मुखरित संवेदनाएं – संस्कारों को थाम कर अपने हिस्से का आकाश मांगती स्त्री के स्वर

लेखिका एवम कवयित्री किरण सिंह  जी का प्रथम काव्य संग्रह “मुखरित संवेदनाएं” का दूसरा संस्करण अभी कुछ समय पहले ही आया है | इस संस्करण में कुछ नयी कविताएँ हैं और कई पुरानी कविताओं को उन्होंने पहले से अधिक परिष्कृत रूप में प्रस्तुत किया है | ये परिष्कार उनके लेखन में परिष्कार का ही स्वरूप प्रस्तुत करता है | मुखरित संवेदनाएँ का पहला संस्करण किरण सिंह जी की  पहली पुस्तक भी रही है| क्योंकि मैंने दोनों संस्करण पढ़ें हैं | तो तुलनात्मक रूप से कहूँ तो जहाँ पहला संस्करण पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था कि एक किशोर मन वो सब कहना चाहता है जो ग्रहस्थी के झमेलों और उम्र के बढ़ते परदों के मध्य अनकहा रह गया था |वहीं इस संस्करण को पढ़कर लगा कि किशोर-युवा मन की भावनाएँ अनुभव की चाशनी में पककर ज्यादा सौंधी हो गई हैं |

शुरुआत करती हूँ संग्रह के पहले अंश “अपनी बात से” जैसा की किरण जी ने लिखा है की छोटी उम्र में ही पिताजी द्वारा थमाई गई डायरी में अपने स्कूल, शिक्षकों, रिश्ते -नातों पर कलम चलाना आरंभ कर दिया था| पर  विवाह व् घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों  में वो भूल ही गयी की उनके अन्दर जाने कितनी कवितायें साँस  ले रही हैं | जो जन्म लेना चाहती है | जब बच्चे उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए तो कांपते हाथों से उन्होंने  पुन: कलम थामी तो उदेश्य निज तक नहीं रह गया बल्कि कलम के माध्यम से  उस बेचैनी का समाधान ढूंढना था जो हर रचनात्मक व्यक्ति अपने अन्दर महसूस करता है | और सामाजिक कुरीतियों, भ्रस्टाचार और दबे-कुचले लोगों  के संघर्षों को के प्रति अपनी कलम का उत्तरदायित्व समझा |
संग्रह की भूमिका “अंतस का सत्व”में जितेंद्र राठौर जी लिखते हैं ..
हर कोशिश है एक बगावत
वरना जीसे सफलता,असफलता कहते हैं
वह तो बस हस्ताक्षर हैं
कवयित्री किरण सिंह का संग्रह सच पूछिए तो इनकी एक कोशिश ही नहीं एक मुखर बगावत है | एक ऐसी बगावत जो जाने-अनजाने पथरीली जमीन तोड़कर  मिट्टी में तब्दील करती हुई जगह -जगह फैले हुए रेगिस्तान को सींचने  का काम करती है |
इस संग्रह को पढ़ते हुए उनकी प्रथम कविता “किस पर  लिखूँ मैं ?” से  “देखो आया डोली द्वार” एक कवयित्री के कलम थाम कर कुछ लिखने की ऊहापोह से गहन आध्यात्मिक भाव तक पहुँचने की विकास यात्रा सहज ही परिलक्षित होती है | जहाँ “किस पर लिखूँ मैं” असमंजस है कि जब मन में इतना कुछ एक साथ चल रहा हो तो एक विषय का चयन कितना दुष्कर हो जाता है |वहीं “देखो आया डोली द्वार” आत्मा सुंदरी और परमात्मा के मिलन की के मिलन पर छायावाद का प्रभाव सपष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है | 

इस पुस्तक में किरण जी ने अपनी 136 संवेदनशील रचनाओं को चार अध्याओं (भक्ति-आध्यात्म,नारी संवेदना के स्वर,युग चेतन ऐवम उदबोधन व  ऋतु रंग) में विभाजित किया है |

भक्ति आध्यात्म
                                           काव्य संग्रह के प्रथम खंड भक्ति व आध्यात्म को समर्पित है | इस खंड में में अपने हिस्से का आसमान मांगने वाली और समाज की कुप्रथाओं से लड़ने वाली कवयित्री एक भावुक पुजारिन में तब्दील हो जाती है | जहाँ वो और उसके आराध्य के अतरिक्त कोइ दूसरा नहीं है | न जमीन न आसमान न घर न द्वार | यहाँ पूर्ण  समर्पण  की भावना है | भक्ति रस में डूबे ये गीत आत्मा को आध्यात्म की  तरफ मोड़ देते हैं |

मन है चंचल भर दे साधना,
कर जोड़ करूँ सुन ले प्रार्थना ||
एक अन्य कविता शत-शत नमन में वो कहती हैं ..

जाति  धर्म में हम उलझ कर
मिट रहे आपस में लड़ कर
क्यों नहीं तुम आते लेकर
शांति चैन और अमन
पुरुषोत्तम राम आपको शत – शत नमन

नारी संवेदना के स्वर
                                   मुखरित संवेदनाएँ का  दूसरे व् प्रमुख खंड  “नारी संवेदना के स्वर” हैं ||इसमें 48 कविताएँ हैं | इस खंड की कविताओं में मुख्य रूप से उस स्त्री का अक्स दिखाई देता है जो हमारे देश के छोटे शहरों, गांवों और कस्बों से निकल कर आई है | जो महानगरों की स्त्री की तरह पुरुष विरोधी नहीं है | या यूँ कहिये वो मात्र विरोध करने के लिए विरोध नहीं करती | वो पुरुष से लड़ते – लड़ते पुरुष नहीं बनना चाहती है | उसे अपने  स्त्रियोचित गुणों पर गर्व है | चाहें वो दया ममता करुणा  हो या मेहँदी चूड़ी और गहने वो सब को सहेज कर आगे बढ़ना चाहती है | या यूँ कहें की वो अपनी जड़ों से जुड़े रह कर अपने हिस्से का आसमान चाहती है | वो अपने पिता पति और पुत्र को कटघरे में नहीं घसीटती बल्कि  सामाजिक व्यवस्था  और अपने ही कोमल स्वाभाव के कारण स्वयमेव अपना प्रगति रथ रोक देने के कारण उन्हें दोष मुक्त कर देती है | वो कहती है ………..

क्यों दोष दूं तुम्हे
मैं भी तो भूल गयी थी
स्वयं
तुम्हारे प्रेम में
                  आज स्त्री विमर्श के नाम पर  जिस तरह की स्त्री का स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है यह उससे भिन्न है | जिस  तरह से स्त्री बदले की भावना की ओर बढ़ रही है, लिव इन या बेवफाई से उसे गुरेज नहीं है | वो पुरुषों से कंधे से कंधा  मिला कर चलने में यकीन नहीं करती बल्कि सत्ता पलट कर पुरुष  से ऊपर हो जाना चाहती हैं | जिस को पढ़ कर सहज विश्वास नहीं होता | क्योंकि हमें अपने आस – पास ऐसी स्त्रियाँ नहीं दिखती | हो सकता है ये भविष्य हो पर किरण जी की कवितायें आज का यथार्थ लिख रही हैं | जहाँ संवेदनाएं इतनी इस कदर मरी नहीं हैं |  किरण जी की कवितायें एक दबी कुचली नारी के स्वर नहीं है | वो अपने हिस्से का आसमान भी मांगती हैं पर प्रेम और समन्वयवादी दृष्टिकोण के साथ ……….

भूल गयी थी तुम्हारे प्रेम में अपना
अस्तित्व
और निखरता गया मेरा
स्त्रीत्व
खुश हूँ आज भी
पर
ना जाने क्यों
लेखनी के पंख से उड़ना चाहती हूँ
मुझे मत रोको
मुझे
स्वर्ण आभूषण  नहीं 
आसमान चाहिए
—————————
यहाँ  कुछ रूढ़ियों के प्रति विरोध भी है ..
क्या गुनाह करती हैं बेटियाँ
कि कर दिया जाता है कन्यादान
बड़े चाव  से गयी थी वो
हल्दी की रस्म में
और सास ने कहा
रुको
सिर्फ सुहागनों के लिए है ये रस्म
क्यों क्रूर रीतियाँ
सिर्फ स्त्रियों के लिए ही हैं ?

युग चेतना एवं उद्बोधन
                                         वो कलम ही क्या जो समाज के लिए न चले | कवि का निज भी समष्टि में समाहित होता है | काव्य संग्रह का तीसरा खंड “युग चेतना ऐवम उदबोधन”  इस खंड में उनकी आत्मा की बेचैनी व् समाज के लिए कुछ करने की चाह स्पष्ट रूप से झलकती है | अपने परिवार के उत्तरदायित्व के साथ -साथ समाज के लिए कुछ करने का उत्तरदायित्व भी लेखनी पर होता है |जिसे किरण जी ने बखूबी निभाया है |

सीख लें हम बादलों से
किस पर गरजना है
किस पर बरसना है
किसको दिखाना है
किसको छुपाना है

और ………..

