श्री राम कथामृतम्

राम कथामृतम”
बाल साहित्य में सुंदर हस्तक्षेप-
महिमा श्री
(Mahima.rani@gmail.com)
राम भारत के जननायक है। भारतीय संस्कृति के युग पुरुष राम लोक में बसे हैं। संयम, विवेक, मर्यादा और आर्दश के प्रतीक हैं राम । मिथकीय चरित्र कह के राम के अस्तित्व को झुठला नहीं सकते।लोक ने सदियों से अपने हृदय में राम को बसा कर रखा है। राम की दृष्टि में हर वर्ग का व्यक्ति महत्वपूर्ण हैं। निषादराज, सुग्रीव, शबरी, अहिल्या, जटायु जिसने भी हाथ बढ़ाया उसे अपने हृदय से लगाया। प्रजावत्सल राम ने जीवन को मर्यादित करने का मार्ग दिखाया।वाल्मिकी रामायण के बाद तुलसीदास ने रामचरित मानस रचा और अमर हो गये।कितनी ही भाषाओं में रामायण लिखी गई। कई अतिश्योक्तियाँ और किवंदतियां भी जुड़ती गई। राम को लेकर विवाद भी गहराये। किंतु रघुपति राजा राम के लिए प्रेम लोकमानस में कम न हुआ।कहते हैं मरा मरा भी कहनेवाला एक दिन राममय हो जाता है और राम राम करने लगता है। राम का जीवन समाज को दिशा देने मे सक्षम है।
रामानंद सागर की टीम ने 1987 में रामायण धारावाहिक जब दूरदर्शन पर प्रसारित किया तो हर वर्ग की छोड़िए हर समुदाय के लोगों ने कितनी श्रद्धा के साथ उसे देखा वह दूरदर्शन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया।
अप्रैल 2020 में लॉकडाउन के दौरान फिर से रामायण का प्रसारण हुआ और फिर वही हुआ लोक ने फिर से अपने राम को छोटे पर्दे पर जी भर के देखा। एनिमेटेड गेम और सोशल मीडिया पर बीजी नई पीढी को भी राम से सही मायने में भेंट हुई। इसी भयावह कोरोनाकाल में कवीयत्री किरण सिंह ने वरिष्ठ साहित्यकार श्री भगवती प्रसाद दिवेदी जी की प्रेरणा से बाल साहित्य लेखन को प्रतिबद्ध हुई। और बच्चों के लिए लोक नायक राम की कथा श्रीराम कथामृतम लिख डाला है।
वे कहती है किसी असीम शक्ति ने उनसे लिखवा लिया। सहज भाषा और सरल छंद में रची-बसी राम कथा बच्चों को बहुत पसंद आने वाली है। राम का बाल चरित्र हो या युवा काल का वे नैतिक मूल्यों को सहजता से पोषित करने में सहायक है। आज जब यूटयूब और अन्य साइटों पर आसानी से एक क्लिक पर अनैतिक साम्रगी उपल्ब्ध है।जब मानसिक रोग जैसे अवसाद, गुस्सा, अनैतिक इच्छाएं , आत्महत्या आदि का शिकार बचपन हो रहा है। वैसे में राम और कृष्ण का बाल चरित्र नैतिक मूल्य यथा आदर, आत्मसम्मान, संयम, विवेक, मित्रता आदि पढ़ाकर समझाया और सिखाया जा सकता है। और हमें विश्वास है लेखिका किरण सिंह की श्रीराम कथामृतम इस कार्य को बखूबी करने वाला है।
पुस्तक में कुल सोलह खंडो में कथा को पिरोया गया है।श्री राम कथामृतम चुकिं बच्चों के लिए लिखा गया है उनकी तरह ही इसकी भाषा सरल और जल की तरह तरलता और बहाव है।बच्चे इसे एक सांस में पढ़ते जानेवाले हैं।राम चरित्र की बोधगम्यता बच्चों में पाठ के दौरान ही महसूस होने लगेगी। पुस्तक में ऐसे किसी भी क्लिष्ट हिंदी शब्द का प्रयोग नहीं मिलता जो बच्चों को समझने और पढ़ने में रुकावट पैदा करे। कवयीत्री ने बच्चों को ध्यान में रखकर लिखा है और उसमें सफल हुई हैं।
शब्दों की सरलता बाल खंड में ही दिख जाती है। कवीयत्री लिखती हैं-
चैत्रमास की नवमी तिथि को/ जन्म लिए थे राम/ कथा सुनाती हूँ मैं/ उनकी
जपकर उनका नाम
पुस्तक के हरेक खंड में राम के चारित्रिक गुण सहजता से परिलक्षित होते हैं।
एक बानगी देखिए-
बने राम निशाद गुरुकुल में / अच्छे सच्चे मित्र / उनदोनों का ही अपना था/ सुंदर सहज चरित्र।
कुछ पंक्तियों में ही राम का मित्रवत स्वभाव उपरोक्त पंक्तियों में आसानी से बच्चों को समझ आ जानेवाला है। ऐसी सरलता पूरी पुस्तक मिलती है।प्रसंगो के साथ नयनाभिराम चित्र भी पुस्तक का आकर्षण का केंद्र है जो बच्चों को बार-बार पन्ने पलटने के लिए उत्सुकता जगायेगा।
राम हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। उनका जीवन भारतीय परंपरा के संवाहिका के रुप में नई पीढ़ी को नैतिक मूल्यों से अवगत कराता है। राम आज्ञाकारी पुत्र, कुशाग्रबुद्धि शिष्य, सरल मित्र, प्रजावत्सल राजा, एक पत्नीव्रता पति, कुशल प्रशासक, न्यायप्रिय व्यक्ति हैं। यही गुण उनको लोक नायक बनाता है। श्री राम कथामृतम, राम के चारित्रिक गुणों को काव्य के सहारे छोटे बच्चों के समक्ष प्रेषित करने में सफल है। इसे सभी विद्यालयों के पुस्तकालयों में होना चाहिए। बच्चों के हाथों में पहूँचना चाहिए। यह पुस्तक बच्चों को पढ़ने में रुची जगाने वाली है। इसके लिए कवयित्री को असीम शुभकामनाएं।
लेखिका- किरण सिंह
पुस्तक- श्री राम कथामृतम
प्रकाशन-जानकी प्रकाशन
पुस्तक मुल्य-150 -/

