वचन उद्धृत कर रही हूँ। यही भाव हमारे भी होंगे।

सदा अधर पर फूलों-सी मुस्कान रहे,
भौरों का संगीत सरीखा मान रहे,
जैसी भी हो चाह, राह सब खुले-खिले
नहीं अधूरा कोई भी अरमान रहे।
— भगवती प्रसाद द्विवेदी

दिनकर की वह है किरण, लिए चली उत्साह।
जादू जैसी लेखनी, भरती सतत प्रवाह।।
भरती सतत प्रवाह, शब्द हो जाते कुसुमित।
सरस् सरल हर भाव, सहज होते है पुष्पित।
पूरी हो हर चाह, मधु लुटाएँ वह सबपर ।
सखी किरण के साथ, सदा मुस्काएं दिनकर।।
— ऋता शेखर

अब पुस्तक पर आते हैं।
अपनी बात में किरण जी ने विस्तार से अपनी लेखन यात्रा का ज़िक्र किया है। छंदमुक्त से छंदयुक्त तक का सफर उन्होंने कविता में पिरोकर अपनी बात रखी है। अभी तक में उनकी बहुत सारी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसका जिक्र भी उन्होंने किया है।
उन्होंने अपनी कुंडलियाँ कुल 19 विषयों के अंतर्गत रखी हैं। प्रथम विषय प्रार्थना में माँ सरस्वती, माँ दुर्गा, पार्वती, सूर्य, श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं शिवजी की आराधना की गई है।
माँ विषय पर चार कुंडलियाँ हैं। एक कुण्डलिया में गौरैया का बिम्ब लिया गया है जो मुझे बहुत अच्छी लगी।

चुन चुन दाना चोंच में, लाती बारम्बार।
देख अचंभित में हुई, माँ बच्चों का प्यार।।
माँ बच्चों का प्यार, देखकर मैंने सच्चा।
सीखा गुण दो चार, लगा जो मुझको अच्छा।
कहे किरण कर यत्न, सोचती क्यों घबराना।
गौरैया हर बार, खिलाती चुन चुन दाना ।।

पिता विषय पर चार कुंडलियाँ में मुझे यह सबसे अच्छी लगी।

संकट छोटा हो अगर, माँ चिल्लाते आप ।
आया ज्यों संकट बड़ा, कहें बाप रे बाप ।।
कहें बाप रे बाप, बचा लो मेरे दादा ।
सूझे नहीं उपाय, कष्ट जब होता ज्यादा।
पिता प्रकट हो आप, हटाता पथ का कंटक।
रखकर सिर पर हाथ, पिता हर लेता संकट ।।

कृषक के लिए लेखिका ने छह कुंडलियाँ लिखी हैं। यह उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है। कृषक की कर्मठता, उसके सपने, उसका प्रहरी जैसा रूप , भारत को कृषि प्रधान देश कहकर लिखना तथा कृषक के लिए गांव की प्रगति को महत्व देना कवयित्री की उच्च कोटि की सोच को दर्शाता हैं।
प्राकृतिक सुषमा में उनकी लेखनी ने खूब सौंदर्य बिखेरा है। सूरज, चाँद, हरियाली, सब कुछ ही है।
स्त्री विमर्श की कुंडलियाँ में लेखिका ने एक बात पर विशेष बल दिया है कि नारी, नारी की दुश्मन नहीं होती। ये नर द्वारा बने गए जाल हैं।

सदियों से ही नर यहाँ, बुनते आए जाल|
नार, नार की शत्रु है, कहकर चलते चाल ||
कहकर चलते चाल, जरा तुम समझो इसको |
डाल रखे हैं फूट, दोष बोलो दूँ किसको |
कहे किरण, हे नार ! करो कुछ विषय समझ के|
धो दो सभी कलंक, लगा है जो सदियों से ||

विषय ‘प्रीत की पाती’ पर कुल ३२ कुण्डलियाँ हैं | सभी एक से बढ़कर एक सरस हैं| पढ़ते हुए मन लेखिका के लिये स्वतः ही कह उठता है…’तू प्यार का सागर है…’| एक कुण्डलिया उद्धृत कर रही हूँ|

ज्यों उनको देखा सखी, गई हृदय मैं हार |
नींद चैन सब ले गया, छलिया राजकुमार ||
छलिया राजकुमार, श्रेष्ठतम पुरुष जगत का |
कर बैठी मैं प्यार, हुआ आभास अलग सा |
किया किरण ने प्रश्न, हो गया क्या मुझको |
ठगी रह गई हाय, देख ली मैं ज्यों उनको ||

