श्री राम कथामृतम्

बच्चों को रामकथा का अमृत रसपान 

  • प्रभात कुमार राय 

कृति: श्री राम कथामृतम्  ( बाल खंड काव्य  )

कृतिकार : किरण सिंह 

प्रकाशक: जानकी प्रकाशन  पटना: नई दिल्ली 

पृष्ठ: 58             मूल्य: रू 150/-

समीक्षक: प्रभात कुमार राय 

मो-  9934083444

     ‘ श्री राम कथामृतम् ‘ कवयित्री द्वारा राम चरित को सरल, सहज एवं सुबोध शब्दों में बालोपयोगी सांचे में ढालने का सत्प्रयास है । मूलतः इस कृति के पीछे 2020 की कुछ घटनाएं कवयित्री ने ‘अपनी बात ‘ में बताया है: (1) ‘ कौन बनेगा करोड़पति ‘ में संजीवनी बूटी संबंधी जानकारी से अनभिज्ञता (2) लब्थप्रतिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा साहित्यिक चर्चा के दरम्यान बाल साहित्य को हर साहित्यकार  की नैतिक जिम्मेदारी बताना (3) कोविड 19 महामारी की रोकथाम के लिए आरोपित लाकडाउन का रचनात्मक कार्य में सदुपयोग (4) लाॅकडाउन की अवधि मे रामानंद सागर द्वारा फिल्माया रामायण का दूरदर्शन पर प्रसारण ।

     यह इत्तेफाक है कि इस पुस्तक के अध्ययन करते वक्त मेरा ध्यान एक दिलचस्प समाचार की ओर आकृष्ट हुआ जिसकी चर्चा प्रसंगवश कर रहा हूँ । भुवनेश्वर के 10 साल के आयुष कुमार खुंटिया ने लाॅकडाउन के दौरान प्रसारित होने वाले रामायण सीरियल पर आधारित दूरदर्शन सीरीज देखने के बाद बच्चों के लिए उड़िया में रामायण लिखी है। 100 पन्ने वाले इस किताब का नाम पिलाका रामायण (बच्चों के लिए रामायण) रखा गया है।

     स्वभावतः बच्चे गूढ, मोटी और गंभीर किताबों से भागते हैं । पढ़ने में रूचि विकसित होने पर बच्चों को अपने मानसिक विकास के लिए ऐसे बाल साहित्य की जरूरत पड़ती है जिसे वे अपना समझकर आत्मसात कर लें । ऐसा साहित्य मनोरंजन के अलावा बालकों में नेक भावनाओं का उदय करने में भी सहायक होता है । कवयित्री ने बाल साहित्य की बुनियादी आवश्यकताओं को भलीभांति ध्यान में रखकर इस खंड काव्य की रचना की है ।

         रामचरितमानस के अक्षुण्णतत्व एवं सूत्र-संकेत सर्वकालिक है जो आज के युग-संदर्भ में भी सर्वथा सही उतरते हैं । राम का बहुआयामी, भव्य एवं महनीय चरित्र सदियों से रचनाकारों को उन पर लिखने के लिए प्रेरित करता रहा है । राष्ट्र कवि  मैथिलीशरण गुप्त ने तो यहाँ तक कह दिया:

           “ राम तुम्हारा चरित स्वंय ही काव्य है,

              कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।“

        जयशंकर प्रसाद ने लिखा है:

        “ अखिल विश्व में रमा हुआ है राम हमारा,

          सकल धरा पर जिसका क्रीड़ापूर्ण पसारा ।“

  मर्यादा पुरुषोत्तम की कथा को खंड काव्य के रूप में बालकों के लिए प्रस्तुत करने का सुप्रयास कवयित्री द्वारा इसी श्रृंखला में एक कड़ी है ।

         समस्त रामचरितमानस में राम को सत्य, न्याय,क्षमा, उदारता, कृपा और स्नेह का उच्चतम भाव प्रदर्शित करते हुए चित्रित किया गया है । निस्संदेह मानव के सद्गुणों का समन्वय उसी में निहित है जिससे समाज, वर्ग, परिवार और व्यक्ति की मर्यादा सुरक्षित रहे। राम मर्यादा के संरक्षण में सर्वोत्तम हैं । इन्हीं उच्चतम गुणों को बच्चों के प्रभाव्य मस्तिष्क में बीजारोपण के सोद्देश्य से कवयित्री ने अत्यल्प एवं अत्यंत सरल शब्दों में पूरे रामायण का मर्म को गूंथने का कठिन कार्य बखूबी किया है ।

      ध्यातव्य है कि रामचरितमानस के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास ने खुद बाल्यकाल मे अपने कोमल मन-मस्तिष्क में ऊँचे भावो के बीजारोपण के महत्व को स्वीकारा है । सौभाग्यवश बाल्यावस्था में  उन्होने सूकर क्षेत्र में अपने गुरू के मुख से रामकथा सुनी थी । स्वाभाविक तौर पर शिशु-काल में  उन्हें राम चरित का पूरा बोध नहीं हो सका था । इस बात का संकेत उन्होंने रामचरितमानस के प्रारम्भ में  इस प्रकार किया है:

        “ मैं पुनि निज गुरू सन सुनी कथा सो सूकर खेत ।

          समुझि नहीं तसि बालपन तब अति रहेऊॅ अचेत ।।“

     गुरु मुख से रामकथा सुनकर गोस्वामी जी के बाल-हृदय में  राम चरित का बीज तो अंकुरित हो गया था किन्तु उसका पल्लवन उनके परवर्ती जीवन में हुआ और उन्होंने युगांतरकारी महाकाव्य की रचना की ।

               रामायण में प्रभु राम का चरित्र उदात्त होते हुए भी  सुख-दुःख से उद्वेलित होता हुआ दिखलाया गया है जिससे वे सामान्य मानव की कोटि मे आ जाते है । उनसे आत्मीयता स्थापित हो ज़ाती है और उनके हर्ष-विषाद में उल्लसित और दुखी हो जाता है । अरण्यकाण्ड में सीता-हरण हो जाने पर राम की करूणपूर्ण दशा का चित्रण बड़े मार्मिक ढंग से किया है:

      “  हे खग-मृग हे मधुकर सेवी। तुम देखी सीता मृगनैनी ।

         यहि विधि खोजत विलपत स्वामी । मनुहॅ कहा विरही अति कामी।“

       कवयित्री ने इसी भाव को सरल शब्दों में बालकों को सहजता से ग्रहण करने हेतु यों लिखा है :

       ‘ लगे  राम-लक्ष्मण फिर करने/ सीताजी की खोज/

         भटक-भटक कर दोनों भाई/ भूले अपना ओज /’

          हनुमान द्वारा गिरि से औषधि ले आने पर राम की प्रसन्नता अवर्णनीय है-

          “ हरखि राम भेटउ हनुमाना । अति कृतज्ञ प्रभु परम सुजाना ।“

कवयित्री ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है:

‘ भरत वाण से अतिशीघ्र ही/ पहुंच गये हनुमान/

  हुए प्रसन्न तब राम लिया / सबने ही लोहा मान/’

         तुलसीदास जी ने अयोध्याकांड में केवट प्रसंग का वर्णन बड़े ही भावोत्पादक ढंग से  किया है । ( बाल्मीकीय रामायण में यह प्रसंग बिलकुल नहीं है । वहां राम नाव चढ़कर शीघ्र पार कर लेते हैं।) तुलसीदास जी ने केवट से कहलवाया है कि-

“ पद कमल धोई चढाई नाव न नाथ उतराई चहुँह।“

क्योंकि  –  “ छुवत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तैन काठ कठिनाई । तरनिऊ मुनि धरनी होई जाई। बाट मोरि नाव उड़ाई ।“

कवयित्री ने इस प्रसंग का वर्णन यों किया है:

        ‘ केवट बोला, कहीँ बनें न / नारी मेरा नाव/

          इसीलिए मैं प्रथम आपका/ धोऊॅगा यह पाँव  ।।‘

    कवयित्री ने समुद्र द्वारा राह नहीँ देने पर राम के क्रोध का वर्णन इस प्रकार किया है :

    ‘ पूजा करने लगे राम जी/ रखे तीन दिन धीर/

      किन्तु जलधि ने दी न राह तो/ तान लिए वे तीर/’

( “ विनय न मानहि जलधि जड़, गये तीन दिन बीत।

    बोले राम सकोप तब, भय बिनु होहिं न प्रीति ।“)

           तुलसीदास जी ने लिखा है :

 “ कवि-कुल वनु पावन जानी। राम-सिया जस मंगल खानी।

   तेहि  ते मैं कछु कहा बखानी/ करन पुनीत  हेतु निज बानी।“

(  सीता और राम के यश को कविकुल के जीवन को पवित्र करनेवाला और मंगोलों की खान जानकर, मैंने भी अपनी वाणी पवित्र करने के निमित्त उसका थोड़ा सा वर्णन कर डाला हूँ ।)

कवयित्री ने भी रामचरितमानस के पात्रों के माध्यम से बच्चों के लिए सदाचार, भातृभाव, सेवा, नैतिकता एवं सत्यनिष्ठा की सीख देने का पुनीत कार्य किया है।

      इस रचना में सादगी और मिठास के साथ सहृदयता और प्रांजलता मौजूद है । प्रसंगानुकूल चित्रों का समावेश प्रभावोत्पादक है और बच्चों को भायगा। इस कृति में बच्चों की रूचि के अनुकूल ही भाव , भाषा, शैली, प्रवाह आदि वर्तमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बालकों की सहज वृति में तारतम्य होकर यह खंड काव्य उद्भूत हुई  है । निस्संदेह बच्चे इस सोद्देश्य काव्य से लाभान्वित होंगे और भावी जीवन में चारित्रिक उत्थान की दिशा में  अग्रसर होंगे ।

औरत बुद्ध नहीं होती

पता नहीं ब्रम्ह ने स्त्रियों के हृदय को ही कुछ विशेष रूप से बनाया है या फिर बचपन से परिवार व समाज के द्वारा दिये गये संस्कारों का असर है कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी वह मोह – माया के बंधन से मुक्त नहीं हो पातीं।
कभी-कभी वह पुरुषों से प्रतिस्पर्धा में उन्हीं की भांति ठोस निर्णय लेना चाहती भी हैं तो वह सफल नहीं हो पातीं क्योंकि उनका स्वभाव तो पानी की तरह होता है जो कि बर्फ की तरह ठोस तो हो जाता है किन्तु ज्यों ही स्नेह और ममता की तपिश उनपर पड़ती है तो उनका हृदय पिघलने लगता है और वह ठोस निर्णय लेने में नाकामयाब हो जाती हैं।
शायद यही वजह है कि औरत बुद्ध नहीं हो सकती।
इस बात को अति संवेदनशील युवा कवयित्री अन्नपूर्णा सिसोदिया ने बखूबी महसूसा और बहुत ही खूबसूरती से कविता में गढ़ कर एक पुस्तक में संग्रहित किया, जिसका शीर्षक ही है औरत बुद्ध नहीं होती ।
पुस्तक का आवरण चित्र जिसमें मुक्तिमार्ग की तरफ़ बढ़ती हुई स्त्री तो है लेकिन रिश्तों की डोर से बंधी हुई है ही इतना सुन्दर व सारगर्भित है कि वह स्वयं ही पुस्तक में संग्रहित रचनाओं का सार बयाँ करने में समर्थ है।
मैं शुरूआत करती हूँ कवयित्री के आत्मकथन से जहां वह स्वयं कहती हैं –
“कविता मानव हृदय के गूढ़ भावों की अभिव्यंजना के साथ नवीन चेतना की वाहक बन, समाज में व्याप्त रुढ़िवादिता, अंधविश्वास, राजनीतिक, सामाजिक और व्यवस्थागत विसंगतियों पर विरोध का स्वर मुखर करती है। केवल परिस्थितियों का चित्रण कविता का उद्देश्य कभी नहीं रहा क्योंकि किसी भी रचना की उत्कृष्टता का आधार मात्र कला व बिम्ब नहीं हो सकते, उसमें युगमंथनकर्ता विषयवस्तु एवम् मानव समाज के महान ऐतिहासिक मूल्यों की प्रतिष्ठा का समावेश भी आवश्यक है।….
उक्त बातें कवयित्री सिर्फ कहती ही नहीं हैं, बल्कि उन्होंने अपनी कविताओं में सभी मूल्यों का समावेश भी किया है।
वैसे तो यह पुस्तक पूर्णतः स्त्री विमर्श पर आधारित है किन्तु कवयित्री ने करीब – करीब सभी विषयों पर पैनी दृष्टि डालते हुए अपनी कलम चलाई है जो कि काबिलेतारीफ है।
पुस्तक की पहली ही कविता मदारी आया खेल दिखाने में कवयित्री सामाजिक विद्रुपताओं पर व्यंग्य वाण छोड़ते हुए लिखती हैं –