पुस्तक 50 % डिस्काउंट पर अमेजन पर उपलब्ध है

लिंक https://www.amazon.in/dp/8194816602/ref=cm_sw_r_wa_apa_i_JovOFbWY6M7Q0

चलो दीप हम जलायें

चलो दीप हम जलायें

विश्वास की बाती में
घृत प्रेम का मिलायें
खुशियों की ज्योति में हम
दुख का तिमिर मिटायें
चलो दीप हम जलायें

रह जाये न अंधेरा
लगे रात भी सवेरा
खिल जायें चन्द्र किरणें
और विश्व जगमगाये
चलो दीप हम जलायें

तारों की सेना लेकर
चाँद आया हो जमीं पर
हम प्यारी सी निशा को
कुछ इस तरह सजायें
चलो दीप हम जलायें

करें साफ विश्व डेहरी
जलायें दीप प्रहरी
जीवन की कल्पना की
हम अल्पना बनायें
चलो दीप हम जलायें

आलस्य त्याग करके
मन में स्फुर्ति भर के
मेहनत के मंत्र से हम
दारिद्रय, दुख भगायें
चलो दीप हम जलायें

रिद्धि-सिद्धि सी सुता है
बहु अन्नपूर्णा है
उन्हें पूजकर हृदय से
समृद्धि, सुख बढ़ायें
चलो दीप हम जलायें

