नमस्ते आंटी

नमस्ते आंटी, एक पतली – दुबली, लम्बी, छरहरी लगभग हमउम्र महिला के मुंह से आंटी सम्बोधन सुनकर कल्याणी थोड़ा असहज हो गई फिर भी थोड़ा खुद को संयमित करते हुए कुसुम को बैठने के लिए कह कर मन ही मन – ही – मन सोचने लगी  – क्या मैं सचमुच इतनी बुड्ढी हो गई हूँ कि वह आंटी बोले, फिर एक तिरछी नज़र कुसुम पर डालते हुए बुदबुदाई – हुंह! ये औरत खुद को क्या सोलह बरस की बाला समझ रही है । मन में तो आया कि उसे टोक दे लेकिन अभी कुछ ही महीने पहले कुसुम का परिवार कल्याणी के मुहल्ले में शिफ्ट हुआ था – इस दौरान आते-जाते दो – चार बार कुसुम से आमना – सामना हुआ था। हर बार कुसुम के मुंह से अपने लिए आंटी का सम्बोधन सुनकर वह सोच में पड़ जाती, पर शिष्टाचार वश कुछ कह नहीं पाती। आज पहली बार कुसुम उसके घर आई थी इसीलिए कल्याणी ने सोचा पहली बार घर आये आगन्तुक के साथ ऐसा कुछ कहना अशिष्टता होगी। अतः औपचारिक बातचीत के क्रम में उक्त महिला का परिचय तथा रुचि – अरुचि पूछते हुए चाय नाश्ता का प्रबन्ध करने लगी।  फिर तो वो महिला अपना डाइट गिनाने लगी साथ ही अपना फिगर मेंटेन रखने की रामकथा भी। बातों – बातों में कहने लगी कि जब मैं अपने बेटे के साथ कहीं जाती हूँ तो सभी कहते हैं कि अरे ये तेरी बहन है? यह बात कहते हुए उसके चेहरे पर गर्व और खुशी की रेखा स्पस्ट दिखाई दे रही थी लेकिन कल्याणी को यह सब सुनकर अन्दर ही अन्दर हँसी आ रही थी क्योंकि उस महिला के चेहरे की त्वचा और आँखों के आसपास की खिंची रेखाएं उसकी उम्र नापने के लिए पर्याप्त थीं।
वे दोनों बात – चीत कर ही रही थीं कि कल्याणी की छोटी बहन भी आ गई। वह कल्याणी से करीब दस वर्ष छोटी थी। हद तो तब हो गई जब कुसुम उसे भी मौसी कहकर सम्बोधित करने लगी । इस बात पर कल्याणी और उसकी बहन दोनों ही जोर – जोर से हँसने लगीं। वे क्यों हँसी इसबात को शायद कुसुम समझी नहीं या फिर समझना नहीं चाहती थी इसलिये अपना सम्बोधन जारी रखी। तभी कल्याणी की हमउम्र एक और पड़ोसन अपने पति की प्रमोशन की खुशी में मिठाई का डिब्बा लिये आ गईं और डब्बा खोलकर कुसुम की तरफ़ मुखातिब होकर बोलीं नमस्ते आँटी मिठाई लीजये ।
कुसुम को जैसे जोर का करंट लग गया, उसने त्वरित प्रतिक्रिया दी  आँटी???
मैं किस हिसाब से आपकी आँटी हो गई?
फिर वह पड़ोसन बोली जिस हिसाब से कल्याणी जी आपकी आँटी  हैं।
यह सुन कुसुम का मुंह देखने लायक था।
कल्याणी का घर ठहाकों से गूँज उठा।