रुपयों की बरसात और डुगडुगी की आवाज़ चरम पर थी और बंदर,
बंदरिया के पास धरती पर
आवाज़ बंद हो गई, भीड़ छँट गई
मुफ्त के घुंघरू दोनो के निष्प्राण देह से अलग कर
चल दिया मदारी रुपयों की पोटली संभालता
फिर से
नये बंदर और बंदरिया की खोज में
डुग – डुग – डुग – डुग……

शाशन व्यवस्था पर कुठाराघात करते हुए कवयित्री लिखती हैं –
प्रजा रोई, चिल्लाई
राजा की नींद में खलल पड़ा
उसने बैचैनी से करवट बदली
और कानो पर तकिया रख लिया
कोड़े अब भी बरस रहे हैं
प्रजा अब भी रो रही है
लेकिन राजा सुकून से सो पा रहा है
देश की व्यवस्था दुरुस्त हो रही है

पढ़ाई, बस्तों तथा अभिभावकों के महत्वाकांक्षा के बोझ तले तबे बच्चों के दर्द को महसूसते हुए कवयित्री लिखती हैं –
मैदान में अब शोर नहीं गूँजता, सन्नाटा पसरा है वहाँ
सारी गेंदे आसमान ने लील ली है या उस भारी बस्ते ने…….

आगे लिखती हैं –
बच्चे अब दादी – नानी के घर भी नहीं जातेऊ
क्यों कि उन्हें बच्चा रहने की इजाजत नहीं
उन्हें रोबोट बनना है
ऐसा रोबोट, जिसे बनते ही दौड़ लगानी है
और हमेशा आगे रहना इस दौड़ में अनिवार्य शर्त है
उसे इजाजत नहीं है पीछे रहने या असफल होने की
बच्चे खिलौनों को हाथ नहीं लगाते
क्यों कि खेलना फालतू होता है
और बच्चे अब फालतू नहीं
माता-पिता की उम्मीदों का बोझ ढोने वाले कुली हैं,……….

जैसा कि मैंने पूर्व में ही कहा कि यह पुस्तक पूर्णतः स्त्री विमर्श पर आधारित है तो आसमान सी वह शीर्षक कविता के माध्यम से कवयित्री स्त्रियों की स्थिति का सटीक चित्रण करते हुए लिखती हैं –

रोटी के साथ जब भी फूली थोड़ी खुशी से
अगले ही पल फटकार कर पिचका दिया घी लगाकर
और बंद हो गई कटोरदान में
सलीके से काटा सब्जी के साथ, अपनी हर इच्छा को
और मिला दिये छद्म मुस्कान के मसाले

स्त्रियों को लेखन के क्षेत्र में भी दोयम दर्जे पर रखने वालों को बहुत ही तुलनात्मक अंदाज़ में समझाते हुए कवयित्री लिखती है मन कविता के माध्यम से कहती हैं –

एक पुरुष लिखता है
क्यों कि उसे लिखना है
सब कुछ सोच समझ कर
जाँच परख कर
वह पारखी है
बहुत बड़ा ज्ञानी है
उसे अपने लेखन से
आने वाली पीढ़ियों का
मार्ग दर्शन करना है
अपनी विद्वता की धाक जो जमानी है

जब स्त्री लिखती है
तो बस इसलिये
क्योंकि
उसे कुछ कहना है
अपने मन का
वह बहुत नहीं जानती
बस अपने भावों के साथ
बहती है
वो प्रेम लिखती है
तो केवल लिखती नहीं
जीती है उसे
अपने शब्दों में जब वो “प्रकृति” लिखती है
तो तितली के परो सवार हो
नाप आती है सारा जंगल

महिला सशक्तिकरण झंडा गाड़ते हुए कवयित्री कहती हैं –

झुकूंगी नहीं

जब बढ़ाती हूँ, कदमों की गति
और मेरी आँखें देखने लगती है
संभावनाओं का आसमान
मेरे पंख खुलने से पहले ही
तुम प्रमाणपत्र जारी कर देते हो
मेरे व्यक्तित्व और चरित्र का
तुम्हारे साथ भीड़ बढ़ने लगती है
और मैं हिल जाती हूँ…..

ये तुम्हारी, मेरी या उसकी बात नहीं
ये हमारे सफ़र की कहानी है
मंजिल तक पहुंचना ही होगा
उस हर बेटी के लिए
जिसे उड़ना है, अपनी उड़ान
अपने पंखों से
चलाओ वाण जितना चाहे
मेरे हौसलों ने जवाब देना सीख लिया है
अब नहीं, नहीं झुकूंगी मैं
कभी नहीं।

और आगे पुस्तक के शीर्षक औरत बुद्ध नहीं होती में कवयित्री स्त्री मन की भावनाओं व संवेदनाओं का बहुत ही तर्कसंगत पक्ष रखते हुए कई वजहें बताती हैं कि औरत क्यों नहीं बुद्ध हो सकती –

वह न प्रेम त्यागती है, न घर न परिवार
क्यों कि जिस दिन औरत के मन में विरक्त होकर,
महान बनने के भाव जाग्रत हुए
वह दिन संसार में खुशियों का शायद अंतिम दिन होगा
श्रृंगार, प्रेम, ममता, करुणा हर भाव हृदय में सजाकर
वह गढ़ती है, ऐसा समाज
जहाँ मनुष्यता वास कर सके
वह जब माँ होती है तो कुछ और नहीं होती,
इसलिए और बुद्ध नहीं होती

इस प्रकार 150 पृष्ठों में संकलित इस संग्रह में कुल इक्यावन (51) कविताएँ हैं। सभी कविताएँ मुखर होती हुई अपनी बात कहने में समर्थ व सशक्त हैं। कहा जाता है न कि साहित्य समाज का दर्पण है तो निश्चित ही इस पुस्तक को समाज का दर्पण कहा जायेगा। पुस्तक के पन्ने स्तरीय हैं और छपाई भी स्पष्ट है, । अतः यह पुस्तक पठनीय व संग्रहणीय है। मैं कवयित्री की पहली पुस्तक के लिए हृदय से बधाई संग शुभकामनाएँ देती हूँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – औरत बुद्ध नहीं होती
लेखिका – डॉ. अन्नपूर्णा सिसोदिया
प्रकाशक – दिव्य प्रकाशन , पूर्व मुम्बई
मूल्य – 200

वर्ण सितारे

तिमिर कितना भी गहरा क्यों न हो, इतने बड़े आसमान में छोटे-छोटे टिमटिमाते हुए निर्भीक सितारे अपना अस्तित्व बोध कराते हुए हमारा ध्यान स्वतः अपनी ओर खींच ही लेते हैं और हम उनकी खूबसूरती में बंधे गिनती शुरू कर देते हैं, पर लाख कोशिशों के बावजूद भी उसकी गणना नहीं कर पाते। कुछ ऐसे ही कवयित्री, लेखिका ऋता शेखर मधु जी के हायकु संग्रह के वर्ण सितारे भी हैं।
हाँ वर्ण सितारे, बहुत ही सटीक शीर्षक है इस संग्रह का। क्योंकि कवयित्री ऋता शेखर मधु ने वर्ण सितारे चुन – चुन कर जिस खूबसूरती और बुद्धिमत्ता पूर्वक भावनाओं के क्षितिज में सजाया है वह काबिले तारीफ है।
5,7,5 अर्थात पहली पंक्ति मे पाँच वर्ण, दूसरी पंक्ति में सात और तीसरी में पाँच वर्णों में सन्निहित जापान से आई हाइकु विधा भारत में आकर साहित्य जगत में अपना स्थान बनाने में पूरी तरह से कामयाब हो गई है।ऐसे में ऋता शेखर मधु जी के वर्ण सितारे हायकु विधा में अपना विशिष्ट स्थान बनायेंगे ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।

पुस्तक का शुभारंभ माँ वीणा वादिनी को समर्पित कर कवयित्री ने अपने सूझ – बूझ और धार्मिक भावनाओं का बहुत ही सुन्दर परिचय दिया है-

शुभ आरम्भ
ज्ञान देवी के नाम
पृष्ठ प्रथम

माँ सरस्वती
साहित्य की झोली में
आखर मोती

कवयित्री ने प्राकृतिक चित्रण मन मोह लेता है और हमारे मन मस्तिष्क में वह खूबसूरत दृश्य अपनी ओर खींचने लगता है –

नभ सिंदूरी
लौट रही आहट
चहका नीड़

साँझ सजीली
दुपट्टा चाँदनी का
धरा के कांधे

उजली भोर
बदल रही प्राची
धरा के वस्त्र

कोई भी लेखक हो या कवि, प्रेम नहीं लिखा तो क्या लिखा? अतः कवयित्री प्रेम जैसे खूबसूरत भाव को नवीन उपमा से अलंकृत करती हुई लिखती हैं –

प्रेम

नभ में घन
नैनो के संग काजल
प्रेम मिलन

प्रेम किताब
पन्नो के बीच दबे
सूखे गुलाब

कवयित्री की जीवन दर्शन की अनुभूतियाँ भी बहुत गहन हैं –

जीवन सिंधु
दुख – सुख दो तट
मध्य लहर

जग सागर
मछुआरे की खुशी
जल की मीन

म्लान में उगे
प्रभु चरण चढ़े
गुणी कमल

कान्हा में प्रीत
जीवन में संगीत
जीने की राह

जो भरा नहीं भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। हृदय नही वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश से प्यार नहीं। महाकवि की यह पंक्तियाँ कितनी सत्य व सटीक हैं कि शायद ही ऐसा कोई कवि हृदय होगा जिसके हृदय धरा पर देश प्रेम का पुष्प न पल्लवित हुआ हो। अतः कवयित्री सरहद पर तिरंगे को लहराता देख कर अपनी भावनाओं को यूँ प्रकट करती हैं –

दोनों फकीर
सरहद पर है
एक लकीर

बिखेरे ज्योति
सरहद का दीप
माने न बंध

अति संवेदनशील कवयित्री ने हवाओं के भार को भी महसूस किया और लिखा –

बाग मोंगरा
सुगंधो की पोटली
हवा के कांधे

भाई बहन के पावन पर्व रक्षाबंधन का जिक्र करते हुए कवयित्री कहती हैं –

गूँथे बहना
मोती – मोती आशीष
भाव रेशमी

चूंकि कवयित्री शिक्षिका रह चुकी हैं इसलिए आधुनिक बच्चों की नस – नस से वाकिफ़ हैं। यथा –

बड़ों के बाप
आधुनिक बालक
बड़े चालाक

कवयित्री ने रिश्तों को कुछ यूँ परिभाषित करती हैं –

प्रेम के धागे
भावों की बुनकरी
वस्त्र रिश्तों के

प्रकृति और पर्यावरण का खूबसूरत चित्रण करते हुए कवयित्री ने लिखती हैं –

श्रृष्टि चूनर
ईश्वर रंगरेज
रंग बहार

एक स्त्री जब सास बनती है और उसके घर में नई – नवेली बहु आती है उन भावों का खूबसूरत चित्रण मन मोह लेता है –