बांट कर गम खुशी से

बाँट कर गम खुशी से पीया कीजिये.
शौक से जिंदगी को जीया कीजिये।

शामिल हो सभी की खुशी में कभी ,
खुशियों का खुशी से गुणा कीजिये।

यूँ ही कट जायेगा जिंदगी का सफ़र,
अपनो से हमेशा मिला कीजिये।

माफ़ कर हर कहा और सुना आप अब ,
चाहे तारीफ़ या फिर गिला कीजिये।

जिंदगी को जीयेगी किरण शान से,
मौत से बेवजह न डरा कीजिये।

इश्क का रिश्ता

इश्क का रिश्ता वे भी निभाते रहे,
ख्वाबों में ही सही आते-जाते रहे।

मैं तो सच के सहारे ही स्थिर रही,
पर यकीं वे मेरा डगमगाते रहे।

गीतों में ढाल उनको मैं लिखती रही.
और वे उसको पढ़ गुनगुनाते रहे।

मेरे हिस्से में आई उदासी भले ,
वे हमेशा मगर मुस्कुराते रहे।

यूँ ही कटते रहे दिन उम्मीदों तले,
ख्वाब भी तारे बन झिलमिलाते रहे।

किया मैंने यकीं उन पे बन्द आँखों से,
लेकिन वे मुझे आजमाते रहे।

हूँ किरण मैं हमेशा बिखरती रही,
फासले दरम्यां तड़पाते रहे।

क्या पिलाया आपने की

क्या पिलाया आपने की ,हैं नशे में चूर हम।
फर्क अब पड़ता नहीं क्यों , पास हैं की दूर हम।

लग रही थी जिंदगी, मेरी अधूरी सी मगर।
मिल गये हैं आप तो, फिर हो गये पुरनूर हम।

कर जो दी तारीफ़ मेरी, आपने कुछ इस तरह।
हो गये हैं धीरे-धीरे, खुद ब खुद मगरूर हम।

आपकी आँखों में ही, कुछ बात है लगता हमें ।
देखकर होता है जिसमें, नाज़ की हैं हूर हम।

जिंदगी की इस कड़ी में, हो गई शामिल किरण।
देखते हैं इस सफ़र में , जाते कितनी दूर हम ।।

अंधकार और प्रकाश में भेद बतलाता है बाल साहित्य

भगवती प्रसाद द्विवेदी जी

जन्म – जुलाई 1,1955, बलिया (उत्तर प्रदेश (के दल छपरा गाँव में।

आपको उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने वर्ष 2016 के लिए बाल साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती‘, सरस्वती बाल कल्याण – न्यास, इंदौर से देवपुत्र गौरव सम्मान। बिहार राष्ट्र भाषा परिषद के तत्वावधान में विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से वर्ष 2013 का निराला पुरस्कार, व 2014 का सूर पुरस्कार, चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट, शकुंतला सिरोठिया बाल साहित्य पुरस्कार, चमेली देवी महेन्द्र सम्मान, भारतीय बाल कल्याण संस्थान, राष्ट्र बंधु स्मृति सम्मान, विद्या वाचस्पति ( पी एच डी ) की मानद उपाधि आदि मिले हैं।

प्रकाशित कृतियाँ – साहित्य अकादमी से ‘भारतीय साहित्य के निर्माता‘ श्रृंखला के तहत प्रकाशित विनिबंध (मोनो ग्राफ) ‘महेन्द्र मिसिर‘ और ललित निबंध-संग्रह ‘माटी में सोनवा‘, चीर हरण, अस्तित्व बोध, फील गुड तथा अन्य कहानियाँ ( कहानी संग्रह) नई कोपलों की खातिर ( नवगीत संग्रह) एक और दिन का इजाफ़ा (कविता संग्रह ) इंटेलेक्चुअल पाॅर्लर ( व्यंग्य संग्रह) भविष्य का वर्तमान, थाती, सदी का सच ( लघुकथा संग्रह ) भिखारी ठाकुर :भोजपुरी के भारतेंदु, महेंद्र मिसिर :भोजपुरी गीतकार ( आलोचना ) भारतीय जनजातियाँ कल आज और कल ( शोध ) भोजपुरी लोककथा मंजू आ ( लोककथा संकलन ) आदि तथा बाल साहित्य की 83 पुस्तकों में मेरी प्रिय बाल कहानियाँ, मेरी प्रिय बाल कविताएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय।

प्रश्न 1- यह तो सत्य है कि हमारे जीवन में अचानक कुछ ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं कि हृदय सागर में भावनाओं की बाढ़ सी आ जाती है और अनायास ही लेखनी चल पड़ती है। हम यह जानना चाहते हैं कि आपके मन लेखन के प्रति अभिरुचि कबसे जागृत हुई?

