उषा किरण खान का कथा लोक

वैसे तो मैं स्वयं ही पद्मश्री उषा किरण खान दीदी की लेखन शैली से अत्यधिक प्रभावित हूँ जिसको पढ़ते हुए पढ़ने की तृष्णा शांत होने की बजाय और भी बढ़ती जाती है।  ऐसे में विदूषी बहन डाॅ सोनी पाण्डेय द्वारा सम्पादित पुस्तक गुलाबी रंग के आवरण में लिपटी, जिसपर उषा दीदी की तीन – तीन दैदिप्यमान छवि अंकित है ‘उषा किरण खान का कथा लोक’ साहित्य जगत के लिए एक उपहार ही है। उपहार इसलिए क्योंकि एक सौ बीस पृष्ठों में संकलित इस पुस्तक मे चौदह विदूषियों, मनिषियों का उषा किरण खान जी के कथा लोक पर अपने-अपने विचार संग्रहित हैं।
सभी के विचार उषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए इतनी खूबसूरती से लिखी गई है कि पाठक बस पढ़ता ही चला जायेगा और पढ़ते हुए उनकी कहानियों को महसूसने लगेगा। इतना ही नहीं  इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों के मन में उषा किरण खान जी की कहानियों को पढ़ने की इतनी उत्कंठा बढ़ जायेगी कि वह पढ़े बिना रह ही नहीं सकता है।
सर्वप्रथम पुस्तक की भूमिका में सोनी पाण्डेय जी लिखती हैं –

मैथिली की कथा लेखिका ‘ऊषा किरण खान’ की कहानियों से गुजरते हुए जो तत्व प्रमुखता से उभरता है वह है “आगे क्या हुआ?” की जिज्ञासा। आपकी कहानियाँ अपनी सहज रवानगी में भाषा को लोकरंग धारण किये पाठक को उस लोक में ले जाती है जहाँ की वह बात करती हैं।……..

विदुषी भावना शेखर जी ने ऊषा किरण खान की सवर्ण विधवाएँ पर बहुत ही खूबसूरती से प्रकाश डाला है जो अवश्य ही पठनीय है।
वो लिखती हैं –
मैथिली और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में सिद्धहस्त उषा जी का साहित्य अपने ग्राम्य अनुभवों के कारण उपेक्षितों, वंचितों के जीवन संघर्ष का आइना बन पड़ा है। दलितों की पीड़ा और जिजीविषा के सूक्ष्म और प्रभावी रेखांकन के लिए उन्हें पहचान मिली किन्तु बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि अपने विपुल साहित्य में बिखरे नारी पात्रों में न केवल दलित अपितु सवर्ण स्त्रियों की पीड़ा का व्याख्यान भी उन्होंने सिद्दत से रचा है। उनकी कहानियों में खास तौर पर विधवा पात्रों की व्यथा – पाठकों को उद्वेलित करती हैं। और लम्बे समय तक भीतर ही भीतर मन को कचोटती हैं।….

नीलकंठ और जलकुम्भी एक विश्लेषण में रानी सुमिता कहती हैं –
कथाकार ऊषा किरण खान की कहानियों का कथा संसार बेहद विस्तृत है। ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई इनकी कहानियाँ गाँवों की लगभग हर समस्या को ढूढती और खँघालती नज़र आती है। कहानी नीलकंठ सुदूर गाँवों में जा पहुंची है और कहानी की आड़ में घर – घर आ पसरे नक्सली जो सामान्य जन का नकाब ओढ़े रहते हैं, को उजागर किया है।….

और उषा किरण खान की कहानियों का नाट्य प्रयोग में उषा दीदी की बहुआयामी प्रतिभा की धनी विदुषी  पुत्री कनुप्रिया कहती हैं – उषा किरण खान मेरी माँ हैं। माँ की कहानियाँ बचपन से ही पढ़ रही हूँ मैं, पर मर्म अब जाकर समझ आया है । चूँकि बचपन से ही मंच और रेडियो पर हिन्दी, मैथिली नाटक करती आई हूँ तो हर कलाकार की तरह मैं भी यह सोचती थी कि काश इस किरदार को मैं भी अपने अंदर उतार सकूँ। किसी भी चरित्र को निभाना आज भी एक स्वप्न सा अनुभव होता है, एक ही जीवन काल में कई सारे जीवन जीना।…..

इस प्रकार से इस पुस्तक में ( शेफाली झर रही है  – डाॅ विद्या निवास मिश्र
जीवनानुभवों का उदात्त – डाॅ चन्द्र कला त्रिपाठी
जल प्लावन में तटबंध की तरह – प्रज्ञा पाण्डेय
सहज किन्तु साधारण नहीं – पूनम सिन्हा
लोक जीवन का समुच्चय – डाॅ गौरी त्रिपाठी
उषा किरण खान की कहानियाँ – आभा बोधिसत्व
अतीत के वर्तमान में वृहत्तर स्वीकृति – पूनम सिंह
गरीबी को परास्त करते पतः साधक बच्चे – सुधा बाला
जीवन मूल्यों का आलोक – डाॅ राजीव कुमार वर्मा
हमके ओढ़ा द चादरिया – आशीष कुमार) ने भी ऊषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए बहुत ही खूबसूरती से अपने-अपने भाव प्रकट किये हैं जो श्लाघनीय है।
वैसे तो यह पुस्तक सभी को अच्छी लगेगी लेकिन शोधार्थियों के लिए तो यह पुस्तक सोनी पाण्डेय जी के द्वारा एक उपहार की तरह है।
पुस्तक की छपाई स्पष्ट है और पन्ने सामान्य हैं। फिर भी पुस्तक की पठन सामग्री को देखते हुए मूल्य ठीक ही कहा जायेगा।
एक सुन्दर और सार्थक कार्य की सराहना करते हुए पुस्तक की सम्पादक सोनी पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – उषा किरण खान का कथा लोक
प्रकाशक – आपस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, अयोध्या, उत्तर प्रदेश
मूल्य – 285,
कवर – पेपर बैक
पृष्ठ संख्या – 120