पीढा चढ़ कर ऊंचा बन रहे
आत्म प्रशंसा आप ही कर रहे
झाँक रहे औरों के घर में
नहीं देखते अपनी करनी
सूप पर हंसने लगी है चलनी

ऋतु-रंग
                                      काव्य संग्रह के अंतिम खंड ऋतु रंग है | इसमें 23 कविताएँ हैं | प्रभात कालीन सूर्य, बरसते मेघ, संध्या को घर वापस लौटते पक्षियों का कलरव और ऋतुओं के अनुसार अपना शृंगार परिवर्तित करती वसुंधरा के अनुपम सौन्दर्य को किरण जी की लेखनी ने शब्दों में जीवंत कर दिया है |

” खबरिया सत्य स्वप्न बलवंत
पिया कहीं तुम ही तो नहीं बसंत “
छलके नभ से मधुरस की गगरी
भीगें गाँव और झूमें नगरी
मन मेरा भी ना जाने क्यों
झूम जाना चाहता है
आज फिर से मन मेरा भीग जाना चाहता है |

                                              अंत में यही कहना चाहूँगी की किरण जी का यह पहला काव्य संग्रह है  जिसमें उन्होंने घर की दहलीज लांघ कर बाहर की दुनिया के सामने मुखर होने का साहस दिखाया है | इसी कारण  इसमें जहाँ एक ओर मिटटी और भावनाओ की भीनी भीनी  सुगंध है | शायद इसीलिए  देश की ८० % महिलाओ की भावनाओ को स्वर देती है “मुखरित संवेदनाएं”  भाव और शब्द  पक्ष बेहद मजबूत है| कविताओं में कमनीय कोमलता है | साहित्य में दिनों -दिन पुष्पित पल्लवित होती किरण जी को उनके प्रथम काव्य संग्रह के द्वितीय संस्करण के लिए बधाई |
मुखरित संवेदनाएँ -कविता संग्रह
कवयित्री -किरण सिंह
प्रकाशक – जानकी प्रकाशन
पृष्ठ -139
मूल्य -400 (हार्ड बाउन्ड ) फिलहाल अमेजन पर पचास प्रतिशत डिस्काउंट पर सिर्फ 200 में फ्री शिपिंग उपलब्ध है ।

समीक्षा -वंदना बाजपेयी

जलधार

कथा की जल धार में मैं भीगी जा रही हूँ। मेरा अन्तर्मन डूबकर रोमांचित हो रहा है तो मेरी आत्मा में स्निग्ध सिहरन सी पैदा रही है। मति नतमस्तक है लेखनी की स्वामिनी को पढ़ कर और सोच रही है कि अवश्य ही इस महा लेखिका की प्रतिभा को पहचानकर स्वयं ब्रम्ह ने ही इन्हें लेखनी भेंट की होगी । और कभी-कभी संशय हो रहा है कि लेखिका कहीं स्वयं सरस्वती की अवतार तो नहीं ? मेरी भावनाएँ प्रबल हो रही हैं कुछ शब्द सुमन अर्पित करने को और मेरी लेखनी सयास उस जलधार को अपनी अंजुरी में भर कर अर्पित करने का प्रयास कर रही है पद्मश्री तथा भारत भारती जैसे सम्मानों से अलंकृत परम आदरणीया उषा किरण खान दी की बेहतरीन कहानियों का संग्रह जलधार को।

जल की धारा से चित्रित खूबसूरत आवरण में जिसमें परम् आदरणीया लेखिका का दैदिप्यमान चित्र है।
116 पृष्ठों में संकलित इस संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं।
पुस्तक की पहली कहानी है स्वास्तिक, जिसका नायक सतीश अपनी ही कई सारी बहनों का इकलौता भाई है ऊपर से ममेरी, चचेरी, फुफेरी बहनों के राखी का बंधन उसे उबाऊ लगता था। लेकिन समय ने सतीश का समय बदल दिया और वह अच्छे पद पर कार्यरत हो गया। अचानक एकदिन यात्रा के दौरान उसे अपनी फुफेरी बहन कांति से मुलाकात हो गई जिसके गरीब भाई पर तरस खाकर एक बेरोजगार लड़के ने अपने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ उससे विवाह कर लिया। इस बात पर सतीश कांति के भाई कौशल को खरी – खोटी भी सुनाई कि यदि लड़के को नौकरी नहीं मिली और उसके माता-पिता भी अपने घर में रखने से इंकार कर देंगे तो क्या होगा।
लेकिन कांति किस्मत की अच्छी रही कि लड़के को नौकरी मिल गई और उसकी गृहस्थी की गाड़ी उसके पति के प्यार और सम्मान के इंधन से सकुशल चल रही थी…… इस कहानी में बहुत ही खूबसूरती से रिश्तों के सकारात्मक पहलू को दिखाया गया है जिसके सामने भौतिकता बौनी नज़र आती है ।
संग्रह की दूसरी कहानी छुअन जीवन संध्या की वेला में अपनों से दूर धनाढ्य बुजुर्ग की कहानी है जिसके बेटे विदेश में बसे हुए हैं। बच्चों की बेरुखी से हताश अपना घर बेचकर अपनापन की तलाश में अपने भाई के पास जाना चाहते हैं लेकिन भाई ने उनका दायित्व बोध कराकर उनके जीवन को नई दिशा दे दी। यह कहानी निराशा की गहन तिमिर में आशा की ज्योति जलाती है।
संग्रह की तीसरी कहानी सुर्योदय पूर्णतः ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई कहानी है जिसमें अपने टंडेल की पत्नी का इलाज़ करवाने के पुण्य के बदले मोहन बाबू को पूरा गाँव तो संदेह की दृष्टि से देखता ही है साथ ही उनकी पत्नी भी इस संदेह के रोग से मुक्त नहीं हो पाती…. अन्ततः सकारात्मक सुर्योदय होता है।

संग्रह की चौथी कहानी उसके बिना एक वृद्ध विधुर की कहानी है जिसे बहुत ही खूबसूरती और मार्मिक ढंग से लिखा गया है।
संग्रह की पाँचवी कहानी वह एक नदी एक अलग तरह की कहानी है जिसमें माँ की बदचलनी का दंश बेटी झेल रही है। किंतु उसकी माँ की बचपन की सहेली एक पत्र के माध्यम से उसे समझाती है कि वह( तुम्हारी माँ) एक नदी है उसके प्रवाह को रोकने की चेष्टा मत करो।

संग्रह की छठी कहानी तुम ही भारत हो एक सच्चा, पवित्र और निश्छल प्रेम कहानी है। या यूँ कहें कि पुरुष और स्त्री के मध्य एक सच्ची मित्रता की कहानी है जिसमें भारतीय परिवेश के पुरुष का अपने परिवार के लिये सच्चे मन से की गई सेवा, श्रम और त्याग को दिखलाया गया है। नायिका नायक के दर्द को महसूस करके आहत है और वह उसके लिये उसके परिवार को भी भला-बुरा कह देती है। जिसपर नायक उसे ही भला-बुरा कह देता है। काफी अन्तराल के बाद पुनः मिलन होता है और नायिका उसके त्याग के लिए उसे तुम ही भारत हो कहकर विभूषित करती है।

संग्रह की सातवीं कहानी हँसी – हँसी पनवा खियओले बेइमनवा पूर्णतः बिहार के ग्रामीण परिवेश के सफेदपोश मुखिया की कहानी है जिसके कुकर्मो का बदला उसी के अंदाज में उसका अंत करके लिया जाता है। यह कहानी बहुत ही रोचक, कौतुहल पूर्ण व मार्मिक है जिसको पढ़ते हुए मन कहानी में पूरी तरह से डूब गया।

संग्रह की आठवीं कहानी तुम बिन अखुवन बिकल मुरारी एक अविवाहित स्त्री की बहुत ही खूबसूरत प्रेम कहानी है। इसमें नायिका सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भी भी अपनी माँ की अतिमहत्वाकांक्षा की वजह से अविवाहित रह जाती है। अपने मन पर अंकुश लगाने के बाद भी उसे एक विवाहित पुरुष से प्रेम हो जाता है। पुरुष उससे विवाह करके उसे पूर्ण करना चाहता है लेकिन वह अपने मन पर पत्थर रख मना कर देती है।

इस प्रकार उजास, अनजाना पहचाना सा तथा नौनिहाल भी काफी रोचक तथा तथा कौतुहल पूर्ण तथा प्रवाहमयी कहानी है जिसे पढ़ते हुए पाठक का चित्त एक क्षण के लिए भी इधर-उधर नहीं भटकेगा।
हाँ कहानी पढ़ते हुए वर्तनी की अशुद्धियाँ खली जरूर लेकिन इसके लिए सीधे-सीधे प्रकाशन विभाग दोषी है।
इस संग्रह की विशेषता यह भी है कि संग्रह की सभी कहानियों के परिदृश्य को इतनी खूबसूरती और सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है की पढ़ते हुए पाठक के आँखों के सामने वह देशकाल दिखने लगता है । कहानी के प्रत्येक पात्र अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं जिसे पढ़ते हुए मन सोचने पर विवश हो जाता है।
इसके लिए महान लेखिका परम् आदरणीया उषा किरण खान दीदी की कलम को शत् शत् नमन करते हुए उन्हें सादर बधाई देते हैं और कामना करते हैं कि आगे भी हमें उन्हें पढ़ने का अवसर मिलता रहे