उत्तर – बचपन की घटना है। जूनियर हाईस्कूल रेवती ( जो मेरे गाँव दल छपरा से करीब दस कीलोमीटर दूर है ) में हर शनिवार को बाल सभा हुआ करती थी जिसमें कविता – कहानी आदि सुनाना होता था। उस समय मेरे मन में बात आई कि क्यों न मैं स्वयं की लिखी हुई रचना प्रस्तुत करूँ और मैंने ऐसा ही किया भी। मेरी रचना सुनकर मेरे शिक्षक जनार्दन पाण्डेय बहुत प्रभावित हुए और पूछे कि यह किसकी रचना है? जब मैंने बताया कि यह रचना मेरी है तो उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और बोले कि लिखा करो। तभी से मैं लिखने लगा।
इसके अलावा भी डेढ़ साल की उम्र में ही मेरी माँ ईश्वर को प्यारी हो गई थीं तो मेरा लालन-पालन मेरी दादी करती थीं। वही मुझे बचपन में अपने साथ सुलाती और लोक कधाएँ सुनातीं जिसके प्रभाव में मैं आ गया और मेरे अंदर बाल साहित्य की तरफ़ अभिरुचि पैदा हुई।

प्रश्न 2 – बाल साहित्य बाल मन पर कितना प्रभावकारी होता है।

उत्तर – बाल साहित्य ही वह माध्यम है जिसके द्वारा बच्चों को बहुत सहजता से जीवन में बहुत कुछ हासिल करने की प्रेरणा दी जा सकती है।
बाल साहित्य अंधकार और प्रकाश में भेद बताता है अतः असफल व्यक्ति को भी सफल बनाने का दम रखता है।
अतः बाल साहित्य बच्चों के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि प्राण वायु।

प्रश्न – 3- बाल साहित्यकारों को किन – किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? तथा आज के युग में बच्चों को आकृष्ट करने के लिए बाल साहित्यकारों को किन – बातों को ध्यान में रखकर साहित्य सृजन करनी चाहिए?

उत्तर – बच्चे ईश्वर के प्रतिमूर्ति होते हैं। इसलिए उनके मनोविज्ञान को पढ़ते हुए उनके लिए सर्जन करना ईश्वरीय आराधना है।
बाल साहित्य की पहली शर्त है बच्चों को आनन्दित करना। बाल साहित्य उपदेशपरक नहीं होना चाहिए।
सीधे – सीधे-सीधे उपदेश देना बच्चों की अभिरुचि को दबाना है। इसलिए बाल साहित्यकारों को चाहिये कि वो अपनी बातों को मजेदार ढंग कविता, कहानी के माध्यम से कहते हुए कुछ उपदेश मूलक ऐसी बातें कह देना चाहिए जो कि बच्चों के मार्गदर्शन में सहायक साबित हो।
अतः बाल साहित्यकारों को सार्थक सृजन करने के लिए बाल मनोविज्ञान की गहरी पड़ताल करना आवश्यक हो जाता है।
एक तरह से बाल साहित्य सर्जना तलवार की धार पर चलने के समान है।

प्रश्न 4 – आज जिस तरह से बच्चे एकाकी, उग्र व चिड़चिड़े होते जा रहे हैं जो कि भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। ऐसे में साहितकारों का क्या दायित्व हो जाता है।