वधु कंगना
झूम उठे अंगना
घर की शोभा

इस प्रकार 132 पृष्ठों में संकलित जीवन के हर पहलू को समेटे इस पुस्तक में कुल 600 हायकु और एक हायकु गीत हैं । सभी हायकु को कवयित्री ने एक कुशल जौहरी की तरह बहुत ही बारीकी से तराशा है। अतः मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि कवयित्री के इस संग्रह का साहित्य जगत में जोर – शोर से स्वागत किया जायेगा। मैं कवयित्री ऋता शेखर मधु जी को हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ देती हूँ।

समीक्षक – किरण सिंह
लेखिका – ऋता शेखर मधु
पुस्तक का नाम – वर्ण सितारे
प्रकाशक – श्वेतांशु प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य – 250 रुपये

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रहस्य

कथाकार,कवियत्री किरण सिंह की कहानी संग्रह “रहस्य” मेरी नजर में –
स्त्री विमर्श को स्वर देती कहानी संग्रह: “रहस्य” साहित्य का हमारे आसपास होना सिर्फ हमारी नहीं, साहित्य की भी मजबूरी है। क्योंकि साहित्य को भी खाद-पानी देने का काम समाज ही करता है। व्यक्ति के जीवन की घटनाओं से समाज प्रभावित होता है और समाज की घटनाओं से साहित्य। कथाकार किरण सिंह की सदः प्रकाशित कहानी संग्रह "रहस्य" से गुजरने का मौका मिला। कहते हैं चित्र के सामने भाषा अपने वजूद को तलाशता नजर आता है, तो मुझे लगता है एक लेखिका के सामने पुरुष प्रधान समाज। चौबीस कहानियों से सजी यह कहानी संग्रह समाज और परिवार के उतने ही करीब है, जितनी एक औरत। हर कहानी में एक औरत की मुखरित संवेदनाएं हैं। संवेदनाओं का गहरा समुद्र है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि लेखनी एक औरत की है। शायद इसलिए है लेखिका ने अपने आसपास के परिवेश को सिद्दत से महसूस किया है। समाज और परिवार किसी भी वर्ग का हो, औरत की कहानी लगभग एक जैसी ही होती है। ग्रामीण जीवन की छोटी-छोटी आम घटनाओं से रूबरू कराती ये कहानियां शहरी जीवन की तंग गलियों से एक दूरी से ही हाथ मिलाती दिखाई देती है। संग्रह में शामिल अधिकांश कहानियां स्त्री के आसपास के स्त्री के दर्द को स्वर देती नजर आती हैं। लेखिका ने पुरुष प्रधान समाज के अहं और वर्चस्व को बहुत नजदीक से देखा है। स्त्री और पुरूष के सामाजिक, पारिवारिक भेद को महसूस किया है। यही कारण है कि कहानी के पात्र खुद ही मुखर है। कुछ वानगी देखते हैं -

‘गलत कहते हैं लोग कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती है। सच तो यह है कि पुरूष ही अपनी अहम तथा स्वार्थ की सिद्धि के लिए एक स्त्री की पीठ पर बंदूक रखकर चुपके से दूसरी स्त्री पर वार करते हैं, जिसे स्त्री देख नहीं पाती और वह मूर्ख स्त्री को ही अपनी शत्रु समझ बैठती है।’

  • (जीवन का सत्य, पृष्ठ 15)
    ‘हम स्त्रियां अपनी खुशी की परवाह ही कब करती हैं। वह तो हमेशा ही अपनों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ ही लेती हैं..कभी पिता, तो कभी पति की, तो कभी पुत्र की खुशियों में।’ – (प्रार्थना, पृष्ठ 51,52)
    ‘ये पुरूष लोग न हमेशा ही औरतों की समझ पर शक करते हैं।’ – (परख, 74)
    ‘रिश्तों की समझ और परख मर्दों से अधिक स्त्रियों को होती है।’ – (परख, 75)
    ‘स्त्रियों का दुर्भाग्य है कि यदि पुत्र निठल्ले निकल गए तो पति और पुत्र के मध्य पिसकर रह जाती है। एक तरफ उसका वर्तमान रहता है, तो दूसरी तरफ उसका भविष्य। … यदि किसी एक ने भी गलत कदम उठाया तो सारा दोष उस स्त्री पर मढ़ दिया जाता है।’ – (राम वनवास, पृष्ठ 94)
    ‘पतियों की आदत ही होती है हिदायत देने की, क्योंकि उनकी नजरों में तो दुनिया की सबसे बेवकूफ औरत उनकी पत्नी ही होती है।’ – (नायिका, पृष्ठ 108) लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कहानी की महिला पात्र पुरुषों के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है। सधी लेखनी के सामने व्यक्ति गौण हो जाता है, परिवेश मुखर हो उठता है। तभी तो ‘जीवन संगीत’ की नायिका पुरुषों की तरफदारी करती भी नजर आती है –
    ‘सच कहते हैं। सभी स्त्रियों का स्वभाव ही शक्की होता है। लेकिन यह भी तो सही है कि जहां अधिक प्रेम होता है वहां शक पैदा हो ही जाता है।’ – (जीवन संगीत, पृष्ठ 119) कहानियां विविध रंगों से सजी हैं। एक गृहणी बाहर से अधिक घर के अंदर की विद्रूपताओं को नजदीक से देखती है। यही कारण है कि एक पुरुष लेखकों के कथा नायक, नायिका जिन मुद्दों को लेकर मुखर नहीं हो पाते, वहीं एक लेखिका की कलम से वैसे पात्र जीवंत हो उठते हैं। बात चाहे घरेलू हिंसा की हो या प्यार में छले जाने या विवाहेत्तर संबंधों के दंश को झेलने की। घर के अंदर के भेदभाव और तिरस्कार को रोजमर्रे की तरह लेने वाली नायिकाएं मौका मिलते ही पात्रों के बहाने सबकुछ उड़ेल कर रख देती हैं – ‘पीड़ा अधिक होने पर मरहम कहां काम कर पाता है और उसमें भी अपनों से मिली हुई पीड़ाएं तो कुछ अधिक ही जख्म दे जाती है।’ – (जीवन का सत्य,पृष्ठ 15)
    ‘बर्तन के खटर-पटर के साथ युगलबंदी करती चूड़ियों की खनक के साथ जीवन सरगम भी मन्द, मध्य और तार सप्तक के मध्य लयबद्ध हो ही जाती थी।’- (प्रतीक्षा, पृष्ठ 21)
    ‘स्त्रियों के लिए तो पति की प्यार भरी एक नजर ही उसे मल्लिकाए हिंदुस्तान की अनुभूति करा देती है।’ – (भगवती देवी, पृष्ठ 27) परंपराओं के निर्वहन की जिम्मेदारी भी हमने महिलाओं पर डाल दिया है। पूजा-पाठ, व्रत-त्योहार और गीत-संगीत को संजोए रखने का भार भी इन्हीं के कंधों सौंप हम निश्चिंत हो चुके हैं। काली, दुर्गा की आराधना में व्रत रखने वाली हजारों महिलाएं हर दिन घरेलू हिंसा का शिकार होती रहती हैं, लेकिन एक ने भी यदि दुर्गा, काली का रूप धारण कर लिया तो हमारे पुरुष प्रधान समाज की चूलें हिल जाती हैं। ‘भगवती देवी’ की नायिका बेटे न जन पाने के दंश की पूर्णाहुति अपने सौत की खोज में पूरी करती है। उसका पति हो या परिवार इस दर्द को दूसरा कोई नहीं समझ सकता। नायिका इस दर्द को भी लोकगीतों और मान्य परंपराओं के माध्यम से बयां करने का तरीका ढूंढ लेती है। –
    ‘भभूति देखले रे हम जरी गइली हो,
    जटा देख जरे छाती जी
    सवती देखत मोरे मनवा विलपेला
    कइसे गंवइबो दिन राती जी।’ – (भगवती देवी,पृष्ठ 26) ‘विडंबना’ की नायिका का जेठ यदि नपुंसक है तो उसमें देवरानी की क्या गलती है, लेकिन सजा उसे ही मिलती है अपने पति द्वारा भाभी के यौन इच्छाओं की पूर्ति के रूप में। हमारा सामाजिक परिवेश ऐसा है कि घर की बातें बाहर न हो इसलिए इस दंश को भी नायिका अपने पति के भाभी के साथ के उसके अंतरंग रिश्तों को स्वीकार करने को बाध्य है। वह अपने पति के भाभी के साथ के संबंधों को भी आत्मसात करने को मजबूर है।
    ‘गलत कहते हैं लोग …….शत्रु मान बैठी है।’ – (विडंबना, पृष्ठ 47) वर्षों तक घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं भी पल भर के लिए भी पति का प्यार मिल जाने से बीते कल को भुलाकर परिवार को जोड़े रखने में तनिक भी झिझक महसूस नहीं करती हैं। ‘जीवन का सत्य’ की नायिका यही कहती है – ‘गलती चाहे स्त्री करे चाहे पुरूष, दोनों ही दशा में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है।’- (जीवन का सत्य,पृष्ठ 17) आज की हमारी युवा पीढ़ी रिश्तों को भी यूज़ एंड थ्रो के रूप में जीती है। किरण सिंह की लेखनी का आधार आज की युवा पीढ़ी भी बनी है। लेकिन आज की पीढ़ी के बहाने रूढ़िवादिता पर भी कटाक्ष करने से बाज नहीं आती।- ‘भारत में तो लड़की से पांच-सात साल बड़े लड़के को ही विवाह के लिए ज्यादा अच्छा माना जाता है कि लड़कियां जल्दी ही अपने उम्र से बड़ी हो जाती हैं और लड़के देर्य से।’ – (प्रार्थना, पृष्ठ 50) ‘लाल गुलाब’ और ‘यू आर माइ बेस्ट फ्रेंड’ के बहाने लेखिका ने नई पीढ़ी को भी नहीं बख्शा है। ‘लाल गुलाब’ में जातीय बंधन से आज की पीढ़ी भी मुक्त नहीं हो पाई है और अपने प्रेमी के प्यार की निशानी लाल गुलाब की सूखी कलियों को वापस कर प्रेम का इति श्री कर सुकून का एहसास करती है। ‘प्यार करते ही लड़कियों को सजना-संवरना स्वयं ही आ जाता है।’ – (लाल गुलाब, पृष्ठ 62) ‘जब कोई तुम्हारे मन का न करे तो तुम खुद को उसकी जगह रखकर देखो कि तुम उसकी जगह होते तो क्या करते?’ – (यू आर माई बेस्ट फ्रेंड, पृष्ठ 41) और अंत में – ‘आत्मकथ्यात्मक संस्मरण संग्रह “दूसरी पारी” से लेखिका किरण सिंह के कुछ शब्द – ‘भावनाएं होती हैं बड़ी मनमौजी। सोते जागते कभी भी मस्तिष्क पटल पर उमड़ने-घुमड़ने लगती थीं।’- पृष्ठ – 21 ‘स्त्रियां तो होती ही हैं समझौतावादी।’ – पृष्ठ – 22 ‘कभी-कभी ईश्वर से भी शिकायती प्रश्न कर बैठती कि मेरी किस्मत में स्वर्ण पिंजरे में बंद पक्षी से ज्यादा क्या लिखा आपने।’ – पृष्ठ 22
    • को धता बताती, आज कहती हैं कि मेरी ये आठवीं पुस्तक है।
      इसी पुस्तक की एक पंक्ति किरण सिंह के लेखन मर्म को रेखांकित करता है –
      ‘दर्द वही महसूस कर सकता है, जिसने दर्द झेला हो।’ – (जीवन संगीत, पृष्ठ 123)
    और अब बात”रहस्य” की –
    ‘रहस्य’ कहानी और यह कहानी संग्रह एक स्त्री का स्वर है। वेदनाओं का स्वर, संवेदनाओं का स्वर, जीवन का स्वर, चिंतन का स्वर, प्रेम की पराकाष्ठा का स्वर, गूंगे-बहरे समाज का स्वर और स्त्री विमर्श का स्वर। स्त्री विमर्श को रेखांकित करती यह कहानी संग्रह सिर्फ किरण सिंह को ही नहीं, पूरे सामाजिक परिवेश के दबे स्वर को मुखरता प्रदान करती नजर आती है। कुछ रहस्य और है, लेकिन इसे जानने के लिए “रहस्य” को पढ़ना होगा। इसलिए आगे के रहस्य को पढ़ने तक राज ही रहने देते हैं। लेखिका आगे क्या लेकर आ रही हैं, प्रतीक्षा मुझे भी है।