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – जलधार
लेखिका – उषा किरण खान
प्रकाशक – शिवना प्रकाशन

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है ।
http://www.amazon.in/dp/B08LNTY1VY
Ushakiran Khan Ushakiran Khan

गोलू – मोलू

हर भाव का धनी बाल कविता संग्रह- गोलू-मोलू
लेखिका- किरण सिंह

गोलू मोलू, एक प्यारा बाल-कविता संग्रह, जिसे लिखा है जानी मानी लेखिका किरण सिंह जी ने।पहले भी कई विधाओं में लिखकर साहित्यजगत को समृद्ध करने वाली किरण जी ने अब बाल साहित्य की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया है। इस क्षेत्र में भी उन्होंने अद्भुत अभिव्यक्ति दी है।
बच्चे अपनी दुनिया में उनको ही प्रवेश देते हैं जो दिल में बचपन संजोकर रखते हैं और उनके संग बागों में झूला झूलने और तितलियों के पीछे भागने का हौसला रखते हैं। इसी हौसले ने किरण जी से बाल साहित्य का सृजन करवाया। गोलू – मोलू पुस्तक में सर्वप्रथम लेखिका ने पत्र लिखकर बच्चों को सम्बोधित किया है और उनके समक्ष दोस्ती का हाथ बढ़ाया है जिसे बच्चे अवश्य स्वीकार करेंगे। पुस्तक का आरम्भ सरस्वती माँ की सुन्दर वंदना से किया गया है। उसके बाद एक प्रार्थना गीत है जिसे बच्चे अवश्य गाना पसन्द करेंगे। उसके बाद बच्चों की प्रिय माँ पर कविता है , जिसमें बच्चों की ओर से माँ के गुणों का वर्णन किया गया है। उसके बाद लेखिका की लेखनी ने हर उस विषय को स्पर्श किया है जहाँ बच्चे अवश्य होते हैं। टीचर जी कैसी होती हैं, बच्चों की ओर से पढ़ना मन को भाया। देखो भोर हुई उठ जाओ, बहुत प्यारी कविता है।
जहाँ बच्चे हों वहाँ उनकी चुहलबाजियाँ न हों, शरारतें न हों, मान मनौवल न हो…यह कैसे मुमकिन है।
‘ गोलू मोलू बबलू डब्लू’, ‘गुड़िया रानी’, ‘ दिया करो न घुड़की ‘, खेल खेल में लगे झगड़ने…कविताओं में लेखिका ने इन्हीं बाल स्वभाव को बाँधने का सफल प्रयास किया है। जैसे-जैसे मैं आगे की कविताएँ पढ़ती जा रही, किरण जी की सकारात्मक सोच एवं उन्हें शब्दों में बांधने की कला देख अचंभित हो रही। सूरज और चंदा में श्रेष्ठ कौन …पाठकगण स्वयं पढ़कर देखें। बच्चों की छोटी छोटी हरकतों को पैनी नजर से परखने वाली लेखिका ने कई कविताओं में हास्य का रंग घोलकर प्रस्तुत किया है जिसे पढ़ते हुए बरबस होठों पर मुस्कुराहट आ जाती है। जल का महत्व, मुनिया को पढ़ने का महत्व सामाजिक सरोकार की कविताएं भी अत्यंत सुन्दर हैं।
बच्चों में देशभक्ति की भावना का विकास भी अत्यंत आवश्यक है, इस जिम्मेदारी को भी किरण जी ने बखूबी निभाया है। अंतिम कविता समसामयिक है जिसे कोरोना के नाश की बात कही गयी है।
पुस्तक बच्चों को उपहार के रूप में दी जा सकती है। यह अमेज़ॉन पर उपलब्ध है।
*
पुस्तक परिचय-
पुस्तक का नाम- गोलू मोलू ( बाल कविता – संग्रह)
लेखिका- किरण सिंह
प्रकाशन- जानकी प्रकाशन
कीमत- पुस्तक में 150/- है किंतु वह बिल्कुल आधी कीमत अर्थात 75/- रुपये में उपलब्ध है।

दूसरी पारी

दूसरी पारी – बना रहे संघर्ष का जज्बा

अभी कुछ दिन पहले अमेजॉन पर मैंने पुस्तक दूसरी पारी देखी और इसके शीर्षक को देखकर ही इसे पढने की इच्छा हो गई। मैंने तुरन्त अमेज़न को पुस्तक भेजने का अनुरोध किया और कुछ ही दिनों में पुस्तक मेरे पास आ गई।
ये पुस्तक वंदना बाजपेई जी और किरण सिंह जी के सम्पादन में एक आत्मकथात्मक संस्मरण संग्रह है। ये महिला रचनाकारों के जीवन की सच्ची कहानियों को उन्हीं के शब्दों में एक प्रेरणादायक संस्मरण संग्रह है। जो हर महिला को किसी न किसी तरह प्रेरणा देकर प्रभावित करेगा।
इस किताब की भूमिका वंदना बाजपेयी जी द्वारा लिखी गई है। भूमिका की ये पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगी।

“सफलता का तो कोई पैमाना नहीं होता, फिर भी किसी ने कहाँ से शुरू किया और कितने कदम आगे चला ये ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। मेरे विचार से A से G तक पहुँचा व्यक्ति X से Z तक पहुँचे व्यक्ति से कहीं ज्यादा सफल है।”

इस पुस्तक में सर्वप्रथम किरण सिंह जी का संस्मरण है, जो एक गृहणी के अपने सपनों को पूरा करते हुए साहित्य जगत का हस्ताक्षर बनने की यात्रा है, जो बेहद प्रेणादायक और प्रभावशाली है। उनकी लेखनी के पंख को यूं ही उड़ान मिले।
अर्चना चतुर्वेदी जी, जिन्हें मीडिया जगत में कार्य का अनुभव है तथा साहित्य के कई पुरुस्कारों से सम्मानित हैं। अर्चना जी ने बहुत सुंदर तरीके से अपने संघर्ष को शब्द दिया है।
अनामिका चक्रवर्ती जी, जो एक डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन बारहवीं के बाद ही विवाह हो जाने के बाद गृहस्थ जीवन के साथ स्नातक करने और साहित्य जगत में एक मकाम हासिल करने के संघर्ष की कहानी उन्हीं की जुबानी है।
सीमा भाटिया जी, जिनका एक प्राध्यापिका बनने का सपना था। गृहस्थ जीवन में प्रवेश, कुछ स्वास्थ्य व पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के साथ साथ सीमा जी की द्वितीय पारी सभी महिलाओं को प्रोत्साहित करने वाली है।
पूनम सिन्हा जी की अपनी एक अलग ही कहानी है। बचपन से मन में जो छटपटाहट थी, उसे उन्होंने स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते समय रचनाओं का रूप दिया और एक मकाम हासिल किया।
छाया शुक्ला जी जो अध्यापन क्षेत्र से हैं, उनकी लेखनी का सफर भी कई संकलनों और सम्मानों के साथ शानदार है।
संगीता कुमारी जी विवाह के पश्चात अपने दृढ़ संकल्प के साथ अपनी शिक्षा जारी रखते हुए निरन्तर साहित्य की सेवा करती रही।
आशा सिंह जी का बचपन से ही पुस्तकों से प्रेम उन्हें उनके जीवन की दूसरी पारी में लेखनी की तरफ खींच ले गया और उनकी एक पुस्तक डॉ सिताबो बाई प्रकाशित हो चुकी है।
रीता गुप्ता जी को बचपन से ही डायरी लिखने का शौक था। विवाह के पश्चत्त इग्नू से आगे की शिक्षा प्राप्त करते हुए अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में लिखना आरम्भ किया। आपका कहानी संग्रह इश्क के रंग हजार प्रकाशित हुआ है।
रेखा श्रीवास्तव जी का लेखन का सफर 10 वर्ष की उम्र से ही शुरू हो गया। कई पत्र पत्रिकाओं में सामाजिक रूढ़ियों और नारी शोषण पर स्तम्भ लिखे। आपके कई कविता संग्रह एवं कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सोशल मीडिया से जुड़कर ब्लॉग्स द्वारा भी आप कई मुद्दों पर लिखती हैं।
पूनम आनन्द जी बचपन से ही साहित्य के सम्पर्क में थी। तथा विवाह पश्चात भी अनुकूल स्थितियां मिली। आपके कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं तथा कई पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया है।
अन्नपूर्णा श्रीवास्तव जी आज एक शिक्षिका, साहित्यकार, पत्रकार के साथ साथ एक समाज सेविका भी हैं। ये मकाम उन्होंने संघर्षो से पाया है और आज भी संघर्ष करते हुए अपने पथ पर अग्रसर हैं।
सिनीवाली शर्मा जी के कई पत्र पत्रिकाओं में कहानियां एवं व्यंग्य प्रकाशित होने के साथ कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनका कहना है कि कोई भी राह आसान नहीं होती, हाँ ये जरूर है कि उनके पास हौसलों के पंख होते हैं।
डॉ पुष्पा जमुआर जी बचपन से ही अध्ययन के साथ साथ कविताओं का सृजन करती थी। 18 वर्ष की उम्र में विवाह होते ही पढ़ाई छूट गई। अपने दृढ़ संकल्प से 12 वर्षों बाद पुनः पढ़ाई प्रारम्भ की और हिंदी में एम ए किया। आपके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा कई प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित हो चुकी हैं।
वंदना बाजपेई जी को बचपन से ही साहित्य से संबन्धित पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक था। CPMT की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद वाराणसी जाने की सहमति न मिलने के कारण अपने शहर कानपुर से ही ऐम एस सी करी । विवाह के वर्षों बाद पुन: डायरी उठाई तो निरन्तर साहित्य रचना में अग्रसर रही। जिसमें कई पड़ाव आये, साहित्य और सम्पादन के क्षेत्र में कई नई बातें सीखकर आज एक मुकाम हासिल किया है।