उत्तर – आज बच्चे एकाकी जीवन जीने को विवश हैं। उनका बचपन अभिभावकों की महात्वाकांक्षा के तले दबकर इस कदर भयाक्रांत है कि कि बच्चे बचपन को भूलकर सीधे बालक से किशोर और युवा हो रहे हैं। नतीजतन बच्चे कहीं कुंठित हो रहे हैं तो कहीं हीन भावना के शिकार, और कहीं कहीं तो बच्चे जीवन से घबराकर आत्महत्या तक कर लेते हैं जो कि पूरे समाज के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
इसके लिए जिम्मेदार हमारी शिक्षा प्रणाली भी है जो बच्चों को मानवीय मूल्यों से काट रही है।
ऐसे में सभी प्रतिष्ठित साहित्यकारों की नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे आज के संदर्भ में प्रगतिशील तत्वों को जोड़ कर कुछ ऐसा रच दें जो कि रोचकता के साथ – साथ प्रेरक तथा ज्ञानवर्धक हो।
साथ ही अभिभावकों को भी चाहिए कि वे अपने बच्चों को बाल पत्रिकाएँ पढ़ने के लिए प्रेरित करें व उपलब्ध कराएँ।
इसके लिए सरकार को भी अभियान चलाना चाहिये कि हर स्कूल में बच्चों के लिए पुस्तकालय हो।विद्यार्थियों में बाल सभाएँ होती रहें जिससे बच्चे सहज जीवन जी सकें और खेल – खेल में ही मानवीय मूल्यों को समझ सकें।

प्रश्न 5 -बाल साहित्य की सीमाएँ तथा सम्भावनाएँ क्या हैं?

उत्तर – बाल साहित्य की सम्भावनाएँ अनन्त हैं।दुनिया का हर क्षेत्र बाल साहित्य से जुड़ा हुआ है।
बस दिक्कत यह है कि बच्चों का साहित्य ( बच्चों की पत्रिकाएँ) बच्चों तक पहुँच नहीं पा रहा है। जबकि बच्चों की पत्रिकाएँ ही सही मायने में बच्चों की दोस्त हैं। क्योंकि बच्चों के दोस्त भले उनको भटका सकते हैं लेकिन पत्रिकाएँ खेल – खेल में रोचक ढंग से उनका सर्वांगीण विकास कर सकती हैं।

प्रश्न 6-बाल साहित्यकारों को साहित्य जगत में क्या वही स्थान मिलता है जितना कि अन्य साहित्यकारों को?

उत्तर – यह एक विडम्बना ही है कि एक तरफ तो हम बाल साहित्य को बहुत दुष्कर मानते हैं और दूसरी तरफ़ बाल साहित्य व साहित्यकारों की उपेक्षा करते हैं। पर जो सही मायने में रचनाकार है वह ऐसी उपेक्षा की परवाह नहीं करते हैं।

प्रश्न 7- आप वरिष्ठ साहित्यकार हैं और वर्षों से साहित्य की कई विधाओं पर लिखते आ रहे हैं। तो नये साहित्यकारों के लिए आपका क्या सुझाव है – क्या उन्हें एक ही विधा पर कलम चलानी चाहिये या अन्य विधाओं को भी आजमाना चाहिये?

उत्तर – हर रचनाकार अपनी अभिरुचि के अनुसार साहित्य सृजन करता है । कुछ साहित्यकार एक ही विधा में काम करते हैं तो कुछ बहुमुखी प्रतिभा के धनी होते हैं जो कई विधाओं में पूरी दक्षता के साथ काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर हम रविन्द्र नाथ टैगोर को ले सकते हैं।
अतः कौन साहित्यकार किस विधा में लिखता है वर उस साहित्यकार पर ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि इसके लिए न तो कोई शर्त है और न ही कोई सिद्धांत।

प्रश्न 8 – पुरस्कार किसी साहित्यकार को प्रोत्साहित तो करते हैं। किन्तु आज जिस तरह से पुरस्कारों की खरीद – बिक्री हो रही है वह साहित्य को कहाँ लेकर जायेगा?

