गुस्सा क्यों आता है

गुस्से में आदमी पागल हो जाता है इसलिए वह उस समय अनियंत्रित होकर कह देता है और क्या कर देता है उसे स्वयं नहीं पता होता है। हाँ गुस्सा शांत होने पर उसे अपनी गलती का एहसास जरूर होता है। किंतु कहा जाता है न कि कमान से निकला हुआ तीर और जुबान से निकली हुई बात कभी वापस नहीं आती तो ऐसी परिस्थिति में गुस्साये इन्सान के पास अफसोस के सिवा कुछ बचा भी नहीं रहता है।
लोगों को गुस्सा क्यों आता है, इसकी कई वजह हैं।
एक इंसान को कब, कैसे और किस बात से गुस्सा आता है यह उसकी उम्र, लिंग, संस्कृति, माहौल तथा परवरिश पर निर्भर करता है।
कई बातें इंसान को गुस्सा दिला सकती हैं।
जैसे – जब उस इंसान के साथ नाइंसाफी होती है।
उसकी बेइज़्ज़ती की जाती है, या फिर उसका अधिकार छीनने की कोशिश की जाती है आदि
ऐसी बहुत सी वजह हैं जो इंसान को गुस्सा दिला सकती हैं।
गुस्सा आने पर अलग-अलग व्यक्ति का अलग – अलग बर्ताव हो जाता है। कुछ लोगों की गुस्से की आग जितनी जल्दी धधकती है उतनी ही जल्दी शांत भी हो जाती है तो कुछ लोगों के हृदय में कई दिनों, महीनों या सालों तक सुलगती रहती है।
मनोवैज्ञानिक हैरी एल. मिल्ज़ का कहना है: “इंसान बचपन से ही गुस्सा करना सीखता है। वह बड़े-बुज़ुर्गों को गुस्सा करते देख उनकी नकल उतारने की कोशिश करता है।”
अगर एक बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में होती है, जहाँ माँ-बाप हमेशा एक-दूसरे से भिड़े रहते हैं और बात-बात पर चिल्लाते हैं, तो बच्चे को यही सीख मिल रही होती है कि मुश्‍किलों का सामना करने के लिए गुस्सा करना ज़रूरी है।
वैसे अधिकांश लोगों को भूख लगने पर तथा तनाव की स्थिति में गुस्सा आता है।
वैसे यदि व्यक्ति स्वयं चाहे तो गुस्से को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए समझना होगा कि गुस्सा आपको ही नुकसान पहुँचाता है।

गुस्से को नियंत्रित करने के उपाय :

गुस्सा आने पर सबसे पहले तो मौन साध लेना चाहिए, क्योंकि गुस्से में अक्सर मनुष्य जहर उगलने लगता है।

बचपन से ही हम अपने बड़े बुजुर्गों से सुनते आये हैं कि गुस्सा आने पर ठंडा पानी पी लेना चाहिए।

कुछ लोग कहते हैं कि उलटी गिनती गिनने से भी गुस्सा कम होता है।

बात करते वक़्त यदि गर्मागर्म बहस होने लगे तो क्षमासहित तर्क – वितर्क वहीं बन्द कर देना चाहिए ।

मनपसंद गाना गाने या सुनने से भी गुस्सा कम होता है।
कुछ अच्छा सोचें।
मनपसंद व्यंजन बनाना शुरू करें।
शापिंग करें।
इन सब से भी बात न बने तो योगा करें ,क्योंकि योग हमारे शरीर और मन की संतुलित कर , क्रोध को नियंत्रण करने में बहुत हद तक मदद करता है।

बच्चों में चुगली की आदत न पनपने दें ।

बच्चों में चुगली की आदत न पनपने दें।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार चुगली करना अपने दिल की भड़ास निकालने का एक अच्छा माध्यम है।  या यूँ कहें कि  हीन भावना से ग्रस्त व्यक्ति चुगली करके खुद को तुष्ट करने का प्रयास करता है। इसीलिए वह खुद में कमियाँ ढूढने की बजाय दूसरों की मीन-मेख निकालने में अपनी उर्जा खपाते रहता है।
चुगलखोर व्यक्तियों की दोस्ती टिकाऊ नहीं होती :-
वैसे हम चुगलखोरों को लाख बुरा- भला कह लें लेकिन सच तो यही है कि निंदा रस में आनंद बहुत आता है। शायद यही वजह है कि अपेक्षाकृत चुगलखोरों के सम्बन्ध अधिक बनते हैं। या यूँ कहें कि चुगलखोरों की दोस्ती जल्दी हो जाती है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी दोस्ती टिकाऊ नहीं होती। क्योंकि वास्तविकता का पता लगने पर लोग चुगलखोरों से किनारा करने लगते हैं।