इन दिनों

गिर रहा आँखों से पानी इन दिनों 

गिर रहा आँखों से पानी इन दिनों 
जिंदगी ने जंग ठानी इन दिनों।

अब डराती हैं हमें नजदीकियाँ,
लाजिमी दूरी बनानी इन दिनों।

बन्द हो अब जिस्म की सौदागिरी, 
इश्क ही लगता रुहानी इन दिनों। 

नाचती घुंघरू को पग में बांधकर, 
मौत होकर के दिवानी इन दिनों। 

आदतें जो भी बुरी हों छोड़िये, 
है सिसकती जिंदगानी इन दिनों। 

कर ‘किरण’ घर में ही तू चिंतन मनन, 
लिख दे फिर कोई कहानी इन दिनों।। 

आम

खट्टा – मीठा ताजा आम।
सबका जी ललचाता आम ।

हिम सागर बादामी बीजू
केसर, चौसा लंगड़ा आम।

नाम गिनाऊँ कौन – कौन सा ,
करूँ बड़ाई कितना आम।

बनी चटपटी चटनी उसकी ।
जब रहता है कच्चा आम।

बन अचार तैयार हुआ तो ,
मुंह में पानी लाता आम।

फेंट दूध में सेक बना जब ,
सबके मन को भाता आम।

भरा हुआ है खास गुणों से,
फिर भी खुद को कहता आम।

इसीलिए शायद बन बैठा ,
सभी फलों का राजा आम ।

गोलू – मोलू


सरल, सहज, सुबोध, सरस एवं शिक्षाप्रद बाल कविताएँ
प्रभात कुमार राय
कृति: गोलू – मोलू ( बाल कविता- संग्रह )
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशक: जानकी प्रकाशन, नई दिल्ली- पटना
पृष्ठ: 48 मूल्य : रू• 150
समीक्षक: प्रभात कुमार राय
मो• 9934083444
यह महज संयोग है कि कवयित्री द्वारा रचित बाल- कविता-संग्रह की समीक्षा लिखते वक्त ही यह आहलाद्कारी समाचार मिला कि उन्हें लखनऊ उ•प्र• हिन्दी संस्थान के बाल साहित्य संवर्धन योजना के अंतर्गत सुभद्रा कुमारी चौहान बाल साहित्य सम्मान से नवाजा गया है। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भी हाल ही में उन्हें उत्कृष्ट रचनाओं के लिए सम्मानित किया है । कवयित्री की यह अद्यतन पुस्तक महान साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी द्वारा साहित्यिक चर्चा के दरम्यान वर्णित एक प्रेरक वाक्य – ‘ बाल साहित्य सृजन प्रत्येक साहित्यकार का नैतिक कर्तव्य होता है’ – की देन है। इसे सूत्रवाक्य की तरह अपनाकर कवयित्री के सत्प्रयास का समीक्ष्य पुस्तक एक सुन्दर फल है । माननीय भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अपने पुरोवाक् में बाल साहित्य साधना को ईश्वरीय आराधना की संज्ञा दे डाला है ।
हिंदी बाल साहित्य लेखन की परंपरा प्राचीन एवं समृद्ध है । हाल मे कॉमिक्स तथा अंग्रेजी विद्यालयों में तुकबंदी वाली लघु कविताओं आदि के प्रति झुकाव के कारण इस साहित्य के अभिवर्धन की गति धीमी हो गयी है । विश्व कवि रवीन्द्रनाथ की बाल- कविताएँ मशहूर है । पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों में अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ‘ हरिऔध ‘, कामताप्रसाद गुरू, राम नरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चौहान, सोहन लाल द्विवेदी, रामधारीसिंह दिनकर एवं आरसी प्रसाद सिंह प्रभृति साहित्यकारों की बाल- कविताएँ बच्चों का कंदहार बन गयी थी। मुझे अपने बाल्यकाल में दिनकर जी का ‘ सूरज का व्याह ‘, ‘मिर्च का मजा ‘, ‘ चित्तौड़ का साका’ तथा आरसी जी का ‘ सोने का झरना’, ‘ कलम और बंदूक ‘, ‘ कागज की नाव’ आदि बाल कविता-संग्रहों को पढ़ने का सौभाग्य मिला । निस्संदेह इन कविताओं ने मेरी कल्पनाशीलता को नया आयाम दिया तथा साहित्य- बोध एवं महत्वपूर्ण सीखें भी दीं।
इस पुस्तक के आरंभ में सरल एवं सरस शब्दों में प्रार्थनाएं हैं जो सदाचार , निष्कपटता एवं विवेकशीलता की पाठ पढ़ाते हैं, वहीं अंत में राष्ट्र- भक्ति से ओत-प्रोत उत्साह, उमंग, गौरव और शौर्य का संचार करनेवाली कविताएँ हैं। कवयित्री की बाल- कविताएँ सिर्फ मनोरंजन या साहित्यिक चेतना को जगाने के निमित्त ही नहीं हैं वरन् उपदेशात्मक और जीवन- दर्शन के यथार्थ को भी स्वर देती है । राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी सपाटबयानी में लिखा है : ‘ केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए/ उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए’/। पर उपदेश या चरित्र-निर्माण संबंधित हिदायतें अगर आदेशात्मक शैली में कही जाती है तो बच्चों के कोमल मस्तिष्क इसे सहज ग्रहण नहीं कर पाते। इसलिए मनोरंजन के मर्म में शिक्षण को पिरोया गया है ताकि बालक अनायास उन्हें अपने स्वभाव और आदतों में डाल सकें । कवयित्री द्वारा कड़वी दवा के घूंट को मधु-मिश्री में घोलकर कंठ के नीचे उतारने का प्रयास रोचक एवं कुशलतापूर्वक किया गया है। जल-संचय, पर्यावरण-संरक्षण, स्वास्थ्य संबंधी हिदायतें, ट्रैफिक सुरक्षा नियमों का अनुपालन, कोरोना महामारी को मात देने के लिए सावधानियाँ आदि ज्वलंत मुद्दों को बड़ी ही सूक्ष्मता से सहज प्रवाह में गेय कविताओं द्वारा व्यक्त किया गया है जिनसे नन्हे-मुन्हे उन्हें झूम-झूम कर गायेंगे और जीवनोपयोगी संदेश को ग्रहण करेंगे ।
सर्वधर्म समभाव के मर्म को भावी कर्णधारों के कोमल हृदय में उकेड़ने का कवयित्री का प्रयास स्पृहणीय है:
