खेलूंगी मैं होली

सखियों संग खेलूंगी मैं होली
सखियों संग

सन सन सनन सन बहे पुरवाई
अंग  – अंग लिये अंगड़ाई
फाग उड़ाये गुलाल रोली
सखियों संग………………….

कुहुक – कुहुक कोयलिया गाये
सुनके मेरा दिल भी बहक – बहक जाये
लेके आओ न मेरे सजन डोली
सखियों संग……………………

सात रंग की लूंगी चुनरिया
उस पर बनाऊँगी सुन्दर लहरिया
चाहे कितना भी बोले  बलम बोली
सखियों संग……………………

फूलों से लाली उधार ले लूंगी
नयनों से कजरा की धार ले लूंगी
कोरे मन पर बनाऊँगी रंगोली
सखियों संग………………….

प्रीत रंग भरी पिचकारी
अबकी पड़ूंगी सभी पर मैं भारी
घोल भावना भंग गोली
सखियों संग……………………

शब्दों को जोड़ – तोड़ गीत लिख दूंगी
रंगों को छिड़क – छिड़क प्रीत लिख दूंगी
ऐसी – वैसी नहीं हूँ मैं अलबेली
सखियों संग ………………….

नये साल में

उम्मीदों की किरणें लायीं, कल्पित कलियाँ स्वर्ण थाल में।
खिल जायेंगी एक – एक कर, हर्षित होकर नये साल में।

छँट जायेंगे दुख के कोहरे, यही सोच कर कष्ट सहे हर,
वक्त हमारा जब आयेगा, दिखला देंगे हम भी कुछ कर झनक उठेगी पुनः जिंदगी , गुंजित हो लय और ताल में।
उम्मीदों की किरणें लायीं……………………………..

बहुत जी लिये डर – डर कर हम, अब आया लेकिन दम में दम।
धैर्य रखे हर मुश्किल क्षण में, सह – सह कर हँस – हँस सारे गम।
हमने जीना सीख लिया अब , जी लेंगे हम किसी हाल में
उम्मीदों की किरणें लायीं……………………………..

सिखलाया है हमें समय ने, चलते रहो हमेशा लय में।
आज नहीं तो कल हर्षित हो ,झूम उठोगे तुम भी जय में।
सत्य धर्म के पथ पर चलना ,पथिक न फँसना झूठ जाल में।
उम्मीदों की किरणें लायीं……………………………..

कर प्रयास हम सब अनवरत, लिख देंगे इतिहास सुन्दरम्।
पास करेंगे सभी परीक्षा, हो उजियारा या कि हो तम।
जो देखे हैं हमने सपने , पूर्ण करेंगे किसी काल में।
उम्मीदों की किरणें लायीं……………………………..

धर्म निभाता चल

कवि तू धर्म निभाता चल

विश्व चमन का बनकर प्रहरी
आशा दीप जलाता चल
कवि तू धर्म निभाता चल

नीरसता जग में भर जाये
नीरवता से मन घबराये
सुर सुमनो को चुन – चुनकर के
लय बद्ध कर गाता चल
कवि तू धर्म निभाता चल

दिखे अकेला कोई पथ में।
बनकर साथी जीवन रथ में
लक्ष्य साधना सीखलाकरके
राह सही दिखलाता चल
कवि तू धर्म निभाता चल

जब जन जायें भूल नीतियाँ
हो जायें जब कुटिल प्रवृत्तियाँ
सदाचार का पाठ पढ़ाकर
उन्हें नीति समझाता चल
कवि तू धर्म निभाता चल

समक्ष रोगियों का वैद्य बन
सहलाकर उनका दुखता मन
छूकर मर्म सृजन कर कोई
जन – जन को बहलाता चल
कवि तू धर्म निभाता चल

शत्रु करे जब कभी आक्रमण
शष्त्र उठाकर तू भी तत्क्षण
बनकर योद्धा युद्ध भूमि में
अपना शौर्य दिखाता चल
कवि तू धर्म निभाता चल