समीक्षक – शम्भू पी सिंह
लेखक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – रहस्य
प्रकाशक – भावना प्रकाशन ( पंकज बुक्स)
मूल्य – 395

उषा किरण खान का कथा लोक

वैसे तो मैं स्वयं ही पद्मश्री उषा किरण खान दीदी की लेखन शैली से अत्यधिक प्रभावित हूँ जिसको पढ़ते हुए पढ़ने की तृष्णा शांत होने की बजाय और भी बढ़ती जाती है।  ऐसे में विदूषी बहन डाॅ सोनी पाण्डेय द्वारा सम्पादित पुस्तक गुलाबी रंग के आवरण में लिपटी, जिसपर उषा दीदी की तीन – तीन दैदिप्यमान छवि अंकित है ‘उषा किरण खान का कथा लोक’ साहित्य जगत के लिए एक उपहार ही है। उपहार इसलिए क्योंकि एक सौ बीस पृष्ठों में संकलित इस पुस्तक मे चौदह विदूषियों, मनिषियों का उषा किरण खान जी के कथा लोक पर अपने-अपने विचार संग्रहित हैं।
सभी के विचार उषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए इतनी खूबसूरती से लिखी गई है कि पाठक बस पढ़ता ही चला जायेगा और पढ़ते हुए उनकी कहानियों को महसूसने लगेगा। इतना ही नहीं  इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों के मन में उषा किरण खान जी की कहानियों को पढ़ने की इतनी उत्कंठा बढ़ जायेगी कि वह पढ़े बिना रह ही नहीं सकता है।
सर्वप्रथम पुस्तक की भूमिका में सोनी पाण्डेय जी लिखती हैं –

मैथिली की कथा लेखिका ‘ऊषा किरण खान’ की कहानियों से गुजरते हुए जो तत्व प्रमुखता से उभरता है वह है “आगे क्या हुआ?” की जिज्ञासा। आपकी कहानियाँ अपनी सहज रवानगी में भाषा को लोकरंग धारण किये पाठक को उस लोक में ले जाती है जहाँ की वह बात करती हैं।……..

विदुषी भावना शेखर जी ने ऊषा किरण खान की सवर्ण विधवाएँ पर बहुत ही खूबसूरती से प्रकाश डाला है जो अवश्य ही पठनीय है।
वो लिखती हैं –
मैथिली और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में सिद्धहस्त उषा जी का साहित्य अपने ग्राम्य अनुभवों के कारण उपेक्षितों, वंचितों के जीवन संघर्ष का आइना बन पड़ा है। दलितों की पीड़ा और जिजीविषा के सूक्ष्म और प्रभावी रेखांकन के लिए उन्हें पहचान मिली किन्तु बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि अपने विपुल साहित्य में बिखरे नारी पात्रों में न केवल दलित अपितु सवर्ण स्त्रियों की पीड़ा का व्याख्यान भी उन्होंने सिद्दत से रचा है। उनकी कहानियों में खास तौर पर विधवा पात्रों की व्यथा – पाठकों को उद्वेलित करती हैं। और लम्बे समय तक भीतर ही भीतर मन को कचोटती हैं।….

नीलकंठ और जलकुम्भी एक विश्लेषण में रानी सुमिता कहती हैं –
कथाकार ऊषा किरण खान की कहानियों का कथा संसार बेहद विस्तृत है। ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई इनकी कहानियाँ गाँवों की लगभग हर समस्या को ढूढती और खँघालती नज़र आती है। कहानी नीलकंठ सुदूर गाँवों में जा पहुंची है और कहानी की आड़ में घर – घर आ पसरे नक्सली जो सामान्य जन का नकाब ओढ़े रहते हैं, को उजागर किया है।….

और उषा किरण खान की कहानियों का नाट्य प्रयोग में उषा दीदी की बहुआयामी प्रतिभा की धनी विदुषी  पुत्री कनुप्रिया कहती हैं – उषा किरण खान मेरी माँ हैं। माँ की कहानियाँ बचपन से ही पढ़ रही हूँ मैं, पर मर्म अब जाकर समझ आया है । चूँकि बचपन से ही मंच और रेडियो पर हिन्दी, मैथिली नाटक करती आई हूँ तो हर कलाकार की तरह मैं भी यह सोचती थी कि काश इस किरदार को मैं भी अपने अंदर उतार सकूँ। किसी भी चरित्र को निभाना आज भी एक स्वप्न सा अनुभव होता है, एक ही जीवन काल में कई सारे जीवन जीना।…..

इस प्रकार से इस पुस्तक में ( शेफाली झर रही है  – डाॅ विद्या निवास मिश्र
जीवनानुभवों का उदात्त – डाॅ चन्द्र कला त्रिपाठी
जल प्लावन में तटबंध की तरह – प्रज्ञा पाण्डेय
सहज किन्तु साधारण नहीं – पूनम सिन्हा
लोक जीवन का समुच्चय – डाॅ गौरी त्रिपाठी
उषा किरण खान की कहानियाँ – आभा बोधिसत्व
अतीत के वर्तमान में वृहत्तर स्वीकृति – पूनम सिंह
गरीबी को परास्त करते पतः साधक बच्चे – सुधा बाला
जीवन मूल्यों का आलोक – डाॅ राजीव कुमार वर्मा
हमके ओढ़ा द चादरिया – आशीष कुमार) ने भी ऊषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए बहुत ही खूबसूरती से अपने-अपने भाव प्रकट किये हैं जो श्लाघनीय है।
वैसे तो यह पुस्तक सभी को अच्छी लगेगी लेकिन शोधार्थियों के लिए तो यह पुस्तक सोनी पाण्डेय जी के द्वारा एक उपहार की तरह है।
पुस्तक की छपाई स्पष्ट है और पन्ने सामान्य हैं। फिर भी पुस्तक की पठन सामग्री को देखते हुए मूल्य ठीक ही कहा जायेगा।
एक सुन्दर और सार्थक कार्य की सराहना करते हुए पुस्तक की सम्पादक सोनी पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – उषा किरण खान का कथा लोक
प्रकाशक – आपस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, अयोध्या, उत्तर प्रदेश
मूल्य – 285,
कवर – पेपर बैक
पृष्ठ संख्या – 120