जीवन संगीत

आसमान बादल की चादर ओढ़े अपनी प्रिया धरा को एक टक निहार रहा था. धरा भी मिलन की आस में आसमान से मौन गुहार कर रही थी, तब उसे आसमान से दूरी और उसकी मजबूरी का खयाल ही नहीं रहा,तभी जोरों की आवाज़ से सिहर उठती है धरती, यह आसमान के हृदय की तड़प ही तो थी जिसे हम मानव बिजली का कड़कना और बादलों का गर्जना कहते हैं।धरा के मौन निमन्त्रण को गगन बखूबी समझता है।तभी तो मजबूर होकर उसके हृदय की पीड़ा छलक पड़ती है जिसे हम वर्षा कहते हैं बर्सात में खिड़की से आसमान को निहारते हुए प्राची अपने ही भावनाओं के सागर में गोते लगा रही थी कि तभी मोबाइल की घंटी बजी…..प्राची हमेशा की तरह जल्दी – जल्दी मोबाइल उठाई क्योंकि उसे पता था कि यह काॅल रोहित का ही होगा, यही क्यों उसे तो इतना भी पता था कि रोहित बोलेंगे आज थोड़ी देर हो जायेगी तुम खाना खाकर सो जाना।ठीक ऐसा ही हुआ,.उधर से रोहित ने कहा बहुत जरूरी मीटिंग में फँस गया था प्राची…. देर हो सकती है तुम खाना खाकर सो जाना… ।ठीक है तो पहले बताना था न मैं तो कुछ भी खा लेती, आपके लिये ही तो बनाया है मैंने.ओह डियर कल सुबह ब्रेक फास्ट में खा लेंगे न टेंशन मत लो. रोहित प्राची को थोड़ा मनाते हुए  बोला.हाँ और बोलोगे कि मैं तुम्हे बासी खाना खिलाती हूँ.ज्यादा देर मत करना.ओकेमोबाइल आॅफ करके प्राची फिर आसमान की तरफ़ देखने लगी और सोचने लगी कि धरती आसमान की तो दूरी और मजबूरी समझ में आती है लेकिन मैं और रोहित तो पास रहकर भी इतने दूर होते जा रहे हैं. क्या वाकई वजह काम है या फिर………. ओह नहीं नहीं मुझे अपने पति पर इतना शक नहीं करना चाहिए, आखिर बेचारे हम सभी के लिए ही तो इतना मेहनत करते हैं और एक मैं हूँ कि……. सच कहते हैं सभी, स्त्रियों का स्वभाव ही शकी होता है. लेकिन यह भी तो सही है कि जहाँ अधिक प्रेम होता है वहाँ शक पैदा हो ही जाता है. क्यों अपने-आप को भी कोसूँ सोचती हुई प्राची टेबल पर रखे हुए गिलास का पूरा पानी गटक गई. तभी फिर मोबाइल रिंग किया, इस बार भी प्राची समझ गई थी कि जरूर माँ का फोन होगा क्योंकि रोज रात को साढ़े नौ बजे मैं माँ से जरूर बातें कर लेती थी और आज…… हेले अम्मा कैसी हो? ठीक हूँ तुम खाना खा ली. हाँ अम्मा…. प्राची झूठ बोल दी क्योंकि उसे पता था कि अगर सच बोल देती तो अम्मा दस और सवाल दाग देतीं और शुरू कर देतीं अपना प्रवचन. अच्छा क्या खाई? कितना पूछती हो अम्मा तुम बताओ तुम क्या खाई. और कब आ रही हो.?कैसे आऊँ बेटी स्कूल से छुट्टी मिलती ही नहीं है,. इस बार भी गर्मी की छुट्टियों में एक्स्ट्रा क्लास लेना है तुम दोनों ही आ जाओ न तुम्हारा भी मन बदल जायेगा. कैसे आयें अम्मा रोहित को तो फुर्सत ही नहीं है और तुम्हीं तो हमेशा कहती रहती हो कि रोहित को अकेले मत छोड़ना वर्ना मैं तो अकेले आ ही जाती . नहीं – नहीं अकेले मत छोड़ना प्राची की अम्मा आदेशात्मक अंदाज में कही क्योंकि उसे हमेशा ही यह डर सताता था कि जो उस पर गुजरी है वह उसकी बेटी पर कतई नहीं गुजरे. प्राची के पापा भी तो मुझे कम प्यार नहीं करते थे लेकिन न जाने कौन सी मनहूस घड़ी थी कि मैं प्राची को पढ़ाने के लिए एक लेडी टीचर रख दी. मेरी अम्मा को भी उसी समय बीमार होना था. दो ही महीने के लिए ही तो गई थी और उसी में ….. काश कि न गई होती तो आज प्राची के पिता उस टीचर के साथ नहीं मेरे साथ होते सोचते हुए प्राची की अम्मा के आँखों के कोरों से दो बूँद आँसू के छलकने को थे कि तभी उसने अपनी आँचल के कोरों से पोछ लिया. तो अम्मा तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ? क्या हुआ अम्मा अचानक चुप क्यों हो गई..? अरे कुछ नहीं तेरी मौसी का काल आ रहा है तुम फोन काट दो. प्राची की अम्मा झूठ बोलकर फोन काट दी अपने कांटेदार अतीत में भ्रमण करने लगी. ठीक है अम्मा मैं भी जाती हूँ अब बच्चों से बात करने. प्राची बेटे को काॅल करने लगी लेकिन उधर से आवाज आ रही थी द डायल नम्बर इज नाॅट रिचेबुल… प्राची मन में भुनभुनाये जा रही थी जरूर वीकेंड में बाहर घूमने निकल गया होगा, बच्चे बाहर निकले नहीं कि बेलगाम घोड़ा बन जाते हैं,. गुस्से में वह अपनी रोज की रुटीन की तरह ही अपनी बेटी कै काॅल की. मम्मा मैं एक फ्रेंड के साथ हूँ थोड़ी देर बाद काॅल करती हूँ. प्राची को पता है कि फ्रेंड्स के साथ होने पर मैडम का थोड़ी देर कब आयेगा. किसी को मेरी फिक्र नहीं सभी का फिक्र मैं ही करूँ. मन ही मन भुनभुनाती हुई प्राची बिस्तर पर लेट गई. नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी .  प्रतीक्षा की घड़ी काटे नहीं कट रही थी. तभी दरवाजे की घंटी बजी तो वह बिजली की तरह भागे गई और दरवाजा खोल दी. हाथ – मुंह धो लो खाना लगाती हूँ. मैंने कहा था न खा लेना फिर भी…. मुझे भूख नहीं है काफी थक गया हूँ. ए सी आॅन है न? हाँ.  रोहित इतना थका  था कि बिस्तर पर जाते ही उसे नींद अपने आगोश में ले ली और प्राची की वह भी रात अधिकांश रातों की तरह करवटों में कटी । प्राची सुबह उनींदी सी उठी और जैसे ही उसकी नज़र कैलेंडर पर पड़ी उसे याद आया कि आज तो हमरी मैरिज एनिवर्सरी है. वह जल्दी – जल्दी वार्डरोब से गुलाबी सूट निकालकर बाथरूम की तरफ़ भागी और फ्रेश होकर कपड़े बदल ली. गमले में लाल गुलाब खिला हुआ था सोची कि आज गुलाब के साथ पति को चाय सर्व करूंगी. वैसे तो प्राची और रोहित के विवाह के बीस वर्ष पूरे हो चुके थे लेकिन वह जब उस दिन वह गुलाबी सूट में सब आइने के सामने खड़ी हुई तो पीछे से रोहित को देख कर उसकी आँखें यूँ शरमाई जैसे वह नव विवाहिता हो. लेकिन अगले ही पल वह धीर – गम्भीर पौढ़ा स्त्री हो गई जब रोहित ने उसे देखकर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. फिर भी वह हिम्मत नहीं हारी और गुलाब के साथ दो कप चाय लेकर आई. आपको तो काम के चक्कर में हमारी मैरिज एनिवर्सरी भी याद नहीं है न. ओह प्राची अब कौन सी हमारी नई – नई शादी हुई है यह सब दिखावा वही करते हैं जिसके पास कोई काम नहीं होता और अपने रिश्तों पर भरोसा नहीं होता. मैं तो तुम्हारा ही हूँ. अच्छा अच्छा ठीक है तो जब मेरे हैं तो मंदिर तो चल ही सकते हैं न? नहीं प्राची तुम ड्राइवर के साथ चली जाओ मुझे किसी जरूरी मीटिंग के लिए निकलना है जाने में करीब दो ती घंटे लग जायेंगे उसमें भी अगर कहीं ट्रेफिक का प्राब्लम हो गया तो……… तुम तैयार रहना हम शाम को जरूर मूवी देखने चलेंगे. उस समय भी प्राची एक समझदार पत्नी की तरह अपनी इच्छाओं को मन में ही दफ़्न कर हमेशा की ही तरह होठों पर कृत्रिम मुस्कान बिखेर दी. वह नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से रोहित को कोई परेशानी हो. प्राची प्रतीक्षा कर रही थी और हर बार की तरह इस बार भी रोहित समय पर नहीं आया. प्राची रोहित के मोबाइल पर रिंग करने लगी लेकिन उधर से आउट आफ रेंज बता रहा था थक हार कर प्राची रोहित को एक मैसेज छोड़कर दुखी मन से अकेली ही मूवी देखने चली गई. मूवी तो अच्छी थी लेकिन प्राची का मन मूवी देखने में नहीं लग रहा था क्योंकि एक तो उसे रोहित की प्रतीक्षा थी और दूसरे उसकी बगल वाले सीट पर एक अविवाहित जोड़ा बात करके उसकी तंद्रा भंग कर देते थे. बीच-बीच में वह एक दो बार उस जोड़े को टोकी भी लेकिन कुछ दे चुप्पी के बाद वे फिर बातें करने लगते थे इसलिए वह थक हार कर टोकना छोड़ दी और मूवी की बजाय वह उन दोनो की बातें सुनने लगी. फिल्म के इंटरवल में प्राची उन दोनों जोड़ी से औपचारिक बातें करने लगी और बातों-बातों में वह उनसे इतना प्रभावित हो गई कि उनकी सहायता करने के लिए  मिलने को अपने घर आमन्त्रित कर दी. अब एक जोड़ी को इससे अधिक और क्या चाहिये इसलिये जोड़ी ने सधन्यवाद, सहर्ष स्वीकार कर लिया. 
जब प्राची के घर जोड़े पहुंचे तो प्राची को लगा कि जैसे पतझड़ में बसंत का आगमन हो गया हो. वह उन दोनों को अपने गेस्ट रूम में छोड़ कर सोचते – सोचते अपने अतीत में चली गई. उसने भी तो कभी किसी से प्यार किया था. तब मन हमेशा ही अपने प्रेमी से मिलने के लिए एक सुरक्षित कोना ढूढता था जो कि बामुश्किल ही मिलता था और मिलने पर हमेशा ही यह डर सताता था कि कहीं कोई देख न ले. उसे अपना प्यार हासिल न हो सका जिसकी कसक उसके मन में आज तक है. शायद इसीलिए वह उनकी मदद करने का मन बना ली थी क्योंकि दर्द वही महसूस कर सकता है जिसने दर्द झेला हो. अब जोड़ी