कोरोना का रोना मत रो

कोरोना का रोना मत रो, और न आहें भर।
बदल आदतें अपनी हे जन , व्यर्थ न इतना डर।

नाक बहे हो सूखी खाँसी, लगे ज़रा भी ज्वर।
शिघ्र परीक्षण करवाकर के, फिर इलाज लो कर।
छोड़ – छाड़ कर काम – धाम सब , रह तू अपने घर।
बदल आदतें अपनी हे जन , व्यर्थ न इतना डर।

तन को दे आराम ज़रा सा, कर ले साधित मन।
पौष्टिक भोजन ही करना है , यह भी ले- ले प्रण।
इधर-उधर का भ्रमण टाल दे , भटक नहीं दर – दर
बदल आदतें अपनी हे जन , व्यर्थ न इतना डर।

नाक – कान को बेमतलब का, बार – बार मत छू।
धोना अपना हाथ हमेशा, भूल न जाना तू।
नहीं मिला फिर हाथ किसी से, नमस्कार अब कर
बदल आदतें अपनी हे जन , व्यर्थ न इतना डर।

खतरनाक है व्याधि भले पर, हम जायेंगे लड़ ।
सावधान होकर डग भरना ,  होना है अब रण।
जीत हमारी ही है निश्चित, थोड़ा धीरज धर।
बदल आदतें अपनी हे जन , व्यर्थ न इतना डर।

किसी ने कर दिया जादू टोना

किसी ने कर दिया जादू टोना।
ले उड़ा नींद सबकी कोरोना।

लोग डरने लगे, आहें भरने लगे।
परिस्थितियों पे आता है रोना।
ले उड़ा नींद………………..

हो रहीं आँखें नम, अब कहाँ जायें हम?
कौन सा अब सुरक्षित है कोना?
ले उड़ा नींद………………..

रुक गई जिंदगी, क्या करें बंदगी?
भूली पलकों ने सपने संजोना?
ले उड़ा नींद………………..

घबराये जिया, काँपे थर – थर पिया ।
छोड़ दी आँखों ने अब से सोना।
ले उड़ा नींद………………..

सुनो मेरी अरज, कोप दो ईश तज।
टाल दो अनहोनी का होना।
ले उड़ा नींद………………..

सखी पनघट पर मैं नहीं जाऊँगी ,

सखी पनघट पर मैं नहीं जाऊँगी ,
कन्हैया बड़ा छलिया है

बंशी बजाई के मोहे लुभावे
मधुर सुरीला राग सुनावे
खो जाऊँगी बंशी की धुन सुन
अपनी आँखों में सपने बुन
भूली अगर मैं पनिया भरन
तो मैं क्या – क्या बहाना बनाऊँगी
कन्हैया बड़ा…………….

पढ़ना जारी रखें “सखी पनघट पर मैं नहीं जाऊँगी ,”

मैया मोरी देदो मोहे मोबाइल

मैया मोरी देदो मोहे मोबाइल

मोबाइल से बात करूंगा
तुमसे सच्ची – सच्ची
बड़ा हो गया अब तो मैं भी
उमर नहीं है कच्ची
जब तुम मुझको मिस करोगी तभी करूंगा डाइल
मैया देदो…………………

पढ़ना जारी रखें “मैया मोरी देदो मोहे मोबाइल”

सखि सावन बड़ा सताए रे

सखि सावन बड़ा सताए रे

जबसे उनसे लागि लगन
तन मन में मेरे जागि अगन
नयन करे दिन रैन प्रतीक्षा
अब दूरी सहा नहीं जाए रे
सखि सावन………………..

पढ़ना जारी रखें “सखि सावन बड़ा सताए रे”

स्वागत है हे नव वर्ष

स्वागत है हे नव वर्ष

मन में जगी नई आशा
बुझती नहीं पिपासा
कर लो हे मन मन्थन
स्वीकार करो परिवर्तन
उतार चढ़ाव झेला है तुमने
माना बहुत किया संघर्ष
स्वागत है………………

पढ़ना जारी रखें “स्वागत है हे नव वर्ष”

तुम क्यों इतने निष्ठुर हो गये..?

अभी-अभी आए हो प्रियतम
अभी जाने की बात कर गए
तुम क्यों इतने निष्ठुर हो गए.?

पढ़ना जारी रखें “तुम क्यों इतने निष्ठुर हो गये..?”