वंदना बाजपेई जी और किरण सिंह जी द्वारा सम्पादित ये संग्रह बहुत सुन्दर और सार्थक प्रयास है। सभी संस्मरण बहुत प्रेरणादायक हैं। गृहस्थ जीवन में आने के बाद अपने सपनों को साकार करने की ललक और उन्हें साकार करते हुए एक मुकाम हासिल करना, बहुत ही प्रभावशाली और प्रेरणादायक है। माना आज का परिवेश कुछ अलग है, लेकिन अभी भी लोग X से Z तक कदम बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। इस सराहनीय प्रयास के लिए आप सभी का बहुत बहुत आभार।
इन संस्मरणों से गुजरते हुए लग रहा है कि जैसे कहीं न कहीं खुद को ही पढ़ रहे हों।

बहुत सुंदर प्रेरणादायक संग्रह हेतु सभी रचनाकारों का आभार और शुभकामनाएं।

लीना दरियाल
दूसरी पारी (आत्मकथात्मक लेख संग्रह)
सम्पादक -किरण सिंह व वंदना वाजपेयी
प्रकाशक -कौटिल्य बुक्स
पृष्ठ -159
मूल्य -250 रुपए

इश्क के रंग हजार

इश्क इबादत है, इश्क खुदा की सबसे बड़ी नेमत है, इश्क जज्बातों की आंधी है, इश्क एक-दूसरे की चाहत में कुछ कर गुजरने का जज्बा है , इश्क आग का दरिया है, इश्क सिर्फ इश्क है आदि – आदि अलग – अलग लेखकों, कवियों, शायरों ने अपने – अपने अपने तरीके से इश्क को महसूसा और बयां किया । लेकिन लेखिका रीता गुप्ता जी की जादूगरनी लेखनी ने तो इश्क के हजार रंगों को न सिर्फ ढूढ़ निकाला बल्कि अपने खूबसूरत शब्दों की तूलिका से पन्नो पर उकेरा और ला दिया खूबसूरत और आकर्षक कवर पृष्ठ से सुसज्जित खूबसूरत कहानियों का एक खूबसूरत संग्रह, जिसका शीर्षक ही है इश्क के रंग हजार।
एक सौ अट्ठाइस पृष्ठ में संकलित इस पुस्तक में कुल सत्रह छोटी – छोटी कहानियाँ हैं।
संकलन की पहली कहानी जो इश्क के रंग हजार, इस पुस्तक का शीर्षक भी है, एक अलग ही इश्क की कौतूहल पूर्ण कहानी है, जिसे पढ़ते हुए पाठक भावनाओं में बहता चला जाता है और कहानी की नायिका की तरह ही रंगबिरंगी परिकल्पना करने लगता है। अन्ततः सच का सामना होता है तो नायिका का दिल तो टूट जाता है फिर भी अंत सुखद होता है जो कि लेखिका की प्रखर लेखनी का एक अजूबा साक्ष्य प्रस्तुत करता है।
संकलन की दूसरी कहानी आमाके खमा करो एक परदेशी पूत के माता-पिता की करुण कहानी है जिसे पढ़ते हुए पाषाण हृदय भी पिघल कर आखों से बहने को विवश हो जायेगा ऐसा मैं दावे के साथ कह सकती हूँ ।
संकलन की तीसरी कहानी पुरसुकून की बारिश एक बहुत ही पावन और खूबसूरत प्रेम कहानी है जिसमें नायक नायिका के हर कष्ट में एक देवदूत की तरह प्रकट होकर रक्षा कवच बन जाता है।

संग्रह की चौथी कहानी बाबा ब्लैकशिप में लेखिका ने अपनी प्रखर लेखनी का परिचय देते हुए पिता – पुत्र के कटु सम्बन्ध के परिणाम को उजागर किया है जिसमें न्युज पेपरों में यह ख़बर छपी थी कि विदेश में बसे पुत्र ने पिता की मरने की खबर जाने पर भी फोन नहीं उठाया लेकिन रिश्ते का पोस्टमार्टम करने के बाद सच्चाई कुछ और ही सामने आती है जिसमें अपने बच्चों के मासूम भावनाओं को बेदर्दी से तहस -नहस कर देने वाले अभिभावकों की असलियत सामने लाकर नई पीढ़ी को दोषमुक्त कर दिया गया है।

संग्रह की पाँचवी कहानी वीणा की तार सी जिंदगी एक नवदम्पति की कहानी है जिसमें पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करने के लिए अपने मूल स्वभाव के विपरीत छद्म रूप धर कर सलीके से चल रहे थे लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ कि दोनो का ही असल रूप सामने आ गया और जिंदगी वीणा की तार सी झनक उठी ।
इस संग्रह की छठी कहानी काँटों से खींच कर ये आँचल में कहानी की नायिका के सर से बचपन में ही माँ – बाप का साया उठ गया और उसपर मनहूस होने का कलंक अपने ही चाचा – चाची के द्वारा लगा दिया गया। यह कलंक उसे इतना दबा दिया कि अपने से दुगने उम्र के विधुर से विवाह तय करने के अपने चाचा – चाची के निर्णय का विरोध नहीं कर पायी और चुपचाप विवाह बंधन में बंध कर ससुराल चली गई।
लेकिन वहाँ पर अपने सरल व स्निग्ध स्वभाव से वर अपने पति के साथ – साथ सौतेले बच्चों का दिल भी जीत लेती है।
इस कहानी में नायिका के त्याग व समर्पण का खूबसूरत और मर्म स्पर्शी तथा प्रेरक चित्रण कर कहानी को एक नया मोड़ दिया गया है है जिसके लिए लेखिका की जितनी भी तारीफ़ की जाये कम होगी।
संग्रह की सातवीं कहानी हम – तुम कुछ और बनेंगे एक निः संतान दम्पति की कहानी है जिसमें पति औलाद की ख्वाहिश में अपनी पत्नी के गर्भ में किसी और का शुक्राणु निषेचित करवाने के लिए तो तैयार हो जाता है लेकिन बाद में उसके अंदर का शक उसे अपनी पत्नी से दूर कर देता है। पर अन्ततः उसे सच्चाई का पता चलता है और पश्चाताप के आँसुओं से उसके मन के सारे मैल धुल गये।
संग्रह की आठवीं कहानी थोड़ी सी जमीन सारा आसमान बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का समर्थन करती हुई बहुत ही प्रभावी व प्रेरक कहानी बन पड़ी है।
संग्रह की नौवीं कहानी शिद्दत ए एहसास बहुत ही मार्मिक है जिसे पढ़ते हुए पत्थर हृदय भी पिघल कर आँखों से बहने को आकुल हो जायेगा।

इस प्रकार इस संग्रह की अन्य कहानियाँ ( हमसाया, आवारागर्दियों का सफ़र, जिंदगी मेरे घर आना, आशा साहनी के बहाने, रक्षाबंधन, बाजूबंद, चौबे गये छब्बे बनने, व दिल की वो रहस्यमयी परतें) भी बहुत ही भावपूर्ण, हृदय स्पर्शी, रोचक, कौतूहल पूर्ण एवम् प्रभावी हैं जिसे पढ़ते हुए पाठक भावनाओं के सागर में डूब जायेगा और कहानी के पात्रों को अपने इर्द-गिर्द ही पायेगा।
इस संकलन की खास बात यह है कि इसकी अधिकांश कहानियाँ विभिन्न प्रतिनिधि पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों का प्यार व प्रशंसा पा चुकीं हैं।
पुस्तक की छपाई स्पष्ट व पन्ने उत्कृष्ट हैं। इस हिसाब से पुस्तक का मूल्य भी सही ही है।
अतः हम दावे के साथ कह सकते हैं कि यह पुस्तक पठनीय व संग्रहणीय है ।
यह लेखिका की पहली पुस्तक है इसलिए हम लेखिका
को हृदय से बधाई देते हुए उनके उज्वल भविष्य की कामना करते हैं।

किरण सिंह

लेखिका – रीता गुप्ता
प्रकाशक – वनिका पब्लिकेशन
मूल्य – 300 रुपये ( तीन सौ रुपये)

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है ।

गोलू – मोलू

कृति: गोलू-मोलू (बाल कविता-संग्रह)
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशकः जानकी प्रकाशन,
अशोक राजपथ, पटना।

पृष्ठः 64 मूल्यः 150/-

समीक्षक: मुकेश कुमार सिन्हाबच्चों के लिए लिखना, मतलब बच्चा बन जाना। बच्चा बनकर ही बच्चों के लिए लिखा जा सकता है, अन्यथा लिखना व्यर्थ है। जिन्होंने बचपन को खुलकर जिया ही नहीं, उनके लिए मुश्किल है बच्चों के लिए लिखना!