‘आस-पास हो मंदिर-मस्जिद/ द्वेष रहे न मन में सिंचित’/
‘एक तरफ हो अल्लाह- अकबर/ सम्मुख विष्णु महेश हों’/
‘चलो सुनाते हूँ मैं कहानी/ एक राम रहीम एक है/ एक सीख हर धर्म की’/
जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव को त्यागने और ऐक्य की भावना जागृत करने के लिए कवयित्री बच्चों को सिखलाती है:
‘ तोड़ दो दीवारें जाति-धर्म की/ हम रहेंगे साथ मिलकर ए वतन’/
बाल कविता-संग्रह में बच्चों के सर्वाधिक प्रिय फल आम का जिक्र स्वाभाविक है ।कवयित्री की ये पंक्तियां:’ खट्टा-मीठा ताजा आम,/सबका जी ललचाता आम/ हिमसागर बादामी बीजू,/ केसर चौसा लंगड़ा आम’/
ये पंक्तियां कविवर आरसी प्रसाद सिंह की निम्न बाल-कविता के भाव को व्यंजित करती प्रतीत होती है:
‘ आमों के हैं नाम हजारों, सभी रसीले, सब सुंदर ।
कृष्णभोग, सिन्दुरिया, फजली, चंपा-दुधिया हिम-सागर’।
बच्चों का स्कूल जाने से कतराना जग-जाहिर है । कवयित्री ने लिखा है: ‘ बस जायगी छूट स्कूल की,/ अगर करोगे देरी/ हो जाओ तैयार फटाफट, बात मानकर मेरी’/ अपनी ‘ रविवारी प्रार्थना’ कविता में आरसी जी ने लिखा है: ‘ हे प्रभो ! प्रत्येक दिन को/ तू मधुर रविवार कर/ और दिन की हर घड़ी में , खेल का संचार कर’/
अत्यधिक कल्पना-प्रधान होने के कारण काल्पनिक कविताएँ, कथा व कहानियों बालकों को अधिक प्रिय होती हैं । कल्पना शक्ति के अधिक तीव्र होने के कारण वे बिल्ली, मेढक, बंदर आदि को भी मनुष्यों की तरह बात-चीत और व्यवहार करनेवाला समझ लेते हैं । कवयित्री ने ऐसी कविताओं का सृजन कर बच्चों की कल्पना को कुलांचे प्रदान की है । आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों एवं उपादानों जैसे मोबाइल, फेसबुक (मुखपोथी),फोटो का स्टाइल आदि के बारे में चर्चा वर्तमान पीढ़ी के बालकों को विशेषकर भायेगा ।
ऐसा माना जाता है कि बच्चों के मन को समझ पाना अतल अंधकारयुक्त समुद्र में गोता लगाकर मोती खोजने के समान अत्यंत कठिन है । श्रेष्ठ बाल-गीत के लिए बाल-स्वभाव का पर्याप्त ज्ञान परमावश्यक है ।बच्चों के मन में किन परिस्थितियों में कैसी भावनाएं उदित होती हैं, कब कैसी-कैसी कल्पनाएं करते हैं, अनुकरण की प्रवृत्ति, अपरिमित जिज्ञासा आदि को गहराई से समझना जरूरी है । तभी गुणवत्तापूर्ण बाल-कविता की रचना संभव है । बालकों को कैसी रचनाएँ प्रिय लगती है और अपने लिए कैसे विचार पसंद करते हैं, यह तो बालक बनकर उनके हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ अपने मनोभावों का स्पंदन मिलाकर ही अनुभव किया जा सकता है । पुस्तक के आरंभ में ‘ एक चिट्ठी बच्चों के नाम’ में कवयित्री ने लिखा है : ‘ ॰॰॰॰ क्यों न मैं आपसे दोस्ती कर लूं । क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगे ?’ पूरी पुस्तक में कवयित्री की भूमिका पाठशाला की शिक्षिका की नहीं वरन् समकक्ष वरिष्ठ दोस्त की है । वस्तुतः बाल-साहित्य को परिचय तो उसकी बाल-प्रकृति में मिलता है । जहां बाल-मनोभाव है, वहीं असली बाल-साहित्य है ।
हिंदी साहित्य के धूमकेतु एवं जनकवि आरसी प्रसाद सिंह ने बाल साहित्य की महत्ता एवं गुणवत्ता को रेखांकित करते हुए बड़े बेबाकी से कहा है: ‘ यह समझना भ्रम है कि उच्च कोटि का साहित्य प्रबुद्ध प्रौढ़ पाठकों के लिए है और निम्न कोटि की रचनाएँ बालकों के लिए । … इस विभेद ने बाल साहित्य के नाम पर इतना सारा कूड़ा- कर्कट भर दिया कि उसकी सडन और दुर्गंध से सारा वातावरण दूषित होने लगा है। अतएव ज्वलंत सच्चाई यही है कि बाल साहित्य भी अपने स्थान पर उतना ही पूर्ण, आत्म-निर्भर, जीवंत और उच्च कोटि का हो सकता है । प्रबुद्ध-प्रौढ़ साहित्य की अपेक्षा यह कोमल-सुकमार साहित्य इसलिए श्रेष्ठ है कि इसमें सरलता के साथ सरसता और श्रेय के साथ प्रेय को मिलाकर गागर में सागर कर देना पड़ता है, जो हर साहित्यकार के वश की बात नहीं ।‘
इस संग्रह में सभी कविताएँ बाल-मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर रची गयी है । कवयित्री के सच्चे आत्म- बोध के एकान्त स्वर में इन रचनाओं का प्रस्फुटन हुआ है । हर कविता के अंत में भावपूर्ण एवं मनोहारी चित्रों का समावेश कविता की सार्थकता को बढ़ाने में सहायक है ।कवयित्री ने अपने मन को बच्चों के मन से तादात्म्य स्थापित करते हुए, उनके मानसिक स्तर को ध्यान में रखते हुए, रोचक कविताओं का सृजन किया है । कवयित्री की भाषा उतनी ही सरल है जितना ‘गोलू-मोलू’ का चंचल स्वभाव ।
बालकों के निमित्त यह संग्रह प्रत्येक शिशु, जिसके कोमल जीवन-अंकुर में भविष्य की अपार संभावनाएं झाँक रही है, को सदाचरण, स्वनिष्ठा, नैतिकता, परस्पर सदभाव , सेवा और राष्ट्र-प्रेम का संदेश देगा और साथ ही साहित्यिक प्रवृत्तियों को विकसित करेगा । मुझे पूरा विश्वास है कि ये रचनाएँ अपने उद्देश्य में निश्चय सफल होंगी तथा पाठकों के हृदय में चेतना का ज्वार भर देगी।