वात्सल्य पर २ कुण्डलियाँ हैं | ‘मन की आँख’ विषय में २४ कुण्डलियाँ हैं| यह अंतर्ध्वनि को सही मायने में परिभाषित कर रहीं|लेखिका की सकारात्मक सोच की बानगी देखिए |

जो कुछ मिला नसीब से, हो जा उससे तुष्ट |
सबको सब मिलता नहीं, क्यों होना है रुष्ट ||
क्यों होना है रुष्ट, कोसना क्यों किस्मत को |
हम जिसके थे योग्य, दिया ईश्वर ने हमको |
जीवन से दो-चार, चुराकर खुशियाँ ले लो |
खुशी खुशी लो बाँट, ईश ने तुम्हें दिया जो ||

‘युग बोध के बाद किरण जी की लेखनी रिश्ते-नातों पर चली है इस |विषय से एक कुण्डलिया उद्धृत कर अपनी बात को विराम दूँगी| आगे के विषयों को पुस्तक में पढ़ें| जिन्हें छंदों से लगाव है वे तो अवश्य पसंद करेंगे, जिन्हें न हो, वे पसंद करने लगेंगे यह हमारा विश्वास है| एक सीख भरी कुण्डलिया देखिए|

रिश्तों पर विश्वास कर, जो हैं बहुत अजीज |
भूले से बोना नहीं, उर में शक के बीज |
उर में शक के बीज, अंकुरित हुए अगर जो |
आएगा तूञान, उठेगा हृदय लहर तो |
किरण सभी संबंध, रखा बंधक किश्तों पर|
धीरे- धीरे नेह, लुटाना है रिश्तों पर ||

आशा है आगे भी किरण जी की कृतियाँ पढ़ने को मिलेंगी | उनकी लेखनी सतत क्रियाशील रहे…
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ…
ऋता शेखर ‘मधु’

पुस्तक परिचय
नाम- अंतर्ध्वनि
लेखिका- किरण सिंह
प्रकाशन- जानकी प्रकाशन

पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।

वक्त में है बहुत

 

वक्त  में हैं बहुत तल्खियाँ जिंदगी ।  

बन्द रख दिल की तू खिड़कियाँ जिंदगी ।।


दिल में तूफां उठे तो सँभलना जरा –

डूब जाएँ  न ये कस्तियाँ जिंदगी।


तोहफा है बहुत खूबसूरत –  सा ये –

जो दिया रब ने कर शुक्रिया जिंदगी। 


मौत की तो है फितरत डराएगी ही-

करने दे उसको मनमर्जियाँ जिंदगी ।


लाख देता रहे वक्त तुझको दगा-

आगे बढ़  , माफ़ कर गलतियाँ जिंदगी। 


है पता खूबसूरत है सबसे  ‘ किरण ‘-

चाहे जितनी पड़ें अर्जियाँ जिंदगी।

श्री राम कथामृतम्

बच्चों को रामकथा का अमृत रसपान 

  • प्रभात कुमार राय 

कृति: श्री राम कथामृतम्  ( बाल खंड काव्य  )

कृतिकार : किरण सिंह 

प्रकाशक: जानकी प्रकाशन  पटना: नई दिल्ली 

पृष्ठ: 58             मूल्य: रू 150/-

समीक्षक: प्रभात कुमार राय 

मो-  9934083444

     ‘ श्री राम कथामृतम् ‘ कवयित्री द्वारा राम चरित को सरल, सहज एवं सुबोध शब्दों में बालोपयोगी सांचे में ढालने का सत्प्रयास है । मूलतः इस कृति के पीछे 2020 की कुछ घटनाएं कवयित्री ने ‘अपनी बात ‘ में बताया है: (1) ‘ कौन बनेगा करोड़पति ‘ में संजीवनी बूटी संबंधी जानकारी से अनभिज्ञता (2) लब्थप्रतिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा साहित्यिक चर्चा के दरम्यान बाल साहित्य को हर साहित्यकार  की नैतिक जिम्मेदारी बताना (3) कोविड 19 महामारी की रोकथाम के लिए आरोपित लाकडाउन का रचनात्मक कार्य में सदुपयोग (4) लाॅकडाउन की अवधि मे रामानंद सागर द्वारा फिल्माया रामायण का दूरदर्शन पर प्रसारण ।

     यह इत्तेफाक है कि इस पुस्तक के अध्ययन करते वक्त मेरा ध्यान एक दिलचस्प समाचार की ओर आकृष्ट हुआ जिसकी चर्चा प्रसंगवश कर रहा हूँ । भुवनेश्वर के 10 साल के आयुष कुमार खुंटिया ने लाॅकडाउन के दौरान प्रसारित होने वाले रामायण सीरियल पर आधारित दूरदर्शन सीरीज देखने के बाद बच्चों के लिए उड़िया में रामायण लिखी है। 100 पन्ने वाले इस किताब का नाम पिलाका रामायण (बच्चों के लिए रामायण) रखा गया है।