हफ्ते में एक या दो बार तो प्राची के घर आ ही जाया करती थी इसीलिए प्राची का अकेलापन कुछ हद तक दूर हो गया. अब प्राची को उन दोनों से धीरे-धीरे इतना अपनापन बढ़ने लगा कि वह उसके परिवार की तरह हो गये . जोड़े मे लड़का नितेश अनाथ था तो उसे प्राची में अपनी माँ नज़र आने लगी इसलिए वह उसकी कोई भी बात नहीं टालता था. लड़की शिखा की माँ थी जो कि शिखा के विवाह के लिए एक सपनो का राजकुमार ढूढने का सपना देख रही थी इसलिए शिखा अपनी माँ से अपने प्रेम की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. तभी एक दिन अचानक शिखा की माँ एक लड़के की तस्वीर और बायोडाटा दिखाते हुए बोली कि देखो मुझे तो यह लड़का तुम्हारे लिए बहुत सही लग रहा है तुम मिल लो. शिखा – क्या ममा शादी की इतनी जल्दी भी क्या है अभी तो मुझे जाॅब छोड़कर मास्टर डिग्री लेनी है. देखो बेटा वह सब करते रहना अच्छे लड़के बड़े मुश्किल से मिलते हैं तबतक इंगेजमेंट तो कर ही सकते हैं न ताकि तुम दोनो एक – दूसरे को अच्छी तरह से जान समझ सको. शिखा जब देखी कि माँ उसकी एक न सुनने वाली हैं तो वह उससे नितेश के बारे में बताई. क्या करता है लड़का और कहाँ का है, उसके माँ बाप क्या करते हैं? लगातार शिखा की माँ प्रश्नों की झड़ी लगा दी. शिखा – लड़का अनाथ है और बी टेक करके अभी – अभी एक कम्पनी में  नौकरी ज्वाइन किया है. क्या अनाथ..? शिखा की माँ चिल्ला पड़ी। हाँ माँ नितेश बहुत अच्छा लड़का है और वह मुझे खुश भी रखेगा एक बार तुम उससे मिल तो लो. नहीं कुछ भी हो जाये मैं अपनी बेटी की शादी एक अनाथ लड़के से नहीं कर सकती. शिखा मायूस हो गई और अपनी माँ से बोल दी कि ठीक है ममा फिर मुझे कहीं भी शादी ही नहीं करनी है. प्राची के घर फिर दोनों मिलने आते हैं लेकिन इस बार शिखा की आँखों में उदासी के काजल लगे हुए थे. प्राची उसके मन के भावों को पढ़ ली थी इसीलिए पूछ भी ली क्या हुआ शिखा तबियत तो ठीक है न? हाँ दी बस कल मम्मा से बकझक हो गई. क्या? वो बस मेरी शादी करने के लिए एक लड़के से मिलने की जिद्द कर रही थीं. तो तुमने क्या कहा? मैंने तो साफ़ – साफ़ नितेश के बारे में बता दिया लेकिन……. लेकिन क्या? नितेश और शिखा दोनो एक साथ प्रश्न कर बैठे? वो इन्कार कर दीं पर मैंने भी साफ़ कह दिया कि अगर नितेश से शादी नहीं करूंगी तो किसी से भी नहीं करूंगी भले ही आजीवन कुंवारी रह जाऊँ. अरे ऐसे – कैसे कुंवारी रह जाओगी? तुम दोनों की शादी होकर रहेगी, मैं हूँ न… तुम्हारी मम्मी को मैं मनाऊँगी.. प्राची एकाएक बड़े ही आत्मविश्वास के साथ बोल पड़ी. शिखा की आँखों में खुशी के आँसू छलक आये और वह प्राची के गले से लिपट गई. प्राची बोली तुम अपनी मम्मी से मुझे मिलवाओ. ओ के दी शिखा अपनी मम्मा और प्राची की मीटिंग करवा दी. शिखा के द्वारा आज की जेनरेशन का हवाला देकर बहुत समझाने के बाद शिखा की माँ अनमने ढंग से ही उन दोनों के विवाह के लिए राजी हो गई. अब शिखा और नितेश के मन में प्राची के लिए और भी सम्मान का भाव पनपने लगा. दोनों का इंगेजमेंट हो गया. नितेश की तरफ से नितेश की दीदी और माँ की भूमिका में प्राची ही थी इसीलिए नितेश के लिए प्राची दुनिया की सर्वश्रेष्ठ महिला लगने लगी. अब नितेश की बातों में हमेशा ही प्राची की तारीफ होती जिससे सहमत होते हुए भी कभी-कभी शिखा का स्त्री मन आहत  होता क्यों कि आमतौर स्त्री हो या पुरुष अपने प्रेमी या प्रेमिका से सिर्फ अपनी ही तारीफ़ सुनना चाहते हैं इसलिए किसी और का बखान सुनकर हृदय के चूल्हे में ईर्ष्या की चिनगी सुलगना स्वाभाविक ही है भले ही प्रेमी प्रेमिका या पति – पत्नी इस भाव को व्यक्त नहीं करें. नितेश प्राची के हर कार्य में तत्पर रहता वो चाहे शापिंग कराने का हो, बैंक जाना हो, या फिर हास्पिटल आदि का. एक तरह से प्राची को एक भाई मिल गया और नितेश को एक माँ के रूप में बड़ी बहन जो कि जिंदगी के हर मुश्किल घड़ी में एक गाइड का काम करती. नितेश और शिखा के विवाह का डेट फाइनल हो गया और शुरु हो गई शादी की तैयारी. अब चाहे ज्वैलरी खरीदनी हो या फिर साड़ी – लहंगा हो या फिर वेडिंग के अन्य डिसीजन नितेश के साथ हमेशा प्राची होती. प्राची को