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है –

ईश्वर का रूप

हमेशा औरों की मदद करने वाली धार्मिक प्रवृत्ति की मनोरमा की आँखें, स्वयं ही मदद की गुहार लगाती हुई याचक की तरह टकटकी लगाये हुए थी कि कोई भी कोविड से बेहाल उसके पति के लिए बेड की व्यवस्था कर दे। लेकिन कोविड मरीजों की भीड़ इतनी ज्यादा थी की वह अपने नम्बर की प्रतीक्षा में परेशान हुए जा रही थी। वह बार-बार कभी हास्पिटल के कर्मचारियों से गुजारिश कर रही थी तो कभी ईश्वर का स्मरण कर रही थी, लेकिन इस विकट घड़ी में उसका गुहार कोई भी नहीं सुन रहा था। वह मन ही मन सोच रही थी कि बड़े बुजुर्ग हमेशा कहते हैं कि किसी की मदद यदि तुम करते हो तो तुम्हारी मदद भगवान करेंगे। लेकिन “कहाँ हैं भगवान?” उसका विश्वास ईश्वर पर से उठने लगा था।
उसे लगने लगा था कि भगवान भी पैरवी और पैसे वालों की ही सुनते हैं। तभी तो खादी धारी नेताओं तथा वर्दीधारियों के लिए हल्के सर्दी-जुकाम में भी तुरंत वी आई पी इंतजाम हो जाता है और आम आदमी की कोई सुनने वाला नहीं है। उसके पति की तेज चलती हुई सांसे उसकी धड़कने तेज कर रही थीं। उसके मन में बुरे – बुरे खयालात आने लगे थे । अब उसे ईश्वर के प्रार्थना में भी मन नहीं लग रहा था।
तभी हास्पिटल का कर्मचारी आकर बोला कि एक बेड खाली है और वह उसके आगे वाले व्यक्ति जो कि करीब अस्सी वर्ष के होंगे को अंदर आने के लिए कहा।
मनोरमा ने कर्मचारी से पूछा – “मेरे पेशेंट का नम्बर कब आयेगा”? देखिये मेरे पति की तबियत लगातार बिगड़ती जा रही है। कुछ तो करिये।
कर्मचारी – ” जबतक कोई बेड नहीं खाली हो जाता है मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूँ मैडम”।
मनोरमा मिन्नतें कर रही थी लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। अन्ततः वह हारकर ईश्वर को याद करने लगी। उसके आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। तभी उसके आगे वाले अस्सी वर्षीय वृद्ध ने हास्पिटल के कर्मचारी से कहा मुझसे अधिक इस महिला के पेशेंट को बेड की आवश्यकता है। मेरा क्या मैं तो अपनी जिंदगी जी चुका हूँ अभी इस बेचारी औरत के पति की उम्र पैंतालीस से पचास वर्ष की है। इसके बीवी – बच्चे हैं इसलिए इसकी जिंदगी मुझसे अधिक महत्वपूर्ण है।मेरे बदले इसको बेड दे दो। हास्पिटल कर्मचारी उस वृद्ध को अचम्भित होकर देखने लगा और मनोरमा ने उनके दोनो चरण पकड़ लिया। उसे लग रहा था जैसे मानव रूप में स्वयं ईश्वर उसकी गुहार सुनकर मदद करने के लिए आ गये हों।
हास्पिटल का कर्मचारी उस वृद्ध से कागज पर कुछ औपचारिक हस्ताक्षर करवाकर मनोरमा के पति को अंदर आने का इशारा करता है।

रश्मि अनन्त

रश्मि अनंत

आज जिस तरह से साहित्यिक संस्थाएँ नवोदित लेखकों को चुन – चुन कर समाज के सामने ला रही हैं वह निश्चित ही सराहनीय है। ऐसी ही एक एक संस्था है सोशल एन्ड मोटिवेशनल ट्रस्ट जो कि दिनोंदिन अनंत साहित्यिक गतिविधियों को विस्तार दे रही है।
यही विस्तार अनंत काव्य रश्मियों के माध्यम से साहित्य जगत को आलोकित करने के लिए एक पुस्तक में संकलित होकर अपनी तरफ़ आकृष्ट कर रहा है ।
वैसे तो इस पुस्तक का नाम रश्मि अनंत ही स्वयं को परिभाषित करने के लिए पर्याप्त है ऊपर से इसका आकर्षक कवर जिसपर परिंदे खुले आसमान में उड़ान भर रहे हैं एक सार्थक संदेश दे रहा है।
पुस्तक में कुल ३१० पृष्ठों में ३९ रचनाकारों की रचनाएँ संकलित हैं ।सभी रचनाओं को पढ़ने के पश्चात संग्रह के सम्पादक रविन्द्र नाथ सिंह जी के काव्य चयन व सम्पादन की प्रशंसा करनी होगी –

उदाहरण के लिए कुछ काव्य रचनाओं से परिचय कराने के क्रम में मैं संग्रह के सम्पादक मनीषी रविन्द्र नाथ सिंह जी की रचना सादगी से ही शुरुआत करती हूँ-

सादगी।

क्या रखा आडम्बरों में
सादगी अपनाइए।
है अगर रब़ पर भरोसा
मत कभी घबराइए
सादगी तन मन का गहना
खुदको इससे सजाइए।

बोलिए मत झूठ हर्गिज
जो भी हो मजबूरियाँ
झूठ से है भेद बढता
सच मिटाती दूरियाँ

तत्पश्चात सोशल एन्ड मोटिवेशनल ट्रस्ट की अध्यक्ष ममता सिंह जी की एक रचना कालीदास से –

कालीदास

कालीदास मूढ मानव थे
ऊँच नीच का ज्ञान नहीं
बैठे थे जिस डाल के उपर
काट रहे थे भान नहीं ।

कौन बताए मूर्ख प्राणी को
डाल जो ये कट जाएगा
गिर जाएगा शीघ्र धरा पर
साथ वह भी गिर जाएगा।