बच्चों में चुगलखोरी की आदत न पनपने दें :-

अक्सर देखा गया है कि बच्चे जब  गलती करते हुए अभिभावकों द्वारा पकड़े जाते हैं और पेरेंट्स पूछते हैं कि कहाँ से सीखा? तो वे अपने को तत्काल बचाने के लिए अपने दोस्तों या फिर भाई बहनों का नाम ले लेते हैं जिससे पेरेंट्स का ध्यान उनपर से हटकर दूसरों पर चला जाता है। यहीं से चुगलखोरी की आदत लगने लगती है।
एक बार सोनू की मम्मी सोनू को पैसे चोरी करते हुए पकड़ लीं और फिर डाट डपटकर पूछने लगीं कि यह सब कहाँ से सीखे। सोनू ने तब अपना बचाव करने के लिए अपने पड़ोस के दोस्त का नाम ले लिया। यह बात सोनू की मम्मी ने उसके दोस्त की मम्मी से यह  कह दिया। परिणामस्वरूप सोनू के दोस्त ने सोनू को चुगलखोर कहकर सोनू से दोस्ती तोड़ ली। और सोनू दुखी रहने लगा।
यहाँ पर सोनू की मम्मी को किसने सिखाया है यह नहीं पूछकर चोरी के साइडइफेक्ट्स बताकर आगे से ऐसा नहीं करने की सीख देनी चाहिए थी । साथ ही यह भी बताना चाहिए था कि चुगली करना और चोरी करना दोनों ही पाप है।
तुलना करने से भी बढ़ती है चुगली करने की प्रवृत्ति :-
कभी-कभी  पेरेंट्स अनजाने में ही अपने बच्चों को आहत कर चुगली करने की प्रवृति को बढ़ावा देते हैं।
दीपक के पापा हमेशा ही अपने दीपक की तुलना अपने दोस्त के बेटे कुणाल से करते हुए कुणाल की प्रशंसा कर दिया करते थे जिससे दीपक का कोमल सा बाल मन आहत हो जाता था और वह कुणाल की तरह बनने की कोशिश करता था और जब उसकी तरह बनने में नाकामयाब हो गया तो वह अपने पापा से कुणाल की झूठी सच्ची चुगली करने लगा।