हम महसूस करते हैं कि बच्चों का हृदय बेहद कोमल होता है। ऐसे में, उनके लिए लिखना साहित्यकारों के लिए बेहद दुरुह कार्य है। बच्चों के लिए उतना नहीं लिखा जा रहा है, जितना लिखा जाना चाहिए।
बच्चों के कोमल हृदय में नैतिकता का भाव पैदा करना जरूरी है। जरूरी है बच्चों को भारतीय संस्कृति और संस्कार से परिचित कराना, ताकि फिर से संस्कृति का झंडा बुलंद हो सके। बच्चों में संस्कार और संस्कृति का भाव साहित्य के माध्यम से ही भरा जा सकता है। बाल मन के भटकाव को रोकने के लिए बाल साहित्य का उन्नत होना जरूरी है। जितना उन्नत बाल साहित्य होगा, उतना ही उन्नत होगा देश और समाज!
राष्ट्र की भावी पीढ़ी के लिए यह एक सुखद बात है कि उन्हें हर दृष्टिकोण से ‘मजबूत’ बनाने के लिए कलम कमर कसकर बैठी है। यूँ तो किरण सिंह की कलम बड़ों के लिए ही लिखती आयी है, लेकिन बाल साहित्य के सृजन को भी उनकी कलम मचल उठी है और साहित्यिक बगिया को समर्पित की सुंदर और सुगंधित पुष्प ‘गोलू-मोलू’। यह बाल कविता संग्रह है, जिसमें 39 कविताएँ हैं और यह पुस्तक समर्पित है प्यारे-प्यारे मासूम बच्चों को।
निश्चित,, प्रत्येक साहित्यकार के लिए बाल साहित्य का सृजन करना नैतिक जिम्मेदारी है। कुशल कलमकार किरण सिंह ने अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाने की भरसक कोशिश की है। उन्होंने बच्चों से कहा-‘कभी मैं भी आपकी ही तरह बच्ची थी। मैं भी खेलती-कूदती थी, पढ़ती-लिखती थी और शैतानियाँ भी किया करती थी। इसलिए जब आपको देखती हूँ तो मुझे अपना बचपन याद आ जाता है, तो सोची कि क्यों न मैं आपसे दोस्ती कर लूँ।
वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी मानते हैं कि मौजूदा दौर के बच्चे जब कई तरह से दबाव और तनाव झेल रहे हैं, हर जिम्मेदार रचनाकार का दायित्व है कि वह शिशुओं-बालकों-किशोरों के लिए भी जरूरी सृजन करे। ऐसा साहित्य-सृजन, जो उनके अधरों पर हँसी ला सके और खेल-खेल में ही कोई जीवनोपयोगी संदेश (उपदेश नहीं) दे दे।
53 साल की संजीदा रचनाकार किरण सिंह बिल्कुल बचपन को जीते हुए कलम को गति दी है। बाल मन तो भगवान से यही मन्नतें माँगता है कि हम पढ़-लिख जायें, सदा मन के सच्चे रहें और छल-कपट से अनजान। बच्चों की तमन्ना होती है कि उनकी कद बढ़े और ऊँचे पद को पा लें, मगर इंसानी गुण बरकार रहे। अभिमान हो, लेकिन स्वभिमान में कभी कोई कमी न आये।
मानवता का पाठ पढ़ें हम
दानवता से दूर रहें हम
दिल का है इतना अरमान
हमको ऐसा दो वरदान
हे भगवान्, हे भगवान।

बच्चों के लिए ‘माँ’ सर्वोपरि है। कितना काम करती हैं माँ, लेकिन थकती नहीं हैं। मैं क्या चाहता हूँ, मेरे कहने से पहले ही माँ जान लेती हैं, समझ लेती हैं। चेहरे की हर भाषा को माँ पढ़ लेती हैं। माँ पढ़ाती हैं, लिखाती हैं, नये-नये सपने दिखाती हैं। जब शरीर थक जाता है, तो माँ सिर को सहलाती हैं। हर मुसीबत में ढाल बन जाती हैं। हर कष्ट को माँ चुपचुप सह लेती हैं, फिर भी मुख से कभी कुछ नहीं कहतीं। सच में, माँ के ममत्व का कोई जोर नहीं है। एक बच्चा का माँ से प्रश्न है-
जादूगरनी हो मम्मी या तुम हो परियों की रानी।
तूफानों में घर की नैया, बोलो कैसे खेती हो।

माँ, पिता और गुरु का हमारे जीवन में विशेष स्थान है। बच्चों की ‘टीचर जी’ क, ख, ग, घ के साथ ही जीवन को संवारने की सीख देती हैं। उदंडता पर दंड, तो डगमगाते पाँवों के भटकाव पर रोक लगाने वाली ‘टीचर जी’ बच्चों की प्रतिभा को नयी ऊँचाइयाँ प्रदान करती हैं। ‘टीचर जी’ बच्चों की ‘नायिका’ हैं, जो सवालों में फँसने और कभी उलझने नहीं देतीं। चुटकी बजाते हल कर देती हैं सारे सवाल।
राहों में हों फूल बिछे या, फिर हों चाहे शूल बिछे।
हाथ पकड़ कर मंजिल तक, हमको पहुँचातीं टीचर जी।

कवयित्री बच्चों को सीख देती हैं कि सुबह उठ जाना है। सूरज अम्बर में उग आया है, किरणें घर-घर में बिखर गयीं हैं। सभी दिशाएँ चहक उठी हैं। धरती का कण-कण फूलों की खुशबू से सराबोर है। ऐसे में अलसाना व्यर्थ है। देर से उठने पर स्कूल की बस छूट जायेगी, फिर टीचर जी की डाँट सुननी पड़ेगी। उठने में आना-कानी करने पर माँ समझाती हैं-
देखो मम्मी बना रही हैं, टिफिन सुबह से उठकर।
सजा रहीं आँखों में सपने, प्यारे-प्यारे बुनकर।

वह बताती हैं कि जीवन का आधार जल है, जिस पर संसार टिका हुआ है। जल की अहमियत है, इसलिए इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। यदि जल समाप्त हो गया, तो भुखमरी बढ़ जायेगी, सृष्टि का अंत हो जायेगा। बच्चों को यदि सीख दी जाये कि पानी अनमोल है, तो निश्चित तौर पर जल की बर्बादी को रोका जा सकता है। कवयित्री बच्चों से कहती हैं-
चलो करो सब शपथ ग्रहण।
जल का करना है संरक्षण।

बच्चों को जरूरी है बताना कि हमें सड़क पर कैसे चलना चाहिए? ट्रैफिक रूल का पालन जरूरी है। यदि हम ट्रैफिक रूल का पालन कर लें, तो दुर्घटनाओं को रोक सकते हैं। कवयित्री बच्चों को ट्रैफिक रूल बताती हैं और इसे कभी नहीं भूलने की अपील करती हैं। बिना कोई सवाल किये लाल बत्ती जलने पर रूकने को कहती हैं। यलो बत्ती जलने पर चलने को तैयार रहने, वहीं ग्रीन लाइट जलने पर चलने को कहती हैं। कहती हैं कि हरदम लेफ्ट को चलो। आगे-पीछे देखकर चलो और कभी भी ओवरटेक न करो।
अलग-अलग रंगों की लाइट,
रूल बताती हमको राइट।

काव्य संग्रह में गाय माता के गुणों का बखान है, तो फलों के राजा आम की चर्चा है। खट्टा हो या मीठा, आम सबका जी ललचा देता है। कच्चे आम की चटनी और आचार को देखकर किसके मुँह से पानी नहीं आता? आम गुणों से भरा हुआ फल है। आम की कई प्रजातियाँ हैं, जिन्हें बच्चों को जानना जरूरी है।
हिम सागर बादामी बीजू,
केसर चौसा लंगड़ा आम।
नाम गिनाऊँ कौन-कौन-सा,
करूँ बड़ाई कितना आम।