गोलू – मोलू


सरल, सहज, सुबोध, सरस एवं शिक्षाप्रद बाल कविताएँ
प्रभात कुमार राय
कृति: गोलू – मोलू ( बाल कविता- संग्रह )
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशक: जानकी प्रकाशन, नई दिल्ली- पटना
पृष्ठ: 48 मूल्य : रू• 150
समीक्षक: प्रभात कुमार राय
मो• 9934083444
यह महज संयोग है कि कवयित्री द्वारा रचित बाल- कविता-संग्रह की समीक्षा लिखते वक्त ही यह आहलाद्कारी समाचार मिला कि उन्हें लखनऊ उ•प्र• हिन्दी संस्थान के बाल साहित्य संवर्धन योजना के अंतर्गत सुभद्रा कुमारी चौहान बाल साहित्य सम्मान से नवाजा गया है। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भी हाल ही में उन्हें उत्कृष्ट रचनाओं के लिए सम्मानित किया है । कवयित्री की यह अद्यतन पुस्तक महान साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी द्वारा साहित्यिक चर्चा के दरम्यान वर्णित एक प्रेरक वाक्य – ‘ बाल साहित्य सृजन प्रत्येक साहित्यकार का नैतिक कर्तव्य होता है’ – की देन है। इसे सूत्रवाक्य की तरह अपनाकर कवयित्री के सत्प्रयास का समीक्ष्य पुस्तक एक सुन्दर फल है । माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अपने पुरोवाक् में बाल साहित्य साधना को ईश्वरीय आराधना की संज्ञा दे डाला है ।
हिंदी बाल साहित्य लेखन की परंपरा प्राचीन एवं समृद्ध है । हाल मे कॉमिक्स तथा अंग्रेजी विद्यालयों में तुकबंदी वाली लघु कविताओं आदि के प्रति झुकाव के कारण इस साहित्य के अभिवर्धन की गति धीमी हो गयी है । विश्व कवि रवीन्द्रनाथ की बाल- कविताएँ मशहूर है । पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों में अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ‘ हरिऔध ‘, कामताप्रसाद गुरू, राम नरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चौहान, सोहन लाल द्विवेदी, रामधारीसिंह दिनकर एवं आरसी प्रसाद सिंह प्रभृति साहित्यकारों की बाल- कविताएँ बच्चों का कंदहार बन गयी थी। मुझे अपने बाल्यकाल में दिनकर जी का ‘ सूरज का व्याह ‘, ‘मिर्च का मजा ‘, ‘ चित्तौड़ का साका’ तथा आरसी जी का ‘ सोने का झरना’, ‘ कलम और बंदूक ‘, ‘ कागज की नाव’ आदि बाल कविता-संग्रहों को पढ़ने का सौभाग्य मिला । निस्संदेह इन कविताओं ने मेरी कल्पनाशीलता को नया आयाम दिया तथा साहित्य- बोध एवं महत्वपूर्ण सीखें भी दीं।
इस पुस्तक के आरंभ में सरल एवं सरस शब्दों में प्रार्थनाएं हैं जो सदाचार , निष्कपटता एवं विवेकशीलता की पाठ पढ़ाते हैं, वहीं अंत में राष्ट्र- भक्ति से ओत-प्रोत उत्साह, उमंग, गौरव और शौर्य का संचार करनेवाली कविताएँ हैं। कवयित्री की बाल- कविताएँ सिर्फ मनोरंजन या साहित्यिक चेतना को जगाने के निमित्त ही नहीं हैं वरन् उपदेशात्मक और जीवन- दर्शन के यथार्थ को भी स्वर देती है । राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी सपाटबयानी में लिखा है : ‘ केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए/ उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए’/। पर उपदेश या चरित्र-निर्माण संबंधित हिदायतें अगर आदेशात्मक शैली में कही जाती है तो बच्चों के कोमल मस्तिष्क इसे सहज ग्रहण नहीं कर पाते। इसलिए मनोरंजन के मर्म में शिक्षण को पिरोया गया है ताकि बालक अनायास उन्हें अपने स्वभाव और आदतों में डाल सकें । कवयित्री द्वारा कड़वी दवा के घूंट को मधु-मिश्री में घोलकर कंठ के नीचे उतारने का प्रयास रोचक एवं कुशलतापूर्वक किया गया है। जल-संचय, पर्यावरण-संरक्षण, स्वास्थ्य संबंधी हिदायतें, ट्रैफिक सुरक्षा नियमों का अनुपालन, कोरोना महामारी को मात देने के लिए सावधानियाँ आदि ज्वलंत मुद्दों को बड़ी ही सूक्ष्मता से सहज प्रवाह में गेय कविताओं द्वारा व्यक्त किया गया है जिनसे नन्हे-मुन्हे उन्हें झूम-झूम कर गायेंगे और जीवनोपयोगी संदेश को ग्रहण करेंगे ।
सर्वधर्म समभाव के मर्म को भावी कर्णधारों के कोमल हृदय में उकेड़ने का कवयित्री का प्रयास स्पृहणीय है:
‘आस-पास हो मंदिर-मस्जिद/ द्वेष रहे न मन में सिंचित’/
‘एक तरफ हो अल्लाह- अकबर/ सम्मुख विष्णु महेश हों’/
‘चलो सुनाते हूँ मैं कहानी/ एक राम रहीम एक है/ एक सीख हर धर्म की’/
जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव को त्यागने और ऐक्य की भावना जागृत करने के लिए कवयित्री बच्चों को सिखलाती है:
‘ तोड़ दो दीवारें जाति-धर्म की/ हम रहेंगे साथ मिलकर ए वतन’/
बाल कविता-संग्रह में बच्चों के सर्वाधिक प्रिय फल आम का जिक्र स्वाभाविक है ।कवयित्री की ये पंक्तियां:’ खट्टा-मीठा ताजा आम,/सबका जी ललचाता आम/ हिमसागर बादामी बीजू,/ केसर चौसा लंगड़ा आम’/
ये पंक्तियां कविवर आरसी प्रसाद सिंह की निम्न बाल-कविता के भाव को व्यंजित करती प्रतीत होती है:
‘ आमों के हैं नाम हजारों, सभी रसीले, सब सुंदर ।
कृष्णभोग, सिन्दुरिया, फजली, चंपा-दुधिया हिम-सागर’।
बच्चों का स्कूल जाने से कतराना जग-जाहिर है । कवयित्री ने लिखा है: ‘ बस जायगी छूट स्कूल की,/ अगर करोगे देरी/ हो जाओ तैयार फटाफट, बात मानकर मेरी’/ अपनी ‘ रविवारी प्रार्थना’ कविता में आरसी जी ने लिखा है: ‘ हे प्रभो ! प्रत्येक दिन को/ तू मधुर रविवार कर/ और दिन की हर घड़ी में , खेल का संचार कर’/
अत्यधिक कल्पना-प्रधान होने के कारण काल्पनिक कविताएँ, कथा व कहानियों बालकों को अधिक प्रिय होती हैं । कल्पना शक्ति के अधिक तीव्र होने के कारण वे बिल्ली, मेढक, बंदर आदि को भी मनुष्यों की तरह बात-चीत और व्यवहार करनेवाला समझ लेते हैं । कवयित्री ने ऐसी कविताओं का सृजन कर बच्चों की कल्पना को कुलांचे प्रदान की है । आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों एवं उपादानों जैसे मोबाइल, फेसबुक (मुखपोथी),फोटो का स्टाइल आदि के बारे में चर्चा वर्तमान पीढ़ी के बालकों को विशेषकर भायेगा ।
ऐसा माना जाता है कि बच्चों के मन को समझ पाना अतल अंधकारयुक्त समुद्र में गोता लगाकर मोती खोजने के समान अत्यंत कठिन है । श्रेष्ठ बाल-गीत के लिए बाल-स्वभाव का पर्याप्त ज्ञान परमावश्यक है ।बच्चों के मन में किन परिस्थितियों में कैसी भावनाएं उदित होती हैं, कब कैसी-कैसी कल्पनाएं करते हैं, अनुकरण की प्रवृत्ति, अपरिमित जिज्ञासा आदि को गहराई से समझना जरूरी है । तभी गुणवत्तापूर्ण बाल-कविता की रचना संभव है । बालकों को कैसी रचनाएँ प्रिय लगती है और अपने लिए कैसे विचार पसंद करते हैं, यह तो बालक बनकर उनके हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ अपने मनोभावों का स्पंदन मिलाकर ही अनुभव किया जा सकता है । पुस्तक के आरंभ में ‘ एक चिट्ठी बच्चों के नाम’ में कवयित्री ने लिखा है : ‘ ॰॰॰॰ क्यों न मैं आपसे दोस्ती कर लूं । क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगे ?’ पूरी पुस्तक में कवयित्री की भूमिका पाठशाला की शिक्षिका की नहीं वरन् समकक्ष वरिष्ठ दोस्त की है । वस्तुतः बाल-साहित्य को परिचय तो उसकी बाल-प्रकृति में मिलता है । जहां बाल-मनोभाव है, वहीं असली बाल-साहित्य है ।
हिंदी साहित्य के धूमकेतु एवं जनकवि आरसी प्रसाद सिंह ने बाल साहित्य की महत्ता एवं गुणवत्ता को रेखांकित करते हुए बड़े बेबाकी से कहा है: ‘ यह समझना भ्रम है कि उच्च कोटि का साहित्य प्रबुद्ध प्रौढ़ पाठकों के लिए है और निम्न कोटि की रचनाएँ बालकों के लिए । … इस विभेद ने बाल साहित्य के नाम पर इतना सारा कूड़ा- कर्कट भर दिया कि उसकी सडन और दुर्गंध से सारा वातावरण दूषित होने लगा है। अतएव ज्वलंत सच्चाई यही है कि बाल साहित्य भी अपने स्थान पर उतना ही पूर्ण, आत्म-निर्भर, जीवंत और उच्च कोटि का हो सकता है । प्रबुद्ध-प्रौढ़ साहित्य की अपेक्षा यह कोमल-सुकमार साहित्य इसलिए श्रेष्ठ है कि इसमें सरलता के साथ सरसता और श्रेय के साथ प्रेय को मिलाकर गागर में सागर कर देना पड़ता है, जो हर साहित्यकार के वश की बात नहीं ।‘
इस संग्रह में सभी कविताएँ बाल-मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर रची गयी है । कवयित्री के सच्चे आत्म- बोध के एकान्त स्वर में इन रचनाओं का प्रस्फुटन हुआ है । हर कविता के अंत में भावपूर्ण एवं मनोहारी चित्रों का समावेश कविता की सार्थकता को बढ़ाने में सहायक है ।कवयित्री ने अपने मन को बच्चों के मन से तादात्म्य स्थापित करते हुए, उनके मानसिक स्तर को ध्यान में रखते हुए, रोचक कविताओं का सृजन किया है । कवयित्री की भाषा उतनी ही सरल है जितना ‘गोलू-मोलू’ का चंचल स्वभाव ।
बालकों के निमित्त यह संग्रह प्रत्येक शिशु, जिसके कोमल जीवन-अंकुर में भविष्य की अपार संभावनाएं झाँक रही है, को सदाचरण, स्वनिष्ठा, नैतिकता, परस्पर सदभाव , सेवा और राष्ट्र-प्रेम का संदेश देगा और साथ ही साहित्यिक प्रवृत्तियों को विकसित करेगा । मुझे पूरा विश्वास है कि ये रचनाएँ अपने उद्देश्य में निश्चय सफल होंगी तथा पाठकों के हृदय में चेतना का ज्वार भर देगी।

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है –

रश्मि अनन्त

रश्मि अनंत

आज जिस तरह से साहित्यिक संस्थाएँ नवोदित लेखकों को चुन – चुन कर समाज के सामने ला रही हैं वह निश्चित ही सराहनीय है। ऐसी ही एक एक संस्था है सोशल एन्ड मोटिवेशनल ट्रस्ट जो कि दिनोंदिन अनंत साहित्यिक गतिविधियों को विस्तार दे रही है।
यही विस्तार अनंत काव्य रश्मियों के माध्यम से साहित्य जगत को आलोकित करने के लिए एक पुस्तक में संकलित होकर अपनी तरफ़ आकृष्ट कर रहा है ।
वैसे तो इस पुस्तक का नाम रश्मि अनंत ही स्वयं को परिभाषित करने के लिए पर्याप्त है ऊपर से इसका आकर्षक कवर जिसपर परिंदे खुले आसमान में उड़ान भर रहे हैं एक सार्थक संदेश दे रहा है।
पुस्तक में कुल ३१० पृष्ठों में ३९ रचनाकारों की रचनाएँ संकलित हैं ।सभी रचनाओं को पढ़ने के पश्चात संग्रह के सम्पादक रविन्द्र नाथ सिंह जी के काव्य चयन व सम्पादन की प्रशंसा करनी होगी –

उदाहरण के लिए कुछ काव्य रचनाओं से परिचय कराने के क्रम में मैं संग्रह के सम्पादक मनीषी रविन्द्र नाथ सिंह जी की रचना सादगी से ही शुरुआत करती हूँ-

सादगी।

क्या रखा आडम्बरों में
सादगी अपनाइए।
है अगर रब़ पर भरोसा
मत कभी घबराइए
सादगी तन मन का गहना
खुदको इससे सजाइए।

बोलिए मत झूठ हर्गिज
जो भी हो मजबूरियाँ
झूठ से है भेद बढता
सच मिटाती दूरियाँ

तत्पश्चात सोशल एन्ड मोटिवेशनल ट्रस्ट की अध्यक्ष ममता सिंह जी की एक रचना कालीदास से –

कालीदास

कालीदास मूढ मानव थे
ऊँच नीच का ज्ञान नहीं
बैठे थे जिस डाल के उपर
काट रहे थे भान नहीं ।

कौन बताए मूर्ख प्राणी को
डाल जो ये कट जाएगा
गिर जाएगा शीघ्र धरा पर
साथ वह भी गिर जाएगा।

चूंकि आजकल सोशल मीडिया साहित्यकारों के लिए एक अच्छा प्लेटफार्म है तो कवयित्री शेफालिका वर्मा के भावों को देखें –

फेसबुक
ये फेसबुक ना होता तो क्या होता
ये रातें ये दिन
गुलज़ार न हुआ करता
सूनेपन को झंकार न मिला होता
इतनी कविताओं का जन्म न हुआ रहता
जो मौन मूक किनारे पड़े रहे
उन्हें यूँ साहिल न मिला होता

मधुर वचन कितना जरूरी है कवि सी. के जैन जी के शब्दों में –

मन रे मधुर वचन तू बोल,
मधुर वचन का इस जग में कोई, लागे नाही मोल।
कडवी बात कभी बन आये, मौन को मन में धार,
बिन बोले नहीं काम बने तो, कटु वचनों को टार,
देखभाल कर, नाप तौल कर, मीठे वचन टटोल,
मन रे मधुर वचन तू बोल।
कडवा वचन व्यंग्य द्रोपदि का, कुपित किया दुर्योधन,
लज्जित करके भरी सभा में, बैर गांठ बांधी मन,
अग्नि उठी बदले की दिलों में, बजा युद्ध का ढोल,
मन रे मधुर वचन तू बोल।

श्रीमती आशा चौधरी जी प्रेम को परिभाषित करते हुए कहती हैं –

प्रेम है पूजा, प्रेम हकीकत, प्रेम जगत की कुंजी है।
यह उमंग है यह तरंग है, यह सुन्दर एहसास है।

भावना झा रूबी जी की पंक्तियाँ –

बदलती सम्बन्ध की तस्वीर।
दुनिया में वो व्याध है गम्भीर।

इस प्रकार इस पुस्तक में संकलित सभी रचनाएँ छन्मुक्त होते हुए भी पाठकों के मन को बांधने के प्रयास में लगभग सफल हैं। पुस्तक के पन्ने सामान्य हैं लेकिन छपाई स्पष्ट है अतः पुस्तक पठनीय है।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – रश्मि अनंत
सम्पादक – रविन्द्र नाथ सिंह
मूल्य – रु ३९९ ( तीन सौ निन्यानबे)
पृष्ठ संख्या – ३१०