चूंकि आजकल सोशल मीडिया साहित्यकारों के लिए एक अच्छा प्लेटफार्म है तो कवयित्री शेफालिका वर्मा के भावों को देखें –

फेसबुक
ये फेसबुक ना होता तो क्या होता
ये रातें ये दिन
गुलज़ार न हुआ करता
सूनेपन को झंकार न मिला होता
इतनी कविताओं का जन्म न हुआ रहता
जो मौन मूक किनारे पड़े रहे
उन्हें यूँ साहिल न मिला होता

मधुर वचन कितना जरूरी है कवि सी. के जैन जी के शब्दों में –

मन रे मधुर वचन तू बोल,
मधुर वचन का इस जग में कोई, लागे नाही मोल।
कडवी बात कभी बन आये, मौन को मन में धार,
बिन बोले नहीं काम बने तो, कटु वचनों को टार,
देखभाल कर, नाप तौल कर, मीठे वचन टटोल,
मन रे मधुर वचन तू बोल।
कडवा वचन व्यंग्य द्रोपदि का, कुपित किया दुर्योधन,
लज्जित करके भरी सभा में, बैर गांठ बांधी मन,
अग्नि उठी बदले की दिलों में, बजा युद्ध का ढोल,
मन रे मधुर वचन तू बोल।

श्रीमती आशा चौधरी जी प्रेम को परिभाषित करते हुए कहती हैं –

प्रेम है पूजा, प्रेम हकीकत, प्रेम जगत की कुंजी है।
यह उमंग है यह तरंग है, यह सुन्दर एहसास है।

भावना झा रूबी जी की पंक्तियाँ –

बदलती सम्बन्ध की तस्वीर।
दुनिया में वो व्याध है गम्भीर।

इस प्रकार इस पुस्तक में संकलित सभी रचनाएँ छन्मुक्त होते हुए भी पाठकों के मन को बांधने के प्रयास में लगभग सफल हैं। पुस्तक के पन्ने सामान्य हैं लेकिन छपाई स्पष्ट है अतः पुस्तक पठनीय है।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – रश्मि अनंत
सम्पादक – रविन्द्र नाथ सिंह
मूल्य – रु ३९९ ( तीन सौ निन्यानबे)
पृष्ठ संख्या – ३१०

मैं एक बलुआ प्रस्तर खण्ड

आज का लेखन यदि स्त्री विमर्श काल कहा जाये तो यह गलत नहीं होगा। क्योंकि जिस तरह से स्त्रियां अपने हाथों में कलम रूपी तलवार थामकर समर में कूद पड़ी हैं कि महा समर में हलचल का माहौल उत्पन्न हो गया है।
वैसे तो स्त्री विमर्श पर अनेक साहित्य रचे गये किन्तु आज मैं जिस पुस्तक की बात कर रही हूँ उसे पढ़ते हुए एक – एक करके मेरे ज्ञान चक्षु खुलते गये।
इस पुस्तक की लेखिका हैं साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा भारत भारती सम्मान से अलंकृत पद्मश्री Ushakiran Khan  जी। मैं आदरणीया की पंक्तियों को लेते हुए मैं  उनके द्वारा स्त्रियों को सप्रेम समर्पित की गई ज्ञानवर्धक तथा प्रेरणादायी पुस्तक का परिचय कराने का प्रयास कर रही हूँ। ” मेरे मन में सदा उथल-पुथल रही कि स्त्री की स्थिति और उसके उत्थान पतन की चर्चा की जाये तो कैसे? आम धारणा और क्रमिक विकास की ऐतिहासिक दृष्टि से देखते हुए मैंने लिखना शुरू किया। रससिद्ध और मनोरंजक बनाने का आलम्बन दीदारगंज की चंवरवाहिनी यक्षी बनी,,” जिसका परिणाम है मैं एक बलुआ प्रस्तर खण्ड।
वास्तव में लेखिका उषा किरण खान जी ने अपूर्व प्रयोग करते हुए स्त्री विमर्श जैसे गम्भीर विषय को भी इतनी सहजता, मनोरंजक व खूबसूरती से वर्णन किया है कि पाठक भावनाओं के प्रवाह में बहता चला जायेगा और सोचने पर विवश हो जायेगा।
पीले सरसों के रंग के आवरण में जिसपर खूबसूरत स्त्रियों की कलाकृति अंकित है.. लिपटी हुई यह पुस्तक पाठकों को आकृष्ट करने तथा अपना परिचय देने के लिए पर्याप्त है जिसमें पूर्व वैदिक काल की विदुषी घोषा से लेकर इंदिरा गांधी तक की स्त्रियों की गौरव गाथा सन्निहित है।
जैसा कि आदरणीया ने अपनी भूमिका में लिखी है कि” रससिद्ध और मनोरंजक बनाने का आलम्बन दीदारगंज की चंवरवाहिनी यक्षी बनी” तो अपनी कहानी सुनाते हुए चंवरवाहिनी यक्षी शिल्पी के श्रम, सूझ – बूझ तथा संवेदनशीलता का बहुत ही सूक्ष्मता से विवेचना करते हुए प्रत्येक काल – खण्ड में स्त्रियों की दशा का वर्णन करती है।
स्त्री और पुरुष पूर्व वैदिक काल में लगभग बराबरी का दर्जा रखते थे।
अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह चलता था।
ऋतमती होते ही स्त्री पुन: पवित्र हो जाती है।
आर्यों के प्रारम्भिक समाज में स्त्रियाँ स्वच्छंद थीं।
वैदिक युग में स्त्री की शिक्षा अपनी उच्चतम सीमा पर थी।
बौद्ध युग में स्त्रियां प्रायः शिक्षित और विद्वान हुआ करती थीं। विद्या धर्म और दर्शन के प्रति उनकी अगाध रुचि हुआ करती थी।
उत्तरवैदिककालीन व्यावहारिक शिक्षा में वे नृत्य, गान, चित्रकला आदि की भी शिक्षा ग्रहण करती थीं।
दूसरी सदी ई. पूर्व तक स्त्री का उपनयन व्यवहारतः बन्द हो चुका था। विवाह के अवसर पर ही उनका उपनयन संस्कार कर दिया जाता था। इस सम्बन्ध में मनु का कथन है कि पति ही कन्या का आचार्य, विवाह ही उसका उपनयन संस्कार , पति की सेवा ही उसका आश्रम – निवास और गृहस्थी का कार्य ही उसका धार्मिक अनुष्ठान है। कालांतर में शुद्रों की ही तरह वेदों के पठन-पाठन और यज्ञों में सम्मिलित होने के अधिकार से भी वह वंचित कर दी गई।
पूर्व मध्य युग तक आकर नारी शिक्षा का प्रसार अवरुद्ध हो चुका था किंतु अभिजात वर्ग में सुसंस्कृत और सुबोध स्त्रियों की कमी नहीं थी।
ऐसी भी स्त्रियां हुईं जो शाशक अथवा अभिभावक के अभाव में स्वयं प्रशासन का संचालन करती थीं।
यह जानकारी तो हमें लेखिका द्वारा स्वयं लिखी गई भूमिका में ही मिल जाती है।
अब सुनाती हूँ चंवरवाहिनी यक्षी द्वारा कही गई कहानी के अंश –
‘शिल्पी का स्पर्श मेरे अंग-अंग में बस गया।शिल्पी वहां मेरे पार्श्व में गहरी निद्रा में सो गया था जिसे उषस्काल  की अन्शुमालाओं ने जगाया। दिनकर की कोमल किरनों ने पहले सिकता राशि पर अपनी प्रभा बिखरी,उनमें घुले-मिले अभरक कणों को सुनहरा किया’ मुझे एक आभा प्रदान की तब उसके गंगा जमुनी श्मश्रुओं के बेतरतीब केशों को सहलाया…….