शार्टकट नहीं, सफलता का मूल मंत्र है, कठिन परिश्रम

शार्टकट का रास्ता अख्तियार करने से बचें।

बारहवीं की बोर्ड परीक्षा के साथ ही शुरू हो जाता है छात्र – छात्राओं के कैरियर की मैराथन दौड़ जिसकी मंजिल होती  है आई आई टी ( भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान), जे ई ई (संयुक्त प्रवेश परीक्षा) या फिर नीट ( राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा )  निकालना । जो स्टूडेंट्स इन परीक्षाओं को क्लियर कर लेते हैं उनके पेरेंट्स तो गंगा नहा लेते हैं, किन्तु जो नहीं क्लियर कर पाते उन्हें उस समय आगे का कुछ रास्ता ही समझ में नहीं आता।  ऐसे में उनके पास विकल्प बच जाता है कि वह अपनी क्षमता को आंक कर या तो  एक साल और इंतज़ार करें या फिर किसी अन्य काॅलेज में प्रवेश ले लें।
वैसे तो उपर्युक्त प्रवेश परीक्षाओं के आधार पर भी कोई न कोई काॅलेज तो मिल ही जाता है, किन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब स्टूडेंट्स के नम्बर तो कम होते हैं किन्तु सपने बड़े। ऐसे में उन्हें अपने मनपसंद काॅलेज में  पढ़ने के सपने चकनाचूर होते दिखाई देने लगते हैं।  उनके इन्हीं सपनों को बेचने के लिए  शिक्षा माफिया कैरियर काउंसिलर के रूप में अपनी दुकान खोलकर बैठे होते हैं। जहाँ खुलेआम काॅलेज का मोलभाव होता है। अर्थात जितना बढ़िया काॅलेज उतनी मोटी रकम अदा करना होता है ।
ऐसे में खुद के तथा अपने बच्चों के सपनों को पंख देने के लिए कुछ पेरेंट्स किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। उन्हें तो लगता है कि यदि अच्छे काॅलेज में  ऐडमिशन न हुआ तो उनके बच्चों के सफलता के सभी रास्ते बंद हो जायेंगे इसलिए वो कहीं से भी जुगाड़ कर के अपने बच्चों को अच्छा काॅलेज दिला देते हैं।उसके बाद उन्हें लगता है कि वे जिंदगी के सारे जंग जीत लिये ।  लेकिन अधिकांश मामलों में पेरेंट्स को निराशा की धूल ही फांकनी पड़ती है। क्योंकि वह अपनी संतानों को सपनों के घोड़ों पर बिठा तो देते हैं  किन्तु यह भूल जाते हैं कि हमारे बच्चों को ठीक से घुड़सवारी आती भी है या नहीं..? ऐसे में मुंह के बल गिरने की आशंका तो रहती ही है।
इंट्रेंस एक्जाम ही इसलिए ली जाती है कि स्टूडेंट्स की काबिलियत का पता चले। और उन्हीं का चयन होता है जो योग्य होते हैं। अर्थात अमुक स्टूडेंट अमुक काॅलेज के पाठ्यक्रम में फिट बैठता है। लेकिन जो दूसरे दरवाजे से आते हैं उन्हें काॅलेज का पाठ्यक्रम कठिन लगने लगता है। परिणामस्वरूप उन्हें एक्जाम क्लियर करना मुश्किल हो जाता है । ऐसी स्थिति में  हताशा की वजह से उन्हें अवसाद से ग्रसित होने की सम्भावना अधिक बन जाती है जिसके फलस्वरूप स्टूडेंट्स  गलत कदम ( नशे का शिकार, आत्महत्या का प्रयास, आदि) भी उठा सकते हैं।
आमतौर पर लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि अच्छे काॅलेज में अच्छा प्लेसमेंट होता है। सही भी है। किन्तु प्लेसमेंट तो तब होगा न जब एक्जाम क्लियर हो ।
अब मिस्टर अजय को ही ले लीजिए। उनके बेटे पर सरस्वती की कृपा भले ही कम थी पर उनपर लक्ष्मी की कृपा कुछ ज्यादा ही थी, अतः वह मनचाहा काॅलेज में अपने बेटे का ऐडमिशन कराकर फूले नहीं समाते थे।
वहीं अभय बाबू अपने तथा अपने बेटे के सामर्थ्य के अनुसार जिस कालेज में सलेक्शन हुआ उसी में ऐडमिशन करा दिये। हाँ उनके मन में थोड़ी कसक जरूर रह गई थी कि काश……
चार वर्ष बीता और अभय बाबू का बेटा काॅलेज का एक्जाम पास करके किसी साधारण कम्पनी में ही नौकरी करके अनुभव लिया और आज बहुत अच्छी कम्पनी में हाई सैलरी पर कार्यरत है जबकि अजय बाबू का बेटा काॅलेज का एक्जाम क्लियर नहीं कर पाने की वजह से अवसाद का शिकार होकर घर में बैठा है।
कहने का तात्पर्य यह है कि योग्यता के अनुसार कार्य और कार्य के अनुसार ही सैलरी मिलती है।
सभी बच्चे एक समान नहीं होते इसे स्वीकार करें।
डींगें हांकने से बचें।
स्व विवेक से काम लें।
शार्टकट का रास्ता अख्तियार करने से बचें।
सफलता का मूलमंत्र कठिन परिश्रम है इस सच्चाई को स्वीकार करें।
शिक्षा माफियाओं के चंगुल में न तो खुद फंसे और न ही अपने बच्चों को फंसने दें ।
और सबसे जरूरी है कि अपने बच्चों के अभिरुचि और क्षमता के अनुसार ही उन्हें अपने कैरियर का चयन करने दें।

