उषा किरण खान का कथा लोक

वैसे तो मैं स्वयं ही पद्मश्री उषा किरण खान दीदी की लेखन शैली से अत्यधिक प्रभावित हूँ जिसको पढ़ते हुए पढ़ने की तृष्णा शांत होने की बजाय और भी बढ़ती जाती है।  ऐसे में विदूषी बहन डाॅ सोनी पाण्डेय द्वारा सम्पादित पुस्तक गुलाबी रंग के आवरण में लिपटी, जिसपर उषा दीदी की तीन – तीन दैदिप्यमान छवि अंकित है ‘उषा किरण खान का कथा लोक’ साहित्य जगत के लिए एक उपहार ही है। उपहार इसलिए क्योंकि एक सौ बीस पृष्ठों में संकलित इस पुस्तक मे चौदह विदूषियों, मनिषियों का उषा किरण खान जी के कथा लोक पर अपने-अपने विचार संग्रहित हैं।
सभी के विचार उषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए इतनी खूबसूरती से लिखी गई है कि पाठक बस पढ़ता ही चला जायेगा और पढ़ते हुए उनकी कहानियों को महसूसने लगेगा। इतना ही नहीं  इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों के मन में उषा किरण खान जी की कहानियों को पढ़ने की इतनी उत्कंठा बढ़ जायेगी कि वह पढ़े बिना रह ही नहीं सकता है।
सर्वप्रथम पुस्तक की भूमिका में सोनी पाण्डेय जी लिखती हैं –

मैथिली की कथा लेखिका ‘ऊषा किरण खान’ की कहानियों से गुजरते हुए जो तत्व प्रमुखता से उभरता है वह है “आगे क्या हुआ?” की जिज्ञासा। आपकी कहानियाँ अपनी सहज रवानगी में भाषा को लोकरंग धारण किये पाठक को उस लोक में ले जाती है जहाँ की वह बात करती हैं।……..

विदुषी भावना शेखर जी ने ऊषा किरण खान की सवर्ण विधवाएँ पर बहुत ही खूबसूरती से प्रकाश डाला है जो अवश्य ही पठनीय है।
वो लिखती हैं –
मैथिली और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में सिद्धहस्त उषा जी का साहित्य अपने ग्राम्य अनुभवों के कारण उपेक्षितों, वंचितों के जीवन संघर्ष का आइना बन पड़ा है। दलितों की पीड़ा और जिजीविषा के सूक्ष्म और प्रभावी रेखांकन के लिए उन्हें पहचान मिली किन्तु बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि अपने विपुल साहित्य में बिखरे नारी पात्रों में न केवल दलित अपितु सवर्ण स्त्रियों की पीड़ा का व्याख्यान भी उन्होंने सिद्दत से रचा है। उनकी कहानियों में खास तौर पर विधवा पात्रों की व्यथा – पाठकों को उद्वेलित करती हैं। और लम्बे समय तक भीतर ही भीतर मन को कचोटती हैं।….

नीलकंठ और जलकुम्भी एक विश्लेषण में रानी सुमिता कहती हैं –
कथाकार ऊषा किरण खान की कहानियों का कथा संसार बेहद विस्तृत है। ग्रामीण परिवेश पर लिखी गई इनकी कहानियाँ गाँवों की लगभग हर समस्या को ढूढती और खँघालती नज़र आती है। कहानी नीलकंठ सुदूर गाँवों में जा पहुंची है और कहानी की आड़ में घर – घर आ पसरे नक्सली जो सामान्य जन का नकाब ओढ़े रहते हैं, को उजागर किया है।….

और उषा किरण खान की कहानियों का नाट्य प्रयोग में उषा दीदी की बहुआयामी प्रतिभा की धनी विदुषी  पुत्री कनुप्रिया कहती हैं – उषा किरण खान मेरी माँ हैं। माँ की कहानियाँ बचपन से ही पढ़ रही हूँ मैं, पर मर्म अब जाकर समझ आया है । चूँकि बचपन से ही मंच और रेडियो पर हिन्दी, मैथिली नाटक करती आई हूँ तो हर कलाकार की तरह मैं भी यह सोचती थी कि काश इस किरदार को मैं भी अपने अंदर उतार सकूँ। किसी भी चरित्र को निभाना आज भी एक स्वप्न सा अनुभव होता है, एक ही जीवन काल में कई सारे जीवन जीना।…..

इस प्रकार से इस पुस्तक में ( शेफाली झर रही है  – डाॅ विद्या निवास मिश्र
जीवनानुभवों का उदात्त – डाॅ चन्द्र कला त्रिपाठी
जल प्लावन में तटबंध की तरह – प्रज्ञा पाण्डेय
सहज किन्तु साधारण नहीं – पूनम सिन्हा
लोक जीवन का समुच्चय – डाॅ गौरी त्रिपाठी
उषा किरण खान की कहानियाँ – आभा बोधिसत्व
अतीत के वर्तमान में वृहत्तर स्वीकृति – पूनम सिंह
गरीबी को परास्त करते पतः साधक बच्चे – सुधा बाला
जीवन मूल्यों का आलोक – डाॅ राजीव कुमार वर्मा
हमके ओढ़ा द चादरिया – आशीष कुमार) ने भी ऊषा किरण खान जी की कथाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हुए बहुत ही खूबसूरती से अपने-अपने भाव प्रकट किये हैं जो श्लाघनीय है।
वैसे तो यह पुस्तक सभी को अच्छी लगेगी लेकिन शोधार्थियों के लिए तो यह पुस्तक सोनी पाण्डेय जी के द्वारा एक उपहार की तरह है।
पुस्तक की छपाई स्पष्ट है और पन्ने सामान्य हैं। फिर भी पुस्तक की पठन सामग्री को देखते हुए मूल्य ठीक ही कहा जायेगा।
एक सुन्दर और सार्थक कार्य की सराहना करते हुए पुस्तक की सम्पादक सोनी पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ।

समीक्षक – किरण सिंह
पुस्तक का नाम – उषा किरण खान का कथा लोक
प्रकाशक – आपस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, अयोध्या, उत्तर प्रदेश
मूल्य – 285,
कवर – पेपर बैक
पृष्ठ संख्या – 120

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