     स्वभावतः बच्चे गूढ, मोटी और गंभीर किताबों से भागते हैं । पढ़ने में रूचि विकसित होने पर बच्चों को अपने मानसिक विकास के लिए ऐसे बाल साहित्य की जरूरत पड़ती है जिसे वे अपना समझकर आत्मसात कर लें । ऐसा साहित्य मनोरंजन के अलावा बालकों में नेक भावनाओं का उदय करने में भी सहायक होता है । कवयित्री ने बाल साहित्य की बुनियादी आवश्यकताओं को भलीभांति ध्यान में रखकर इस खंड काव्य की रचना की है ।

         रामचरितमानस के अक्षुण्णतत्व एवं सूत्र-संकेत सर्वकालिक है जो आज के युग-संदर्भ में भी सर्वथा सही उतरते हैं । राम का बहुआयामी, भव्य एवं महनीय चरित्र सदियों से रचनाकारों को उन पर लिखने के लिए प्रेरित करता रहा है । राष्ट्र कवि  मैथिलीशरण गुप्त ने तो यहाँ तक कह दिया:

           “ राम तुम्हारा चरित स्वंय ही काव्य है,

              कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।“

        जयशंकर प्रसाद ने लिखा है:

        “ अखिल विश्व में रमा हुआ है राम हमारा,

          सकल धरा पर जिसका क्रीड़ापूर्ण पसारा ।“

  मर्यादा पुरुषोत्तम की कथा को खंड काव्य के रूप में बालकों के लिए प्रस्तुत करने का सुप्रयास कवयित्री द्वारा इसी श्रृंखला में एक कड़ी है ।

         समस्त रामचरितमानस में राम को सत्य, न्याय,क्षमा, उदारता, कृपा और स्नेह का उच्चतम भाव प्रदर्शित करते हुए चित्रित किया गया है । निस्संदेह मानव के सद्गुणों का समन्वय उसी में निहित है जिससे समाज, वर्ग, परिवार और व्यक्ति की मर्यादा सुरक्षित रहे। राम मर्यादा के संरक्षण में सर्वोत्तम हैं । इन्हीं उच्चतम गुणों को बच्चों के प्रभाव्य मस्तिष्क में बीजारोपण के सोद्देश्य से कवयित्री ने अत्यल्प एवं अत्यंत सरल शब्दों में पूरे रामायण का मर्म को गूंथने का कठिन कार्य बखूबी किया है ।

      ध्यातव्य है कि रामचरितमानस के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास ने खुद बाल्यकाल मे अपने कोमल मन-मस्तिष्क में ऊँचे भावो के बीजारोपण के महत्व को स्वीकारा है । सौभाग्यवश बाल्यावस्था में  उन्होने सूकर क्षेत्र में अपने गुरू के मुख से रामकथा सुनी थी । स्वाभाविक तौर पर शिशु-काल में  उन्हें राम चरित का पूरा बोध नहीं हो सका था । इस बात का संकेत उन्होंने रामचरितमानस के प्रारम्भ में  इस प्रकार किया है:

        “ मैं पुनि निज गुरू सन सुनी कथा सो सूकर खेत ।

          समुझि नहीं तसि बालपन तब अति रहेऊॅ अचेत ।।“

     गुरु मुख से रामकथा सुनकर गोस्वामी जी के बाल-हृदय में  राम चरित का बीज तो अंकुरित हो गया था किन्तु उसका पल्लवन उनके परवर्ती जीवन में हुआ और उन्होंने युगांतरकारी महाकाव्य की रचना की ।

               रामायण में प्रभु राम का चरित्र उदात्त होते हुए भी  सुख-दुःख से उद्वेलित होता हुआ दिखलाया गया है जिससे वे सामान्य मानव की कोटि मे आ जाते है । उनसे आत्मीयता स्थापित हो ज़ाती है और उनके हर्ष-विषाद में उल्लसित और दुखी हो जाता है । अरण्यकाण्ड में सीता-हरण हो जाने पर राम की करूणपूर्ण दशा का चित्रण बड़े मार्मिक ढंग से किया है:

      “  हे खग-मृग हे मधुकर सेवी। तुम देखी सीता मृगनैनी ।

         यहि विधि खोजत विलपत स्वामी । मनुहॅ कहा विरही अति कामी।“

       कवयित्री ने इसी भाव को सरल शब्दों में बालकों को सहजता से ग्रहण करने हेतु यों लिखा है :

       ‘ लगे  राम-लक्ष्मण फिर करने/ सीताजी की खोज/

         भटक-भटक कर दोनों भाई/ भूले अपना ओज /’