मैं एक बलुआ प्रस्तर खण्ड

आज का लेखन यदि स्त्री विमर्श काल कहा जाये तो यह गलत नहीं होगा। क्योंकि जिस तरह से स्त्रियां अपने हाथों में कलम रूपी तलवार थामकर समर में कूद पड़ी हैं कि महा समर में हलचल का माहौल उत्पन्न हो गया है।
वैसे तो स्त्री विमर्श पर अनेक साहित्य रचे गये किन्तु आज मैं जिस पुस्तक की बात कर रही हूँ उसे पढ़ते हुए एक – एक करके मेरे ज्ञान चक्षु खुलते गये।
इस पुस्तक की लेखिका हैं साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा भारत भारती सम्मान से अलंकृत पद्मश्री Ushakiran Khan  जी। मैं आदरणीया की पंक्तियों को लेते हुए मैं  उनके द्वारा स्त्रियों को सप्रेम समर्पित की गई ज्ञानवर्धक तथा प्रेरणादायी पुस्तक का परिचय कराने का प्रयास कर रही हूँ। ” मेरे मन में सदा उथल-पुथल रही कि स्त्री की स्थिति और उसके उत्थान पतन की चर्चा की जाये तो कैसे? आम धारणा और क्रमिक विकास की ऐतिहासिक दृष्टि से देखते हुए मैंने लिखना शुरू किया। रससिद्ध और मनोरंजक बनाने का आलम्बन दीदारगंज की चंवरवाहिनी यक्षी बनी,,” जिसका परिणाम है मैं एक बलुआ प्रस्तर खण्ड।
वास्तव में लेखिका उषा किरण खान जी ने अपूर्व प्रयोग करते हुए स्त्री विमर्श जैसे गम्भीर विषय को भी इतनी सहजता, मनोरंजक व खूबसूरती से वर्णन किया है कि पाठक भावनाओं के प्रवाह में बहता चला जायेगा और सोचने पर विवश हो जायेगा।
पीले सरसों के रंग के आवरण में जिसपर खूबसूरत स्त्रियों की कलाकृति अंकित है.. लिपटी हुई यह पुस्तक पाठकों को आकृष्ट करने तथा अपना परिचय देने के लिए पर्याप्त है जिसमें पूर्व वैदिक काल की विदुषी घोषा से लेकर इंदिरा गांधी तक की स्त्रियों की गौरव गाथा सन्निहित है।
जैसा कि आदरणीया ने अपनी भूमिका में लिखी है कि” रससिद्ध और मनोरंजक बनाने का आलम्बन दीदारगंज की चंवरवाहिनी यक्षी बनी” तो अपनी कहानी सुनाते हुए चंवरवाहिनी यक्षी शिल्पी के श्रम, सूझ – बूझ तथा संवेदनशीलता का बहुत ही सूक्ष्मता से विवेचना करते हुए प्रत्येक काल – खण्ड में स्त्रियों की दशा का वर्णन करती है।
स्त्री और पुरुष पूर्व वैदिक काल में लगभग बराबरी का दर्जा रखते थे।
अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह चलता था।
ऋतमती होते ही स्त्री पुन: पवित्र हो जाती है।
आर्यों के प्रारम्भिक समाज में स्त्रियाँ स्वच्छंद थीं।
वैदिक युग में स्त्री की शिक्षा अपनी उच्चतम सीमा पर थी।
बौद्ध युग में स्त्रियां प्रायः शिक्षित और विद्वान हुआ करती थीं। विद्या धर्म और दर्शन के प्रति उनकी अगाध रुचि हुआ करती थी।
उत्तरवैदिककालीन व्यावहारिक शिक्षा में वे नृत्य, गान, चित्रकला आदि की भी शिक्षा ग्रहण करती थीं।
दूसरी सदी ई. पूर्व तक स्त्री का उपनयन व्यवहारतः बन्द हो चुका था। विवाह के अवसर पर ही उनका उपनयन संस्कार कर दिया जाता था। इस सम्बन्ध में मनु का कथन है कि पति ही कन्या का आचार्य, विवाह ही उसका उपनयन संस्कार , पति की सेवा ही उसका आश्रम – निवास और गृहस्थी का कार्य ही उसका धार्मिक अनुष्ठान है। कालांतर में शुद्रों की ही तरह वेदों के पठन-पाठन और यज्ञों में सम्मिलित होने के अधिकार से भी वह वंचित कर दी गई।
पूर्व मध्य युग तक आकर नारी शिक्षा का प्रसार अवरुद्ध हो चुका था किंतु अभिजात वर्ग में सुसंस्कृत और सुबोध स्त्रियों की कमी नहीं थी।
ऐसी भी स्त्रियां हुईं जो शाशक अथवा अभिभावक के अभाव में स्वयं प्रशासन का संचालन करती थीं।
यह जानकारी तो हमें लेखिका द्वारा स्वयं लिखी गई भूमिका में ही मिल जाती है।
अब सुनाती हूँ चंवरवाहिनी यक्षी द्वारा कही गई कहानी के अंश –
‘शिल्पी का स्पर्श मेरे अंग-अंग में बस गया।शिल्पी वहां मेरे पार्श्व में गहरी निद्रा में सो गया था जिसे उषस्काल  की अन्शुमालाओं ने जगाया। दिनकर की कोमल किरनों ने पहले सिकता राशि पर अपनी प्रभा बिखरी,उनमें घुले-मिले अभरक कणों को सुनहरा किया’ मुझे एक आभा प्रदान की तब उसके गंगा जमुनी श्मश्रुओं के बेतरतीब केशों को सहलाया…….

इस प्रकार लेखिका की लेखनी यक्षी के माध्यम से घोषा,गार्गी,लोपामुद्रा, आमृपाली, रज़िया सुल्तान से इन्दिरा गांधी तक का बहुत ही कम शब्दों में विस्तार से वर्णन करती है। पुस्तक की भाषा, काल और संस्कृति का सूक्ष्म परिचय देती है ।

इस प्रकार की कितनी ही जानकारी इस पुस्तक में सन्निहित हैं जिसको जानना हम सभी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इतने कम पृष्ठों में कथेतर गद्य  के माध्यम से इतनी खूबसूरती से पूर्ण स्त्रीकाल को समेट लेने की क्षमता आदरणीया उषा किरण खान दीदी की लेखनी ही रखती है। हम लेखिका की लेखनी को नमन करते हैं।

यह पुस्तक सभी स्त्रियों को तो पढ़नी ही चाहिए साथ ही समस्त पुरुष जाति को भी पढ़नी चाहिए जिससे स्त्रियों के प्रति उनकी धारणा बदल सके और वह एक नई दृष्टि से स्त्रियों को देख सकें।
इतने खूबसूरत और बहुमूल्य उपहार के लिए हम आदरणीया उषा किरण खान दीदी को साधुवाद देते हुए बारम्बार प्रणाम करते हैं।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – मैं एक बलुआ प्रस्तर खण्ड
लेखिका – पद्मश्री उषा किरण खान
प्रकाशक – वाणी प्रकाशन
मूल्य – 250 रुपये

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है –

रहस्य

24 कहानियों का गुलदस्ता है ‘रहस्य’

कृति: रहस्य (कहानी संग्रह)
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशकः पंकज बुक्स
109-ए, पटपड़गंज गाँव
दिल्ली-110091

