आक्रोश

आक्रोशित हैं बेटियाँ, माताएँ भयभीत।
आग बबूला लेखनी , लिखे कौन सा गीत।।

सुलग रही है वेदना, खौल रहा है खून।
किरण पकड़कर क्यों नहीं, दिया दनुज को भून??

पूछ रही हैं नारियाँ , झेलें कबतक दंश?
क्यों बढ़ता ही जा रहा, कुत्सिकता का वंश??

चलो थाम लो बेटियों, हाथों में समशीर ।
दिखे जहाँ भी भेड़िये, उन्हें वहीं दो चीर ।।

दृढ़ होकर अब बेटियों , हो जा स्वयं सशक्त।
बहा कालिका रूप धर , दुष्ट जनो का रक्त।।

समय आ गया बेटियों, रहो नहीं अब मूक।
दिखे दरिंदे जो कहीं , वहीं उन्हें दो फूंक ।।

आक्रोश&rdquo पर एक विचार;

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s