इस प्रकार लेखिका की लेखनी यक्षी के माध्यम से घोषा,गार्गी,लोपामुद्रा, आमृपाली, रज़िया सुल्तान से इन्दिरा गांधी तक का बहुत ही कम शब्दों में विस्तार से वर्णन करती है। पुस्तक की भाषा, काल और संस्कृति का सूक्ष्म परिचय देती है ।

इस प्रकार की कितनी ही जानकारी इस पुस्तक में सन्निहित हैं जिसको जानना हम सभी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इतने कम पृष्ठों में कथेतर गद्य  के माध्यम से इतनी खूबसूरती से पूर्ण स्त्रीकाल को समेट लेने की क्षमता आदरणीया उषा किरण खान दीदी की लेखनी ही रखती है। हम लेखिका की लेखनी को नमन करते हैं।

यह पुस्तक सभी स्त्रियों को तो पढ़नी ही चाहिए साथ ही समस्त पुरुष जाति को भी पढ़नी चाहिए जिससे स्त्रियों के प्रति उनकी धारणा बदल सके और वह एक नई दृष्टि से स्त्रियों को देख सकें।
इतने खूबसूरत और बहुमूल्य उपहार के लिए हम आदरणीया उषा किरण खान दीदी को साधुवाद देते हुए बारम्बार प्रणाम करते हैं।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – मैं एक बलुआ प्रस्तर खण्ड
लेखिका – पद्मश्री उषा किरण खान
प्रकाशक – वाणी प्रकाशन
मूल्य – 250 रुपये

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है –

रहस्य

24 कहानियों का गुलदस्ता है ‘रहस्य’

कृति: रहस्य (कहानी संग्रह)
कृतिकार: किरण सिंह
प्रकाशकः पंकज बुक्स
109-ए, पटपड़गंज गाँव
दिल्ली-110091