इन सभी कामों में मन लगता था फिर भी वह ड्रेस और ज्वैलरी का डिजाइन शिखा को दिखा कर उसकी पसंद जानकर ही उसके लिए कुछ लेती थी. प्राची और नितेश तो सब शिखा के लिए ही करते लेकिन शिखा के मन के कोने में यह तो लगता ही था कि मेरी पसंद तो नितेश भी पूछ सकता था. इन सब बातों से अनजान प्राची उनके विवाह की तैयारी में मशगूल थी. अगले दिन शिखा का जन्मदिन था नितेश प्राची को लेकर ही तनिष्क के शो रूम में गया और शिखा के लिए एक इयर रिंग खरीद लिया. खरीदते समय उसकी कल्पना में शिखा का इयर रिंग पहने चेहरा मन मोह रहा था. वह सोच रहा था कि अचानक जब मैं शिखा को सरप्राइज दूंगा तो कितनी खुश हो जायेगी. शो रूम से बाहर आकर प्राची जैसे ही रोड क्रास करना चाही एक तेज चलती हुई गाड़ी से उसे धक्का लग गया और वह जा गिरी. खून से लतपथ उसे देखकर नितेश की तो जान ही निकलने लगी. वह जोर जोर से चिल्लाने लगा दी एक तुम ही तो मेरी जिन्दगी में अपनी थी मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा. तुम्हें  ठीक होना ही होगा , तुम्हें ही तो मेरी शादी करवानी है. नितेश अपने-आप को सम्हालते हुए प्राची के पति को काॅल कर दिया और प्राची को लेकर सीधे हास्पिटल पहुंच गया.डाॅक्टर अपने काम में लगे थे और वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि मेरी दी को किसी भी कीमत पर बचा लो. मेरे पास मेरी दी के अलावा इस दुनिया में अपना कोई नहीं है. तभी नर्स बाहर आई और बोली खून अधिक बह जाने से पेशेंट बेहोश हो गई थी आपका खून मैच कर गया है अब पेशेंट खतरे से बाहर है. थैंक्स गाॅड नितेश के मुख से अचानक निकल गया आखिर कैसे न खून मिलता मैं प्राची दी का भाई हूँ. इधर प्राची और नितेश खून के रिश्तों में बंध रहे थे और उधर शिखा के जन्मदिन पर नितेश के अनुपस्थित होने पर शिखा का दिल का टूट रहा था. नितेश को जब याद आई तो रात के साढ़े बारह बज चुके थे. उसने अपना मोबाइल निकाला तो देखा उसका स्विच आॅफ है. वह हड़बड़ा कर वह प्राची के मोबाइल से शिखा को स्थिति बताने के लिए फोन करना चाहा लेकिन  शिखा मोबाइल नहीं उठाई. फिर वह अगले दिन अपना मोबाइल चार्ज करके बात करना चाहा फिर भी शिखा गुस्से से मोबाइल नहीं उठाई. ऐसे ही तीन – चार दिन बीत गये. नितेश ने बहुत सारा मैसेज किया लेकिन कोई उत्तर नहीं आया क्योंकि गुस्से से शिखा मैसेज भी नहीं देखी. सोच रही थी माँ ठीक ही कह रहीं थीं. मैं शादी के लिए कुछ ज्यादा ही जल्दबाजी कर दी. अब तो सोचना पड़ेगा. अभी से ये हाल है तो शादी के बाद तो और भी…… इधर शिखा नकारात्मकता के अंधेरे में घिरी जा रही थी और उधर नितेश प्राची की सेवा में लगा था. जब प्राची स्वस्थ हुई तो वह नितेश से पूछी इयर रिंग शिखा को पसंद आई? अभी तो मैंने उसे दिया ही नहीं दी नितेश बोला. अब तक नहीं दिया यह तो तुमने गलत किया और शिखा आई भी नहीं उसे पता नहीं है क्या मेरी तबियत के बारे में. नहीं दी दर-असल उस दिन मैंने उसे बताया ही नहीं कि खामखा वह अपने बर्थ-डे के दिन परेशान हो जाती. तो दूसरे दिन बता देते. कैसे बताता दी वो मोबाइल उठाये तब तो नितेश मन ही मन बोला लेकिन ऊपर से मौन रहा. अच्छा तो तुम मेरी सेवा का सारा क्रेडिट खुद लेना चाहते थे न? लाओ मैं उसे काॅल करती हूँ. प्राची शिखा का नम्बर डायल की उधर से शिखा का आवज आया नमस्ते दी कैसी हैं? चुपचाप तुम सीधे घर आ जाओ अब मैं तुमसे सेवा करवाऊँगी. क्या हुआ दी? आओ तो. आती हूँ दी. शिखा जल्दी – जल्दी तैयार होकर प्राची के घर गई. प्राची के घर  नितेश को पहले से ही देख कर उसका गुस्सा और भी बढ़ गया इसलिए नितेश की तरफ से उसने अपनी नज़रें फेर ली और सीधे प्राची के कमरे में चली गई. प्राची के कमरे में जाते ही उसे अपने-आप पर गुस्सा आने लगा. उसकी नज़र में नितेश का कद और भी बढ़ गया और वह अपने-आप को बहुत छोटा महसूस करने लगी. बाहर आकर नम आँखों से नितेश से आँखों ही आँखों में माफ़ी माँगने लगी. नितेश उसे बांहों में भरकर गले से लगा लिया और उसे इयर रिंग थमाते हुए माथे पर एक चुंबन जड़ दिया. दोनों के सांसों की सरगम में जीवन संगीत बज उठी. और प्राची के मन के आँगन में शहनाई गूँज उठी.