बच्चे हठी होते हैं। बच्चे बात-बात पर लड़-झगड़ जाते हैं। हालाँकि छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई नहीं करनी चाहिए। लड़ाई बुरी बात है। हठ भी नहीं करना चाहिए। बड़ों का फर्ज है कि वह बच्चों को बताये कि पटाखे नहीं छोड़ना चाहिए। पटाखों से प्रदूषण फैलता है। पटाखों से हाथ जलने का डर बना रहता है। बच्चों को भारतीय संस्कार की जानकारी दी जानी चाहिए। भारतीय संस्कार में दीया का विशेष महत्व है। दीपावली दीपों का त्योहार है, इसलिए घर-घर को दीया से जगमग करना चाहिए। बच्चों को बताना होगा कि चाइनीज झालरों से अच्छा है मिट्टी का दीया। ऐसी सीख से बाल हठ छूटेगा ही और बाल मन मान जायेगा।
मिट्टी के दीयों से बिट्टू घर को लगे सजाने।
हुआ गगन ज्यों जगमग-जगमग लगा उन्हें भी भाने।

बच्चों के मन को होली बहुत भाती है, लुभाती है। लाल-गुलाबी, नीला और पीला रंग को देखकर बच्चे खुशी से झूम उठते हैं। प्रकृति भी खिल उठती है। चहूँओर बस खुशियों का बसेरा होता है। बच्चों की टोली जमकर होली खेलती है। होली पर्व में पुआ-पकवान, दही बड़ा से लेकर ढेर-सारे व्यंजन खाने को मिलते हैं। ऊँच-नीच का भेद मिटाकर यह पर्व सभी को गले लगाना सिखाता है। क्या अमीर और क्या गरीब?
पड़ी दिलों की गांठें खोली,
प्यार बांटने आई होली।

काश! अपने पास भी पंख होते, तो आकाश में घूमना-फिरना होता। हर बच्चों की यह ख्वाहिश होती है कि काश! पंख होते। आसमान में पंख पसारे चिरैया को देखकर हर बच्चा आकाश में उड़ना चाहता है, चाँद-सितारों से बतियाना चाहता है। ‘पंख पसारे चिरैया’ में कवयित्री का संदेश है कि हम भी उड़ सकते हैं, बस हौसलों की जरूरत है। एक सीख-
उड़ों हौसलों के पंखों से।
नाद करो तुम भी शंखों से।
नहीं असम्भव है कुछ भी गर।
कर्म करोगे पुत्र निरन्तर।

आखिर हताश क्यों होना? निराश क्यों होना? बेकार की बातों से आहत क्यों होना? मन में आगे बढ़ने की ललक हो, तो लक्ष्य को भेदने से कोई रोक नहीं सकता है। हजारों दुआएँ मिलेंगी, बलाएँ हट जायेंगी। हमें बस सतत प्रयास करना है। सतत प्रयास करने से ही सफलता मिल सकती है। हमें थककर बैठना नहीं है। लड़ना है, अड़ना है। आत्मबल को मजबूत बनाये रखना है। कवयित्री कहती हैं-
चाहे हो जितनी दूरी, हो कितनी भी मजबूरी।
चलतो रहो निरन्तर, इच्छाएँ होंगी पूरी।
मन में उमंग भर लो…।हर चीज की अति खराब है। या तो मोबाइल हो अथवा टीवी। लेकिन यह भी सच है कि मोबाइल से दुनिया सिमट गयी है। एक मिनट में हम हजारों मील दूर बैठीं ‘मामीजी’ से बतिया सकते हैं। सोचिए, बंदर के पास यदि मोबाइल नहीं होता, उसका ज्ञान नहीं होता, तो क्या उसकी चाह पूरी होती, वह स्कूल पहुँच पाता? गूगल ने ही तो उसे सही राह दिखायी थी, जब वह रास्ता भटक गया था। मोबाइल का यूज कीजिए, लेकिन मिसयूज नहीं।

जब तुम मुझको मिस करोगी
तब कर दूँगा डाइल,
मैया दे दो मोहे मोबाइल।

बच्चों की सोच में कहाँ कोई भेद है? पिंकी के हाथ में काॅपी और कलम हो, वहीं मुनिया बर्तन माँज रही हो, तो बाल मन प्रश्म पूछेगा ही? माँ भी बाल मन के प्रश्न से खुश हैं, प्रसन्नचित् हैं। पिंकी ने माँ से कहा-मम्मी रूल बदल लो अब, मुनिया बर्तन नहीं धोएगी अब, वह भी पढ़ने जायेगी, उसको भी ड्रेस दिला दो, काॅपी और कलम दे दो, ताकि उसके ख्वाब पूरे हो सके। बाल मन की ऐसी भावना को देखकर माँ का खुश होना लाजिमी है और वह चूमते हुए बिटिया को कहती है-
मुनिया की आँखों में सज गये, नये-नये फिर स्वप्न।

कवयित्री बच्चों को बताती हैं कि अपना देश बहुत प्यारा है। वीरों के संघर्ष के बाद भारत को आजादी मिली है। सीना तानकर और माथे पर कफन बाँधकर देश के नौजवान आजादी की लड़ाई के लिए निकल पड़े थे। अपना खून बहाकर देशभक्तों ने इस माटी की रक्षा की थी। यह हिन्दुस्तान सुंदर है और जग में बहुत प्यारा, जहाँ मानवता सबसे श्रेष्ठ धर्म है। इसे किसी भी सूरत पर विखंडित होने नहीं देना है। राम-रहिम एक हैं, इसलिए मन में द्वेष न हो, क्लेश न हो। कवयित्री की चाहत है-
जाति-धर्म का भेद भुलाकर
मिलें सभी को गले लगाकर
हरा, श्वेत, केसरिया रंग में
रंगा हर परिवेश हो
ऐसा मेरा देश हो।

पहले ही लिख चुका हूँ कि कवयित्री की पहचान संजीदा रचनाकार के रूप में है। ऐसे में उनकी कलम वैश्विक बीमारी कोरोना को नजरअंदाज कर दे, ऐसा कैसे संभव था? कोरोना डरा रहा है, लेकिन विश्वास है कि इसका नाश होगा। कोरोना से बचने के लिए मास्क और दो मीटर की दूरी बहुत जरूरी है। जरूरी है हाथ और मुँह को धोते रहना। जरूरी है लक्षण दिखने पर चिकित्सीय जाँच कराना। कवयित्री बच्चों को बताती हैं-
हाथ मिलाना कभी न अब से।
करो नमस्ते सीधे सबसे।

एक बात है! इस संग्रह से पूर्व कवयित्री की कलम बड़ों के लिए ही लिखती आयी है। बच्चों के लिए यह उनकी पहली कोशिश है। कलम की पहली कोशिश को सलाम करना जरूरी है। अब, कलम से अपेक्षाएँ बढ़ गयीं हैं। कलम से बाल साहित्य की बगिया खिलती रहे, यही अपेक्षा है। सरल शब्दों से रचित कविताएँ बच्चों को पसंद आयेंगी, ऐसा विश्वास है। पर, बच्चे गुल्लक के पैसे से किताब खरीद पायेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। दरअसल, यह पुस्तक थोड़ी महंगी जान पड़ती है लेकिन निराश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि फिलहाल पुस्तक 50% डिस्काउंट पर मिलेगी।