पृष्ठः 128 मूल्यः 395/-

समीक्षकः मुकेश कुमार सिन्हा

हमारे आस-पास कहानियों के अनगिनत पात्र बिखरे पड़े हैं, बस जरूरत है उन पात्रों को, शब्द रूपी पुष्पों में ढालने की। पुष्पों को चुन-चुनकर हम उसे माला का रूप दे सकते हैं। रंग-बिरंगे पुष्पों से तैयार माला गुलदस्ता रूप में लोगों का बरबस ध्यान आकर्षित करता है। कौन नहीं चाहेगा रंग-बिरंगे फूलों के गुलदस्ता को हाथों में लेना? ऐसा ही एक गुलदस्ता है-‘रहस्य’। 24 कहानियों से सुसज्जित है यह। कहानीकार हैं-किरण सिंह।
किरण सिंह केवल कहानियाँ नहीं गढतीं, साहित्य की हर विधा पर अपनी कलम चलाती हैं। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मान सहित कई सम्मानों से सम्मानित किरण सिंह की कलम कविता गढ़ती है, दोहे रचती है, कहानियाँ भी सृजित करती है। ‘प्रेम और इज्जत’ के बाद किरण सिंह की कहानियों की यह दूसरी पुस्तक है।
बकौल किरण, ‘हमारे आसपास के वातावरण में कई तरह की घटनाएँ घटित होती रहतीं हैं, जिसे देखकर या सुनकर हमारा संवेदनशील मन कभी हर्षित होता है तो कभी व्यथित और फिर कभी अचंभित भी। ऐसे में हम मानव के स्वभावानुरूप अपने-अपने मित्रों, पड़ोसियों आदि से उस घटना की परिचर्चा करके अपनी मचलती हुई संवेदनाओं को शांत करने का प्रयास करते हैं। किंतु, एक लेखक की लेखनी मचलने लगती है, शब्द चहकने लगते हैं और लिख जाती हैं खुद-ब-खुद कहानियाँ।
किरण सिंह रचित ‘रहस्य’ की कहानियों में नारी के अंतर्मन की चाहत है, नारी की बेबसी है, तो समाज से उम्मीद भी। आखिर समाज से नारी उम्मीद नहीं लगाये, तो किससे लगायेगी? कितना त्याग करती है नारी? माँ रूप में, पुत्री रूप में, बहन रूप में और न जाने कितने रिश्तों को निभाते-निभाते अपनी खुशियों की भी परवाह नहीं करती है। कहानियों में नयी पीढ़ी को संदेश है, तो नारी को नसीहत भी।
भले ही ‘रहस्य’ से पर्दा उठ गया, लेकिन यह प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम अन्तर्मन से होता है, यह हाट में बिकने वाली चीज नहीं है। ‘यह मैं सोना के लिए लाया हूँ। उससे ब्याह करूँगा।’ यह हीरा ने कहा। हीरा और सोना का एक-दूसरे से बहुत प्यार था, मगर दोनों विवाहित थे।
कभी कुएँ में गिरे सोना को निकालने वाला हीरा उसे फिर कुएँ से निकालता है, लेकिन तब वह बेजान होती है। लोगों के बीच चर्चा थी कि कुएँ पर सोना की आत्मा भटकती है, पायल की झंकार सुनायी देती है। हालाँकि वह सोना नहीं होती। वह तो हीरा होता है, जो अक्सर रात को चूड़ियाँ, बिंदिया तथा पायल-सिंदूर को लाल रंग के बक्से में रखकर कुएँ के पास पहुँचता है, यह आस लिए कि सोना जिंदा कुएँ से लौटेगी और वह ब्याह रचायेगा!
दिल से किया गया ‘प्यार’ हमेशा पूर्णतः को प्राप्त करता है। ऋचा को पाकर ऋषभ इठला उठा था। हालाँकि ऋचा का संबंध अभिषेक से हो जाता है, लेकिन प्यार का पलड़ा ऋषभ का ही भारी रहा। ‘लाल गुलाब’ लेकर ऋषभ के खड़ा होने से ऋचा का चेहरा गुलाब-सा खिलना लाजिमी था। यह ‘विडम्बना’ ही है कि विवेहत्तर संबंध का खामियाजा स्त्री को ही भुगतना पड़ता है। मेघा यह जान गयी थी कि उसके पति का संबंध उसकी जेठानी से है, फिर भी वह यह सोचकर चुप हो जाती है कि जेठानी की क्या गलती? इस परिवार ने छलकर ही उनकी शादी नपुंसक बेटे से करा दी। वहीं ‘अपशगुन’ कहानी नारी मन की पीड़ा को उजागर करती है।
कहानीकार की कहानियाँ माता-पिता को सलाह देती है। सच में, हम अपनी औलाद को इतना लाड़-प्यार देने लगते हैं कि उनकी गलतियों को नजरअंदाज कर देते हैं। फलतः औलाद के पाँव भटक जाते हैं। जरूरत है माँ-पिता को सही परवरिश देने की, ताकि हर माँ यह कह पाये-‘बेटा सोने पर लाख धूल मिट्टी जम जाये, थोड़ा-सा तपा दो चमक ही जाता है।’ फैशनपरस्त नयी पीढ़ी को नसीहत देती है-‘झूठी शान’। कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता, बस राह गलत न हो!
अक्सर युवा मन भटक जाता है। एकतरफा प्यार के चक्कर में वह कैरियर को दाँव पर लगा देता है। हालाँकि जो संभल गया, उसकी चाँदी है और जो न समझा, वह कैरियर व भविष्य को चौपट कर लेता है। विक्की सँभल गया, इसलिए अच्छे पद पर पहुँचा। कितना अच्छा होता, यदि ‘यू आर माई बेस्ट फ्रेंड’ में लेखिका विक्की के हाथ को मिताली के हाथ में थमा देती। हम प्यार करते हैं, लेकिन इजहार नहीं कर पाते। यदि नितेश मन की बात को मृणालिनी से कह देता, तो उसकी जिंदगी संवर जाती। अब मृणालिनी के हिस्से ‘प्रार्थना’ के सिवाय कौन-सा शब्द शेष है।
कोख कितनी भी बेटियों को जन्म दे दे, लेकिन बेटों को न जने, तो कोख की इज्जत कम हो जाती है। खानदान चलाने के लिए बेटा चाहिए, समाज की यही सोच है। पति की खुशी और वंश वृद्धि के लिए भगवती देवी घर में सौतन लाती है, लेकिन एक वक्त ऐसा आता है कि उसे उपेक्षित जीवन जीना पड़ता है। भगवती जैसी नारी समाज में है, लेकिन आखिर भगवती जैसी महिलाओं को सौतन लाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? समाज आज तक अपनी सोच को बदल पाने में असमर्थ क्यों है? एक अनुत्तरित प्रश्न है, जिसका जवाब ढूँढा जाना आवश्यक है।
लेखिका स्त्री को नसीहत देती है। लिखती हैं-यदि स्त्री चाहे तो घर को घर बना सकती है, अन्यथा ‘राम वनवास’ हो सकता है। स्त्री की सोच क्यों हो जाती है कि उसके बगैर घर नहीं चल सकता? परिवार को चलाने के लिए सबकी जरूरत होती है, बस ‘आत्ममंथन’ की जरूरत है। संस्मरणात्मक कहानी है-‘नायिका’, तो कोरोना की त्रासदी का दंश है-‘वादा’।
पति और पत्नी के बीच नोंक-झोंक होना कोई असाधारण बात नहीं है, लेकिन इसका क्या मतलब कि हम अपनी जान पर ही आफत मोल लें। ‘जीवन का सत्य’ में अविनाश गलत है या मीना, कहना मुश्किल है। यदि अविनाश सही होता, तो वह अपनी पत्नी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करता और यदि मीना सही होती, तो वह अपनी ‘बगिया’ को छोड़कर संन्यासी जीवन को नहीं अपनाती। पति और पत्नी गाड़ी के दो पहिए हैं, दोनों का साथ जरूरी है गृहस्थ जीवन चलाने में। शक को भी कभी जिंदगी में आने नहीं देना चाहिए, अन्यथा शिखा और नितेश की तरह जिंदगी बदरंग-सी हो जायेगी। प्राची की वजह से दोनों के साँसों की सरगम में जीवन संगीत बजा। जाहिर सी बात है कि ‘जीवन संगीत’ है, मन के आँगन में शहनाई का बजना भी बार-बार जरूरी है।
अपनी जान बचाने के एवज में ‘अमृता’ ने डाॅक्टर दंपति की बदरंग जिंदगी को रोशन करने के लिए कोख को दे देती है। हालाँकि यह अमृता की बदकिस्मती थी कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। काश! उसकी अभिलाषा पूरी हो जाती।
कहानीकार के शब्द संयोजन के क्या कहने? कहावतों को भी कहानी में पिरोती हैं। सिरहाने बांसुरी रखने से पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है को शब्दों में पिरोकर कहानी रची गयी है-बांसुरी। ‘धर्म’ यह बताने को काफी है कि सबसे बड़ा धर्म है-मानवता। हम बेवजह धर्म को लेकर आपस में लड़ते-झगड़ते हैं। यदि शबाना ने मानव धर्म नहीं अपनाया होता, तो शैलजा का बेटा पता नहीं आज किस हाल में होता? ‘नमस्ते आंटी’ उन महिलाओं को बेपर्द करने की कोशिश है, जो अपनी उम्र छिपाती फिरती हैं। ‘संकल्प’ आईना है। अनसोशल की पैठ के बीच जरूरी है सोशल मीडिया में खुद के लिए लक्ष्मण रेखा तैयार करना। हालाँकि सोशल मीडिया की उपयोगिता है। फेसबुकिया प्रपंच के बीच संध्या की ‘परख’ को दाद देनी पड़ेगी। ‘संतुष्टि’ अच्छी कहानी है। हमारी मदद से किसी की जिंदगी सुधर जाये, तो संतुष्ट होना लाजिमी है। सविता के चेहरे पर संतुष्टि का भाव कहानी को जीवंत बनाती है।
लेखिका किरण सिंह की कलम परिपक्व है। वह जानती है कि कब और कहाँ, किस पात्र से क्या-क्या कहलाना है? ‘वैसे भी पतियों की आदत होती है हिदायत देने की क्योंकि उनकी नज़रों में तो दुनिया की सबसे बेवकूफ औरत उनकी पत्नी होती है’, ‘गलत कहते हैं लोग कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती है। सच तो यह है कि पुरुष ही अपनी अहम् तथा स्वार्थ की सिद्धि के लिए एक स्त्री के पीठ पर बंदूक रखकर चुपके से दूसरी स्त्री पर वार करते हैं, जिसे स्त्री देख नहीं पाती और वह मूर्ख स्त्री को ही शत्रु समझ बैठती है’, ‘अरे आ जायेगा। लड़का है कउनो लड़की थोड़े है कि एतना चिंता करती हो’, ‘बच्चे बाहर निकले नहीं कि बेलगाम घोड़ा बन जाते हैं’, ‘स्त्रियाँ अपनी खुशी ढूँढ ही लेती हैं…कभी पिता की तो कभी पति की तो कभी पुत्र की खुशियों में’ आदि वाक्यों के माध्यम से लेखिका ने सामाजिक दृष्टिकोण को रखने की कोशिश की है।
लेखिका बलिया की हैं, इसलिए कहानियों में भोजपुरी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग है। यह लेखिका का मातृभाषा के प्रति समर्पण का द्योतक है। कहानियाँ चूँकि सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं, इसलिए यह ग्राह्य है। काल्पनिकता है, लेकिन पाठकों को बाँधे रखने के लिए यह जरूरी है। एकाध जगह प्रूव की कमी है, जिसे लेखिका अगले अंक में दुरुस्त कर देंगी, ऐसी आशा है।

चलितवार्ता-9304632536

अन्त: के स्वर – दोहों का सुंदर संकलन

सतसैयां के दोहरे, ज्यूँ नाविक के तीर |
देखन में छोटे लगे, घाव करें गंभीर ||

वैसे ये दोहा बिहारी के दोहों की ख़ूबसूरती के विषय में लिखा गया है पर अगर हम छन्द की इस विधा पर बात करें जिसके के अंतर्गत दोहे आते हैं तो भी यही बात सिद्ध होती है | दोहा वो
तीक्ष्ण अभिव्यन्जनायें हैं जो सूक्ष्म आकर में होते हुए भी पाठक के अन्त:स्थल व् एक भाव चित्र अंकित कर देती हैं | अगर परिभाषा के रूप में प्रस्तुत करना हो तो, दोहा, छन्द की वो विधा है जिसमें चार पंक्तियों में बड़ी-से बड़ी बात कह दी जाती है | और ये (इसकी चार पंक्तियों में (13, 11, 13, 11 मात्राएँ के साथ ) इस तरह से कही जाती है कि पाठक आश्चर्यचकित हो जाता है | हमारा प्राचीन कवित्त ज्यादातर छन्द बद्ध रचनाएँ हीं हैं | दोहा गागर में सागर वाली विधा है पर मात्राओं के बंधन के साथ इसे कहना इतना आसान नहीं है | शायद यही वजह है कि मुक्त छन्द कविता का जन्म हुआ | तर्क भी यही था कि सामजिक परिवर्तनों की बड़ी व् दुरूह बातों को छन्द में कहने में कठिनाई थी | सार्थक मुक्त छन्द कविता का सृजन भी आसान नहीं है | परन्तु छन्द के बंधन टूटते ही कवियों की जैसे बाढ़ सी आ गयी | जिसको जहाँ से मन आया पंक्ति को तोड़ा-मरोड़ा और अपने हिसाब से
प्रस्तुत कर दिया | हजारों कवियों के बीच में अच्छा लिखने वाले कवि कुछ ही रह गए | तब कविता का पुराना पाठक निराश हुआ | उसे लगा शायद छन्द की प्राचीन विधा का लोप हो जाएगा | ऐसे समय में कुछ कवि इस विधा के संरक्षण में आगे आते रहे, जो हमारे साहित्य की इस धरोहर को सँभालते रहे |उन्हीं में से एक नाम है किरण सिंह जी का | किरण सिंह जी छन्द बद्ध रचनाओं में न सिर्फ दोहा बल्कि मुक्तक,रोला और कुंडलियों की भी रचना की है |

“अन्त: के स्वर” जैसा की नाम सही सपष्ट है कि इसमें किरण जी ने अपने मन की भावनाओं का प्रस्तुतीकरण किया है | अपनी बात में वो कहती हैं कि, “हर पिता तो अपनी संतानों के लिए अपनी सम्पत्ति छोड़ कर जाते हैं, लेकिन माँ …? मेरे पास है ही क्या …? तभी अन्त : से आवाज़ आई कि दे दो अपने विचारों और भावनाओं की पोटली पुस्तक में संग्रहीत करके , कभी तो उलट –पुलट कर देखेगी ही तुम्हारी अगली पीढ़ी |” और इस तरह से इस पुस्तक ने आकर लिया | और कहते है ना कि कोई रचना चाहे जितनी भी निजी हो …समाज में आते ही वो सबकी सम्पत्ति हो जाती है |
जैसे की अन्त: के स्वर आज साहित्य की सम्पत्ति है | जिसमें हर पाठक को ऐसा बहुत कुछ मिलेगा जिसे वो सहेज कर रखना चाहेगा |

भले ही एक माँ संकल्प ले ले | फिर भी कुछ लिखना आसान नहीं होता | इसमें शब्द की साधना करनी पड़ती है | कहते हैं कि शब्द ब्रह्म होते हैं | लेखक को ईश्वर ने अतरिक्त शब्द क्षमता दी होती है | उसका शब्दकोष सामान्य व्यक्ति के शब्दकोष से ज्यादा गहन और ज्यादा विशद होता है | कवित्त का सौन्दर्य ही शब्द और भावों का अनुपम सामंजस्य है | न अकेले शब्द कुछ कर पाते हैं और ना ही भाव | जैसे प्राण और शरीर | इसीलिए किरण जी एक सुलझी हुई कवियित्री की तरह कागज़ की नाव पर भावों की पतवार बना कर शब्दों को ले चलती हैं …