वादा

लाॅकडाउन में पिता की मृत्यु से महेंद्र बाबू की आँखों में आँसुओं के बाढ़ में अनेक स्वप्न महल ढहने लगे। अभी कुछ ही वर्ष पहले तो माँ की मृत्यु हुई थी जिसके श्राद्ध कर्म में करीब दस हजार से भी अधिक व्यक्ति सम्मिलित हुए थे। पूरे गाँव में इस श्राद्ध कर्म की चर्चा होने लगी थी। कुछ मृत्यु के आसपास पहुंचे बुजुर्गों की भी यही इच्छा होती थी कि काश मेरे भी बेटे मेरा श्राद्ध कर्म इतने ही धूमधाम से करें। और महेंद्र बाबू के पिता तो कह भी दिये कि ए बेटा जब हम मरेंगे त हमरो श्राद्ध कर्म असहिये करना । अपने बाप से बेइमानी मत कर देना ।
वह मन ही मन सोच रहे थे कि सच में यह हम पुरुष लोगन का अभागे ही हैं कि वे अपने बेटे – बेटियों को कितना भी स्नेह कर लें पर उनकी गिनती में तो बाप  का जगह माँ के बाद ही आता है। इस पर महेंद्र बाबू बोले थे – बाबू जी तनि भरोसा कीजिए आपका श्राद्ध कर्म हम माँ से भी बढ़िया से करेंगे। हाँ बस हमें छोड़ कर जाने की जल्दी मत कीजियेगा। इस बात पर महेंद्र बाबू के पिता की आँखें एक विश्वास की ज्योति से चमक उठीं थी ।
आज अतीत महेन्द्र बाबू की आँखों में तैर रहा था और महेंद्र बाबू काल के जंजीरों में जकड़े किंकर्तव्यविमूढ़ अपने पिता की मृत देह को निहार रहे थे।
तभी महेंद्र बाबू का मोबाइल रिंग किया उधर से उनके अफसर भाई सुरेन्द्र बाबू का काॅल आया – सुरेन्द्र बाबू का आवाज़ तो कुछ भर्राया हुआ ही था लेकिन वह खुद को सम्हालते हुए अपने भाई को समझाते हुए बोले –
अभी पूरी दुनिया कोरोना जैसे महामारी से लड़ रही है ऐसे में ज्यादा भीड़ – भाड़ इकट्ठा करने की जरूरत नहीं है इसीलिए जो जान गया सो आये लेकिन किसी के घर यह खबर देकर अन्त्येष्टि में जाने के लिए बुलाहट मत भेजना। प्रवाह में जाने के लिए बीस आदमी से एक भी अधिक नहीं होना चाहिए।
महेंद्र बाबू – भाई जी यह तो ठीक न होगा। गाँव समाज की बात है। लोगों को समझाना मुश्किल होगा ।
सुरेन्द्र बाबू – क्या मुश्किल होगा? हम इंटलेक्चुअल पर्सन हैं यदि हम ही सरकारी रूल फाॅलो नहीं करेंगे तो औरों को क्या कहेंगे। किसी भी कीमत पर बीस से अधिक आदमी नहीं जायेगा।
महेंद्र बाबू के मन के तराजू के एक पलड़े में अपने पिता को दिया गया वचन तो दूसरे पलड़े में अपने आदर्श बड़े भाई का आदेश। ऐसे में जब जब दिल से काम लेते तो बाबू जी को दिये गये वचन का पलड़ा भारी लगता और जब दिमाग से काम लेते तो अपने भाई का आदेश का। उनके दिल और दिमाग के मध्य जंग छिड़ गई तभी गाँव के मुखिया जी पधारे।
का सोच रहे हैं महेन्दर हम अभी जिंदा हैं और हमारे रहते हमारे गाँव में कोरोना का बाप भी नहीं आ सकता। नउआ को बुला के बोलाहटा भेजवाइये। किसका मजाल है कि हमारे गाँव के मजल पर नज़र गड़ाने की। सब थाना पुलिस मैनेज हो जायेगा। तनिको चिंता मत करिये आप।
महेंद्र बाबू – उ त है बाकी भाई जी न अलगे राग अलाप रहे हैं, कह रहे हैं कि बीसे आदमी घाट पर जायेगा।
मुखिया जी – अरे उ सुरेन्दर बाबू अफसर हैं इसलिए शहरी नियम कानून की बात कर रहे हैं। हम तो देहाती गंगा किनारे वाले हैं जरा नज़र गड़ा के देखिये तो इहां से उहां तक कवनो को कोरोना हुआ है? अरे इ सब हमारी अर्थव्यवस्था ठप्प करने की चीन डबलू एच ओ की सेनेटाइजर अउर मास्क बेचने की साजिश है। तभिये तो कबो स्वाइन फ्लू त कबो चिकेन गुनिया त कबो कोरोना.…………. ।
मुखिया जी महेन्दर बाबू के दिल की बात कह रहे थे इसलिए वह गांव में घाट जाने के लिए बोलाहटा भिजवा दिये। इधर सुरेन्दर बाबू भी पहुंच कर लाख भाषण देते रह गये लेकिन उनकी  एक न चली। घाट पर चार – पाँच सौ लोगों की भीड़, वहाँ एक टेंट लगा था, सभी गर्मी से बचने के लिए एकदूसरे से सट – सट कर टेंट में बैठे थे। शर्बत, पानी, फल, मेवा, मिष्ठान चल रहा था। सुरेन्द्र बाबू मुखाग्नि दे रहे थे और उनके मन के डर की चिता में पूरा गाँव जलता हुआ दिखाई दे रहा था।