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है ।

श्री राम कथामृतम्

राम कथामृतम”
बाल साहित्य में सुंदर हस्तक्षेप-
महिमा श्री
(Mahima.rani@gmail.com)
राम भारत के जननायक है। भारतीय संस्कृति के युग पुरुष राम लोक में बसे हैं। संयम, विवेक, मर्यादा और आर्दश के प्रतीक हैं राम । मिथकीय चरित्र कह के राम के अस्तित्व को झुठला नहीं सकते।लोक ने सदियों से अपने हृदय में राम को बसा कर रखा है। राम की दृष्टि में हर वर्ग का व्यक्ति महत्वपूर्ण हैं। निषादराज, सुग्रीव, शबरी, अहिल्या, जटायु जिसने भी हाथ बढ़ाया उसे अपने हृदय से लगाया। प्रजावत्सल राम ने जीवन को मर्यादित करने का मार्ग दिखाया।वाल्मिकी रामायण के बाद तुलसीदास ने रामचरित मानस रचा और अमर हो गये।कितनी ही भाषाओं में रामायण लिखी गई। कई अतिश्योक्तियाँ और किवंदतियां भी जुड़ती गई। राम को लेकर विवाद भी गहराये। किंतु रघुपति राजा राम के लिए प्रेम लोकमानस में कम न हुआ।कहते हैं मरा मरा भी कहनेवाला एक दिन राममय हो जाता है और राम राम करने लगता है। राम का जीवन समाज को दिशा देने मे सक्षम है।
रामानंद सागर की टीम ने 1987 में रामायण धारावाहिक जब दूरदर्शन पर प्रसारित किया तो हर वर्ग की छोड़िए हर समुदाय के लोगों ने कितनी श्रद्धा के साथ उसे देखा वह दूरदर्शन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया।
अप्रैल 2020 में लॉकडाउन के दौरान फिर से रामायण का प्रसारण हुआ और फिर वही हुआ लोक ने फिर से अपने राम को छोटे पर्दे पर जी भर के देखा। एनिमेटेड गेम और सोशल मीडिया पर बीजी नई पीढी को भी राम से सही मायने में भेंट हुई। इसी भयावह कोरोनाकाल में कवीयत्री किरण सिंह ने वरिष्ठ साहित्यकार श्री भगवती प्रसाद दिवेदी जी की प्रेरणा से बाल साहित्य लेखन को प्रतिबद्ध हुई। और बच्चों के लिए लोक नायक राम की कथा श्रीराम कथामृतम लिख डाला है।
वे कहती है किसी असीम शक्ति ने उनसे लिखवा लिया। सहज भाषा और सरल छंद में रची-बसी राम कथा बच्चों को बहुत पसंद आने वाली है। राम का बाल चरित्र हो या युवा काल का वे नैतिक मूल्यों को सहजता से पोषित करने में सहायक है। आज जब यूटयूब और अन्य साइटों पर आसानी से एक क्लिक पर अनैतिक साम्रगी उपल्ब्ध है।जब मानसिक रोग जैसे अवसाद, गुस्सा, अनैतिक इच्छाएं , आत्महत्या आदि का शिकार बचपन हो रहा है। वैसे में राम और कृष्ण का बाल चरित्र नैतिक मूल्य यथा आदर, आत्मसम्मान, संयम, विवेक, मित्रता आदि पढ़ाकर समझाया और सिखाया जा सकता है। और हमें विश्वास है लेखिका किरण सिंह की श्रीराम कथामृतम इस कार्य को बखूबी करने वाला है।
पुस्तक में कुल सोलह खंडो में कथा को पिरोया गया है।श्री राम कथामृतम चुकिं बच्चों के लिए लिखा गया है उनकी तरह ही इसकी भाषा सरल और जल की तरह तरलता और बहाव है।बच्चे इसे एक सांस में पढ़ते जानेवाले हैं।राम चरित्र की बोधगम्यता बच्चों में पाठ के दौरान ही महसूस होने लगेगी। पुस्तक में ऐसे किसी भी क्लिष्ट हिंदी शब्द का प्रयोग नहीं मिलता जो बच्चों को समझने और पढ़ने में रुकावट पैदा करे। कवयीत्री ने बच्चों को ध्यान में रखकर लिखा है और उसमें सफल हुई हैं।
शब्दों की सरलता बाल खंड में ही दिख जाती है। कवीयत्री लिखती हैं-
चैत्रमास की नवमी तिथि को/ जन्म लिए थे राम/ कथा सुनाती हूँ मैं/ उनकी
जपकर उनका नाम
पुस्तक के हरेक खंड में राम के चारित्रिक गुण सहजता से परिलक्षित होते हैं।
एक बानगी देखिए-
बने राम निशाद गुरुकुल में / अच्छे सच्चे मित्र / उनदोनों का ही अपना था/ सुंदर सहज चरित्र।
कुछ पंक्तियों में ही राम का मित्रवत स्वभाव उपरोक्त पंक्तियों में आसानी से बच्चों को समझ आ जानेवाला है। ऐसी सरलता पूरी पुस्तक मिलती है।प्रसंगो के साथ नयनाभिराम चित्र भी पुस्तक का आकर्षण का केंद्र है जो बच्चों को बार-बार पन्ने पलटने के लिए उत्सुकता जगायेगा।
राम हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। उनका जीवन भारतीय परंपरा के संवाहिका के रुप में नई पीढ़ी को नैतिक मूल्यों से अवगत कराता है। राम आज्ञाकारी पुत्र, कुशाग्रबुद्धि शिष्य, सरल मित्र, प्रजावत्सल राजा, एक पत्नीव्रता पति, कुशल प्रशासक, न्यायप्रिय व्यक्ति हैं। यही गुण उनको लोक नायक बनाता है। श्री राम कथामृतम, राम के चारित्रिक गुणों को काव्य के सहारे छोटे बच्चों के समक्ष प्रेषित करने में सफल है। इसे सभी विद्यालयों के पुस्तकालयों में होना चाहिए। बच्चों के हाथों में पहूँचना चाहिए। यह पुस्तक बच्चों को पढ़ने में रुची जगाने वाली है। इसके लिए कवयित्री को असीम शुभकामनाएं।
लेखिका- किरण सिंह
पुस्तक- श्री राम कथामृतम
प्रकाशन-जानकी प्रकाशन
पुस्तक मुल्य-150 -/

पुस्तक 50 % डिस्काउंट पर अमेजन पर उपलब्ध है

लिंक https://www.amazon.in/dp/8194816602/ref=cm_sw_r_wa_apa_i_JovOFbWY6M7Q0

बस कह देना कि आऊँगा

आना और न आना तो आने वालों की मर्जी पर निर्भर करता है किन्तु ये जिद्दी प्रतीक्षा इस बात से बेखबर अड़ी रहती है अपनी जिद्द पर ।  निराशा के तिमिर को भेद कर आशा की  खूबसूरत भविष्य की परिकल्पना में प्रतीक्षारत।
तभी तो आजिज़ होकर कवयित्री नन्दा जी की लेखनी चलकर प्रिय से प्रार्थना करती है कि तुम आना या न आना बस कह देना कि आऊँगा। और उनकी प्रार्थना रूप ले लेती है एक काव्य संग्रह का।  इस प्रकार संग्रह का शीर्षक बस कह देना की आऊँगा अपनी सार्थकता को सिद्ध करता ही है, ऊपर से लाल रंग के आवरण पृष्ठ पर नव यौवना का चित्र पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए पर्याप्त है।
एक सौ बीस पृष्ठों में अंकित इस पुस्तक में चौवन कविताएँ हैं।सभी रचनाएँ छन्द मुक्त, भाव प्रबल और श्रृंगार रस में डूबी हुई हैं जिसको पढ़ने के उपरांत ऐसा प्रतीत होता है कि नायिका ने अपनी व्यथा को डायरी में काव्य के रूप में अंकित कर दिया है जिसको पढ़ते हुए पाठक परत दर परत खुलती भावनाओं में प्रतीक्षा के मर्म को समझता है।
पुस्तक की पहली ही कविता शीर्षक को सार्थक कर रही है।
यथा –

मैं तो बस एक सम्भाव से
तुम्हारा इंतज़ार करती रहती हूँ..
तुम आओ न आओ
बस कह देना कि आऊँगा।

कवयित्री आप बीती में कहती हैं –

मेरी कविता मुझसे ही बगावत कर बैठी
सारी कविताएँ मुझ पर
हँस रहीं थीं और मेरा ही मुंह चिढ़ा रहीं थीं
मानो कह रही हों
क्या मिला मेरे शब्दों से खेलकर
जिसके लिये तुम हमें तोड़ती – जोड़ती रही
क्या उसने समझा तुम्हारी भावनाओं को
जी में आया सबका गला घोंट दूँ…….

आरम्भ या अंतिम संस्कार में कवयित्री लिखती हैं –
एक बार फिर मैं,
अप्रमेय प्रेम की खोज में
सबसे सरलतम प्रमेय से छली गई
क्या..?
ये मेरा आरम्भ होगा या अंतिम संस्कार
नहीं जानती मैं… ।

कवयित्री मन का रिश्ता में मन के खूबसूरत रिश्ते की गहराई को कुछ यूँ बयाँ करती हैं –

जानते हो!
तुम्हारे प्रति मेरी
अनुभूति की अभिव्यक्ति
शब्दों में परिवर्तित क्यों नहीं हो पाती?
क्योंकि
मेरे और तुम्हारे प्रेम का
सुनहरा क्षितिज असीमित है..

नायिका जब प्रतीक्षा करते – करते थक जाती है तो कवयित्री तुम आओगे या मैं आऊँ कविता में कहती हैं –

तुम्हारे यादों के उस कोट में
खुद को बंद कर लेती हूँ
जिसमें मेरी कल्पनाओं के सतरंगी इन्द्रधनुष
आज भी दिखाई देते हैं
जानती हूँ ये असम्भव प्राय है
फिर भी हो सके तो आ जाना..