उत्तर -यह अर्जित करने का क्षेत्र नहीं बल्कि अपना सर्वस्व लुटाने का क्षेत्र है। जो रचनाकार अच्छा रचेंगे उनकी रचनाएँ आज नहीं तो कल सराही भी जायेंगी और सम्मानित भी होंगी।
मुझे लगता है कि अच्छे व सच्चे रचनाकर को रचने में विश्वास करना चाहिए प्राप्ति में नहीं। क्योंकि जो प्राप्ति में विश्वास करते हैं वो कहीं विकृत राजनीति करते हैं तो कहीं गलत तरीके इस्तेमाल करके सही रचनाकर का हक छीनते हैं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।

गुस्सा क्यों आता है

गुस्से में आदमी पागल हो जाता है इसलिए वह उस समय अनियंत्रित होकर कह देता है और क्या कर देता है उसे स्वयं नहीं पता होता है। हाँ गुस्सा शांत होने पर उसे अपनी गलती का एहसास जरूर होता है। किंतु कहा जाता है न कि कमान से निकला हुआ तीर और जुबान से निकली हुई बात कभी वापस नहीं आती तो ऐसी परिस्थिति में गुस्साये इन्सान के पास अफसोस के सिवा कुछ बचा भी नहीं रहता है।
लोगों को गुस्सा क्यों आता है, इसकी कई वजह हैं।
एक इंसान को कब, कैसे और किस बात से गुस्सा आता है यह उसकी उम्र, लिंग, संस्कृति, माहौल तथा परवरिश पर निर्भर करता है।
कई बातें इंसान को गुस्सा दिला सकती हैं।
जैसे – जब उस इंसान के साथ नाइंसाफी होती है।
उसकी बेइज़्ज़ती की जाती है, या फिर उसका अधिकार छीनने की कोशिश की जाती है आदि
ऐसी बहुत सी वजह हैं जो इंसान को गुस्सा दिला सकती हैं।
गुस्सा आने पर अलग-अलग व्यक्ति का अलग – अलग बर्ताव हो जाता है। कुछ लोगों की गुस्से की आग जितनी जल्दी धधकती है उतनी ही जल्दी शांत भी हो जाती है तो कुछ लोगों के हृदय में कई दिनों, महीनों या सालों तक सुलगती रहती है।
मनोवैज्ञानिक हैरी एल. मिल्ज़ का कहना है: “इंसान बचपन से ही गुस्सा करना सीखता है। वह बड़े-बुज़ुर्गों को गुस्सा करते देख उनकी नकल उतारने की कोशिश करता है।”
अगर एक बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में होती है, जहाँ माँ-बाप हमेशा एक-दूसरे से भिड़े रहते हैं और बात-बात पर चिल्लाते हैं, तो बच्चे को यही सीख मिल रही होती है कि मुश्‍किलों का सामना करने के लिए गुस्सा करना ज़रूरी है।
वैसे अधिकांश लोगों को भूख लगने पर तथा तनाव की स्थिति में गुस्सा आता है।
वैसे यदि व्यक्ति स्वयं चाहे तो गुस्से को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए समझना होगा कि गुस्सा आपको ही नुकसान पहुँचाता है।

गुस्से को नियंत्रित करने के उपाय :

गुस्सा आने पर सबसे पहले तो मौन साध लेना चाहिए, क्योंकि गुस्से में अक्सर मनुष्य जहर उगलने लगता है।

बचपन से ही हम अपने बड़े बुजुर्गों से सुनते आये हैं कि गुस्सा आने पर ठंडा पानी पी लेना चाहिए।

कुछ लोग कहते हैं कि उलटी गिनती गिनने से भी गुस्सा कम होता है।

बात करते वक़्त यदि गर्मागर्म बहस होने लगे तो क्षमासहित तर्क – वितर्क वहीं बन्द कर देना चाहिए ।

मनपसंद गाना गाने या सुनने से भी गुस्सा कम होता है।
कुछ अच्छा सोचें।
मनपसंद व्यंजन बनाना शुरू करें।
शापिंग करें।
इन सब से भी बात न बने तो योगा करें ,क्योंकि योग हमारे शरीर और मन की संतुलित कर , क्रोध को नियंत्रण करने में बहुत हद तक मदद करता है।