पृष्ठः 128 मूल्यः 395/-

समीक्षकः मुकेश कुमार सिन्हा

हमारे आस-पास कहानियों के अनगिनत पात्र बिखरे पड़े हैं, बस जरूरत है उन पात्रों को, शब्द रूपी पुष्पों में ढालने की। पुष्पों को चुन-चुनकर हम उसे माला का रूप दे सकते हैं। रंग-बिरंगे पुष्पों से तैयार माला गुलदस्ता रूप में लोगों का बरबस ध्यान आकर्षित करता है। कौन नहीं चाहेगा रंग-बिरंगे फूलों के गुलदस्ता को हाथों में लेना? ऐसा ही एक गुलदस्ता है-‘रहस्य’। 24 कहानियों से सुसज्जित है यह। कहानीकार हैं-किरण सिंह।
किरण सिंह केवल कहानियाँ नहीं गढतीं, साहित्य की हर विधा पर अपनी कलम चलाती हैं। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा सुभद्रा कुमारी चौहान महिला बाल साहित्य सम्मान सहित कई सम्मानों से सम्मानित किरण सिंह की कलम कविता गढ़ती है, दोहे रचती है, कहानियाँ भी सृजित करती है। ‘प्रेम और इज्जत’ के बाद किरण सिंह की कहानियों की यह दूसरी पुस्तक है।
बकौल किरण, ‘हमारे आसपास के वातावरण में कई तरह की घटनाएँ घटित होती रहतीं हैं, जिसे देखकर या सुनकर हमारा संवेदनशील मन कभी हर्षित होता है तो कभी व्यथित और फिर कभी अचंभित भी। ऐसे में हम मानव के स्वभावानुरूप अपने-अपने मित्रों, पड़ोसियों आदि से उस घटना की परिचर्चा करके अपनी मचलती हुई संवेदनाओं को शांत करने का प्रयास करते हैं। किंतु, एक लेखक की लेखनी मचलने लगती है, शब्द चहकने लगते हैं और लिख जाती हैं खुद-ब-खुद कहानियाँ।
किरण सिंह रचित ‘रहस्य’ की कहानियों में नारी के अंतर्मन की चाहत है, नारी की बेबसी है, तो समाज से उम्मीद भी। आखिर समाज से नारी उम्मीद नहीं लगाये, तो किससे लगायेगी? कितना त्याग करती है नारी? माँ रूप में, पुत्री रूप में, बहन रूप में और न जाने कितने रिश्तों को निभाते-निभाते अपनी खुशियों की भी परवाह नहीं करती है। कहानियों में नयी पीढ़ी को संदेश है, तो नारी को नसीहत भी।
भले ही ‘रहस्य’ से पर्दा उठ गया, लेकिन यह प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम अन्तर्मन से होता है, यह हाट में बिकने वाली चीज नहीं है। ‘यह मैं सोना के लिए लाया हूँ। उससे ब्याह करूँगा।’ यह हीरा ने कहा। हीरा और सोना का एक-दूसरे से बहुत प्यार था, मगर दोनों विवाहित थे।
कभी कुएँ में गिरे सोना को निकालने वाला हीरा उसे फिर कुएँ से निकालता है, लेकिन तब वह बेजान होती है। लोगों के बीच चर्चा थी कि कुएँ पर सोना की आत्मा भटकती है, पायल की झंकार सुनायी देती है। हालाँकि वह सोना नहीं होती। वह तो हीरा होता है, जो अक्सर रात को चूड़ियाँ, बिंदिया तथा पायल-सिंदूर को लाल रंग के बक्से में रखकर कुएँ के पास पहुँचता है, यह आस लिए कि सोना जिंदा कुएँ से लौटेगी और वह ब्याह रचायेगा!
दिल से किया गया ‘प्यार’ हमेशा पूर्णतः को प्राप्त करता है। ऋचा को पाकर ऋषभ इठला उठा था। हालाँकि ऋचा का संबंध अभिषेक से हो जाता है, लेकिन प्यार का पलड़ा ऋषभ का ही भारी रहा। ‘लाल गुलाब’ लेकर ऋषभ के खड़ा होने से ऋचा का चेहरा गुलाब-सा खिलना लाजिमी था। यह ‘विडम्बना’ ही है कि विवेहत्तर संबंध का खामियाजा स्त्री को ही भुगतना पड़ता है। मेघा यह जान गयी थी कि उसके पति का संबंध उसकी जेठानी से है, फिर भी वह यह सोचकर चुप हो जाती है कि जेठानी की क्या गलती? इस परिवार ने छलकर ही उनकी शादी नपुंसक बेटे से करा दी। वहीं ‘अपशगुन’ कहानी नारी मन की पीड़ा को उजागर करती है।
कहानीकार की कहानियाँ माता-पिता को सलाह देती है। सच में, हम अपनी औलाद को इतना लाड़-प्यार देने लगते हैं कि उनकी गलतियों को नजरअंदाज कर देते हैं। फलतः औलाद के पाँव भटक जाते हैं। जरूरत है माँ-पिता को सही परवरिश देने की, ताकि हर माँ यह कह पाये-‘बेटा सोने पर लाख धूल मिट्टी जम जाये, थोड़ा-सा तपा दो चमक ही जाता है।’ फैशनपरस्त नयी पीढ़ी को नसीहत देती है-‘झूठी शान’। कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता, बस राह गलत न हो!
अक्सर युवा मन भटक जाता है। एकतरफा प्यार के चक्कर में वह कैरियर को दाँव पर लगा देता है। हालाँकि जो संभल गया, उसकी चाँदी है और जो न समझा, वह कैरियर व भविष्य को चौपट कर लेता है। विक्की सँभल गया, इसलिए अच्छे पद पर पहुँचा। कितना अच्छा होता, यदि ‘यू आर माई बेस्ट फ्रेंड’ में लेखिका विक्की के हाथ को मिताली के हाथ में थमा देती। हम प्यार करते हैं, लेकिन इजहार नहीं कर पाते। यदि नितेश मन की बात को मृणालिनी से कह देता, तो उसकी जिंदगी संवर जाती। अब मृणालिनी के हिस्से ‘प्रार्थना’ के सिवाय कौन-सा शब्द शेष है।
कोख कितनी भी बेटियों को जन्म दे दे, लेकिन बेटों को न जने, तो कोख की इज्जत कम हो जाती है। खानदान चलाने के लिए बेटा चाहिए, समाज की यही सोच है। पति की खुशी और वंश वृद्धि के लिए भगवती देवी घर में सौतन लाती है, लेकिन एक वक्त ऐसा आता है कि उसे उपेक्षित जीवन जीना पड़ता है। भगवती जैसी नारी समाज में है, लेकिन आखिर भगवती जैसी महिलाओं को सौतन लाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? समाज आज तक अपनी सोच को बदल पाने में असमर्थ क्यों है? एक अनुत्तरित प्रश्न है, जिसका जवाब ढूँढा जाना आवश्यक है।
लेखिका स्त्री को नसीहत देती है। लिखती हैं-यदि स्त्री चाहे तो घर को घर बना सकती है, अन्यथा ‘राम वनवास’ हो सकता है। स्त्री की सोच क्यों हो जाती है कि उसके बगैर घर नहीं चल सकता? परिवार को चलाने के लिए सबकी जरूरत होती है, बस ‘आत्ममंथन’ की जरूरत है। संस्मरणात्मक कहानी है-‘नायिका’, तो कोरोना की त्रासदी का दंश है-‘वादा’।
पति और पत्नी के बीच नोंक-झोंक होना कोई असाधारण बात नहीं है, लेकिन इसका क्या मतलब कि हम अपनी जान पर ही आफत मोल लें। ‘जीवन का सत्य’ में अविनाश गलत है या मीना, कहना मुश्किल है। यदि अविनाश सही होता, तो वह अपनी पत्नी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करता और यदि मीना सही होती, तो वह अपनी ‘बगिया’ को छोड़कर संन्यासी जीवन को नहीं अपनाती। पति और पत्नी गाड़ी के दो पहिए हैं, दोनों का साथ जरूरी है गृहस्थ जीवन चलाने में। शक को भी कभी जिंदगी में आने नहीं देना चाहिए, अन्यथा शिखा और नितेश की तरह जिंदगी बदरंग-सी हो जायेगी। प्राची की वजह से दोनों के साँसों की सरगम में जीवन संगीत बजा। जाहिर सी बात है कि ‘जीवन संगीत’ है, मन के आँगन में शहनाई का बजना भी बार-बार जरूरी है।
अपनी जान बचाने के एवज में ‘अमृता’ ने डाॅक्टर दंपति की बदरंग जिंदगी को रोशन करने के लिए कोख को दे देती है। हालाँकि यह अमृता की बदकिस्मती थी कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। काश! उसकी अभिलाषा पूरी हो जाती।
कहानीकार के शब्द संयोजन के क्या कहने? कहावतों को भी कहानी में पिरोती हैं। सिरहाने बांसुरी रखने से पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है को शब्दों में पिरोकर कहानी रची गयी है-बांसुरी। ‘धर्म’ यह बताने को काफी है कि सबसे बड़ा धर्म है-मानवता। हम बेवजह धर्म को लेकर आपस में लड़ते-झगड़ते हैं। यदि शबाना ने मानव धर्म नहीं अपनाया होता, तो शैलजा का बेटा पता नहीं आज किस हाल में होता? ‘नमस्ते आंटी’ उन महिलाओं को बेपर्द करने की कोशिश है, जो अपनी उम्र छिपाती फिरती हैं। ‘संकल्प’ आईना है। अनसोशल की पैठ के बीच जरूरी है सोशल मीडिया में खुद के लिए लक्ष्मण रेखा तैयार करना। हालाँकि सोशल मीडिया की उपयोगिता है। फेसबुकिया प्रपंच के बीच संध्या की ‘परख’ को दाद देनी पड़ेगी। ‘संतुष्टि’ अच्छी कहानी है। हमारी मदद से किसी की जिंदगी सुधर जाये, तो संतुष्ट होना लाजिमी है। सविता के चेहरे पर संतुष्टि का भाव कहानी को जीवंत बनाती है।
लेखिका किरण सिंह की कलम परिपक्व है। वह जानती है कि कब और कहाँ, किस पात्र से क्या-क्या कहलाना है? ‘वैसे भी पतियों की आदत होती है हिदायत देने की क्योंकि उनकी नज़रों में तो दुनिया की सबसे बेवकूफ औरत उनकी पत्नी होती है’, ‘गलत कहते हैं लोग कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु होती है। सच तो यह है कि पुरुष ही अपनी अहम् तथा स्वार्थ की सिद्धि के लिए एक स्त्री के पीठ पर बंदूक रखकर चुपके से दूसरी स्त्री पर वार करते हैं, जिसे स्त्री देख नहीं पाती और वह मूर्ख स्त्री को ही शत्रु समझ बैठती है’, ‘अरे आ जायेगा। लड़का है कउनो लड़की थोड़े है कि एतना चिंता करती हो’, ‘बच्चे बाहर निकले नहीं कि बेलगाम घोड़ा बन जाते हैं’, ‘स्त्रियाँ अपनी खुशी ढूँढ ही लेती हैं…कभी पिता की तो कभी पति की तो कभी पुत्र की खुशियों में’ आदि वाक्यों के माध्यम से लेखिका ने सामाजिक दृष्टिकोण को रखने की कोशिश की है।
लेखिका बलिया की हैं, इसलिए कहानियों में भोजपुरी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग है। यह लेखिका का मातृभाषा के प्रति समर्पण का द्योतक है। कहानियाँ चूँकि सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं, इसलिए यह ग्राह्य है। काल्पनिकता है, लेकिन पाठकों को बाँधे रखने के लिए यह जरूरी है। एकाध जगह प्रूव की कमी है, जिसे लेखिका अगले अंक में दुरुस्त कर देंगी, ऐसी आशा है।