दाह संस्कार निर्बाध रूप से सम्पूर्ण हुआ। इसके बाद जहाँ महेंद्र बाबू के मुख पर पितृ शोक के बावजूद भी विजय का भाव दिखाई दे रहा था वहीं सुरेन्द्र बाबू के मन में अपराधबोध और आशंका ।
इस विजय के बाद बारी आई श्राद्ध कर्म की। सुरेन्द्र बाबू फिर भी भाई को समझाये कि नियम न तोड़े। श्राद्ध कर्म में पचास आदमी से अधिक नहीं जुटना चाहिए। पितृ ऋण चुकता करने के और भी बहुत से तरीके हैं। लेकिन इस बात पर भी महेंद्र बाबू अपनी तथा अपने पिता की प्रतिष्ठा की दुहाई देने लगे। सुरेन्द्र बाबू बोले भी कि अगले वर्ष चौगुना लोगों को बुला लेना पर उस समय तो जैसे लग रहा था कि महेंद्र बाबू पर पागलपन सवार था इसीलिए वह किसी की भी सुन नहीं रहे थे ऊपर से उनके सिर पर मुखिया जी का हाथ था ।
सुरेन्द्र बाबू मुखाग्नि देने के बाद महेंद्र बाबू को समझा – बुझाकर उन्हें ही आगे का कार्यभार देकर अपनी ड्युटी पर चले गये। इधर महेंद्र बाबू जोर – शोर से श्राद्ध कर्म की तैयारी करने लगे। जिला – जवार के लोगों को आमंत्रित करने में आमन्त्रण कार्ड छपने चला गया।
तैयारी जोरो पर थी तभी पूरे गाँव में ख़बर फैल गई कि मुखिया जी को खांसी और बुखार हो गया था और चेक करवाने पर कोरोना निकल गया इसलिए उन्हें कोरन्टाइन सेंटर ले जाया जा रहा है।
इ कइसे हो गया..? महेंद्र बाबू ग्रामीण से सवाल दाग दिये।
ए बाबू इ कोरोना एटम बमों से बड़का खतरनाक है। आ उ बड़ छोट थोड़े न देखता है… बहुते भांज रहे थे मुखिया जी अब निकल गया न सब मुखियागिरी…
ग्रामीणों की बात सुनकर महेंद्र बाबू थर्मामीटर लेकर अपना बुखार नापने लगे। उस समय तो लग रहा था कि उन्हें भी कोरोना पकड़ लिया है।
एक तो पूरे गाँव में कोरोना फैलने का डर और दूसरे श्राद्ध कर्म के खण्डित होने का खतरा।
महेंद्र बाबू के कानों में अपने भाई जी सुरेन्द्र बाबू की कही गई एक – एक बात गूँज रही थी। सामने पिता के श्राद्ध में आमंत्रण के लिए कार्ड पड़ा हुआ था। मन में सोच रहे थे कि क्या करें क्या न करें… तभी हेल्थ सेंटर से गाड़ी आई और मुखिया जी के सम्पर्क में आये सभी लोगों का ब्लड सेम्पल लेकर गई।
काफी चिंतन मनन के बाद महेन्द्र बाबू उठे और थोड़ी दूर जाकर पोखर में सभी आमन्त्रण कार्ड प्रवाहित कर दिये। मानो वह अपने मन का सभी आडम्बर और दिखावा को निकाल कर प्रवाहित कर रहे हों।
तभी रमेसर (महेंद्र बाबू का सेवक) आकर बोला मालिक हलवाई आ गये।
महेंद्र बाबू – बोल दो चला जाये खाना नहीं बनेगा।
काहे मालिक?
महेंद्र बाबू – अरे देखते नहीं हो पूरे गाँव में आफत आ गई है और तुम्हें भोजे दिखाई दे रहा है।
रमेसर –  मालिक त इ समनवा का होगा?
महेंद्र बाबू – अरे भाक बुरबके हो का…. जा सुदेसर, महेसर सबको बोला के अपने गोतिया में बांट लो..
अउर लो इ लो सुरेंद्र भाई जी शहर से सेनेटाइजर अउर मास्क लाये थे मास्क मुंह में बांध लेना अऊर सिनेटाइजर बेरी – बेरी हाथ में मलते रहना अउर सभे के भी कहना न तो इ कोरोनवा गाँव को लील जायेगा।
उ त ठीक है मालिक, बाकि बड़का मालिक के किरीया करम कइसे होगा? रमेसर डरते-डरते पूछा।
भाक बुरबक पचास आदमी के खाना त अपनही से घरे में बन जायेगा।
अभी देखते नहीं हो दुनिया में महामारी आया है आ तुमको किरिया का पड़ल है।
रमेसर महेन्द्र बाबू का मुंह ताकने लगा… और महेंद्र बाबू अंदर ही अंदर कोरोना के डर से कांपते हुए
बाबू जी के फोटो के सामने  हाँथ जोड़ कर क्षमा माँगते हुए अगले बरसी पर धूमधाम से श्राद्ध करने का वादा कर रहे थे ।