          हनुमान द्वारा गिरि से औषधि ले आने पर राम की प्रसन्नता अवर्णनीय है-

          “ हरखि राम भेटउ हनुमाना । अति कृतज्ञ प्रभु परम सुजाना ।“

कवयित्री ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है:

‘ भरत वाण से अतिशीघ्र ही/ पहुंच गये हनुमान/

  हुए प्रसन्न तब राम लिया / सबने ही लोहा मान/’

         तुलसीदास जी ने अयोध्याकांड में केवट प्रसंग का वर्णन बड़े ही भावोत्पादक ढंग से  किया है । ( बाल्मीकीय रामायण में यह प्रसंग बिलकुल नहीं है । वहां राम नाव चढ़कर शीघ्र पार कर लेते हैं।) तुलसीदास जी ने केवट से कहलवाया है कि-

“ पद कमल धोई चढाई नाव न नाथ उतराई चहुँह।“

क्योंकि  –  “ छुवत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तैन काठ कठिनाई । तरनिऊ मुनि धरनी होई जाई। बाट मोरि नाव उड़ाई ।“

कवयित्री ने इस प्रसंग का वर्णन यों किया है:

        ‘ केवट बोला, कहीँ बनें न / नारी मेरा नाव/

          इसीलिए मैं प्रथम आपका/ धोऊॅगा यह पाँव  ।।‘

    कवयित्री ने समुद्र द्वारा राह नहीँ देने पर राम के क्रोध का वर्णन इस प्रकार किया है :

    ‘ पूजा करने लगे राम जी/ रखे तीन दिन धीर/

      किन्तु जलधि ने दी न राह तो/ तान लिए वे तीर/’

( “ विनय न मानहि जलधि जड़, गये तीन दिन बीत।

    बोले राम सकोप तब, भय बिनु होहिं न प्रीति ।“)

           तुलसीदास जी ने लिखा है :

 “ कवि-कुल वनु पावन जानी। राम-सिया जस मंगल खानी।

   तेहि  ते मैं कछु कहा बखानी/ करन पुनीत  हेतु निज बानी।“

(  सीता और राम के यश को कविकुल के जीवन को पवित्र करनेवाला और मंगोलों की खान जानकर, मैंने भी अपनी वाणी पवित्र करने के निमित्त उसका थोड़ा सा वर्णन कर डाला हूँ ।)

कवयित्री ने भी रामचरितमानस के पात्रों के माध्यम से बच्चों के लिए सदाचार, भातृभाव, सेवा, नैतिकता एवं सत्यनिष्ठा की सीख देने का पुनीत कार्य किया है।

      इस रचना में सादगी और मिठास के साथ सहृदयता और प्रांजलता मौजूद है । प्रसंगानुकूल चित्रों का समावेश प्रभावोत्पादक है और बच्चों को भायगा। इस कृति में बच्चों की रूचि के अनुकूल ही भाव , भाषा, शैली, प्रवाह आदि वर्तमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बालकों की सहज वृति में तारतम्य होकर यह खंड काव्य उद्भूत हुई  है । निस्संदेह बच्चे इस सोद्देश्य काव्य से लाभान्वित होंगे और भावी जीवन में चारित्रिक उत्थान की दिशा में  अग्रसर होंगे ।

जाऊँगा मैं स्कूल

जाऊँगा मैं स्कूल

रोज मुझे बहलाकर मम्मी,
नहीं बनाओ फूल।
नाम लिखा दो मेरा भी अब ,
जाऊँगा मैं स्कूल।

देखो मेरे भैया राजा,
कितने बनते स्मार्ट ।
पढ़ना-लिखना मुझको भी है,
करना जल्दी स्टार्ट।

अभी बहुत छोटे हो बेटा,
जिद्द करो मत व्यर्थ ।
पढ़ना-लिखना क्या है प्यारे ,
पहले समझो अर्थ।

क ख ग घ ए बी सी डी,
वन टू एक दो तीन।
चलो पढ़ाती हूँ मैं तुमको,
उँगली पर गिन – गिन।

मान लिये गोलू राजा फिर,
मम्मी की यह बात।
लगे पढ़ाई करने घर में,
मन से वह दिन रात।

धीरे-धीरे गोलू राजा,
हो गये होशियार।
मम्मी – पापा भैया उनको,
करते प्यार – दुलार।

बड़े हुए जब गोलू राजा,
दिये स्कूल में टेस्ट।
दिये जवाब फटाफट सार,
मार्क्स आ गया बेस्ट।

फिर मस्ती में गोलू राजा,
गये खुशी से झूम ।
मम्मी पापा लिये गर्व से,
उनका माथा चूम।