बच्चों में चुगली की आदत न पनपने दें ।

बच्चों में चुगली की आदत न पनपने दें।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार चुगली करना अपने दिल की भड़ास निकालने का एक अच्छा माध्यम है।  या यूँ कहें कि  हीन भावना से ग्रस्त व्यक्ति चुगली करके खुद को तुष्ट करने का प्रयास करता है। इसीलिए वह खुद में कमियाँ ढूढने की बजाय दूसरों की मीन-मेख निकालने में अपनी उर्जा खपाते रहता है।
चुगलखोर व्यक्तियों की दोस्ती टिकाऊ नहीं होती :-
वैसे हम चुगलखोरों को लाख बुरा- भला कह लें लेकिन सच तो यही है कि निंदा रस में आनंद बहुत आता है। शायद यही वजह है कि अपेक्षाकृत चुगलखोरों के सम्बन्ध अधिक बनते हैं। या यूँ कहें कि चुगलखोरों की दोस्ती जल्दी हो जाती है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी दोस्ती टिकाऊ नहीं होती। क्योंकि वास्तविकता का पता लगने पर लोग चुगलखोरों से किनारा करने लगते हैं।

बच्चों में चुगलखोरी की आदत न पनपने दें :-

अक्सर देखा गया है कि बच्चे जब  गलती करते हुए अभिभावकों द्वारा पकड़े जाते हैं और पेरेंट्स पूछते हैं कि कहाँ से सीखा? तो वे अपने को तत्काल बचाने के लिए अपने दोस्तों या फिर भाई बहनों का नाम ले लेते हैं जिससे पेरेंट्स का ध्यान उनपर से हटकर दूसरों पर चला जाता है। यहीं से चुगलखोरी की आदत लगने लगती है।
एक बार सोनू की मम्मी सोनू को पैसे चोरी करते हुए पकड़ लीं और फिर डाट डपटकर पूछने लगीं कि यह सब कहाँ से सीखे। सोनू ने तब अपना बचाव करने के लिए अपने पड़ोस के दोस्त का नाम ले लिया। यह बात सोनू की मम्मी ने उसके दोस्त की मम्मी से यह  कह दिया। परिणामस्वरूप सोनू के दोस्त ने सोनू को चुगलखोर कहकर सोनू से दोस्ती तोड़ ली। और सोनू दुखी रहने लगा।
यहाँ पर सोनू की मम्मी को किसने सिखाया है यह नहीं पूछकर चोरी के साइडइफेक्ट्स बताकर आगे से ऐसा नहीं करने की सीख देनी चाहिए थी । साथ ही यह भी बताना चाहिए था कि चुगली करना और चोरी करना दोनों ही पाप है।
तुलना करने से भी बढ़ती है चुगली करने की प्रवृत्ति :-
कभी-कभी  पेरेंट्स अनजाने में ही अपने बच्चों को आहत कर चुगली करने की प्रवृति को बढ़ावा देते हैं।
दीपक के पापा हमेशा ही अपने दीपक की तुलना अपने दोस्त के बेटे कुणाल से करते हुए कुणाल की प्रशंसा कर दिया करते थे जिससे दीपक का कोमल सा बाल मन आहत हो जाता था और वह कुणाल की तरह बनने की कोशिश करता था और जब उसकी तरह बनने में नाकामयाब हो गया तो वह अपने पापा से कुणाल की झूठी सच्ची चुगली करने लगा।

रूल

कई बार ऐसा होता है जब हम छोटी-छोटी बातों से नाराज होकर एक-दूसरे से बातचीत करना बंद कर देते हैं। ऐसा करना किसी भी स्थिति में ठीक नहीं है….
हम अपने नजदीकी लोगों से भी तब संवाद करने से जी चुराने लगते हैं जब किसी बात को लेकर मन खिंच जाता है। परिवार या मित्रता में ऐसी स्थिति का पैदा होना सद्भावना तथा प्रेम के लिहाज से घातक है। न सिर्फ़ रिश्तों में कड़वाहट घुलने लगती है, बल्कि संवादहीनता के कारण गलतफहमियाँ दूर भी नहीं होती हैं। कई बार ऐसा होता है कि हमारा मन तो करता है कि किसी भी तरह से बातचीत शुरू हो, लेकिन दोनों में से कोई पहल करना नहीं चाहता है।