जीवन की नई भोर

अपने जीवन के कार्यकाल की अवधि में प्रायः कार्यालय में कार्यरत व्यक्ति लोगों से घिरे होते हैं । जिसके हाथ में जितना पावर उसके उतने ही अधिक चमचे । ऐसे में मतलब से ही सही उन्हें सलामी ठोकने वाले संख्या असंख्य होती हैं। ऐसे में जब वह अवकाश  प्राप्त करते हैं तो उन्हें कुछ ज्यादा ही खालीपन महसूस होने लगता है । उनके मन में एक नकारात्मक भाव उत्पन्न हो जाता है कि अब मैं किसी काम का नहीं रहा। अब मेरी कोई कद्र नहीं है। परिणामस्वरूप वह धीरे-धीरे अवसादग्रस्त होने लगते हैं। वह इतना अधिक चिड़चिड़े हो जाते हैं कि पराये तो पराये अपने भी उनसे कटने लगते हैं। स्थिति दिनोंदिन बद से बदतर होने लगती है। ऐसे में आवश्यकता है मनुस्मृति के अवलोकन की और चिंतन मनन की।

मनु ने मानव आयु को सामान्यत: एक सौ वर्ष की मानकर उसको चार बराबर भागों में बांटा है।
१) ब्रह्मचर्य, (२) गार्हस्थ्य, (३) वानप्रस्थ और (४) संन्यास।
जब सिर के बाल सफेद होने लगे और  शरीर पर झुर्रियाँ पड़ने लगे तब मनुष्य जीवन के तीसरे आश्रम-वानप्रस्थ-में प्रवेश करता है।
यूँ तो वानप्रस्थ का अर्थ वन प्रस्थान करने वाले से है लेकिन आज के परिप्रेक्ष्य में घर के झंझावातों तथा राग द्वेष से मुक्त होकर सामाजिक कार्य करने वाले व्यक्ति भी एक तरह से वानप्रस्थी ही हैं और सामाजिक संस्थाएँ आश्रम। क्योंकि मनुस्मृति में भी वानप्रस्थ के बारे में कहा गया है महर्षिपितृदेवानां गत्वानृण्यं यथाविधि। पुत्रे सर्व समासज्य वसेन्पाध्यस्थ्यमास्थित:।। ढलती उम्र में अपने पुत्र को गृहस्थी का उत्तरदायित्व सौंप दें। वानप्रस्थ ग्रहण करें और देव पितर व ऋषियों का ऋण चुकाएं। वानप्रस्थ आश्रम में उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन ढालने, समाज में निरंतर सद्ज्ञान, सद्भाव और कुप्रथाओं के विरोध आदि में काम करने का मौका मिलता है। जिससे लोक-परलोक सुधरता है।
इस हिसाब से यदि हम सकारात्मकता के साथ सोचेंगे तो यह जीवन संध्या हमारे जीवन का सबसे खूबसूरत और सुनहरा पल होता है बस आवश्यकता है आत्मसाक्षात्कार की ।

प्रत्येक मनुष्य की अपनी अभिरुचि होती है, अपने सपने होते हैं लेकिन वह रोजी-रोटी के चक्कर में वह सब छोड़ देता है। सामाजिक दायित्वों को निभाते – निभाते  स्वयं को भूल जाता है लेकिन कहीं न कहीं उनके मन के कोने में एक टीस रहती है कि काश मैं यह कर पाता।
ऐसे में अवकाशप्राप्त व्यक्तियों के लिए इससे अधिक सुनहरा समय भला क्या हो सकता है?
फिर निराश क्यों होना?
बस अपनी अभिरुचि को पहचानें और शुरु कर दें अपने मन का काम। जैसे किसी का रुझान संगीत की तरफ है तो गीत संगीत सीखने – सीखने में लग जायें। जिनको लेखन कार्य में अभिरुचि है तो लेखन आदि में  लग जायें या फिर समाजसेवा में लग जायें। यदि चाहें तो अपनी अभिरुचि के अनुसार ही संगठन या संस्था से जुड़ जायें क्योंकि वहाँ आपके मनोनुकूल लोग मिलेंगे तो विचार विनिमय करना अच्छा लगेगा।
जिस विषय में आपकी अच्छी पकड़ हो उसकी मुफ्त सेवा दें।
इस तरह से कितने ही कार्य या शौक आपके कार्यकाल के दौरान समयाभाव के कारण छूट गये हैं उन्हें जरूर करें। क्योंकि जिंदगी न मिलेगी दुबारा।
ऐसा करने से आप स्वतः अनुभव करेंगे कि जीवन यह समय जीवन की संध्या नहीं, बल्कि जीवन की खूबसूरत सुरभित, चहकती नई भोर है ।