कल्पना के राजकुमार

मधु अपने वीरान जिंदगी में फिर से खुशियों की आहट महसूस कर रही थी, रोम – रोम प्रफुल्लित हो रहा था, मन में फिर से जीने की लालसा जाग उठी थी, मानो उसका मृत देह जो प्रखर के दुनिया से जाने के बाद से जिंदा लाश बन गयी थी फिर से उसमें किसी ने प्राण फूंक दिये हो ! महीनों बाद मधु खुद को आइने में देख रही थी! आह कितनी बदल गयी हूँ मैं सोचकर दो बूँद अश्रु छलक पड़े उसके गालों पर और वह अपने

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भैरवी

आज यूँ ही समाचार पत्र पर साहित्य पेज को पलटा तो एक जानी पहचानी सी खूबसूरत तस्वीर पर मेरी नज़रें ठहर गईं ! फिर नाम मैंने नाम देखा तो भैरवी ! बला की खूबसूरत तो थी ही अब तो भैरवी और भी खूबसूरत लग रही थी इस तस्वीर में ! देखकर तो ऐसा लग रहा था कि यदि सौन्दर्य की प्रतियोगिता रखी जाय और उसकी प्रतिद्वंद्वी मेनका भी हो तो भी प्रथम स्थान भैरवी को ही मिलना तय होता ! मैंने उसकी लिखी गज़ल को कई बार पढ़ा और अपने हृदय में उठे प्रश्नों का उत्तर ढूंढते – ढूंढते स्मृतियों में विचरण करने लगा!

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मंगलसूत्र

जो दीप्ति हमेशा सुहाग चिन्हों का मजाक उड़ाने में जरा भी संकोच नहीं करती थी आज अचानक करवा चौथ के दिन छत पर चाँद को अर्घ्य देते हुए अपनी सहेली कामिनी के सोलह श्रृंगार से सजे हुए रूप लावण्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई थी ! जब कामिनी हाथ में चलनी लेकर अपने चाँद को निहार रही थी तो तो सच में कामिनी के मुखड़े की दमक के सामने चाँद का भी चमक फीका पड़ गया था ! जब कामिनी का पति अर्नव अपनी पत्नी कामिनी को प्यार से पानी पिलाकर व्रत खोल रहा था तो दीप्ति कामिनी के सौन्दर्य का जादुई रहस्य समझने की कोशिश कर रही थी कि आखिर यह चमत्कार उसके सोलह श्रृंगार की वजह से हुआ या फिर उसके पति के प्यार की वजह से !दीप्ति बार – बार कल्पना के आइना मे निहारती हुई खुद और कामिनी के सौन्दर्य की तुलना करते हुए अतीत में चली गई !

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आई लव यू टू 

अंश क्लास टेस्ट के पेपर पर अपने पापा की साइन करवा कर अपनी क्लास टीचर ज्योति को जैसे ही दिखाया तो ज्योति बार – बार उलट – पुलट कर उस साइन को देखने लगी क्योंकि साइन और नाम दोनो ही कुछ जाना – पहचाना सा लगा उसे !

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जीवन का सत्य

अरे – अरे यह मैं कहाँ आ गई? अपनी हमउम्र श्याम वर्णा तराशे हुए नैन नक्श वाली साध्वी को अपनी खाट के बगल में काठ की कुर्सी पर बैठे हुए देखकर मीना कुछ घबराई हुई सी उससे पूछ बैठी। साध्वी वृक्ष के तना के समान अपनी खुरदुरी हथेली उसके सर पर फेरती हुई बोली बहन घबराओ नहीं तुम सुरक्षित स्थान पर आ गई हो।

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भगवती देवी 

हाँ भगवती देवी बिल्कुल सटीक नाम है उनका क्यों कि कहाँ बोलतीं हैं भगवती देवियाँ , कहाँ सोचतीं हैं भगवती, कहाँ रोती हैं , देवियाँ! उन्हें तो ज़रा सा अक्षत, फूल, माला, फल, मिठाई चढ़ा दो , खा लो , और फिर बाँट दो उन्हें तो प्रसन्न होकर आशिर्वाद देना ही है क्यों कि वह देवी जो ठहरीं ! अपना धर्म तो निभाना ही होगा उन्हें न? साथ ही अपने नाम तथा यश कीर्ति का खयाल भी रखना होगा !

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ज्वैलरी

भतीजे की शादी में आने के लिए भैया – भाभी ने ज्यों ही न्योता भेजा मेरे तो सपनों के पंख लग गये! इन्हीं मांगलिक कार्यक्रमों में तो सभी रिश्ते – नातेदारों से मिलना हो पाता है! मौसी, चाची, बुआ, बहनें, सखियाँ, सहेलियाँ सभी एक साथ, एक जगह साथ में गाना – बजाना सोच – सोच कर मन रोमांचित हुआ जा रहा था ! साथ ही क्या पहनना है क्या गिफ्ट करना है

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