ऐसी ही एक घटना याद आ रही है। बात उन दिनों की है जब मेरा बड़ा बेटा ऋषि करीब बारह वर्ष का था और  छोटा बेटा आर्षी करीब छः वर्ष का। एकदिन किसी बात को लेकर दोनों भाई की आपस में लड़ाई हो गई तो मेरा छोटा बेटा आर्षी रोते हुए मुझसे अपने बड़े भाई ऋषि की शिकायत की। उसके बाद मैं भी झुंझलाकर ऋषि को डांट दी । फिर तो इस बात से नाराज होकर ऋषि ने आर्षी से बात करना बंद कर दिया। आर्षी अपने बड़े भाई ऋषि को  मनाने का भरसक प्रयास किया, साॅरी भी बोला लेकिन  ऋषि बड़े भाई वाला अकड़ दिखाते हुए नहीं माना। थक हारकर आर्षी फिर अपनी आँखों में आँसू भरकर मेरे पास आया और कुछ गुस्सा करते हुए ही बोला – मम्मी अब आप इस घर का रूल ( नियम) बना दीजिए कि आपस में चाहे जितनी भी लड़ाई हो फैमिली का कोई भी मेम्बर एक-दूसरे से बात करना नहीं बन्द कर सकता है।
आर्षी की बात सुनकर स्वतः ही मेरे होठों पर मुस्कान बिखर गई और मैं दोनों भाई में सुलह कराते हुए आर्षी के कहे मुताबिक अपने घर का रूल बना दी।
इस अनुभव के माध्यम से मैं यह कहना चाहती हूँ कि रिश्ते अनमोल होते हैं इसलिये छोटी-छोटी बातों से आहत होकर रिश्तों में संवाद नहीं बन्द करना चाहिए।

रिकवरी रूम में वेलेंटाइन डे

स्ट्रेचर पर लेटकर ऑपरेशन थियेटर की तरफ जाते हुए रीमा को लग रहा था कि जल्लाद रुपी परिचारिकाएँ उसे फांसी के तख्ते तक ले जा रही हैं, हृदय की धड़कने और भी तेजी से धड़क रही थीं। वह मन ही मन सोंच रही थी कि शायद यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है इसलिए वह जी भर कर देखना चाहती थी दुनिया को। पर नजरें नहीं मिला पा रही थी परिजनों से कि कहीं उसकी आँखें छलक कर उसकी पोल न खोल दें। क्योंकि वह अपने परिजनों के सामने  खुद को बिलकुल निर्भीक दिखाने का अभिनय कर रही थी!परिचारिकाएं ऑपरेशन थियेटर के दरवाजे के सामने स्ट्रेचर रोक दीं . और तभी किसी यमदूत की तरह डाक्टर आ गये .. स्ट्रेचर के साथ साथ डॉक्टर  उसके साथ चल रहे थे। चलते चलते वे अपनी बातों में उलझाने लगे थे ।  और फिर उसे आॅपरेशन थियेटर में ले गये। वहाँ डाॅक्टर ने रीमा को बातों ही बातों में उलझाकर बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया ! करीब ३६ घंटे बाद १४ फरवरी को उसकी आँखें रुक – रुक कर खुल रही थी ..! आँखें खुलते ही  सामने अपने पति को देख उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि वह जीवित है या कि  स्वप्न देख रही है। इसलिए वह अपने पति की तरफ अपना हाँथ बढ़ाया। जब उसके पति ने उसका हाथ पकड़ा तब उसे विश्वास हुआ कि वह सचमुच जीवित है ! उस समय उसे अपनी जिन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगी थी। वह हास्पीटल के रिकवरी रूम का वेलेंटाइन डे सबसे खूबसूरत दिन लग रहा था..!