अति सर्वत्र वर्जयते

दुनिया जहान के सभी बच्चे फले , फूले, खुश रहें, अपने लक्ष्य को प्राप्त करें, उनके सपने साकार हों यही शुभकामना है |
हमने देखी है अक्सर ही स्त्रियों के समस्याओं को लेकर परिचर्चा होती रहती है , आये दिन स्त्री विमर्श देखने सुनने तथा पढ़ने को मिल जाता है लेकिन बच्चे जाने अनजाने ही सही अपने अभिभावकों द्वारा सताये जाते हैं इस तरफ़ कम ही लोगों को ध्यान जा पाता है! प्रायः सभी के दिमाग में यह बात बैठा हुआ है कि माता – पिता तो बच्चों के सबसे शुभचिंतक होते हैं इसलिए वे जो भी करते हैं अपने बच्चों की भलाई के लिए ही करते हैं।

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नवरात्रि

हिन्दू धर्म में व्रत तीज त्योहार और अनुष्ठान का विशेष महत्व है। हर वर्ष चलने वाले इन उत्सवों और धार्मिक अनुष्ठानों को हिन्दू धर्म का प्राण माना जाता है इसीलिये अधिकांश लोग इन व्रत और त्योहारों को बेहद श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाते हैं।

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वर्तमान समय में साहित्य और समाज का सम्बन्ध।

वर्तमान समय में साहित्य जगत में एक अभूतपूर्व क्रान्ति आई है जिसका एक कारण महिलाओं का साहित्य जगत में प्रवेश भी है। चुकीं महिलाएँ सम्बन्धों को जोड़ने में मुख्य भूमिका निभाती आईं हैं अतः साहित्य जगत में भी नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी को आपस में जोड़ने का काम कर रही हैं, जिससे आज की पीढ़ी का भी रुझान हिन्दी की तरफ बढ़ रहा है।

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भारतीय_नारी_की_दशा

यह आलेख आज से चौंतीस वर्ष पूर्व मैंने लिखी थी ।

नारी की दशा हमारे देश में आदिकाल से ही सोचनीय रही है। पुरुष ने तो हमेशा ही नारी की उपेक्षा की है।
नारी के गौरव और प्रतिष्ठा के सबसे बड़े हिमायती मनु ने यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता कहकर भी नारी को धर्म शास्त्र सुनने का अधिकार नहीं दिया। महाकवि तुलसीदास ने भी

ढोल, गँवार, शुद्र, पशु, नारी।
ये सब तारन के अधिकारी

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गलतियों से ज्यादा गलत फहमियों और अधिक अपेक्षाओं की वजह से टूटते हैं रिश्ते।

मनुष्य जब किसी से भी भावनात्मक रूप से जुड़ता है तो उनके मध्य एक खूबसूरत रिश्ता कायम हो जाता है और उन रिश्तों के बीच उम्मीदें स्वतः ही जुड़ जातीं हैं फिर जब वह व्यक्ति विशेष उनके उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो हृदय बेवजह ही आहत हो जाता है। चुकीं ऐसे रिश्ते दिल से जुड़े होते हैं और दिल तो स्वयं ही पागल और कमजोर होता है तो वह इस आघात को सहन नहीं कर पाता है ऐसे में दिल टूटने के साथ ही दिल के रिश्ते भी टूटने लगते हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यकता होती है सूझबूझ से काम लेने की और ऐसे समय में सबसे बड़ी सलाहकार होती है अपनी मति।
कई बार तो ऐसा होता है कि कोई आहत होता है और दूसरे को इल्म तक नहीं होता क्यों कि कभी-कभी परिस्थितियाँ भी ऐसी बन जाती हैं कि एक दूसरे के मध्य गलत फहमियाँ पैदा हो जाती हैं ।

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लोहरी

लोहड़ी का त्यौहार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार पौष माह की आखिरी रात में मनाया जाता है।
यह त्योहार एक तरह से संग्रदियों के जाने और बसंत के मौसम के आने की आहट है। इस दिन अग्नि में फसलों का अंश भी समर्पित किया जाता है। कहा जाता है कि सूर्य और अग्नि जो ऊर्जा के बड़े स्रोत है उन्हें समर्पित है। लोहड़ी की रात सबसे ठंडी मानी जाती है। यह त्योहार मुख्यतः नई फसल की कटाई के मौके पर मनाया जाता है और रात को लोहड़ी जलाकर सभी रिश्तेदार और परिवार वाले पूजा करते हैं। इस मौके पर सभी एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं।

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