कवि तू अपने मन की लिख

कवि तू अपने मन की लिख

कोई कहता गज़ल लिखो
तो कोई कहता गीत
कोई कहता नफरत लिख दो
और कहे कोई प्रीत
चल तू अपने ही लय में मत
चाटुकारिता सीख

कवि तू अपने………………

चाहे लिख दे छन्द सुन्दरम्
या लिख होकर मुक्त
भाव चयन कर भर दे जो भी
तुझे लगे उपयुक्त
रस श्रृंगार में लिख सुकोमल
वीर रौद्र में चीख

कवि तू अपने…………..

कभी न चलना भेड़ चाल में
मान हमारी बात
करके मन ही मन में चिंतन
परख सभी जज्बात
लिख दे तू कुछ सबसे हटकर
बिन पकड़े ही लीक
कवि तू अपने………..

मंच सुशोभित कर कविवर
जग को कर उजियार
मिटा नफ़रतों को हर दिल से
भर दो थोड़ा प्यार
स्वयं बजेंगी तब तालियाँ
मत माँगना भीख

कवि तू अपने…………

दोस्ती

दोस्ती

तोल कर मैंने देखा, हरेक रिश्ते को ,
दोस्ती से भला कुछ लगा ही नहीं।
है हृदय से जुड़ा, खूबसूरत बड़ा,
राज जिससे हृदय का छुपा ही नहीं।

स्वार्थ से है रहित, स्नेह से है भरा,
इसीलिए तार दिल का, स्वयं ही जुड़ा।
झंकृत हो हृदय, सुन्दरम् छेड़े लय,
स्नेह का फिर सफ़र ये  रुका ही नहीं।
तोल कर मैंने देखा हरेक……..  …

बढ़े उससे खुशी, दुख हरे वह सभी,
साथ चाहे हृदय उसका, हरदम तभी।
अच्छे हों या बुरे, बात हर वह सुने,
उससे कुछ  कहने  से दिल, डरा ही नहीं ।
तोल कर मैंने देखा हरेक………….

पाक एहसास है, साफ़ जज्बात है,
उसकी बातों में कुछ तो, अलग बात है।
कितना भी कहूँ, कितना भी गुनूँ,
कहने से मगर दिल, भरा ही नहीं।
तोल कर मैंने देखा हरेक………….

उससे मिलता है दम, भूल जाता है गम ,
इसलिये मुझको होता है, कुछ – कुछ भरम्।
समझे जो मरम, मित्र मेरा परम्,
तो लगे वो कहीं, खुद खुदा तो नहीं।
तोल कर मैंने देखा हरेक………….

मौत आना फिर कभी

जीने दो भरपूर मुझको
खुद बुलाऊँगी मैं तुझको
देख न बिखरा पड़ा हर
काम बाकी है अभी
मौत आना फिर कभी

क्यों डराती है तू इतना
प्राण लेगी और कितना
भोली – भाली जिंदगी का
हक न छीन तू सभी
मौत आना फिर कभी

फिर हमें सताना नहीं
बिन बुलाये आना नहीं
स्वाभिमानिनी तुझे भी
मान लूंगी मैं तभी
मौत आना फिर कभी

कर कपाट बन्द मैं
लिख रही हूँ छन्द मैं
मैं चलूंगी साथ तेरे
गीत पूरे हों जभी
मौत आना फिर कभी

मौत नर्तन कर रही है

बाँधकर घुंघरू को पग में
चूर होकर अपने मद में।
मटक, मटक लचक, लचक
भावों में विचर रही है
मौत नर्तन कर रही है

है चढ़ाये त्योरियाँ वह
नयनो से ही दे रही कह
नर्तकी परिपक्वता से
रूप नव – नव धर रही है
मौत नर्तन कर रही है

बाँधकर अद्भुत शमा वह
दिखलाती अपनी कला वह
सम्मोहित कर जादूगरनी
नित्य ही सँवर रही है
मौत नर्तन कर रही है

खींचती है पास अपने
आँखें देखतीं हैं सपने
थिरक – थिरक संग उसके
जिंदगी सिहर रही है
मौत नर्तन कर रही है

आओ दीया जलायें


आओ दीया जलायें
विश्वास की बाती में
घृत प्रेम का मिलायें
खुशियों की ज्योति में हम
दुख का तिमिर मिटायें
आओ दीया जलायें

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मेंहदी

एक जमाना था
जब मेंहदी की पत्तियों को
तोड़ कर
सिल पर महीन पीस कर
सीक के सहारे
हथेलियों पर उकेर दिये जाते थे
फूल पत्तियों के मध्य
पिया का नाम

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एक चिट्ठी भाई के नाम


जैसे ही नैहर की
चौकठ पर
मैंने रखा पांव
सज – धजकर खड़ी थी भौजाई
लेकर हांथो में सजी
थाल

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आसमान चाहिए

मैं समझती हूँ
तुम्हारे भावनाओं को
तब से
जब से तुमने पूर्ण विश्वास के साथ
मुझे सौप दिये थे
अपना घर ,परिवार
और मैं

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चूड़ियाँ

कितनी मधुर होती हैं
चूड़ियों की खनकार
जिनके मधुर संगीत
मंत्रमुग्ध कर देती हैं
साजन को
खींच लेती हैं उनके
मन की डोर

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