और कवयित्री तुम आना में लिखती हैं –

तुम आना जब मिट जाये
मध्यस्थ की रेखा
मृदु नेह अर्पित हो
मिलन पर
गा उठे सब तार
मन के
तुम आना!
बेशक तुम मत आना…. बस कह देना कि आऊँगा।

इस प्रकार मुक्त छन्द में उन्मुक्त काव्य से संकलित यह पुस्तक पठनीय है। पुस्तक के पन्ने स्तरीय हैं तथा छपाई स्पष्ट है। यह कवयित्री की पहली पुस्तक है इसलिए मैं कवयित्री को हार्दिक बधाई एवम् उनके उज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएँ देती हूँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक – बस कह देना कि आऊँगा
लेखिका – नन्दा पाण्डेय
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन
मूल्य – 150. 00

इंटेलेक्चुअल पार्लर

व्यंग्य अंग्रेज़ी के सटायर शब्द का हिंदी रूपांतर है।
व्यंग्य के माध्यम से हल्के-फुल्के अंदाज में ही हँसी मजाक करते हुए किसी भी व्यक्ति, वस्तु, व्यवस्था, समाज आदि की आलोचना सीधे शब्दों में न कह कर उल्टे या टेढ़े शब्दों में व्यक्त किया जाता है। बोलचाल में इसे ताना, बोली या चुटकी भी कहते हैं।
व्यंग साहित्य की विधा अन्य विधाओं से अधिक प्रभावकारी होता है। इसीलिए व्यंग्य को व्यंग्य वाण भी कहा जाता है। क्योंकि व्यंग्य वाले शब्द तीर की तरह ही हृदय को बेध देते हैं। लेकिन व्यंग्य को पढ़ते, सुनते हुए पाठकों , श्रोताओं के होठों पर अनायास ही मुस्कान बिखर जाती है। और यदि व्यंग्यकार की लेखनी मजी हुई हो तो वह अपने पाठकों को मन्त्रमुग्ध कर पढ़ने को मजबूर कर देती है।
कुछ ऐसी ही जादूई लेखनी है माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी की। जो चलकर अबतक सैकड़ों पुस्तकों को आकार देकर दुनिया भर के पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल हुई है। वैसे तो माननीय की प्रशंसा करना सूर्य को दीपक दिखाने के जैसा ही है, फिर भी मैं साहस जुटाकर उनकी सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह इंटेलेक्चुअल्स पार्लर के व्यंग्य पुष्प वाण से आप सभी को भी  बेधने का प्रयास कर रही हूँ। क्योंकि माननीय द्वारा प्राप्त उपहार स्वरूप यह पुस्तक मेरे मन मस्तिष्क पर इस प्रकार हावी हो चुकी है कि मैं लिखे बिना रह ही नहीं सकती।
हरे रंग के कवर पृष्ठ में लिपटी हुई  111 ( एक सौ ग्यारह ) पृष्ठों वाली इस पुस्तक में कुल पच्चीस ( 25) व्यंग्य हैं। सभी व्यंग्य में व्यंग्यकार ने बहुत प्यार से सामाजिक कुव्यवस्था पर वार किया है, जिसे पढ़ते हुए पाठक कभी हँस पड़ता है तो कभी आक्रोशित हो जाता है और फिर कभी सोचने – समझने पर विवश हो जाता है। जो कि व्यंग्यकार की सफलता का द्योतक है।
लेखक ने पुस्तक के पहले ही व्यंग्य का शीर्षक सम्बन्धों का अंत्य परीक्षण में अपनी विशिष्ट शैली की तकनीक  से बिना चीड़ – फाड़ के रिश्तों का आॉपरेशन कर दिया है। जिसकी कुछ पंतियों से मैं आपको भी रूबरू करवाती हूँ।
यथा – वर्तमान अर्थयुग में व्यवसाय तो एक सम्मानीय पेशा है। क्योंकि जहाँ व्यवसाय है वहीं अर्थ है। और अर्थ के बिना सबकुछ व्यर्थ है। ऐसे में सम्बन्धों को भी यदि व्यवसायिक बनाया जा रहा हो तो भला इसमें बुराई क्या है?

आगे लिखते हैं – जिस माँ बाप के पास पैसे न हों, उन्हें बेटे – बेटियाँ जन्माने का क्या अधिकार… और जिस बेटे की अच्छी – खासी कमाई न हो, उसे माँ – बाप के प्यार पाने का क्या हक़ है? अर्थ तंत्र का यह मंत्र धन्य है। सबहिं नचावत अर्थ गुसाईं।……
चाहे दोस्ती का रिश्ता हो या अन्य कोई, त्याग, निःस्वार्थ सेवा , समर्पण भाव, निष्ठा, कर्तव्य बोध जैसे कोरी भावुकता से ओत-प्रोत शब्द पिछड़ेपन की निशानी हैं।

संग्रह के दूसरे व्यंग्य में व्यंग्यकार ने आधुनिक युग में नारियों के बदलते हुए स्वरूप पर जमकर कटाक्ष करते हुए पुरुषों को आगाह किया है…
इक्सवीं सदी नारियों की होगी। तब दहेज की माँग करने वाले की नहीं, दहेज की मोटी रकम अदा करने वाले पतियों की जीते जी अर्थी निकलेगी। कमर से तलवार लटकाए रानी लक्ष्मी बाई सरीखी अश्वारोही नारी जब बारात लेकर निकलेगी तो सभी झूम – झूम कर गा उठेंगे, घोड़े पे होके सवार, चली है दूल्हन नार, कमरिया में बांधे तलवार…!

संग्रह का तीसरा व्यंग्य आम और खास में व्यंग्यकार ने आम और खास को बहुत ही रोचक ढंग से परिभाषित करते हुए सामाजिक ढांचे को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है।

यथा – खास और खासमख़ास सबके आकर्षण का केंद्र रहा है आम आदमी। चाहे डाॅक्टर – इंजीनियर हों, खुद को तीसमार समझने वाले बुद्धिजीवी हों अथवा आत्ममुग्ध लेखक – पत्रकार – सभी आम आदमी नामक इसी प्राणी का गाहे-बगाहे उपयोग – उपभोग करते रहे हैं।
आम और आम आदमी दोनों ही समान धर्मा है। फलों का सरताज़ है आम, तो जन आन्दोलन का सिरमौर है आम आदमी।
संग्रह के ग्यारहवें व्यंग्य में लेखक ने बहुत ही बेबाकी से साहित्य जगत की बखिया उधेड़ कर रख दी है।

जैसे – जब यंत्र मानव बनाये जा सकते हैं तो फिर साहित्यकार – पत्रकार क्यों नहीं?
पत्रिका में छपने के लिए अच्छे साहित्यकार की कोई शर्त नहीं है। शर्त है तो बस आजीवन सदस्यता शुल्क भेजने की। सहयोगी संकलनों के लिए निर्धारित राशि के साथ कूड़ा – करकट कुछ भी भेजा जा सकता है।…… आप अपनी सज्जनता का परिचय देते हुए दोनों हाथ से मुँह माँगा धन उलीचिये और मीडिया में मनोवांछित प्रतिष्ठा प्राप्त कीजिये।

संग्रह के सत्रहवें व्यंग्य आजादी का अंक गणित में लेखक ने गवईं परिदृश्य को हल्का – फुल्का भोजपुरी भाषा का प्रयोग करते हुए बड़े ही खूबसूरत एवम् रोचक अंदाज में आजादी का अंकगणित समझाने का प्रयास किया है। जिसके छोटे से वार्तालाप से आपको भी अवगत करवाती हूँ।
कहाँ जा रहे हो, खदेरन.?
आज पन्द्रह अगस्त है नू? स्कूले जात बानी ।उसने कहा।
शाबाश। बहुत अच्छे। आजादी तो हमें आज के दिन ही तो मिली थी। मैंने उसे समझाने की गरज से कहा।
आजादी? उ का होला? स्कूल में त उ मिलबे ना करेला। खाली केला आ मिठाई मिलेला। एही से त आज जात बानी। खदेरन ने कहा।
संग्रह का बीसवा व्यंग्य इंटेलेक्चुअल्स पार्लर गुजरात राज्य शाला पाठ्यपुस्तक मंडल के संपादक मंडल ने कक्षा 12 की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में शामिल कर लिया है। इससे लेखक के लेखन के स्तर का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसी प्रकार संग्रह के अन्य व्यंग्य ( सुनी – अनसुनी, उल्टा – पुल्टा, और चाबी खो जाये, अथ गुरुदेवोपाख्यानम्, साहित्य अर्ध नारीश्वरों के नाम आदि ) भी जबरदस्त व्यंग्य हैं।
अतः मैं यह दावे के साथ कह सकती हूँ कि यह संग्रह सभी को अच्छा लगेगा इसलिये जरूर पढ़ें।
इस संग्रह के लिए माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी जी को सादर प्रणाम करते हुए हार्दिक बधाई देती हूँ और आग्रह करती हूँ कि भविष्य में भी हमें अपनी अनमोल कृतियों से लाभान्वित करते रहें।

किरण सिंह

लेखक – भगवती प्रसाद द्विवेदी
प्रकाशक – अमिधा प्रकाशन
मूल्य – दो सौ ( 200 ) रुपये







हे राम! मर गया… धनी राम..!

राम के नाम हियो में धरो,
न सड़े न गले नहीं होत पुराना।
दिनो दिन बढ़े न घटे कबहूँ ,
नहीं आग लगे नहीं चोर चुराना।
कितनी सत्य पंक्तियाँ हैं यह। तभी तो कुछ लोग अपना सरनेम तो कुछ पूरा का पूरा राम का नाम ही अपनाकर लेते हैं। राम का नाम है ही ऐसा जो दुख हो या सुख हमारे मुख पर अनायास ही आ जाता है।

पढ़ना जारी रखें “हे राम! मर गया… धनी राम..!”