कश्ती कागज़ की बनी, भावों की पतवार |
शब्दों को ले मैं चली , बनकर कविताकार ||

अन्त: के स्वर का प्रथम प्रणाम

जिस तरह से कोई व्यक्ति किसी शुभ काम में सबसे पहले अपने ईश्वर को याद करता है , उनकी वंदना करता है | उसी तरह से किरण जी ने भी अपनी आस्तिकता का परिचय देते हुए पुस्तक के
आरंभ में अपने हृदय पुष्प अपने ईश्वर के श्री चरणों में अर्पित किये हैं | खास बात ये है कि उन्होंने ईश्वर से भी पहले अपने जनक-जननी को प्रणाम किया है | और क्यों ना हो ईश्वर ने हमें इस सुंदर सृष्टि में भेजा है परन्तु माता –पिता ने ही इस लायक बनाया है कि हम जीवन में कुछ कर सकें | कहा भी गया है कि इश्वर नेत्र प्रदान करता है और अभिवावक दृष्टि | माता–पिता को नाम करने के बाद ही वो प्रथम पूज्य गणपति को प्रणाम करती है फिर शिव को, माता पार्वती, सरस्वती आदि भगवानों के चरणों का भाव प्रच्छालन करती हैं | पेज एक से लेकर 11 तक दोहे पाठक को भक्तिरस में निमग्न कर देंगे |

संस्कार जिसने दिया, जिनसे मेरा नाम |

हे जननी हे तात श्री, तुमको शतत् प्रणाम ||

..
अक्षत रोली दूब लो , पान पुष्प सिंदूर |

पहले पूज गणेश को, होगी विपदा दूर ||

शिव की कर अराधना, संकट मिटे अनेक |
सोमवार है श्रावणी , चलो करें अभिषेक ||

अन्त: के स्वर का आध्यात्म

केवल कामना भक्ति नहीं है | भीख तो भिखारी भी मांग लेता है | पूजा का उद्देश्य उस परम तत्व के साथ एकीकर हो जाना होता है | महादेवी वर्मा कहती हैं कि,

“चिर सजग आँखें उनींदी, आज कैसा व्यस्त बाना,
जाग तुझको दूर जाना |”

मन के दर्पण पर परम का प्रतिबिम्ब अंकित हो जाना ही भक्ति है | भक्ति है जो इंसान को समदृष्टि दे | सबमें मैं और मुझमें सब का भाव प्रदीप्त कर दे | जिसने आत्मसाक्षात्कार कर
लिए वह दुनियावी प्रपंचों से स्वयं ही ऊपर उठ जाता है | यहीं से आध्यात्म का उदय होता है | जिससे सारे भ्रम दूर हो जाते हैं | सारे बंधन टूट जाते हैं | किरण जी गा उठती हैं …

सुख की नहीं है कामना, नहीं राग , भय क्रोध |
समझो उसको हो गया , आत्म तत्व का बोध ||
……………………….

अंतर्मन की ज्योति से, करवाते पहचान |
ब्रह्म रूप गुरु हैं मनुज, चलो करें हम ध्यान ||

अन्त : के स्वर में नारी

कोई स्त्री स्त्री के बारे में ना लिखे … असंभव | पूरा संसार स्त्री के अंदर निहित है |जब एक स्त्री स्त्री भावों को प्रकट करने के लिए कलम का अवलंबन लेती है तो उसमें सत्यता अपने अधिकतम प्रतिशत में परिलक्षित होती है | अन्त : के स्वर का नारी की विभिन्न मन : स्थितियों के ऊपर
लिखे हुए दोहों वाला हिस्सा बहुत ही सुंदर है | एक स्त्री होने के नाते यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि ये हर स्त्री के मन को स्पर्श करेगा | इसमें चूड़ी हैं, कंगना है, महावर है और है एक माँ की पत्नी की बेटी की स्त्री सुलभ भावनाएं जो मन के तपती रेत पर किसी लहर सम आकर नमी सृजित कर देती हैं |

जीवन हो सुर से सजा , बजे रागिनी राग |
ईश हमें वरदान दो , रहे अखंड सुहाग ||
………………….

लिया तुम्हें जब गोद में , हुआ मुझे तब बोध |
सर्वोत्तम वात्सल्य है, सुखद सृष्टि का शोध ||
…………………….

करती हूँ तुमसे सजन, हद से अधिक सनेह
इसीलिये शायद मुझे , रहता है संदेह ||
…………………..

मचल-मचल कर भावना, छलक –छलक कर प्रीत |
करवाती मुझसे सृजन , बन जाता है गीत ||

अन्त: के स्वर में नीति मनुष्य को मनुष्य बनाता है सदाचार | मनुष्यत्व का आधार ही सदाचार है | दोहों में नीति या जीवन से सम्बंधित सूक्तियाँ ना हों तो उनका आनंद ही नहीं आता | कबीर , तुलसी रहीम ने नीति वाले दोहे आज भी हम बातों बातों में एक दूसरे से कहते रहते हैं |रहीम दास जी का ये दोहा देखिये ...

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग |
चन्दन विष व्याप्त नहीं, लिपटे राहत भुजंग ||

बिहारी यूँ तो श्रृंगार के दोहों के लिए अधिक प्रसिद्ध हैं पर आम प्रचलन में उनके नीति के ही
दोहे हैं | ‘अन्त : के स्वर में भी किरण जी ने कई नीति के दोहे सम्मिलित किये हैं| हर दोहा अपने साहित्यिक सौन्दर्य के साथ एक शिक्षा दे जाता है |

अपनों से मत कर किरण, बिना बात तकरार |

जो हों जैसे रूप में , कर लेना स्वीकार ||

कर यकीन खुद पर किरण , खिलना ही है रूप |

मूर्ख मेघ कब तक भला, रोक सकेगा धूप ||

सुख में रहना संयमित, दुःख में धरना धीर |
संग समय के आ पुन :, हर लेगा सुख पीर ||

अन्त: के स्वर में प्रेम

प्रेम मानव मन की सबसे कोमल भावना है | प्रेम के बिना तो जीवन ही पूरा नहीं होता तो कोई पुस्तक पूरी हो सकती है भला ? किरण सिंह जी ने भी प्रेम के दोनों रंगों संयोग और वियोग के दोहे इस पुस्तक में लिखें हैं | प्रेम केवल दैहिक नहीं होता यह मन व आत्मा से भी होता है | अक्सर देह के अनुराग को ही प्रेम समझ बैठते हैं पर देह तो प्रेम की तरफ बढ़ाया पहला कदम मात्र है | प्रेम की असली अभिव्यंजना इसके बाद ही पल्लवित –पुष्पित होती है जहाँ से यह मन और आत्मा के स्तर पर अवतरित होता है | प्रेम पर अपनी कलम चलाने से पूर्व ही वो प्रेम का परिचय देती हैं |

प्रेम नहीं है वासना, प्रेम नहीं है पाप |

प्रेम पाक है भावना, नहीं प्रेम अभिशाप ||

प्रेम नहीं है वासना , प्रेम नहीं है भीख |
प्रेम परम आनंद है, प्रेम प्रेम से सीख ||
अन्त: के स्वर :राजनीति

वो कवि ही क्या जिसकी कलम देश की स्थिति और समकालीन समस्याओं पर ना चले | आज की
राजनीति दूषित हो चुकी है चुनाव के समय तो नेता वोट माँगने के लिए द्वार –द्वार जाते हैं |याचना करते हैं पर चुनाव जीतते ही उनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं | इस भौतिकतावादी युग में नेता सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी |पीड़ित, शोषित , दुखी व्यक्ति कराहते रह जाते हैं और सत्ता जन प्रतिनिधियों की मुट्ठी गर्म करती रहती है | ये बात कवियित्री को मर्मान्तक पीड़ा से भर देती है |

जनता के दुःख दर्द से, जो रहते अनभिज्ञ |
उसको ही कहते यहाँ , किरण राजनीतिज्ञ ||

…………………….

घूम रहे बेख़ौफ़ हो, करके कातिक खून |
कैसे होगा न्याय जब , अँधा है क़ानून ||

अन्त :के स्वर में स्त्री विमर्श

आज कल साहित्य में स्त्री विमर्श की बाढ़ आई हुई है | जिसे पुरुष बड़ी संदिग्ध दृष्टि से देखते हैं | उसे लगता है कि उसके अधिकार क्षेत्र में महिलाओं की दखलंदाजी हो रही है | वो अभी भी अपने उसी नशे के मद में रहना चाहता है | स्त्री विमर्श सत्ता की नहीं समानता की बात करता है | यूँ तो स्त्री विमर्श हर काल में स्थित था परन्तु महादेवी वर्मा ने इसकी वकालत करते हुए कहा कि स्त्री विमर्श तभी सार्थक है जब स्त्री शिक्षित हो और अर्थ अर्जन कर रही हो | वर्ना ये सिर्फ शाब्दिक प्रलाप ही होगा | मैत्रेयी पुष्पा , उषा किरण खान, प्रभा खेतान, सुधा अरोड़ा, चित्रा मुद्गल आदि स्त्री विमर्श की अग्रणीय लेखिकाएं रही है | इससे पितृसत्ता की जंजीरे कुछ ढीली तो हुई है पर टूटी नहीं है | आगे की कमान समकालीन लेखिकओं को संभालनी है | किरण जी ये दायित्व पूरी जिम्मेदारी के साथ उठाते हुए कहती हैं कि …

अपनी कन्या का स्वयं, किया अगर जो दान |

फिर सोचो कैसे भला , होगा उसका मान ||

करके कन्यादान खुद, छीन लिया अधिकार |

इसीलिये हम बेटियाँ , जलती बारम्बार ||

जो दहेज़ तुमने लिया, सोचो करो विचार |
बिके हुए सुत रत्न पर , क्या होगा अधिकार ||

अन्त: के स्वर में प्रकृति

प्रकृति मनुष्य की सहचरी है | ये लताएं ये प्रसून , ये हवाएं, नदी झरने ,वन, विविध जलचर वनचर | ईश्वर भी क्या खूब चितेरा है उसने अपनी तूलिका से प्रथ्वी पर अद्भुत रंगों की छटा बिखेर दी है| प्रकृति को देखकर ना जाने कितनी बार प्रश्न कौंधता है, “वो चित्रकार है ?” श्री राम चरित मानस किष्किन्धा कांड में जब प्रभु श्री राम अपने लघु भ्राता लक्ष्मण के साथ पूरा एक वर्ष सुग्रीव द्वारा माता सीता की खोज का आदेश देने की प्रतीक्षा में बिताते हैं तो तुलसी दास जी ने बड़ी ही सुंदर तरीके से सभी ऋतुओं का वर्णन किया | उन्होंने हर ऋतु के माध्यम से शिक्षा दी है |

रस-रस सूख सरित सर पानी ,
ममता त्याग करहिं जिमी ज्ञानी ||

दादुर ध्वनि चहुँ दिशा सुहाई |
वेड पढई जनु वटू समुदाई ||

कवियित्री के मन को भी प्रकृति विह्वल करती है | यहाँ पर किरण जी ने हर ऋतु की सुन्दरता को अपने शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है |

पिघल गया नभ का हृदय, बरसाए है प्यार |

धरती मैया भीगती, रिमझिम पड़े फुहार ||

हरियाली ललचा रही , पुरवा बहकी जाय |
हरी धरा की चुनरी , लहर –लहर बलखाय ||

अंत में … कवयित्री ने इस छोटी सी पुस्तक के माध्यम से अपनी भावनाओं का दीप जलाया है| जिसकी लौ उनके अनुभवों से प्रदीप्त हो रही है | उन्होंने प्रकृति , नारी , स्त्री विमर्श , आध्यात्म , भक्ति , पर्यावरण ,साहित्य व् समकालें राजनैतिक दशा हर तरह के अँधेरे को अपनी परिधि में लिया है | खास बात ये हैं कि पुस्तक के सभी दोहों में लयात्मकता व् गेयता है | हिंदी साहित्य की इस विधा को जीवित रखने का उनका अप्रतिम योगदान है | 111 पृष्ठ वाली इस पुस्तक का कवर पृष्ठ आकर्षक है |

*अगर आप भी दोहे की विधा में रूचि रखते हैं तो ये पुस्तक आपके लिए एक अच्छा विकल्प है |

अन्त: के स्वर –दोहा संग्रह
लेखिका –किरण सिंह
प्रकाशक जानकी प्रकाशन
पृष्ठ – 111
मूल्य – 300 रुपये

वंदना बाजपेयी

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है