चलितवार्ता-9304632536

छोटी सी बात

अपने बाॅस के रवैये से नाखुश होकर महेश बाबू दफ्तर से छुट्टी लेकर घर बैठ गये। परिणाम स्वरूप उनका वेतन कटने लगा। कुछ दिनों तक तो जमा – पूंजी से घर खर्च मैनेज होता रहा, लेकिन कुछ समय के बाद दिक्कत होने लगी। महेश बाबू के मित्रों तथा परिजनों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह किसी की भी सुनते ही नहीं थे।
पति की जिद के सामने मीना की भी एक न चलती थी इसलिए मीना ने सब ईश्वर पर छोड़ दिया।
मीना की चाहे कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, वह प्रतिदिन सांझ को भगवान के सामने दीया जलाना नहीं भूलती थी। एकदिन ऐसे ही शाम को दीया जला रही थी और उसका बारह वर्षीय बेटा गोलू उससे नाश्ता मांगने लगा, मीना ने उससे कहा “थोड़ी देर और रुक जा मैं भगवान के आगे दीया जला लूँ, फिर तुझे नाश्ता देती हूँ”।
गोलू ने कौतूहल वश अपनी माँ से पूछा.. ‘ मम्मी आप ये रोज शाम को लक्ष्मी जी को दीया क्यों जलाती हैं.”.?
मीना बोली -” बेटा ऐसा करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख समृद्धि आती है। गोलू इस बात से सहमत नहीं हुआ और बोला – मम्मी घर में सुख समृद्धि लक्ष्मी जी के आगे दीया जलाने से नहीं आयेगी , वो तो पापा के दफ्तर जाने से आयेगी।आप ही तो कहती हैं कि कर्म ही पूजा है। यह सुनकर मीना कुछ न कह स्की और चुपचाप दीया जलाकर रसोई में गोलू के लिए नाश्ता निकालने चली गई।
अगली सुबह जब मीना महेश बाबू को चाय देने उनके कमरे में गई तो तो देखा महेश बाबू दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। उन्होंने मीना को जल्दी से नाश्ता निकालने को कहा।
मीना के होठों पर विजयी मुस्कान खिल गयी। वह मन ही मन सोचने लगी कि महेश जी को जो बात मैं तथा बड़े – बुजुर्ग भी नहीं समझा पाये उन्हे उनके छोटे से बेटे ने समझा दिया ।

खेलूंगी मैं होली

सखियों संग खेलूंगी मैं होली
सखियों संग

सन सन सनन सन बहे पुरवाई
अंग  – अंग लिये अंगड़ाई
फाग उड़ाये गुलाल रोली
सखियों संग………………….

कुहुक – कुहुक कोयलिया गाये
सुनके मेरा दिल भी बहक – बहक जाये
लेके आओ न मेरे सजन डोली
सखियों संग……………………

सात रंग की लूंगी चुनरिया
उस पर बनाऊँगी सुन्दर लहरिया
चाहे कितना भी बोले  बलम बोली
सखियों संग……………………

फूलों से लाली उधार ले लूंगी
नयनों से कजरा की धार ले लूंगी
कोरे मन पर बनाऊँगी रंगोली
सखियों संग………………….

प्रीत रंग भरी पिचकारी
अबकी पड़ूंगी सभी पर मैं भारी
घोल भावना भंग गोली
सखियों संग……………………

शब्दों को जोड़ – तोड़ गीत लिख दूंगी
रंगों को छिड़क – छिड़क प्रीत लिख दूंगी
ऐसी – वैसी नहीं हूँ मैं अलबेली
सखियों संग ………………….